एकलव्य 1 in Hindi Novel Episodes by ramgopal bhavuk books and stories Free | एकलव्य 1

एकलव्य 1

.................ऐसे मिला एकलव्य अंगुष्ठ

 

हमारे देश के अधिकांश लोग भील बालक एकलव्य के बारे में केवल अंगुष्ठदान के प्रसंग से ही परिचित हैं। उसके सम्बन्ध में और अधिक जानने के लिये हम सभी उत्सुक रहते हैं। इसी प्रेरणा से,  एकलव्य के बारे में शोध करना मेरे चिन्तन में समाहित हो गया।

.........मैंने एकलव्य को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से महाभारत एवं उसके एक अंश कहे जाने वाले हरिवंश पुराण के प्रसंगों में खोजने का प्रयास किया है। लोक कथा एवं जनश्रुतियों के अतिरिक्त रामचरितमानस के प्रसंगों ने एकलव्य की कथा के विस्तार में सहयोग किया है।

पाण्डव युग में नदियों के नाम देवता अथवा प्रकृति के नाम पर होते थे जो अब बिगडकर निर्थरक ध्वनि मात्र रह गये हैं । उदाहरण के लिये वर्तमान हिण्डन नदी जो उस युग में इन्द्रन कही जाती है । मैंने इसी रुप में उस नदी को सम्बोधित किया है ।

श्री हरिवंश पुराण के हरिवंश पर्व का उन्तीस से तेंतीसवां श्लोक दृष्टव्य है। जिसमें उल्लेख है कि  श्रीकृष्ण के पिता श्री वासुदेव जी दस भाई हैं। उनमें देवश्रवा का यह पुत्र एकलव्य ही है जिसे जन्म के बाद ही त्याग दिया गया। उसे निषाद उठाकर ले गये। उन्होंने ही इसका पालन पोशण किया। इसका देवश्रवा निषाद पुत्र एकलव्य के नाम से इस पुराण में वर्णन है। श्री हरिवंश पुराण के भविष्य पर्व में एकलव्य के सैनिकों का निधन, एकलव्य और बलराम युद्ध, श्रीकृष्ण और पौण्ड्रक युद्ध ने एकलव्य की कथा को विस्तार, समृद्धि व पूर्णता प्रदान की है। वहीं एकलव्य का महाभारत (उद्योग पर्व अध्याय चार) में युद्ध के लिये बुलावा आना एवं पाण्डवों के राजसूय यज्ञ के समय (अध्याय चौदह में) श्री कृष्ण द्वारा एकलव्य वीरता की प्रसंशा करना.........और उन्ही दिनों  श्री कृष्ण द्वारा एकलव्य को मार डालना भी दृष्टव्य है । महाभारत एवं श्री हरिवंश पुराण में उल्लिखित प्रसंगों को देखने से समेकित रूप से एकलव्य का क्रमबद्ध एवं सम्पूर्ण जीवन वृत हमारे सामने आ जाता है।

मेरे छोटे भाई सदृश्य प्रिय एवं प्रख्यात कथाकार राजनारायण बोहरे ने इसके लेखन में जो सहयोग किया है इसके लिये मैं उनका हृदय से आभारी रहूँगा।

 

श्री रघुवीर दास कनकने दतिया एवं पं. गुलाम दस्तगीर, मुम्बई ने अपने विपुल अध्ययन से  उसे खोजने में सहयोग किया है।

इसके अतिरिक्त डा. भगवान स्वरूप शर्मा ‘‘चैतन्य’’, वेदराम प्रजापति ‘ मनमस्त ‘ डा. स्वतन्त्र सक्सेना, श्री विश्वेश्वरदयाल बोहरे एवं अन्य मित्रों ने बिम्व चयन में सहयोग किया है। उनका भी हृदय से आभार मानता हूँ।

 प्रकाशन संस्थान से वर्ष 2006 में प्रकाशित उपन्यास ‘एकलव्य’ पर आई0ए0एस0 अधिकारी श्री व्ही0के0वाथमजी की दृष्टि पड़ी। वे एकलव्य के सम्वन्धमें वचपन से ही गहराई से सोच रहे थे। इसकी पर्तो को और अधिक खोलने में सहयोग किया है। इसकी कथा में और अधिेक बिस्तार करने के लिये कश्यप मंथन एवं निशादों का प्रामाणिक इतिहास,डा0रामदेव प्रसाद की कृतियों को ध्यान से पढ़ा है। इसके लिये कृतिकारों का आभारी रहूँगा। दिनांक25.12.2008

                              

                

 

 

       1  एकलव्य के आचार्य   

         इन्द्रन नदी का किनारा

       घने वृक्षों की छाया में मध्यान्ह के समय विश्राम करते पथिक।

       निकट के पुराने वट वृक्ष की छाया में निषादपुरम के कुछ बालक अपने युवराज एकलव्य के साथ गिल्ली डन्डे का खेल, खेल रहे थे। पथिकों का ध्यान उनका खेल देखने में लगा था।

बच्चों ने गिल्ली-डंडा खेलने के लिये मैदान के बीचों बीच समतल धरती पर तीन अंगुल लम्बा और दो अंगुल गहरा गड्ढा खोदकर गल्ल बना ली थी। एक बालक गिल्ली डंडा लेकर गल्ल के पास पहुंच गया था। उसने गिल्ली को आड़ा करके गल्ल पर रखा। डण्डे की नोंक के सहारे गिल्ली को खूब जोर से उछाल दिया । गिल्ली तेजी से ऊंची उठी और हवा में लहराई। बारह बरस का एकलव्य उसे पकड़ने के लिये पहले से ही सामने तैयार खड़ा था। उसकी श्यामल छवि खेल देखने वालों को मुग्ध कर रही थी। उसने एक छलांग भरी और उछलकर गिल्ली को पकड़ लिया। गिल्ली उछालने वाला खेल से बाहर हो गया था ।

