Incompleteness - 28 in Hindi Motivational Stories by Falguni Dost books and stories PDF | अधूरापन - 28

Featured Books
Categories
Share

अधूरापन - 28

अध्याय-२८

रमेशभाईने जैसे ही बात की, सभी बड़ों ने कहा, "वाह! यह तो आपने बहुत सुंदर प्रस्ताव दिया है।" सबने विस्तार से सभी के बायोडाटा मैसेज करने को कहा और फिर सभी प्रसाद लेने बैठ गए। उत्सुकता से भरा आज का दिन बस ऐसे ही पूरा हुआ। अमृता के याद दिलाने के बाद रमेशभाई ने बायोडाटा के साथ ही हनी की बात भी स्पष्ट रूप से बता दी थी।

तीनों बहनें एक-दूसरे को अपनी-अपनी भावनाएँ बता रही थीं। सब अपने-अपने मन की बात कर रहे थे। भव्या बोली, "यार! प्रिंस को देखकर सचमुच ऐसा लगा जैसे वह वाकई कोई राजकुमार (प्रिन्स) ही है। मेरी तो धड़कनें बढ़ गईं... अरे...! अभी भी धड़कन बहुत तेज़ है!"—यह कहते हुए वह अपनी धड़कनों को हाथ से महसूस करती हुई मानो पल भर के लिए प्रिंस के ख्यालों में खो गई। उसकी यह हालत देखकर बाकी दोनों बहनें उसे छेड़ने लगीं और हँसने लगीं।

हनी तो बिंदास बोल ही पड़ी, "मैंने तो वहीं उससे पूछ लिया कि मैं अपना बायोडाटा तुझे अभी भेज दूँ, दे अपना नंबर!"

भव्या अचरज से बोली, "सच में तूने ऐसा पूछा हनी?"

हनी हँसने लगी और बोली, "अरे नहीं रे! मेरा तो दिमाग ही काम करना बंद हो गया था। मैं तीन बार रॉकी को प्रसाद दे आई। जब आखिरी बार गई तो बोला, 'आपको सारा प्रसाद मुझे ही देना है क्या? यह तीसरी बार आपने मुझे प्रसाद दिया है।' और मैं शर्म के मारे मन ही मन हँसती हुई वहाँ से निकलने लगी तो बोला, 'एक मिनट सुनिए न!' और उसकी इस तरह प्यार से पुकारने से मेरी धड़कनें बढ़ गईं। मैं उससे नज़रें ही नहीं मिला सकी, बस मुड़कर खड़ी रही और रॉकी बोला, 'साड़ी आप पर बहुत सुंदर लग रही है।' बस फिर क्या कहूँ? बड़ी मुश्किल से 'थैंक यू' हकलाते स्वर में मेरे मुँह से निकला था! हाय यार! कितना मीठा लहज़ा था... मैं तो पागल ही हो गई उस पर..."—ऐसा बोलते हुए वह बिस्तरों पर खड़ी हो गई और हाथ फैलाकर गोल-गोल घूमते हुए बोलने लगी, "थैंक यू गॉड... आई एम सो हैप्पी...." बाकी दोनों बहनें उससे कहने लगीं, "ओ हेलो! पागल मत हो जाना हाँ..!" और सब हँस पड़े।

अब रही सोनाली। वह बोली, "हम दोनों की आँखें मिलीं और मैं तो ठीक, राज भी मुझे एकटक देखता ही रह गया। मेरे हाथ में प्रसाद था ही नहीं और मैं उसे खाली हाथ से प्रसाद दे रही थी और वह ले रहा था। हमारी तंद्रा उसके भाई ने तोड़ी। बोला, 'बहुत ज़्यादा प्रसाद नहीं दे दिया?' तब हमारी जो हालत हुई, बात ही मत पूछो यार..! इतनी जल्दी किसी के लिए मन खिंचने लगता है, यह आज पता चला! सचमुच कुछ अलग ही अहसास था। सब कुछ इतना रोमांचक लग रहा था कि मानो आसपास कोई हल्का-सा तितली का पंख लहरा रहा हो और मैं उड़ रही हूँ। शायद इसी को प्यार की शुरुआत कहते होंगे! यार! मैं उसे पसंद आऊँगी भी या नहीं? इसी सोच में मेरी धड़कनें बढ़ रही हैं।"

इन सबकी बातें कमरे के बाहर खड़ी अमृता, भार्गवी और गायत्री सुनकर हँस रही थीं। अमृता तो बोल ही पड़ी, "हाँ! मेरी लाडलियों, जवाब ज़रूर 'हाँ' ही आएगा। हमारी प्रार्थना ज़रूर रंग लाएगी। तुम्हें ससुराल में प्यार, सम्मान, मान और भरपूर साथ ज़रूर मिलेगा।" और सभी बेटियाँ अमृता से लिपट गईं...

