अपनी ही चाह में in Hindi Thriller by Ritu kumari books and stories PDF | अपनी ही चाह में

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अपनी ही चाह में

अध्याय 1: रात का आशियाना
मुंबई की भागदौड़ भरी जिंदगी से दूर, महाबलेश्वर के शांत पहाड़ों के बीच 'इरविन कॉटेज' नाम का एक पुराना लकड़ी का घर था। उस घर के बड़े से बगीचे में जब लाल-गुलाबी गुलाब खिलते, तो ऐसा लगता मानो कोई पुरानी पेंटिंग जीवंत हो उठी हो।
उसी घर की पहली मंजिल की बालकनी में खड़ी थी—नवोदिता।
चौबीस साल की नवोदिता के चेहरे पर एक अजीब सी मासूमियत और आंखों में गहरा खालीपन था। वह पेशे से एक लेखिका थी, लेकिन उसकी पहचान सिर्फ उसकी किताबें नहीं थीं। नवोदिता के साथ एक ऐसी बात थी जो उसे बाकी दुनिया से अलग बनाती थी—वह अपनी बनाई काल्पनिक दुनिया में इतनी गहराई से उतर जाती थी कि कभी-कभी हकीकत और ख्वाब का अंतर मिट जाता था।
नवोदिता के माता-पिता की बचपन में ही एक हादसे में मौत हो गई थी। उसकी परवरिश उसकी दादी ने की थी, जिनका छह महीने पहले देहांत हो गया। तब से नवोदिता उस बड़े से कॉटेज में अकेली रह रही थी।
"नवोदिता बेटा, चाय ठंडी हो रही है," नीचे से काम करने वाली रामू काकी की आवाज़ आई।
नवोदिता ने अपनी सोच की श्रृंखला तोड़ी और बालकनी से नीचे देखा। शाम के छह बज रहे थे और पहाड़ों पर ठंडी हवाएं चलने लगी थीं।
"आती हूँ काकी," नवोदिता ने अपनी धीमी, मीठी आवाज़ में कहा।
वह नीचे आई और चाय का कप लेकर अपनी पसंदीदा स्टडी टेबल के पास बैठ गई। उसकी टेबल पर एक पुरानी, चमड़े की बाइंडिंग वाली खाली डायरी रखी थी। नवोदिता पिछले एक महीने से एक नया उपन्यास लिखने की कोशिश कर रही थी, लेकिन उसकी उंगलियाँ कीबोर्ड या कागज़ पर चल नहीं पा रही थीं।
उसे लगता था कि जो कहानी वह लिखना चाहती है, वह कोई आम प्रेम कहानी नहीं है। वह एक ऐसी चाहत के बारे में लिखना चाहती थी जो किसी इंसान से नहीं, बल्कि अपनी ही आत्मा के किसी खोए हुए हिस्से से हो—'अपनी ही चाह'।
अध्याय 2: अनजान लिखावट
रात के करीब 11 बज रहे थे। पूरे कॉटेज में सन्नाटा पसरा हुआ था। सिर्फ बाहर हवा के चलने से खिड़की के शीशों की हल्की खड़खड़ाहट सुनाई दे रही थी।
नवोदिता अपनी टेबल पर लेटी हुई लगभग सो चुकी थी। अचानक, कमरे में रखी पुरानी लकड़ी की अलमारी के पीछे से एक हल्की सी सरसराहट की आवाज़ आई।
नवोदिता की आंख खुल गई। उसने टेबल लैंप की पीली रोशनी में चारों तरफ देखा। सब कुछ सामान्य था। लेकिन जब उसकी नजर अपनी उसी खाली डायरी पर पड़ी, तो उसका दिल ज़ोर से धड़क उठा।
डायरी का पहला पन्ना, जो शाम तक बिल्कुल कोरा था, उस पर नीली स्याही से कुछ पंक्तियां लिखी हुई थीं!
नवोदिता ने डरते-डरते हाथ बढ़ाकर डायरी अपनी तरफ खींची। लिखावट बेहद खूबसूरत और पुरानी शैली की थी:
"तुम जिस चाहत की तलाश में पन्ने कोरा छोड़ रही हो नवोदिता, वह तुम्हारी किताबों में नहीं... तुम्हारे ही अतीत के किसी धुंधले कोने में छुपी है।"
नवोदिता की सांसें थम गईं। घर में उसके अलावा कोई नहीं था। दरवाजे अंदर से बंद थे। फिर यह किसने लिखा? और उसे उसका नाम कैसे पता?