पाला बदल गया। अब एकलव्य के हाथ में गिल्ली डंडा था। उसने भी गिल्ली को गल्ल पर रखा और डंडे की नोक के सहारे उछाला। कई बालकों को छकाते हुए गिल्ली हवा में लहराती  बहुत दूर जा गिरी । एकलव्य ने डंडे को गल्ल के ऊपर रखा। सामने जो बालक गिल्ली को पकड़ने का प्रयास कर रहा था, उसने गिल्ली को उठाया और लक्ष्य साधकर डंडे में मारने के लिए फेंक दिया । उस डंडे से बिना टकराये गिल्ली दूर जाकर गिरी ।

अब एकलब्य की बारी थी, एकलव्य ने गल्ल से डंडे को उठाया और डंडे की नोक से गिल्ली की नोक में चोट मार के गिल्ली उछाली । साथ खेल रहे बालकों ने गिल्ली को धरती पर आने से पहले ही पकड़ना चाहा किन्तु एकलव्य ने डंडा बढ़ाकर गिल्ली में चोट मारी और हवा में गिल्ली को पुनः लहरा दिया। होऽऽ होऽऽ करती  बालकों की भीड़ गिल्ली को पकड़ने दौड़ी। किन्तु एकलव्य ने तीव्र गति से गिल्ली के पास पहुंचकर पुनः उसे आगे बढ़ा दिया। इस तरह एकलव्य गिल्ली को इन्द्रन नदी के तट तक ले आया। सभी खिलाड़ी साथी वहां आ गये। इस स्थल से गल्ल तक की दूरी डंडे को आधार बना कर नापी गयी। अब विपक्षी खिलाड़ियों को एक टांग पर उचकते हुए गल्ल तक आना था । आगे एकलब्य था और पीछे उछल कर चलते उसके साथी ।

दिन ढले तक एकलव्य सभी साथी बालकों को लंगड़ी भरवाकर भरपूर छकाता रहा।

वृक्ष के नीचे बैठे पथिक एकलव्य के हस्तकौशल का आनंद लेते रहे ।

दूसरे दिन भी एकलव्य के सभी साथी यथा समय इन्द्रन के उसी घाट पर इकत्रित होगये। उनमें तय किया जाने लगा,आज कौनसा खेल खेला जाये।उनका एक साथी बोला-‘‘आज तो कोई नया खेल ही खेला जाये।’’

नये खेल की बात सुनकर दूसरे साथी ने प्रस्ताव रखा-‘‘आज तो हम सब गोफन से ढ़ेला फेंककर निशाना लगायें।’

’कुछ लड़के गोफन बनाने के लिये पलास के पेड़ की जड़ खोद लाये। दूसरे उसे कूटने लगे। जब वह ठीक ढंग से वह जड़ कुट गई तो एक चतुर लड़के ने उसकी रस्सी बटना शुरू कर दी। उनमें से दो लड़के चले सो गोफन बनाने के जानकार मनोहर काका को बुला लायसे।

मनोहर काका ने जब गोफन बनाना शुरू किया तो सभी बालक दत्तचित होकर उनसे गोफन बनाने ही बिधि सीखने लगे। उन्होंने एक घड़ी के प्रयास से रस्सी से बना फन्दा तैयार कर दिया। जिससे उसके द्वारा तीव्रगति से ढ़ेला फेंककर निशाना लगाया जा सके।

शेष कुछ चले ,वे जाकर इन्द्रन के किनारे से गोलमटोल पत्थर के ढे़ले बीन लाये।

        एक छेंकुर के पेड़ से लक्ष्य के लिये मिटटी से बने छोटे से पात्र को टाँग दिया। एकलव्य के एक अति उत्साही साथी ने आगे बढ़कर गोफन पर कब्जाकर लिया। उसने उसके फन्दे में एक पत्थर का ढ़ेला रखा।उसके फन्दे में दोनें तरफ लम्वी रस्सीं लगी थीं। उन रस्सियों को अपने सिर के ऊपर चक्राकार घुमाया। दो रस्सियों में से एक के छोर को छोड़ दिया। गोफन खुला।चटाक का तीव्र स्वर गूँजा। गोफन से निकलकर ढ़ेला तीव्रगति से लक्ष्य की ओर गया।....और उस छेंकुर के पेड़ की टहनी से टकराया। सारी टहनी हिल गई। लक्ष्य डगमगाया । किन्तु निशाना चूक गया।

        यों सभी साथी बारी-बारी से निशाना लगाते रहे। अन्त में एकलव्य ने लक्ष्य का बेधन कर दिया।

        हो...हो के स्वर के साथ खेल समाप्त हो गया। साँझ ढ़लते ही सभी अपने-अपने घर चले गये।

          यह एकलव्य का प्रतिदिन का कार्यकलाप था । आज एक पथिक ने निषादराज को उनके घर जाकर यह समाचार विस्तार से सुनाए । जब निषादराज हिरण्यधनु ने पथिक की बात सुनी तो सोचने लगे-एकलव्य सचमुच प्रतिभाशाली है । अब कैसे वत्स की प्रतिभा को प्रखर बनायें ?उन्हे विचार आया- हमारे मन्त्री चक्रधर इस कार्य में मदद कर सकते हैं। वैसे उन्होंने एकलव्य और अपने पुत्र शंखधर की प्रतिभा को देखकर बचपन से ही आचार्य की व्यवस्था कर दी है। किन्तु वे आयार्य उन्हें शास्त्रों के पठन-पाठन तक सीमित रखे हुये हैं। इससे हमारा मन्तव्य पूर्ण होने वाला नहीं है।

