Suljhe Ansuljhe - 14 in Hindi Social Stories by Pragati Gupta books and stories PDF | सुलझे...अनसुलझे - 14

सुलझे...अनसुलझे - 14

सुलझे...अनसुलझे

पलायन क्यों

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काफ़ी अरसे बाद आज मिसेस तोमर को अपनी बेटी दिव्या के साथ अपने सेंटर की सीढ़ियों पर मैंने चढ़ते देखा| अनायास ही मन में विचार आया कि इतने समय बाद मिसेस तोमर के आने की क्या वजह हो सकती है| कई साल पहले तक उनके आने की एक वजह थी| उनके ससुर की नियमित जांचें हमारी लैब से ही हुआ करती थी| तब अक्सर ही दिव्या कभी अकेले तो कभी माँ के साथ तकनीशियन को अपने दादा जी का सैंपल लेने के लिए बुलाने आती थी|

घर काफ़ी नज़दीक होने से स्टाफ को भी सैंपल लाने में कोई असुविधा नहीं होती थी| शाम तक परिवार का कोई भी सदस्य आकर दादा जी की रिपोर्ट्स ले जाता था| यह क्रम क़रीब पांच से छ: वर्ष चला| बाद में सुनने में आया कि दादा जी का देवलोकगमन हो गया है| तब इन सबके नियमित रूप से आने-जाने का क्रम टूट गया था|

मिसेस तोमर को जब मैंने रिसेप्शन की बजाय मेरे ही चेंबर की तरफ़ आते हुए देखा तो मुस्कुरा कर मैंने उनसे कहा ....

‘कैसी है आप मिसेस तोमर? काफ़ी लम्बे समय बाद आपको देख रही हूँ|’’

वास्तविकता तो यह है अगर कोई डॉक्टर अपने क्लिनिक पर किसी मरीज़ से यह पूछे कि आप बहुत दिनों बाद दिखाई दिए| तो बहुधा ही इसके मायने गलत ही ले लिए जाते हैं कि पता नहीं कैसा डॉक्टर है जो चाहता है हम बीमार हो और इनके पास दिखाने आए| बस इसी बात को सोच कर मैंने मिसेस तोमर से इतना ही पूछा| फिर उनके उत्तर का इंतज़ार करने लगी|

‘कुछ नहीं मेम इधर से गुजर रही थी सोचा आपसे मिलती चलूँ| चूँकि आजकल दिव्या मेरे पास ही थी| सोचा आपसे इसको भी मिलवाती चलूँ|’… मिसेस तोमर बोली|

‘आप लोग का जब जांचों के लिए सेंटर पर आना होता था उस समय दिव्या इंजिनियरिंग कर चुकी थी| फिर किसी एडवांस कोर्स के लिए हिन्दुस्तान के बाहर जा रही थी न|’..मैंने मिसेस तोमर से पूछा...

‘हाँ! मेम इसके कोर्स ख़तम होने के बाद आज से दो साल पहले इसकी शादी भी बहुत धूमधाम से हमने की| पर इसका मन नहीं लगा ससुराल में| पिछले एक साल से यह हमारे पास ही है|’.. मिसेस तोमर यह बोल कर चुप हो गई...

अब न चाहते हुए भी मैंने दिव्या की ओर देख कर पूछ ही डाला|..

‘क्या हुआ था दिव्या?’....

‘कुछ नहीं आंटी बस मुझे अच्छा नहीं लगा वहाँ| वो लोग मेरे लायक नहीं थे|’….दिव्या ने ज़वाब दिया....

‘तुम ये कैसे कह सकती हो वो तुम्हारे लायक नहीं थे| यह भी तो हो सकता है तुम उनके लायक न हो| मुझे कुछ विस्तृत में बताओगी तो शायद मैं समझ पाऊं तुम्हारी परेशानी को|’…

कुछ ऐसा बोलकर मैं दिव्या के चेहरे के आते-जाते भावों को पढने कि चेष्टा करने लगी| जाने क्यों मुझे लगा उसको मेरी बात परेशान कर गई|

‘क्या हुआ दिव्या?’.. मैंने पूछा ....

‘आंटी मैं इतनी पढ़ी-लिखी लड़की हूँ| मेरा एक अपना आर्थिक सबलता से जुड़ा हुआ स्तर है| क्या ऐसा हो सकता है कि मैं किसी के लायक न होऊं|’.. कुछ ऐसा बोल कर दिव्या चुपचाप मेरे मुँह को ताकने लगी|

‘बेटा! तुम शायद मेरी यह बात इस तरह नहीं समझ पाओ| तसल्ली से बैठ कर मुझे एक-एक कर जब सारी बातें विस्तृत में बताओगी तब मैं तुमको बताउंगी मेरे कहने का क्या तात्पर्य था|’..मैंने दिव्या को कहा ...

