ग्वालियर दुर्ग की ऐतिहासिकता in Hindi Novel Episodes by Dr Mrs Lalit Kishori Sharma books and stories Free | ग्वालियर दुर्ग की ऐतिहासिकता

ग्वालियर दुर्ग की ऐतिहासिकता

Dr Smt Lalit Kishori Sharma 
इतिहास अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में उन मानवीय क्रियाकलापों का अभि लिखित चित्रण हैं जो समय चक्र में घटित होते रहते हैं ।इतिहास का प्रवाह उस विशाल निरंतर प्रवाहित होने वाली नदी के समान है जो अपना मार्ग समय चक्र के बीच से खोजती हुई आगे बढ़ जाती है । नदी के प्रवाह कभी सरल सुमधुर एवं शांतिपूर्ण होता है और कवि वह अत्यंत उतार-चढ़ाव वाला कोतुहल पूर्ण और यहां तक की विध्वंसआत्मक बाढ़ के रूप में भी दृष्टिगोचर होता है 
ग्वालियर का ऐतिहासिक दुर्ग विंध्याचल की श्रृंखलाओं से घिरे हुए सुरम स्थल एवं गालव ऋषि की तपोस्थली ग्वालियर नगर की सतह से 98 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।  ग्वालियर नगर की स्थापना के संबंध में कुछ इतिहासकारों का मत है किसकी स्थापना कुंतल पुरी  के राजा सूरज सेन नामक एक कछवाहा सामंत प्रधान द्वारा की गई थी। राजा शूरसेन  कोढ के रोग से ग्रसित थे।  एक दिन शिकार करते हुए  वे गोप  गिरी का पहाड़ी पर पहुंच गए पास ही गालव ऋषि की गुफा थी प्यास से व्याकुल राजा जब वहां पहुंचे तब ऋषि नेेे पहले उन्हें सरोवर मेंंंंस्नान करने को कहा तत्पश्चात अपने कमंडल से जल पिलाया जिसके फलस्वरूप वह कुष्ठ रोग से मुक्तत हो गया। उस सिद्ध संत की ईश्वर राजा द्वारा सरोवर का जीर्णोद्धार करवाया गया तभीी से ओशो संत द्वारा उस कुंड का नाम सूरजकुंड रखा गया जो आज भी दुर्ग पर स्थित है साधु की आज्ञा से ही इस दुर्ग का निर्माण हुआ तथा राजा ने कृतज्ञता वश अपने नगर का नाम उन महात्मा के नाम पर ही  ग्वालियर रखा। मार्कंडेय पुराण में इस पर्वत को गोवर्धन तथा विक्रम संवत 932 के अल्ल के शिलालेख में गोपा दरी और विक्रम संवत 933 के भोज प्रतिहार के शिलालेख में गोोप गिरी के नाम सेेे उद्धृत किया गया है। 15 वी शताब्दी के शिलालेखों में भी यह गोपो पर्वत गोपा तथा गोपाचल के रूप मेंं ही मिलता है इस गोपाचल पर्वत पर दुर्ग का निर्माण कब हुआ यह प्रश्न आज भी विवादास्पपद है। स्वर्गीय श्री गर्दे के लेखके अनुसार खटक राय लिखतेे हैं कि ग्वालियर किला कलयुग के प्रारंंभ में अर्थात ईसवी संवत पूर्व 3101 में बनाया गया था। 
द्विवेदी जी के मतानुसार  खड़क राय का कथा  निराधार प्रतीत नहीं होता क्योंकि महाभारत में भी  इस प्रदेश को  गोप राष्ट्र कहा गया है  और जब  गुप्तेश्वर के समीप  चार पांच हजार वर्ष पुराने  गुहा चित्र प्राप्त होते हैं तब गोपाचल की स्थापना कलयुग के प्रारंभ तक पहुंच जाती है 
दुर्ग का स्थापना काल कुछ भी रहा हो  परंतु इसका वैभव  अप रमित है ग्वालियर दुर्ग को  'भारतीय दुर्गों की  मणि माला का प्रमुख मोती कहा जाता है' ताजुल अमा आसिर के लेखक ने ग्वालियर दुर्ग का वर्णन करते हुए लिखा है 
की 'इस के शिखर के नीचे स्थल में बिहार करने वाली तीव्र वायु इसका स्पर्श नहीं कर सकती और जिसकी कोटों पर तेज गति से उड़ने वाले बादल अपनी छाया नहीं डाल सकते। यह किला आज भी अपनी आन बान से प्राचीन वैभव और गौरव की याद दिलातााा हुआ खड़ाा है इसके वक्ष स्थल पर अगणित जीवन मरण नाना विधि  के प्रेम वियोग के नाटक और साहस वीरता भीरुता की कथाएं घटित हुई हैं'