प्रायः यही होता है, जब जब निषादराज हिरण्यधनु के समक्ष अपने किशोर पुत्र एकलव्य की शिक्षा-दीक्षा का प्रश्न आकर खड़ा होता है तो वे चिन्तित हो जाते हैं। वे समझ नहीं पाते कि किससे परामर्श करें, इस गांव में न कोई विद्वान है न शास्त्र के आचार्य। यों तो इन्द्रन नदी के घाट से बड़े-बड़े मनीषी और धनुर्धर आते जाते रहते हैं। इन्द्रन के एक सिरे पर पांचाल है तो दूसरी ओर हस्तिनापुर । दोनों राज्य व्यापार के बड़े केन्द्र हैं ।

पांचाल नरेश सहृदयी हैं। उनके यहां का हस्तिनापुर से व्यापार इन्द्रन के रास्ते से चलता है। इस व्यापार में राज्य के अधिकांश नौकाजीवी उद्यम करते हैं।  पड़ोस के दोनों राज्यों का व्यापार निषादराज के उस भू-भाग पर निर्भर करता है। इसी कारण दोनों ही राज्य उनका सम्मान करते हैं।

वैसे निषादजाति करे भी तो क्या करे, जन्म जन्मांतर से नदियों में नावें चलाकर, आवश्यक वस्तुओं एवं यात्रियों को पहुंचाने का कार्य ही तो उनको विरासत में मिला है। कुछ मत्स्य व्यापार में लगे हैं, इन्द्रन नदी से मछलियॉ पकड़कर उन्हें लम्बे समय तक सुरक्षित रखने की कला में दक्ष हैं। बिक्री हेतु उन्हें पांचाल अथवा हस्तिनापुर भेज देने के कार्य में संलग्न हैं। कृषि कार्य से भी कुछ लोग अपनी आजीविका चलाते हैं

घने जंगलों के मध्य बसे निषादपुरम को संपूर्ण वैभव प्राप्त हैं। यहाँ से आने जाने वालों से दोनों राज्यों की आंतरिक स्थिति से अवगत होने का अवसर मिलता रहता है। यात्रियों के अंतर की बातें उनके नाविक प्यार भरी बातों से निकाल लेते हैं। उन्हें क्या पता कि ये नाविक, नाविक ही नहीं हैं बल्कि सब के सब निषादराज के गुप्तचर भी हैं। इन दिनों दस्युओं का आतंक बहुत बढ़ गया है। वे पथिकों को लूट लेते हैं। यही कारण है कि निषादराज हिरण्यधनु अपने राज्य की प्रगति के लिये चिंतित रहने लगे हैं।

      गत वर्ष इस घाट से हस्तिनापुर के प्रमुख शिल्पी सुमत यहां से निकले थे। तब अकस्मात उन्हें यहाँ की वनस्थली देखकर विश्राम करने की इच्छा हुई। जब जब निषादराज हिरण्यधनु का किसी विशिष्ट व्यक्ति से मिलना होता है, तब  वे अपने वत्स एकलव्य से उनका मिलन अवश्य कराते। इसी क्रम में सुमत नामक उन प्रमुख शिल्पी से एकलव्य को भी उनने मिला  दिया था। वे एकलव्य के बात करने के अंदाज और उसकी लगन व भीतर छुपी प्रतिभा से बहुत ही प्रभावित हुये। उसका चौड़ा माथा, लम्बी नाक, बड़े बड़े कान, मन को लुभाने वाला सांवला रंग प्रमुख शिल्पी के समक्ष, उसके आगत उज्जवल भविश्य की भविष्यवाणी करने में सहायक हो रहा था। उनके लम्बे हाथ एवं घुंघराले बाल देखकर वे समझ गये इस असाधारण बालक ने धरा पर किसी विशेष कार्य के लिये जन्म लिया है।

 

प्रमुख शिल्पी सुमत निषादराज हिरण्यधनु की सेवा भावना एवं नगरीय कोलाहल से दूर शान्त परिवेश को देखकर निषादपुरम में बहुत दिन ठहरे रहे और हिरण्यधनु को सम्पूर्ण आर्यावर्त के राजनैतिक समाचार सुनाते रहे। बातों ही बातें में उनने तमाम राजवंशों  के भीतरी षड़यंत्रों से लेकर क्षत्रियों में प्रचलित संतानोत्पत्ति की  विभिन्न रीतियों की कभी चर्चा की ।

 एक दिन प्रमुख शिल्पी सुमत ने बतलाया-मानवीय सभ्यता का विकास नदियों, झीलों और समुद्र के किनारेपर ही हुआ है। सभ्यता के विकास में निःसन्देह निषाद जाति का ही बिशेष योग दान रहा है। इस जाति को समस्याओं से जूझने की शक्ति प्रकृति से ही प्राप्त हुई है। वत्स, तुम्हारी जाति में वीरता के गुण भरपूर हैं। यों निषाद जाति एक वीर जाति है।

 हिरण्यधनु के पास बैठे एकलव्य ने प्रश्न किया-‘‘ आचार्य, समाज जातियों में विभक्त है। कहें, इस जाति प्रथा का क्या रहस्य है?

