Suljhe Ansuljhe - 15 in Hindi Social Stories by Pragati Gupta books and stories PDF | सुलझे...अनसुलझे - 15

सुलझे...अनसुलझे - 15

सुलझे...अनसुलझे

प्यार और डांट

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बहुत साल पहले हमने अपने घर में ही, एक कमरे का सेट मरीज़ों को देखने के लिए बनवाया हुआ था| ताकि समयानुसार उसका उपयोग कर सके। प्रैक्टिस के शुरुवाती दौर में वहां मरीज़ देखे| पर जैसे-जैसे समय ग़ुज़रा, मुख्य क्लिनिक पर ही काफ़ी समय निकल जाता था| घर आते-आते बहुत देरी हो जाती थी|

फिर हमने घर की क्लीनिक को बंद करने का निर्णय लिया| साथ ही उसको किसी छोटे परिवार को किराए पर देने का भी निर्णय लिया| ताकि घर में थोड़ी चहलपहल रहे।

तभी किसी दुकान में कार्यरत दिनेश और उसकी पत्नी दिव्या ने घर के लिए हमसे संपर्क किया| दोनो ही पढ़े-लिखे समझदार लगे| हमने उनको वो कमरा दे दिया। उनका पंद्रह-सोलह साल का एक बेटा था मयंक। दिखने में बहुत ही प्यारा बच्चा था पर थोड़ा गुस्सा ज्यादा करता था| शायद अकेला होने कि वजह से छोटी-छोटी बातों पर अपना रोष प्रकट करना उसके व्यवहार में था| अक्सर किशोर अवस्था में बच्चे स्वयं को बहुत समझदार समझने लगते है पर हक़ीकत में वह समझदार हो रहे होते है|

इकलौता बेटा होने की वजह से पति-पत्नी दोनों का ही अधिकतम समय और ध्यान सिर्फ मयंक पर होता। दिव्या अपने बेटे को बहुत अच्छी पढ़ाई के साथ-साथ, उसको वो सब देना चाहती थी जो उसको नही मिला था। महंगा मोबाइल आयदिन की उसकी छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करने में दिव्या को आनंद आता था। सिर्फ इसी वजह से दिव्या ने भी नौकरी की| ताकि दिनेश के ऊपर भार न पड़े।

कई बार मयंक को पढ़ाई में कुछ समझना होता तो मेरे पास आ जाता था। वैसे तो काफी कुछ उसका कोचिंग में पूरा हो जाता था पर उसको जब स्कूली विषयों से इतर भी कुछ चर्चा करनी होती तो मेरे और डॉ गुप्ता के पास आकर बैठ जाता|

आठ-नौ मास ही गुजरे होंगे कि मुझे अक्सर शाम को माँ-बेटे की किसी न किसी बात पर बहस सुनाई देती। बहुत अधिक लाड़ प्यार की वजह से अपनी हर ज़िद को पूरा करवा लेना मयंक अपना हक़ समझता था। उसकी पढ़ाई को लेकर दिव्या बहुत चिंतित रहती। एक दिन मुझे दिव्या का जोर- जोर से मयंक को डांटना सुनाई दिया ।

“क्यों नही जाना चाहते हो तुम कोचिंग पर? तुम्हारी हर ख्वाहिश को पूरा करने के लिए मैंने नौकरी की| हम दोनों चाहते है तुम खूब पढ़ो| ...स्कूल के बाद बचे हुए समय में सिर्फ टी.वी. या मोबाइल लेकर बैठे रहोगे तो पढ़ोगे कब?”..

“बहुत टोकती है आप मुझे….पढ़ लूंगा मुझे पता है क्या करना है|..बड़ा हो गया हूँ| आपकी डांट मुझे बिल्कुल अच्छी नही लगती।” मयंक का जवाब मुझे सुनाई दिया।

“इतनी आसान नही है ज़िन्दगी बेटा! अगर बड़े हो गए हो तो बातों की गहराई तक भी पहुँचकर समझने की कोशिश करो।”..दिव्या ने समझाने के उद्देश्य से कहा।