‘आंटी! विनय से शादी के बाद कुछ समय तक तो सब बहुत अच्छा चला| हम लोग खूब बाहर घूमते-फिरते,खाते-पीते थे| बहुत अच्छा समय था हमारा| पर कुछ समय बाद ही छोटी-छोटी बातों पर हमारा कलह होना शुरू हुआ| जैसे कि ऑफिस जाने से पहले कौन किस काम को करेगा| घर खर्च में कौन पैसे देगा और भी बहुत कुछ|...

अब आप ही बताओ आंटी मैं इतना कमाती हूँ क्या मैं घर के वह काम भी करुँगी जो एक बाई भी कर सकती है| आंटी मैंने कभी अपने घर पर ही ऐसे कोई काम नहीं किये क्यों कि मम्मी के यहाँ पूरे दिन के नौकर थे| मुझे तो रसोई से जुड़े काम करने ही नहीं आते| मैं क्यों सीखूं यह सब जबकि मेरा सैलरी पैकज विनय से कम तो नहीं|’..यह सब बोल कर दिव्या चुप हो गयी”

अब सबसे पहले तो मैंने मिसेस तोमर तरफ देखा क्यों कि मैं उनकी प्रतिक्रिया से भी अवगत होना चाहती थी| उनकी आँखों में उतर आई नमी मुझ से छिपी न रह सकी| चूँकि मैं चाहती थी वो कुछ बोले पर शायद बहुत कुछ उन्होंने न बोलकर भी कह दिया|

शायद मिसेस तोमर अपनी वयस्क लड़की के सामने उसकी गलतियों को या वह क्या–क्या गलत सोच और कर रही है....नहीं बोलना चाहती थी| ताकि उनको किसी भी तरह की विपरीत स्थिति का सामना न करना पड़े|

बहुधा जब बच्चे आत्मनिर्भर हो जाते हैं तो उनको माँ-बाप कि बातें समझ नहीं आती है| उनका यूँ अचानक आज दिव्या को मेरे पास लाना और उसकी समस्या को बता कर चुपचाप सुनना बहुत कुछ कह रहा था| मैंने दिव्या के सामने तो उनको सिर्फ यही कहा मिसेस तोमर आप मेरे से मिलने आती रहा कीजिये आपसे मिलकर अच्छा लगता है| फिर मैंने अपनी बात दिव्या से कहना शुरू किया|

‘दिव्या! मैं बेहद ख़ुश हूँ बेटा कि तुम पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर हो और मैं चाहती हूँ कि तुम दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की करो| पर तुम्हारी कुछ बातें मुझे समझ नहीं आ रही जिनको मैं बताना और तुमसे जानना चाहूंगी|..

तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई का सबसे ज्यादा किसको फायदा है? क्या सिर्फ़ पढाई-लिखाई से परिवार कि जरूरतें पूरी हो जाती है? तुम अपनी सैलरी से बाई तो लगा सकती हो| पर खाना बनाने और खिलाने में बाई के भाव तुम्हारे अपने भावों और अपनों के प्रति भावों से मेल खाएंगे?...

हम सभी स्त्री हो या पुरुष रसोई जैसी महत्वपूर्ण जगह पर बगैर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवाये, क्या सभी कुछ नौकर और बाइयों पर छोड़ सकते है| जो हमारा मेहनत का रुपया है, क्या हम उसको आँखें बंद करके उन लोगों पर लुटा सकते है, जिनके मदद सिर्फ रुपयों से जुडी है| वह सब रुपयों के लिए हमारे यहाँ काम करते हैं|...

मैं यह नहीं कहती तुम सारा समय रसोई को दो| पर आज के समय मैं स्त्री हो या पुरुष दोनों को ही किसी भी फ्रंट पर काम करने कि आदत होनी चाहिए| आपका कमाया हुआ आपके अकाउंट को तो भर सकता है पर परिवार को आपकी और आपके भावों कि ज़रूरत होती है|....