  एकलव्य का प्रश्न सुनकर प्रमुख शिल्पी सुमत गम्भीर होकर बोले-‘‘ वत्स, तुमने प्रश्न उचित ही किया है। सच तो यह है कि इस वर्तमान में कोई भी अपने का शुद्ध रक्त का नहीं बतला    सकता। आज के आर्य कहे जाने वाले  लोग भी निषाद और द्रविण जातियों के समिश्रण     हैं।

         जातियाँ कार्यों के बटवारे के आधार पर बनी हैं। पढ़ने -पढ़ाने एवं शिक्षा देने वालों को ब्राह्मण, वाहुबल से रक्षाकरने वालों को क्षत्रिय, कुशलता से व्यपार संचालन करने वालों को वैश्य एवं शरीरिक श्रम के आधार पर जीविका यापन करने वालों को शूद्र नाम दिया गया। इस कर्मणा जाति व्यवस्था को सुचारु रूप से चलने दिया जाता तो आज समाज इतनी जातियों में विभक्त नहीं होता।

        शुरू में गुण और कार्य जाति बटबारे का आधार था, किन्तु धीरे-धीरे इसका रूप ब्राह्मणों ने जन्मना से जोड़ दिया। आज वही रूप् स्थाई रूप से प्रभावी होगया है। हमने जाति बनाने बालों की मूल अवधारणा ही त्याग दी। चरित्र एवं कार्य क्षमता से कोई व्यक्ति ब्राह्मण बनता था और उसी के कारण क्षत्रिय,वैश्य एवं शूद्र बन जाता था। शुरू-शुरू में जातियों में स्थायित्व नहीं था। एक शूद्र चरित्र एवं कार्य क्षमता से ब्राह्मणत्व धारण कर पूज्यनीय बन जाता था।

              जातियों के उत्थान-पतन के बारे में उनकी अवधारणा को समझते हुये एकलव्य बोला-‘‘आचार्य, मैं समझ गया इन जातियों का आधार कर्म एवं गुणा है।

                 .और एक दिन सुमत एकलब्य की कोमल अंगुलियों को देखकर बोले, ‘‘वत्स, एकलव्य नदी के तट से चिकनी गीली मिट्टी तो लेकर आओ।’’

आदेश पाकर एकलव्य गीली मिट्टी ले आया। प्रमुख शिल्पी उठे और उस मिट्टी के पास  बैठते हुये बोले, ’’मैंने अनुभव किया है कि तुम एक श्रेष्ठ मूर्तिकार भी हो सकते हो। इसलिये मैं चाहता हूँ  कि तुम्हें इस मिट्टी से मूर्ति निर्माण करना सिखलाऊँ।’’

उत्सुकतावश एकलव्य उनके पास बैठ गया। उन्होंने मिट्टी की ओर इंगित करते हुये सिखाया, ’’इसमें  से थोड़ी सी मिट्टी ले लो।

एकलव्य ने आदेश का पालन किया। सुमत ने उससे शुरू-शुरू में बैल, हाथी, घोड़े, ऊँट आदि की मूर्तियों का निर्माण करना सिखाया। उसके बाद प्रमुख शिल्पी ने आदमी की मूर्ति बनाने की कला सिखाना शुरू किया। कैसे सबसे पहले धड़ का निर्माण किया जाता है ? कैसे हाथ और पैर का अनुपात रखा जाता है ? ऑख, कान और नाक की संरचना कैसे की जाती है ? इस तरह दो-तीन दिन में ही एकलव्य मानव एवं पशुओं की तरह-तरह की मूर्तियों के निर्माण में पारंगत हो गया।

सुमत जी ने देखा था कि एकलब्य अपने छोटे से धनुष से प्रायः बाण चलाने का अभ्यास किया करता है। उनने पूछा तो पता लगा कि निषादराज हिरण्यधनु और उनके मंत्री चकधर वाण चलाने में निश्णात थे। उड़ते हुये पक्षी को वेध देना उनके लिये सहज कार्य था। उन दोनों की धनुर्विद्या में दूर-दूर तक धाक थी। इसके बावजूद वे इस अस्त्र में और अधिक संभावनाओं की खोज में लगे रहते। दोनों बैठते तो यह विषय भी चर्चा में रहा करता। एक दिन चक्रधर ने एकलव्य को अपने शिष्य की तरह सिखाना शुरू किया । सबसे पहले उन्होंने एकलव्य को कितने ही प्रकार के बाणों के फलक बनाना सिखलाया। फिर धनुष पर बाण संधान करना, निशाना लगाना और तेज गति से बाण को छोड़ देना सिखाया ।

 

एकलव्य ने सुमत जी को बताया कि युद्ध के प्रचलित सभी अस्त्र हाथ में लेकर युद्ध किया जाता है, जबकि एक मात्र धनुष ऐसा अस्त्र है जो शस्त्र की तरह योद्धा के पास रहता है और उसका एक अंश यानी कि बाण निकल कर लक्ष्य को हताहत कर डालता है । दूर से लड़ पाना केवल धनुषबाण से ही संभव है अन्यथा गदा, असि,भाला, सांग या कुछ भी हथियार हो इनका उपयोग बगल में रह कर लड़ने पर ही संभव है, इस कारण उसका आकर्षण धनुविद्या की ओर होता जा रहा है ।

उन्ही दिनों की बात है ! एकलव्य ने मूर्ति बनाने के काम से थक कर एकाएक धनुष उठाया और लक्ष्य साधकर एक छोटा सा बाण आसमान में उड़ते हुये कपोत के जोड़े में से एक पर छोड़ दिया और उसे बेध कर धरती पर गिरा दिया। यह देखकर प्रमुख शिल्पी ने उस घायल कपोत को उठाकर, अपने सीने से चिपका लिया। वे उसका उपचार करते हुये बोले, ’’एकलव्य, निशाने की तो प्रशंसा करना पड़ेगी, लेकिन हमें आपका यह लक्ष्य बेध शोभनीय नहीं लगा।’’

’’ क्यों आचार्य ? मैं समझा नहीं’’

’’ दो कपोत वन विहार के लिये निकले थे। तुमने अनायास ही एक का वेधन क्यों कर दिया ?’’