देखो न, कुछ अलग ही अनुभूति हो रही थी,
सभी की धड़कनें मानो एक-दूसरे के मन को छू गई थीं!
मौसम मानो हल्का-सा रोमांचक होकर खिल रहा था,
प्यार का अधूरापन पूरा होने के मुहाने पर मचल रहा था!

इस बात को आज दो दिन बीत चुके थे। रमेशभाई द्वारा भेजे गए बायोडाटा के मैसेज का जवाब आज आया था। उन सभी के कहे अनुसार उन्हें बेटियाँ पसंद आ गई थीं और उन्होंने प्रिंस, रॉकी और राज के बायोडाटा उनके अपने-अपने बड़ों से भिजवा दिए थे। जैसे ही मैसेज आया, रमेशभाई ने तुरंत परिवार में सभी को यह खुशखबरी सुनाई। सब बेहद खुश हो गए। बेटियाँ अपनी-अपनी जॉब पर चली गई थीं। उन्हें तथा विनय और नीला को यह समाचार रमेशभाई ने फोन करके दिए। घर में सब बहुत खुश थे। जैसा परिवार सब चाहते थे, वैसा ही परिवार था। बायोडाटा भी बहुत अच्छे थे।

शाम को जब बेटियाँ नौकरी से घर आईं, तो पूरा परिवार फिर इकट्ठा हुआ और क्या जवाब देना है, इस बात पर चर्चा की।

रमेशभाई ने युवकों के बड़ों को बारी-बारी से फोन करके बताया कि हमारी तरफ से भी 'हाँ' ही है, तो अब कोई अच्छा मुहूर्त देखकर रिश्ता पक्का करते हैं।

रमेशभाई ने पंडितजी से पूछकर सगाई का शुभ मुहूर्त निकलवाया, जो आने वाले रविवार का सभी को सही लगा। इसलिए रविवार को भव्या संग प्रिंस, हनी संग रॉकी और सोनाली संग राज की बड़े ही धूमधाम से सगाई संपन्न हुई—बिल्कुल भारतीय संस्कृति के अनुसार। अमेरिका में बसे लगभग सभी भारतीय वहाँ मौजूद थे। सब पूरे आयोजन की मुक्तकंठ से तारीफ़ कर रहे थे। तीनों जोड़ियाँ एक से बढ़कर एक थीं। सभी बेहद खूबसूरत लग रहे थे। जो माहौल बेहद आनंदित लग रहा था, उसमें अब थोड़ा व्याकुल होने के लक्षण दिखाई देने लगे थे। सगाई खत्म होने के बाद सब फोटो खिंचवा रहे थे। हनी के चाचा-चाची जैसे ही फोटो खिंचवाने आए, रॉकी की दादी ने वे कौन हैं, यह पूछते हुए उनकी पहचान पूछी। रॉकी की दादी थोड़े पुराने खयालात की थीं, इसलिए दादी को रॉकी के परिवार ने यह नहीं बताया था कि हनी को अमृता और राजेश ने गोद लिया है।

हनी हँसते चेहरे से बोली, "ये मेरे सगे चाचा-चाची हैं और यह मेरा चचेरा भाई है।" रॉकी अपनी दादी के स्वभाव को जानता था, इसलिए बात को बीच में ही बदलते हुए बोला, "दादी! आपने मेरे पास खड़े होकर फोटो तो खिंचवाई ही नहीं। चलिए, हम एक सेल्फी लेते हैं।" उस समय तो रॉकी ने बात जैसे-तैसे संभाल ली, लेकिन देर-सवेर सच्चाई तो सामने आनी ही थी—यह सोचकर रॉकी कुछ सेकंड के लिए चिंता में पड़ गया। इन सब बातों से हनी तो बिल्कुल बेखबर थी। वह तो बेहद खुशी में मानो रॉकी के प्यार में पागल ही हो गई हो, ऐसा अब रॉकी को भी महसूस हो रहा था।