Kartavya in Hindi Short Stories by Rajeev kumar books and stories PDF | कर्त्तव्य

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कर्त्तव्य

 

भयंकर गर्मी से निजात पाने के लिए सब अपने-अपने तरह से कोशिश कर रहे थे। सुर्यदेव की उग्रता के सामने सब नतमस्तक थे। आलम यह था कि सुर्यदेव जो सुबह उग्र होते थे तो उनका गुस्सा शाम को ही शांत होता था। इतनी भयानक गर्मी और उस पर चलने वाली गर्म हवा, ऐसा लग रहा था कि मानो हड्डी में छेद कर देगी, सारे लोग अपने अपने काम में लगे हुए थे। उन्हीं लोगों में एक मनोहर था जो साईकिल चलाकर अपने गन्तव्य स्थान तक पहूंचने को आतूर था। कभी साईकिल की रफ्तार इतनी धीमी हो जाती थी , जैसे कि पहूंचना ही तो है, इतनी जल्दबाजी क्या है और कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता था कि हर क्षण कीमती है। साईकिल की रफ्तार इतनी तेज होती थी कि जैसे थोड़ी देर में न पहूंचे तो बड़ा अनर्थ हो जाएगा।
मनोहर अपनी थकान और मन का संतूलन को बनाए रखा हुआ था। तभी मनोहर का गुस्सा प्रकट हुआ ’’ गई भैंस पानी में। ’’ और सचमुच भैंस पानी में जा चुकी थी। उसका गुस्सा इस बात पर फुटा क्योंकि साईकिल की चैन उतर गई थी। घुप की गर्मी झेल रहा हाथ चैन चढ़ाने के क्रम में पुरा काला होेकर कैमिकल की गर्मी झेल रहा था, मनोहर का गुस्सा तो तब दोगुना हुआ जब पसीने की एक धार उसके ललाट से होते हुए उसके नाक पर खुजली और गुदगुदी उत्पन्न करने लगी, हालत तो ऐसी कि वो पसीना भी नहीं पोंछ सकता था।
खैर जैसे-तैसे करके मनोहर अपने गन्तव्य स्थान भगोना गाँव पहूंचा। मनोहर ने महसूस किया कि एक चीर-परिचित ऑंखें बड़ी ही बेसब्री से उसका इन्तजार कर रही थी। आवाभगत की उत्सूकता को छुपाकर और सामने वाले की मंशा को जानने के लिए मनोहर ने उनके हाथ में थैला पकड़ाते हुए कहा ’’ काका, अब चलता हूं, नहीं तो पहूंचने में देर हो जाएगी। ’’
सामने वाले आदमी ने मनोहर की तरफ आश्चर्य से देखा और कहा ’’ तुम हमको ही पढ़ाने लगे, दस किलोमीटर जाने में शाम हो जाएगा ? थोड़ा ठंडा और गर्म नाश्ता कर लो, थोेड़ा सुस्ता लो तब आराम से चले जाना। ’’
मनोहर के मन-मस्तिष्क में आवाभगत ग्रहण करने की उत्सूकता और भी बलवती हुई, मनोहर तो इसी इन्तजार में था। आवाभगत की पहली कड़ी में जब शरबत हाजिर हुआ तो मनोहर के कंठ और आँखों को भी ठंडक प्राप्त हुई, क्योंकि शरबत परोसने वाले सुन्दर हाथ, सुन्दर लड़की के थे।
मुन्ना साव की बेटी खाली गिलास लेकर जा चुकी है, मगर मनोहर का मन-मस्तिष्क यही सोचने-समझने में व्यस्त है कि पिछली बार इनकी बेटी को नहीं देखा था, हो सकता है कि कहीं गयी हो या विद्यालय गयी हो। खैर शरबत ने प्यास में निजात दिलाई और पके पपीते के टुकड़ों ने भुख के भुकम्प को थोड़ा कम कर दिया।