उसने अपने कांपते हाथों से पेन उठाया और उसी पन्ने पर नीचे लिखा:
“तुम कौन हो? मेरे कमरे में कैसे आए?”
नवोदिता ने डायरी को वहीं खुला छोड़ दिया और कमरे के चारों तरफ देखा। कोई नहीं था। फिर जैसे ही उसने वापस डायरी पर नज़र डाली, नीली स्याही से अपने आप नए शब्द उभरने लगे—जैसे कोई अदृश्य हाथ पेन चला रहा हो!
"मैं कोई अजनबी नहीं हूँ। मैं तुम्हारी ही उस ख्वाहिश का साया हूँ, जिसे तुमने सालों पहले भुला दिया था।"
अध्याय 3: साये का साया
नवोदिता का पूरा शरीर मारे डर के कांपने लगा। उसने झटके से डायरी बंद कर दी और उसे दूर फेंक दिया। वह बेड पर जाकर रजाई में दुबक गई। पूरी रात वह सो नहीं पाई। बार-बार उसकी आँखों के सामने वे नीली स्याही वाले शब्द घूमते रहे।
सुबह जब सूरज की पहली किरण कमरे में आई, तब जाकर नवोदिता में थोड़ी हिम्मत आई।
उसने फर्श पर पड़ी डायरी को उठाया। पन्ना खोला।
वहां लिखा था:
"डरना मत नवोदिता। अगर मैं तुम्हें नुकसान पहुँचाना चाहता, तो बहुत पहले पहुँचा चुका होता। तुमने हमेशा अपनी कहानियों में प्यार को तलाशा है, लेकिन क्या तुमने कभी खुद से प्यार किया है? 'अपनी ही चाह' ही तुम्हारी असली मंजिल है।"
नवोदिता ने अपनी आँखें बंद कीं। उसमें डर के साथ-साथ अब एक अजीब सी उत्सुकता जागने लगी थी। वह अकेली थी, बेहद अकेली। और उस वीरान घर में, यह अदृश्य मौजूदगी उसे डराने के साथ-साथ एक अजीब सा अपनापन भी दे रही थी।
उसने पेन उठाया और लिखा:
“अगर तुम सच में मुझे जानते हो, तो बताओ कि मेरी दादी ने मुझसे आखिरी शब्द क्या कहे थे?”
कुछ ही सेकंड में डायरी पर जवाब आया:
"उन्होंने कहा था—'नवोदिता, अपनी परछाईं से कभी मत भागना, वही तुम्हारी सबसे सच्ची साथी है।'"
यह सुनते ही नवोदिता की आंखों से आंसू बह निकले। यह बात सिर्फ और सिर्फ नवोदिता और उसकी दिवंगत दादी के बीच की थी। यह बात दुनिया में कोई और नहीं जानता था।
नवोदिता ने धीरे से मुस्कुराते हुए लिखा:
“तुम्हारा नाम क्या है?”
डायरी पर लिखा उभरा:
"मुझे तुम जो नाम देना चाहो... लेकिन फिलहाल मुझे अपना 'अक्स' समझो।"
अध्याय 4: अक्स और एहसास
नवोदिता के लिए अब दिन और रात का फर्क मिटने लगा था। वह हर वक्त अपनी उसी पुरानी डायरी के पास बैठी रहती। वह अदृश्य मौजूदगी, जिसे उसने 'अक्स' नाम दिया था, धीरे-धीरे उसके दिल के बेहद करीब आ गई थी।
जब भी नवोदिता उदास होती, डायरी के पन्नों पर नीली स्याही से सांत्वना के शब्द उभर आते। जब वह खुश होती, तो अक्स उसकी तारीफों के पुल बांध देता।
एक शाम नवोदिता ने लिखा: “अक्स, तुम सामने क्यों नहीं आते? मैं तुम्हें देखना चाहती हूँ।”
डायरी पर लिखा उभरा:
"नवोदिता, मेरी कोई शारीरिक उपस्थिति नहीं है। मैं तुम्हारी ही उस कल्पना, तुम्हारी ही उस दबी हुई 'चाह' का रूप हूँ, जिसे तुमने सालों से अपने दिल में छुपा कर रखा था। जब तुम मुझे अपनी पूरी आत्मा से स्वीकार कर लोगी, तब तुम मुझे देख पाओगी।"
नवोदिता ने गहरी सांस ली। उसे लगने लगा था कि अक्स कोई भूत या साया नहीं, बल्कि उसकी अपनी ही अंतरात्मा की पुकार है—उसका अपना ही एक रूप, जो उसे खुद से प्यार करना सिखा रहा था।