 ग्वालियर दुर्ग पर  छठी शताब्दी से ऐतिहासिक  प्रमाण  प्राप्त होने लगते हैं  इनमें हूणड शासक मैहर कुल  का शिलालेख  सबसे अधिक प्राचीन है  इस समय के शिलालेख तथा मंदिरों के अवशेषों से  इतिहास की श्रंखला  जुड़ने लगती है  दुर्ग पर स्थित  मुख्य ऐतिहासिक धरोहरों का  वर्णन यहां संक्षेप में प्रस्तुत है  
1 पहला गुजरी महल  ग्वालियर दुर्ग के पूर्वी् द्वार के निकट  गुजरी महल स्थित है  गुलाबी पत्थर से निर्मित  यह महल  स्थापत्य  कला का  एक अनुपम उदाहरण है  राजा मानसिंह ने  अपनी प्रिय रानी  मृगनैनी के लिए  इसका निर्माण करवाया था  रानी गुर्जर जाति की होने के कारण इसका नाम गुजरी महल प्रसिद्ध हुआ मृगनयनी की शर्त के अनुसार राई गांव काा पानी यहांं तक लाने के लिए सांक नदी सेे नहर बनाई गई जिसका स्वरूप  आज भी इस महल में देखा जा सकता है  बीच में  एक विशाल आंगन के चारों तरफ बने कमरों  व उनके छज्जा को सुंदर नक्काशी से तराशा गयाा है इसमें लगे अरबी वफारसी के शिलालेखों से विदित होता है कि इस महल का निर्माण सन 1512 ईसवी में किया गया था वर्तमान में यहां एक पुरातत्व संग्रहालय है साथ ही एक पुस्तकालय भी है जो इतिहास प्रेमियों के लिए लाभकारी व ज्ञानवर्धक है 
दूसरा दुर्ग द्वार ग्वालियर दुर्ग में प्रवेश पाने के लिए मुख्य रूप से दो द्वावार है एक पूर्व दिशाा में ग्वालियर गेट वह पश्चिम दिशाा में उरवाई गेट के नाम सेेे प्रसिद्ध है ग्वालियर द्वार के मार्ग मैं 5 द्वार मिलते हैं प्रथम आलमगीर दरवाजा मुस्लिम स्थापत्य कला का सुंदर नमूना है इसका निर्माण  1660 में मोतनी दिखा द्वारा करवाया गया था  दूसरा बादलगढ़  द्वार हिंदू स्थापत्य कला का सुंदर नमूना है इसका निर्माण  15 शताब्दी में  राजा मानसिंह  के चाचा  बादल सिंह की स्मृति में किया गया था इसे  हिंडोला द्वार भी कहते हैं  यहां पहले  कई वर्षों तक  सिंधिया स्कूल के  घोड़ों का अस्तबल था  वर्तमान में सरस्वती शिशु मंदिर  प्रारंभ हो गया तीसरा  भैरव द्वार था  जो अब नहीं है इसके पश्चात  चतुर्थ द्वार  गणेश द्वार है इसे डूंगर सिंह ने  बनवाया था  इस द्वार के  थोड़े ही ऊपर  गालव ऋषि की  मूल समाधि का निर्माण  राजा शूरसेन द्वारा  करवाया गया था वर्तमान में  यहां गालव ऋषि वाह हनुमान जी कााा मंदिर है  गणेश द्वार के आगे  पांचवा लक्ष्मण द्वार है  जिसके पास अत्यंत प्राचीन  चतुर्भुज  भगवान का मंदिर है लक्ष्मण द्वारका निर्माण तोमर वंश के राजकुमार लक्ष्मण सिंह की स्मृति मेंं कराया गया इसी द्वार के आगे एक 15 फीीट ऊंची शिव प्रतिमा व अन्य देवताओं कीी प्रतिमाएं चट्टानों में उत्कीर्ण की गई थी जो अब केवल भग्नावशेष हैं इनका निर्माण काल नौवीं शताब्दी अनुमान किया जाता है इनके पास ही शरद और अनार बावड़ी के नाम से दो प्रसिद्ध पानी की बावड़ियां है अंतिम द्वार हाथीया पावर के नाम से प्रसिद्ध है प्राचीन काल में इस दरवाजे में अलंकरण के रूप में बनी हुई जीवित आकार हाथी के आकार की प्रस्तर आकृति के कारण ही द्वारका नाम हाथिया पर पड़ा था 1610 तक इस हाथी प्रतिमा की उपलब्धि के प्रमाण मिलते हैं इसी द्वार के ऊपर सुंदर पत्थर की जालियों से निर्मित नौबत खाना है जिसमें सूर्योदय व सूर्यास्त के समय शहनाई वादन होता रहता था यह क्रम 1947 तक चलता रहा इसी स्थान पर बाहर आते हुए झंडे को देखकर राजा की विजय का अनुमान लगाया जा सकता था