रास्ते में लोटते वक्त भी सुर्यदेव की उग्रता थी, पसीना चल रहा था मगर मनोहर के मन-मस्तिष्क की ठंडक, पुर जिस्म को ठंडक प्रदान किए हुए थी, यह ठंडक आवाभगत करने वाले से नहीं बल्कि आवाभगत करने वाली के कारण था। एक तरफ तो मनोहर का मन चाह रहा था कि उस तरफ (लड़की) मन न जाए, मगर अगले ही क्षण मनोहर अपने आप को वेवश सा महसूस कर रहा था। मन-मस्तिष्क तो उस लड़की की याद में ही व्यस्त था। जिसका थोड़ा बहूत खामियाजा मनोहर के काम को भी भुगतना पड़ा। मनोहर का लगभग हर काम अपूर्णता को प्राप्त होता था।
मनोहर ने पिता जी से कहा ’’आज-कल में मुन्ना साव जी के घर जाना है क्या ? ’’
मनोहर के पिता जी ने थोड़ी खिजता से कहा ’’ तु वहाँ की सोच रहा है। यहाँ सारा काम खराब हुआ जा रहा है। ’’मतलब कि मनोहर की इच्छा पूर्ण होते-होते रह गयी।
सिर्फ मनोहर के ही मन-मस्ष्कि का ही बुरा हाल नहीं था, उधर श्यामली की भी मनोहर के जैसी ही हालत थी। किसी भी काम में मन नहीं लगना और काम करते हुए भी बिगड़ जाना श्यामली के मन-मस्ष्कि की सिथती को दर्शा रही थी। मसला तो गंभीर था लेकिन इस मीठे मसाले वाले मसले से मनोहर के घर वाले और श्यामली के घर वाले दोनों ही अन्जान थे। न तो मनोहर के पिता को मुन्ना साव जी से कोई काम पड़ा और न तो मुन्ना साव जी को मनोहर के पिता जी से कोई काम पड़ा।
मनोहर का शयामली के लिए संदेश मनोहर के मन में ही उमड़ता-घुमड़ता रह गया। उधर शयामली भी मन-मसोस कर रह गयी। दोनों एक दुसरे से दुर और दोनों के दिल बड़े मजबूर। मिलने-मिलाने का कोई जुगाड़ नहीं लगा तो प्रेम की लौ थोड़ी धीमी पड़ने लगी। शयामली तो छटपटा कर रह गयी मगर मनोहर ने किसी बहाने से शयामली तक पहूंचने की कोशिश की तो कोई न कोई छोटा काम बड़ा और बहूत जरूरी होकर मिलन की राह में रोड़ा बना गया।
पिता जी की तबियत थोड़ी खराब हो गयी तो मनोहर ने दुकान और घर का बोझ अपने कांधे पे ले लिया। अपने पिता को आश्वस्त करते हुए मनोहर ने कहा ’’ बापू, चिन्ता न करें, आप घर पर आराम करें। मैं भी तो बोझ उठाना सिखुं। मेरा भी तो कुछ कर्त्तव्य है। ’’
मनोहर के पिता ने मनोहर का पीठ थपथपाने के लिए हाथ उठाया मगर अफसोस हाथ हवा में लहराकर बिस्तर पे टिक गए। मनोहर के कर्त्तव्य में बहन के लिए योग्य वर ढुंढना भी शामिल था। मनोहर ने अपने पिता के घिसे जुते पर सरसरी निगाह डाली और बहन के लिए योग्य वर ढुंढने के लिए निकल पड़ा। योग्य वर ढुंढने के चक्कर में उसका जुता, पिता के जुते से थोड़ा सा ज्यादा घिस गया। अंततः सफलता हाथ लगी।
आज वो दिन है कि मनोहर की बहन नैना की शादी है। तैयारी में व्यस्त मनोहर के तो होश तब उड़ गए, आँखों पर यकिन ही नहीं हुआ कि शयामली अपने पिता के साथ सामने खड़ी है। आँसू न छलके, इस बात पर दोनों ने काबू किया मगर व्याह की इच्छा और भी बलवती हुई।
पिता की आवाभगत देखकर शयामली का विश्वास बढ़ा, फिलहाल तो दो दिन मनोहर और शयामली एक दुसरे के साथ हैं और एक दुसरे का हाथ बंटा रहे हैं।

समाप्त।