चूंकि एक कमरे का ही घर था तो थोड़ी देर बाद मैंने मयंक को कमरे से निकल कर घर के बाहर जाते देखा। उस समय बात आई गई हो गई। अगले दिन सवेरे हम जब क्लीनिक के लिए निकल रहे थे। दिव्या ने डॉ.गुप्ता से आकर मयंक के लिए मेडिसिन ली और बताया आज मयंक के पेट में दर्द है| वह स्कूल नही जा रहा है। उसको मेडिसिन देकर हम सभी अपने-अपने काम पर निकल गए। मेरे दिमाग में अभी तक मयंक की नासमझी घूम रही थी। सेंटर पर पहुंच कर मैं भी अपने कामों में व्यस्त हो गई। करीब तीन बजे मेरे पास दिव्या का फ़ोन आया ।

“मैम! मयंक घर पर नही है और हम उसका मोबाइल लगा रहे हैं तो आउट ऑफ़ रीच या स्विच ऑफ आ रहा है|..हम दोनों अपने दोस्तों और उसके दोस्तों के पास देखने जा रहे है| आप घर लौटने पर उसको देखें तो उसको प्लीज कहीं जाने न दें ।" फ़ोन पर बोलते-बोलते दिव्या को रुलाई छूट गई थी और वह लगातार रोते-रोते बोल रही थी।

“दिव्या! संभालो अपने आपको, मिल जाएगा मयंक।” मैंने ऐसा बोल कर उसको सांत्वना देने की कोशिश की। पर आज मेरी छटी इंद्री भी बोल रही थी कि मयंक ने गुस्से में कुछ न कुछ नासमझी का निर्णय लिया है। मयंक के न मिलने की वज़ह से थोड़ी घबराहट हम दोनों को भी हो रही थी| मयंक अभी इतना बड़ा नही हुआ था कि सभी कुछ अपना संभाल सके| आजकल के माहौल में बच्चों से जुड़ी आपराधिक वारदातें भी तो बहुत सुनने में आने लगी थी।

मयंक के कहीं न मिलने पर दिनेश और दिव्या ने पुलिस रिपोर्ट भी करवाई। पूरा दिन निकल चुका था। दोनो के मुंह में खाने का एक निवाला भी नही गया। मिलने-जुलने वाले भी बराबर हर तरह से कोशिशों में लगे थे| किसी तरह मयंक का पता चल जाये।

पूरी रात जाने कैसे कटी होगी उन दोनों की हम महसूस कर सकते थे| हम भी उनकी परेशानी में शामिल हो चुके थे। तभी अचानक सवेरे अहमदाबाद से मयंक का फ़ोन आया.....दिव्या के फ़ोन पर। शायद वह दिनेश से बात करने की हिम्मत जुटा नही पाया हो| तभी उसने अपने पापा को फोन नहीं किया। ऐसा मेरे दिमाग़ में आया|

“मां मैं मुम्बई जा रहा हूँ मैं कुछ भी करूंगा वहां, आप चिंता मत करना।बोलकर मयंक चुप हो गया...

सौभाग्यवश मयंक का फ़ोन खुल जाने से पुलिस ने भी उसको ट्रेक कर लिया था और आगे से आगे इन्फॉर्म कर उसको मुम्बई स्टेशन पर ही संभालने की जिम्मेवारी पुलिस ने बख़ूबी निभाई। दिनेश ने भी मुंबई में रहने वाले अपने किसी दोस्त को मयंक के पास पहुँचने को कहा और उसको ख़ुद के मुम्बई पहुंचने तक संभालने को कहा।

बहुत दौड़-भाग से गुजरे चार दिनों के बाद मयंक को दिनेश वापस घर लेकर आ गया।

इस बीच जाने कितनी ही बार दिनेश और दिव्या दोनों की रुलाई फूटी..बगैर खाये पीए दोनो ने चार दिन किस तरह गुजारे ईश्वर ही जानता था। उम्र में हम दोनों उन दोनो से बड़े थे| साथ ही मकान-मालिक होने की वजह से, हमारी इस परिवार के दुःख में शामिल होने की अप्रत्यक्ष-सी जिम्मेवारी बन गई थी।

मैंने अभी तक एक शब्द भी दिनेश और दिव्या को ढांढस के अलावा नही बोला था। जैसे ही चार दिन बाद मयंक घर लौटा। दिव्या और दिनेश की आंखों में आँसुओं और लाड़ के अलावा कुछ नही दिख रहा था। उन दोनों को देख कर यही लगता था जैसे गलती मयंक ने न करके, दिव्या और दिनेश ने की हो। कई बार बच्चे माँ-बाप को कितना लाचार महसूस करवा देते है| मानो कि बच्चों की भलाई सोचना भी बच्चे गलत तरह से ले जायेंगे।