अब आती है बात कि स्त्री या पुरुष में जो ज्यादा फ्री होता, वही सब मैनेजमेंट देखता है| अपनी- अपनी काबिलियत के हिसाब से परिवार को चलाया जाता है| पर हाँ स्त्री हो या पुरुष अगर कोई अपने कमाए हुए को अपने अहम् का हिस्सा बना कर यह सोचे कि अगर हम कमा रहे है तो और कोई भी जिम्मेवारी हमारी नहीं, तो इस बात को सही नहीं माना जा सकता|...

दिव्या आपके माँ-पापा ने आपको आत्मनिर्भर बनाने के लिए ही उच्च पढाई कि व्यवस्था की| पर अगर आज तुम उनसे अगर पूछोगी कि तो वो भी यही कहेंगे कि अपने घर परिवार को संभालना तुम्हारी प्राथमिक जिम्मेवारी है| दिव्या हम कितने भी शिक्षित हो जाये कितना भी कमाए हम सभी को बहुत कुछ संभालना होता है बेटा|...

मैं चूँकि आपके पति विनय से नहीं मिली हूँ पर उसको भी यही सब कहना चाहूंगी| आप दोनों की शिक्षा सिर्फ़ रुपया-पैसा कमाने से ही नहीं जुडी है| बल्कि पढ़ाई-लिखाई व्यक्ति को सूझ-बूझ से सब निर्णय लेने कि क्षमता प्रदान करती है| बस सोचने के तरीके बदलने होते है|...

बहुत छोटी-छोटी बातें है| अगर माँ-पापा के यहाँ आपने कुछ नहीं किया तो उसकी वजह थी आपका पढ़ना| पर अगर आपने उस समय भी काम करना सीखा होता तो रसोई भी बोझ नहीं लगती बेटा| सोच कर देखो|

शिक्षा का मानी ज़िम्मेवारिओं से पलायन नहीं है बेटा| विनय हो या तुम....भावों से जीओ और भावों के लिए जियो| विनय हो या तुम अहम् को एक तरफ रखकर सोचना शुरू करो| सब बहुत सुन्दर दिखेगा| आज आप दोनों ही समर्थ हैं| पढ़ाई को अहम् का हिस्सा बना कर नहीं बल्कि समझदारी का हिस्सा बनाकर निर्णय लो|....

अब कि बार जब विनय से मिलों तो उसको भी मेरे पास लाना| मिलना चाहूंगी उससे| बहुत देर से मेरी बातें सुनते-सुनते दिव्या सुबकते हुए बोली.... ‘आंटी मम्मी भी यही कहती है पर क्या मैं ही गलत हूँ?’..

‘तुम ही गलत हो....यह कब कहा बेटा मैंने| पर सोचना शुरू करो| कलह से एक समझदार व्यक्ति ही आसानी से निकल सकता है| समझदारी के लिए सिर्फ पढ़ाई-लिखाई ही जरूरी नहीं होती| जो भी निर्णय लो कुछ समय के लिए यह भूल जाओ कि तुम बहुत रुपया कमा रही हो| बल्कि यह सोचो कि एक अच्छी ज़िन्दगी प्रेम के साथ कैसे चलाई जा सकती है क्यों कि प्रेम के लिए भावों से जुड़ने कि ज़रूरत होती है|’..

‘हाँ आंटी! मैं समझ रही हूँ| कोशिश करूंगी सब अच्छा हो जाये| आपकी मुझे कभी ज़रूरत हुई तो आप मदद करेगी न|’...

‘हाँ बेटा जरूर| तुम ख़ुश रहोगी मेरे लिए यही बहुत आनंद से जुडी बात है बेटा|’..

अपनी बात ख़तम कर मैंने मिसेस तोमर कि तरफ देखा| जिनके मौन में मुझे धन्यवाद नज़र आ रहा था| कई बार माँ-बाप का समझाया हुआ बच्चे गलत तरीके से लेते है| इसी वजह से माँ-बाप बच्चे को समझाने में असमर्थ रहते है| बच्चों को लगता है, माँ-बाप उनको समझना ही नहीं चाहते|

दोनों के जाने कि बाद कितनी ही देर तक मैं यह सोचती रही कि माँ बाप बच्चो को शिक्षा उनको समर्थ बनाने के लिए देते है| वो कभी नहीं चाहते कि बच्चे बाकी बातों की उपेक्षा करें| जिनकी वजह से समस्याएँ आती है| लड़का हो या लड़की उसके लिए कोई भी काम हेय नहीं होना चाहिए| मिलजुल कर ही हर बात के समाधान निकलते हैं|

अगर शिक्षा समझदारी न दे तो व्यर्थ है....सोच कर देखिये जरूर||

प्रगति गुप्ता