’’उड़ते हुये पक्षी पर लक्ष्य संधान के उद्देश्य से।

’’प्राणियों के अलावा तुम्हे लक्ष्यबेध का कोई दूसरा विकल्प नहीं सूझा ?’’

’’सूझा तो है आचार्य, पहले एक वाण के वेग को कम करके चला दें। दूसरे वाण से उसके पथ को अवरूद्ध करें।’’

’’अरे ! बहुत ही आश्चर्यजनक है तुम्हारी सोच। युवराज तुम एक कलाकार भी हो। कोई भी कलाकार निरूद्देश्य वन्य प्राणियों को वेध कर, किसी की हत्या नहीं करता।’’

’’तो क्या आचार्य दोनों पथ पृथक-पृथक हैं ?’’

’’युवराज दोनों की भावना का स्वर हृदय के एक ही स्थान से प्रस्फुटित होता है।’’

’’यह कैसे आचार्य, स्पष्ट करें ?’’

’’कलाकार हृदय की संवेदना को अपनी कला में प्रतिस्थापित करता है, तो किसी प्राणी की हत्या करते समय वही संवेदना कहां लुप्त हो जाती है ?’’

’’इसका अर्थ तो यह है आचार्य कि श्रेष्ठ धनुर्धर श्रेष्ठ कलाकार नहीं हो सकता।’’

’’युवराज, आपको एक सत्य बताऊं कि जो श्रेष्ठ कलाकार नहीं होगा वह श्रेष्ठ धनुर्धर भी नहीं हो सकेगा। श्रेष्ठ धनुर्धर होने का अर्थ यह तो नहीं कि वह अपने बल वैभव में मदमस्त होकर भ्रमण करता रहे। वीर वही है जो उच्छृंखल नहीं है। वीर होकर उच्छृंखल हुआ तो उसकी वीरता सृजन के लिये नहीं हो सकती।’’

’’आचार्य, आप हस्तिनापुर के राजकुमार दुर्योधन की ओर हमारा ध्यान तो आकर्शित नहीं कर रहे हैं।’’

’’युवराज, हम किसी व्यक्ति विशेष की बात नहीं कर रहे हैं। हम करूणा और निर्दयता की गहरी तहों को छूने का प्रयास कर रहे हैं।’’

’’आचायर्, तब तो एक कलाकार को हिंसा का परित्याग कर देना चाहिये।’’

’’नहीं युवराज, मैं यह भी नहीं कर रहा हूँ  कि हिंसा का पूरी तरह परित्याग कर दो।’’

’’आचार्य, आप चाहते क्या हैं ?’’

’’युवराज, संवेदनशील कलाकार व्यर्थ की हिंसा में विश्वास नहीं रखते। हम हिंसा तब करें, जब हमारी भूख हिंसा के बिना शान्त न हो, उस समय हम हिंसा को अनिवार्य मान सकते हैं।’’

’’आचार्य, यह तो आप हिंसा का ही पक्ष ले रहे हैं।’’

‘‘हाँ युवराज, इसके अतिरिक्त यदि अपनी सुरक्षा की दृश्टि से हिंसा आवश्यक हो गई हो, तो वहां भी हिंसा अनिवार्य है। दूसरे की सुरक्षा में भी हिंसा की जा सकती है, लेकिन निरूद्देश्य हिंसा लक्ष्यहीन संधान है।उसका जीवन में कोई औचित्य नहीं है।’’

’’बस-बस, मैं आपकी बात को अच्छी तरह से समझ गया। आज के बाद मेरे द्वारा व्यर्थ में हिंसा नहीं होगी। अब तो हिंसा तभी होगी जब वह मात्र हिंसा न हो, उसमें करूणा का भाव भी सन्निहित हो।’’

’’अब यह भी समझ लो युवराज कि जो वनवासी, वन्य प्राणियों की रक्षार्थ अपना जीवन व्यतीत करते हैं, वे वन्दनीय हैं।’’

’’आचार्य, मैं इसी पथ पर चलने का प्रयास करता रहॅूगा।’’

 

’’युवराज इसी उद्देश्य को लेकर धनुर्विद्या का अभ्यास किया करें। निश्चय ही लक्ष्य तक पहुँच सकोगे। युवराज मैं तुममें श्रेष्ठ धनुर्धर होने के सम्पूर्ण गुण देख रहा हूँ  मैं चाहता हूँ कि तुम सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनो। अब मेरा जाने का समय आ गया है। कल मैं यहां से चला जाऊॅगा।’’ जब महाशिल्पी जाने लगे तो उन्होंने एक बार फिर कहा था, ’’एकलव्य तुम में मूर्तिकार की अपेक्षा सर्वश्रेष्ठ  धनुर्धर होने की अनंत संभावनाएँ हैं।’’

उसी दिन एकलव्य ने हृदय में निश्चय कर लिया कि एक दिन वह सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनकर रहेगा और वह धनुर्विद्या के अभ्यास में लग गया।

इन्द्रन नदी के किनारे विशाल अश्वत्थ की छाया में शिवालय बना है। वह छोटे आकार का है, लेकिन उसके चबूतरे का आकार मंदिर की अपेक्षा विशाल है। प्रतिदिन एकलब्य के पुरम् के अधिकांश लोग प्रातः होने के पहले इन्द्रन नदी पर पहुँच जाते थे। उसके पावन सलिल में स्नान करते। शिवलिंग पर जल चढ़ाने के उपरान्त अपने गृहस्थी के कार्यकलापों में व्यस्त हो जाते थे। इसलिए एकलव्य ने नदी-तट से हटकर घने जंगल के एक कोने में अभ्यास के लिये स्थान निहित कर लिया। निषादपुरम के अधिकांश किशोर अपने-अपने धनुष बाण लिये वहां उपस्थित हो जाते और अभ्यास करने लगते।