चार-पांच दिन और बीते होंगे तो एक दिन मयंक ने हमारी घंटी बजाई| मेरे दरवाजे पर पहुँचकर बोला तो कुछ नही बस प्रश्नसूचक दृष्टि से मयंक को देखा।

“आंटी दो दिन बाद मेरा एग्जाम है कुछ समझना था आपसे ,आप फ्री हो तो समझा दीजिये।” मयंक बोला

मयंक के प्रति मेरा अबोला गुस्सा,जाने कैसे चुप होकर बैठा था| यह मैं ही जानती थी| पर उसको अपने सामने पा कर स्वयं को रोक नहीं पाई|

“तुम मुझे क्या मानते हो मयंक? सिर्फ आंटी या गुरु की जगह भी देते हो।” मेरा यूँ अचानक इस तरह का प्रश्न पूछना मयंक को सकपका गया।

“आपसे पढ़ने आता हूँ आप और अंकल, मम्मा-पापा से काफी बड़े भी हैं, तो बहुत आदर करता हूँ आपका।” मयंक ने बहुत शांत मन से जवाब दिया।

ध्यान से अब मेरी बात सुनो| चूंकि तुम इतने छोटे बच्चे नही हो और तुम्हारी गुरु होने के नाते, काश मैं तुमको एक थप्पड़ लगा पाती| जानते हो तुम्हारे माँ और पापा ने चार दिन कुछ नहीं खाया| ऐसे ही बग़ैर खाने के चार दिन तक, एक ही जगह पर तुमको बांध सकती। ताकि तुम अहसास करो अपने पेरेंट्स के उस कष्ट को जिसमे उन्होंने तुम्हारी अनुपस्थिति की यातना को भोगा है।....

क्या तुम्हारे भले की सोचना उनकी गलती है? या फिर तुमको उनको कष्ट देने में बहुत अच्छा लगा? यह कदम उठाने से पहले तुम उनकी चिंता क्यों नहीं कर पाए। कैसे तुमने यह सोचा इतनी छोटी उम्र में घर के बाहर की दुनिया तुमको गलत राह पर नही ले जाएगी। बेशक़ तुम्हारे पेरेंट्स ने तुम्हारे लौटने पर डांटा या मारा नही, पर मेरे पास अगर कुछ समझना पढ़ना हो तो मुझे तुम्हारे लिखे हुए दो पत्र चाहिए, वो भी दिल से लिखे हुए। एक तो मुझे लिखो अपनी इन हरकतों की वजह बताते हुए।....

दूसरा अपने पेरेंट्स से माफ़ी मांगो| अगर लगता है कुछ गलत किया है। तुमने किसी के बहकावे में आकर यह निर्णय तो नही लिया वो भी बताना। फिर आना मेरे पास तब तुमको बताऊँगी,जीवन में किताबी पढ़ाई-लिखाई के अलावा भी बहुत समझना, जीवन का हिस्सा है। इसको तुम्हें समझना होगा क्योंकि तुम बड़े हो रहे हो और तुम्हारी यह नादानी हम सबके लिए विशेषतः तुम्हारे माँ-बाबा के लिए बहुत कष्टदाई रही है|”

“सॉरी आंटी मुझ से आवेश में आकर ऐसी गलती हुई है। जानता हूँ मैं। आपसे और मम्मी पापा से जरूर लिखित में माफ़ी मांगूगा।” मुझे खुद समझ नही आ रहा था मम्मी पापा को कैसे कहूँ ,कैसे उनके आगे अपनी नासमझियों के लिए मुआफ़ी मांगू? क्या आप मेरी मदद करेगी?मयंक ने कहा।

“जरूर करुँगी मयंक ,अगर तुमने सभी कुछ दिल से महसूस किया है।” मैंने जवाब दिया।

अक्सर ही बच्चों को जितना मिलता जाता है वो अपना हक़ समझने लगते है।बच्चों के लिए प्यार जितना जरूरी है उतनी ही डांट भी जरूरी है और बच्चों को इसकी आदत होनी चाहिए। नही तो भविष्य में उनको पता ही नही चलता गलत क्या है और सही क्या है। अक्सर बहुत अधिक लाड़ प्यार की वजह से भी बच्चे भटक जाते हैं। जब गलतियां ही नही पता चलेंगी तो वो सही निर्णय कैसे लगे। सोच कर देखिये जरूर।।

प्रगति गुप्ता