अध्याय 5: आइने के पार
दिन बीतते गए। महाबलेश्वर में भारी बारिश का दौर शुरू हो चुका था। इरविन कॉटेज के चारों तरफ पानी की बूंदों की छन-छन आवाज़ें गूंज रही थीं।
उस रात नवोदिता ने अपनी नई किताब का आखिरी पन्ना पूरा कर लिया था। किताब का शीर्षक था—'अपनी ही चाह में'। उसने अपनी पूरी रूह, अपनी पूरी तन्हाई उस किताब में उड़ेल दी थी।
रात के 12 बजे, नवोदिता अपने ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी हुई। कमरे में सिर्फ एक मोमबत्ती जल रही थी।
उसने आइने में देखा। आइने में उसकी अपनी परछाईं दिख रही थी—सुंदर, लेकिन थोड़ी थकी हुई।
अचानक मोमबत्ती की लौ फड़फड़ाई। आइने में नवोदिता की परछाईं ने हिलना बंद कर दिया, जबकि नवोदिता खुद बिल्कुल स्थिर खड़ी थी।
आइने के अंदर से उसकी अपनी ही परछाईं ने मुस्कुराते हुए हाथ बाहर बढ़ाया।
नवोदिता कांप उठी, लेकिन इस बार डर नहीं था। एक अजीब सा सुकून था। आइने के अंदर से वही जानी-पहचानी मीठी आवाज़ आई—अक्स की आवाज़:
"नवोदिता, तुमने हमेशा दूसरों में अपना वजूद तलाशा। कभी अपनी किताबों के किरदारों में, तो कभी अपनी तन्हाई में। लेकिन सच्चाई यह है कि तुम्हें किसी और के सहारे की जरूरत नहीं है। तुम्हारी सबसे बड़ी चाहत, तुम्हारा सबसे बड़ा प्यार तुम खुद हो।"
नवोदिता ने मुस्कुराते हुए अपना हाथ आइने की तरफ बढ़ाया। जैसे ही उसकी उंगलियां कांच से टकराईं, उसे कांच ठंडा नहीं, बल्कि एक इंसान की हथेली जैसा गरम महसूस हुआ।
अध्याय 6: खुद से मुलाकात
उसी पल नवोदिता को सब समझ आ गया।
अक्स कोई बाहरी शक्ति नहीं थी। वह नवोदिता का अपना ही अवचेतन मन (subconscious mind) था, जो उसकी तन्हाई और लेखन की अपार शक्ति की वजह से एक नया रूप ले चुका था। वह अपनी ही चाहत में, अपनी ही आत्मा के साथ एक अटूट रिश्ते में बंध चुकी थी।
उसने लिखा नहीं, बल्कि आइने की तरफ देखकर सीधे कहा:
"हाँ अक्स... मुझे समझ आ गया। मुझे अब किसी और के साथ की जरूरत नहीं है। मैं खुद में पूरी हूँ।"
आइने की परछाईं मुस्कुराई और धीरे-धीरे नवोदिता के अपने ही अक्स में समा गई।
उपसंहार (Epilogue)
छह महीने बाद, नवोदिता की किताब 'अपनी ही चाह में' देश की सबसे बड़ी बेस्टसेलर बन चुकी थी।
लोग उसकी कहानी की गहराई और आत्म-प्रेम (Self-Love) के खूबसूरत संदेश की तारीफ करते नहीं थक रहे थे। कई इंटरव्यूअर्स ने उससे पूछा, "नवोदिता जी, आपको इस अनूठी कहानी की प्रेरणा कहाँ से मिली?"
नवोदिता हमेशा मुस्कुराकर एक ही जवाब देती:
"मुझे यह प्रेरणा अपनी ही तन्हाई और अपने ही अक्स से मिली। जब आप दुनिया की तलाश छोड़ कर खुद की तलाश में निकलते हैं, तो आपको सबसे खूबसूरत चाहत मिलती है—'अपनी ही चाह'।
आज भी, जब महाबलेश्वर के पहाड़ों पर ठंड बढ़ती है, नवोदिता अपनी डायरी खोलती है। अब पन्नों पर अपने आप शब्द नहीं बनते, लेकिन जब भी वह लिखती है, उसे महसूस होता है कि उसकी हर सांस, उसकी हर सोच में उसका अपना ही अक्स उसके साथ मुस्कुरा रहा है।
(समाप्त)