निषादराज देख रहे थे कि बच्चों में खूब उत्साह है ।

 

इस तरह खेल-खेल में धनुर्विद्या का अभ्यास करते करते उन किशोरों को कई दिवस  व्यतीत हो चले। ज्यों ज्यों अभ्यास की अवधि बढती जा रही थी, त्यों-त्यों हिरण्यधनु को किसी श्रेष्ठ प्रशिक्षक आचार्य का अभाव खटकने लगा था। प्रमुख शिल्पी ने कहा था, ’’इस युग के युद्ध की सब विधाओं के सर्वश्रेष्ठ आचार्य अवन्तिका नगरी के सान्दीपनी जी हैं। मधुपुरी के वासुदेव पुत्र श्रीकृष्ण जी उसी आश्रम में रहकर समस्त प्रकार की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।’’

 

निषादराज सोचते, सान्दीपनी आश्रम तो अनेक विद्याओं और कलाओं, का केन्द्र गुरूकुल है, लेकिन हम तो निषाद भील है, हमें एकलव्य को अन्य कलाओं को सिखाकर क्या करना है ? उसे तो केवल धनुर्विद्या में ही पारंगत कराना है। धनुर्विद्या के क्षेत्र में हिरण्यधनु को महर्षि परशुराम की याद आती है। उन्ही के शिष्य तो आचार्य द्रोण हैं। आज उनके समान धनुर्विद्या में कोई दूसरा नहीं है। कौरव और पाण्डव दोनों  ही उनसे धनुर्विद्या की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। क्या यह सम्भव है कि एकलव्य को आचार्य द्रोण जैसा गुरू प्राप्त हो सके ?’’

 

 एकवार प्रमुख शिल्पी सुमत ने कहा था-‘‘ऋग्वेद में निषाद पंचजन्य कहलाते थे। इसकी ऋचाओं में पाँच वर्णों का यज्ञ में सम्मिलित होने एवं यज्ञ के फल प्राप्त करने हेतु आवाह्न किया गया है। इस तरह निशादों को पंचम वर्ण कहकर समुचित आदर दिया है। उन्हें यज्ञ में श्रद्धाभाव से बुलाना पड़ता था। इससे निशादों की सत्ता का स्पस्ट आभास मिलता हैं।

अचानक उन्हें प्रमुख शिल्पी का यह कथन याद हो आया, ’’कौरव और पाण्डव का वंशक्रम निषादकन्या मत्स्यगंधा और पाराशर ऋषि की संतान हैं। कहाजाता है कि एक बार पाराशर ऋषि भ्रमण के लिये निकले। उन्होंने नाव से गंगा पार करना चाही। नाव खेने का कार्य रूपवती मत्स्य गंधा कर रही थी। वे उसके रूप पर मुग्ध हो गये, और उसके साथ  भोग विलास किया, फिर कुमारी अवस्था में पाराशर ऋषि से कृष्ण द्वैपायन जैसे लोक विख्यात ऋषि को जन्म देकर भी वह मत्स्यगंधा नामक निषाद युवती ही राजा शान्तनु से विवाह कर सत्यवती के रूप मे कुलवधु हो गई। इस दृष्टि से देखें  तो हम निषादवंशी कौरव और पाण्डवों से किसी प्रकार कम नहीं हैं।’’

 

यह सोचकर महाराज हिरण्यधनु को याद हो आई ,अपने पिता श्री निषाद अधिपति से सुनी यह बात-मनु और श्रद्धा के संयोग से आर्यावर्त के इस भूभाग में मानव सृष्टि के जन्म की कथा प्रचलित है। मनु एक श्रेष्ठ नाविक मल्लाह थे जो प्रलय के समय सृष्टि को बीज के रूप में बचाने में सफल हो सके। यों हम निशादों के विवेक और साहस से ही यह सृष्टि फलफूल रही है।

उस दिन वे इस तरह के चिन्तन में थे कि अचानक ही वहां मंत्री चक्रधर और एकलव्य का आगमन हुआ। चक्रधर ने निषादराज की मुखाकृति के भाव पढ़ते हुये कहा, ‘‘देव, चिन्तित दिखाई दे रहे हैं।’’

एकलव्य के प्रशिक्षण के बारे में अपनी चिन्ता से हिरण्यधनु ने मंत्री को अवगत कराया  -‘‘मैं अभी अपने एकलव्य को धनुर्विद्या सिखाने के लिये पर्याप्त हूँ लेकिन पिता पिता होता है और आचार्य-आचार्य। पिता आचार्य नहीं बन सकता। मैं वैसा धनुर्धारी भी नहीं हॅूं । अन्य राजकुलों की तरह हमें भी अपने वत्स के लिये किसी श्रेष्ठ गुरू की खोज करनी चाहिये जो हमारे निषादपुरम में रहकर अकेले एकलव्य को ही नहीं बल्कि संपूर्ण निषादपुरम के युवकों को धनुर्विद्या सिखा सके।’’

उनके इस मन्तव्य के समर्थन में मंत्री चक्रधर ने अपना विचार व्यक्त किया, ’’कौरव पाण्डव की तरह हमारे पास उतने संसाधन नहीं हैं। हमारी आय का मुख्य साधन तो हस्तिनापुर और पांचाल के मध्य होने वाले व्यापार वस्तुओं का परिवहन करना था लेकिन जब से आचार्य द्रोण हस्तिनापुर पहॅुंचे हैं, तब से हस्तिनापुर और पांचाल के बीच होने वाले व्यापार में बहुत कमी आई है। दोनों राज्य एक दूसरे के प्रति शत्रुता का भाव रखने लगे हैं। इन दोनों राज्यों के सम्बन्धों पर ही निषादपुरम का भविष्य निर्भर है। ऐसी स्थिति में किसी आचार्य की व्यवस्था करना सम्भव नहीं है।’’

 

वे दोनों देर तक राजनीति की बात करते रहे ।

एकलव्य ने विनम्रता पूर्वक अपना विचार व्यक्त किया, ’’गुरूदेव से अध्ययन करने के लिये उनके आश्रम में ही जाना पड़ेगा। श्रीकृष्ण समर्थ हैं फिर भी उन्हें शिक्षा ग्रहण करने के लिये उनके आश्रम में ही जाना पड़ा है।’’

मंत्री चक्रधर ने एकलव्य का मंतव्य समझते हुये उत्तर दिया, ’’युवराज, इन दिनों राजकुलों में आचार्य को रखने की जिस परम्परा ने जन्म लिया है, उसके अनुसार हमें भी आचार्य द्रोण की तरह किसी आचार्य की खोज करनी पड़ेगी, जो निषादपुरम में रहकर हमारे पुरम के सभी युवकों को विद्याओं में पारंगत कर सके।’’

निषादराज नें अपने दृष्टिकोण से उन दोनों को अवगत कराया, ’’मैं अनुभव कर रहा हॅू आचार्य द्रोण से श्रेष्ठआचार्य कहीं कोई दिखाई नहीं देता। अकेली युद्ध कला ही  नहीं  उनकी पूरी शिक्षण पद्धति व्यावहारिक अधिक लग रही है। उनमें आजके परिवेश से जूझने की सामर्थ्य अधिक है। गुरूदेव सान्दीपनि अपने शिष्यों को दर्शन पढ़ा रहे हैं। अरे ! दर्शन से किसी का पेट भरने वाला नहीं है।’’

मंत्री चक्रधर ने उनकी बात के समर्थन में कहा, ’’हमें तो अपने राज्य के अस्तित्व को बचाए रखने के लिये एक शक्तिश्शाली सेना की आवश्यकता है। इसलिए जरूरी है कि हमारे युवक दुर्घर्ष योद्धाओं के रूप में तैयार हों ।’’

अपने राज्य की परिस्थिति का अनुभव करते हुये एकलव्य ने कहा, ’’पिताश्री, यदि मैं धनुर्विद्या में पारंगत हो सका तो निषादपुरम के युवकों को शिक्षित करने के कार्य में मैं स्वयं लग जाऊॅगा।’’

एकलव्य की यह बात सुनकर निषादराज को अपने पूर्व से चलते सोच पर विश्वास हो गया कि एकलव्य की उचित व्यवस्था कर देने से ही निषादपुरम की सुरक्षा की समस्या का समाधान हो सकेगा। यह सोचकर बोले, ’’मंत्री चक्रधर आप इस सम्बन्ध में कोई उचित मार्ग खोज निकालें और हमें सूचित करें जिससे हम अपने दायित्व का निर्वाह कर सकें।’’

यह सुनकर मंत्री चक्रधर ने कहा, ’’जैसी निषादराज की आज्ञा। मैं शीघ्र ही समाधान खोजकर देव के समक्ष प्रस्तुत करूँगा ।’’

यह कहकर मंत्री चक्रधर कक्ष से बाहर निकल गये।

 

 

 

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एक दिन परमहंस मनीषी बाबा का आगमन इन्द्रन के तट से निषादपुरम में हुआ। नाव से उतरकर अनायास वे शिवालय की ओर चले। वहॉ पहुंचकर वे अश्वत्थ की छाया मे बने शिवालय के चबूतरे पर जाकर बैठ गये। इन्द्रन नदी की ओर से प्रवाहित शीतल वायु उनका स्वागत करने लगी।

परमहंस बाबा के चेहरे से उमड़े पड़ रहे तेज और  आभा मण्डल को जो देखता, वही आकर्षित हो जाता।  कुछ लोग उन्हें देखकर इनके पास आकर बैठ गये। कुछ परमहंस जी के खाने पीने के लिये कंद मूल और फल ले आये और कुछ जल पात्र में जल ले आये।

परमहंस जी उन कंद मूल और फलों को उपस्थित जनों में बांटने लगे। लोग प्रसाद के रूप में अपनी ही दी हुई वस्तु ग्रहण करने लगे ।

 

 कुछ के मन में उनसे अपना भविष्य जानने की इच्छा से प्रश्न उमड़ने लगे। एक ने प्रश्न किया, ’’परमहंस जी आज मैं चौसर के खेल में जीतूंगा या नहीं।’’

उसकी यह बात सुनकर वे अपनी खड़ी बोली में बोले ’’रे तू न कबहॅूं जीतो है, न जीतैगो।’’

इसी एक उत्तर ने ही सभी के कान खोल दिये। क्योंकि परमहंस जी भले ही प्रत्यक्ष में उसकी स्थिति से परिचित न हों पर वहां उपस्थित जन तो उस व्यक्ति की स्थिति से अवगत थे ही। वे अनुभव कर रहे थे- यह प्रतिदिन चौसर खेलता है लेकिन आज तक कभी नहीं जीत पाया है।चौसर ने इसका घर परिवार ही नष्ट कर दिया है। फिर भी इसका वही चाल चलन है।

इस एक उत्तर ने सब के मन का विश्वास जीत लिया। निषादपुरम के सेठ अनन्तराम सोचने लगे,’’परमहंस जी के उत्तर के अनुसार यह कभी चौसर में न विजयी हुआ है न होगा।’’

लोहकर्मी रामबली ने सोचा, ’’इसे तो हमेशा हमेशा के लिये चौसर खेलना ही छोड़ देना चाहिये?’’

अब तक दूसरा व्यक्ति अपने अन्दर की व्यथा को छिपाकर न रख सका। उसने भी प्रश्न किया,’’परमहंस जी आज मेरे लड़के को अर्ध रात्रि के बाद उल्टी हो रही है, उसे ताप चढी है। उसे क्या औषधि देना चाहिए !’’

परमहंस जी ने उसे अपने पास से एक औषधि देते हुये कहा, ‘‘जा उसे इसे पीस कर खिला दे।’’

वह औषधि लेकर घर चला गया।

जब जब निषादपुरम में परमहंस जी का आगमन होता है, तब तब लोग इसी प्रकार की उलझनों और अपने प्रश्नों को लेकर उनके पास आने लगते हैं। आज भी यह सिलसिला देर तक चला ।

तब अंधेरा घिर रहा था । सायंकालीन अभ्यास से निवृत्त होकर एकलव्य परमहंस जी के पास आया । उसने साष्टांग प्रणाम कर उनसे निवेदन किया, ’’परमहंस जी राजप्रासाद में चलें।’’

एकलव्य की बात सुनकर बच्चों की तरह सरल हृदय वाले परमहंस जी तत्काल उठे ओर एकलब्य के साथ चल पड़े । कुछ वृद्धजन भी परमहंस जी के पीछे पीछे राजप्रासाद के लिये चल दिये।

निषादपुरम में अधिकांश घर मिट्टी के बने थे। कुछ घरों पर छान डली थी। कुछ की छान पर बेलें सुशोभित थीं। कुछ घर नदी के पत्थरों का उपयोग कर बनाये गये थे। निषादपुरम के मध्यपथ से चलते हुये सभी राजप्रासाद की ओर चले जा रहे थे।

मिट्टी के ऊॅचे टीले पर दिख रहा था राजप्रासाद। थोड़ी सी चढ़ाई चढ़ने के बाद दिखने लगा विशाल दरवाजा, जो पत्थरों को सुसज्जित कर बनाया गया था। उन्हीं पत्थरों से बना था राजप्रासाद का परकोटा। राजप्रासाद के सामने था विशाल अशोक का वृक्ष, जो इसकी शोभा में वृद्धि कर रहा था। निषादराज से मिलने आने वाले, प्रतीक्षा के समय इसी वृक्ष की छाया का आश्रय ग्रहण करते हैं। राजप्रासाद के आसपास पहाड़ी की तलहटी तक घने वृक्षों की शोभा, भीलराज के वनप्रेम की कहानी कह रही है।

परमहंस जी के साथ युवराज एकलव्य को देखकर पहरेदार को अन्दर निषादराज के पास सूचना भेजने की आवश्यकता नहीं पड़ी। वे राजप्रासाद के विशाल कक्ष में पहुँच  गये। निषादराज ने आगे बढ़कर परमहंस जी की अगवानी की। परमहंस जी को पास के सिंहासन पर बैठाया। निषादराज सिंहासन पर विराजमान हो गये। कुछ लोग परमहंसजी की चरणसेवा करने लगे। राजसेवक ने उन्हें गौदुग्ध प्रस्तुत किया। जिसे वे बिना ना नुकुर कर पी गये ।

 

हिरण्यधनु आज कम बोल रहे थे । वे बस परमहंस जी को देखे जा रहे थे ।

परमहंस जी अनुभवी हैं। वे बिना प्रश्न सुने ही जान गये कि निषादराज की उलझन क्या है ? उन्होंने स्वयं ही पूछ लिया, ’’राजन, आचार्य की खोज चल रही है।’’ हिरण्यधनु समझ गये कि परमहंस जी को हमारी समस्या का आभास हो गया है। इसलिये उन्होंने उत्तर दिया, ’’जी गुरूदेव।’’

यह उत्तर सुनकर परमहंस जी विचार मग्न बैठ गये मानों समाधिस्थ हो गये हों । सभी उनके उत्तर की प्रतीक्षा करने लगे। उत्तर की प्रतीक्षा करते आधी घड़ी व्यतीत हो गई तो हिरण्यधनु ने प्रश्न किया, ’’गुरूदेव एकलव्य के लिये धनुर्विद्या सिखलाने वाले आचार्य की खोज कर रहे हैं। अभी इस कार्य में सफलता नहीं मिल पाई है।’’

 

उनकी यह बात सुनकर परमहंस जी ने उत्तर दिया, ’’एकलव्य के गुरू बनने लायक तो द्रोणाचार्य ही हैं। उनके पास ही जाना पड़ेगा।’’

परमहंस जी के इस कथन से लोगों को आश्चर्य हो रहा था। कुछ वृद्ध सोच रहे थे, ’’वे तो क्षत्रिय राजकुमारों के आचार्य हैं। क्या वे भील पुत्र एकलव्य को शिष्य रूप स्वीकार करेंगे ?’’

मंत्री चक्रधर सोच रहे थे, ’अब आचार्य की खोज में भटकने की आवश्यकता नहीं है। निश्चित ही समस्या का समाधान प्राप्त हो गया है।’’

हिरण्यधनु परमहंस जी की बातों को अक्षरशः ग्रहण कर रहे थे। उन्हें विश्वास हो गया, ’’आचार्य द्रोण इसे अपना शिष्य स्वीकार कर लेंगे।’’

अब परमहंस जी वहां से उठे। हिरण्यधनु ने उन्हें रोंकने का प्रयास किया। परमहंस जी कुछ उत्तर दिये बिना ही वहां से चले गये। निषादपुरम के जो वृद्ध उनके साथ आये थे वे भी उनके पीछे-पीछे चले गये।

उनके जाने के बाद हिरण्यधनु को लगा कि परमहंस जी हमें परामर्श देने के लिये ही अचानक आज यहॉ आये थे।

यही सोचते हुये वे एकलव्य को आचार्य द्रोण के पास भेजने की योजना बनाने लगे।

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