 तीसरा मान मंदिर मान मंदिर राजा मानसिंह की स्थापत्य कला प्रियता का अनुपम उदाहरण है सन 1486 ईसवी के लगभग ग्वालियर दुर्ग वैभव एवं उन्नति के चरम शिखर पर पहुंचा हुआ था इसी काल में निर्मित अनेक सुंदर भावना मैं सुंदर तम कलाकृति के रूप में मान मंदिर की स्थापत्य शैली अनुपम एवं अद्वितीय है इसकी भव्यता एवं सुंदरता से आकर्षित होकर ही राजाओं के ह्रदय में ग्वालियर दुर्ग को अपने अधिकार में करने की प्रबल आकांक्षा जागृत हो उठती थी इतिहासकारों ने भी मान मंदिर के सौंदर्य वाह स्थापत्य कला की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है प्रसिद्ध इतिहासकार फर्गुसन ने से भारत के प्रारंभिक काल में निर्मित हिंदू प्रसाद ओ मैं अत्यंत भव्य एवं आकर्षण उदाहरण माना है दुर्ग के उत्तरी किनारे पर राजा मानसिंह का यह भव्य प्रसाद है जिसकी दो मंजिलें जमीन के नीचे तथा दो जमीन के ऊपर हैं महल आयताकार है जिसकी लंबाई उत्तर से दक्षिण की ओरन92में मीटर और पूर्व से पश्चिम की ओर 49 मीटर है मान मंदिर की दीवारों पर हाथी सिंह हंस मयूर आदि की चित्रित आकृतियां पत्थर की बारीक नक्काशी रंगीन टाइल्स की चित्र बल्लारी आदि चीजें देखते ही बनती हैं इसका प्रवेश द्वार बहुत छोटा है अंदर शीश महल की जालियों पर की गई मीनाकारी पच्चीकारी खंभों तथा पत्थरों की खुदाई वह उन पर उत्कीर्ण बेल भूतों का सौंदर्य वह अनुपम चित्रकारी तथा उत्कीर्ण की गई खैनी का अद्भुत कौशल इसे भारत की महानतम कलाकृतियों की पंक्ति में रखता है इस दुर्ग के स्थापत्य काल की शैली इतनी उच्च कोटि की है की मुगलों ने भी इसके नमूनों को अपने यहां की इमारतों में स्थान दिया इतिहासकारों का मत है कि फतेहपुर सीकरी के बुलंद दरवाजे में ग्वालियर दुर्ग के द्वारों की छाया दिखाई देती है मान मंदिर के समीप विक्रम मंदिर करण मंदिर जहांगीर महल जहाजरानी महल आदि अनेक दर्शनीय स्थल हैं उत्तरी भाग के निकट एक जौहर कुंड भी है मान मंदिर के दक्षिण में समीप ही पेरापेट पर बैठकर मान मंदिर वह पुराने ग्वालियर नगर के दृश्य का अवलोकन किया जा सकता है वर्तमान में यहां सूचना विभाग की ओर से प्रतिदिन संध्या के समय प्रकाश एवं ध्वनि का रोचक कार्यक्रम पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है शरद पूर्णिमा की चंद्र ज्योत्सना में मान मंदिर के नीले पत्थरों पर पड़ता हलका प्रकाश सबका मन अपनी ओर आकर्षित कर लेता है मान मंदिर की प्रशंसा में हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासकार श्री वृंदावन लाल वर्मा ने लिखा है की 'महाकवि टैगोर ने ताजमहल को काल के गाल का आशु कहां है यदि मैं मान मंदिर और गुजरी महल को होठों की मुस्कान कहूं तो महाकवि टैगोर के उस बात का एक प्रकार से समर्थन ही करूंगा '
चौथा सास बहू का मंदिर ध्रुव के पूर्व दिशा में सहस्रबाहु के मंदिर स्थित है यही वर्तमान में सास बहू मंदिर के नाम से विख्यात है यह एक विष्णु मंदिर है जिसका निर्माण कार्य कछवाहा राजपूत महिपाल ने 1093 ईस्वी में पूर्ण किया यह 32 मीटर लंबा 22 मीटर चौड़ा है बाद में विशाल वेदी तीन और मंडप वह चौथी और देवालय है गुंबज की छत बारीक नक्काशी धार है बड़ा एवं छोटा दोनों ही मंदिर भारतीय मंदिर वास्तुकला की अलंकृत शैली के उत्कृष्ट उदाहरण हैं यहां से ग्वालियर नगर का सुंदर विहंगम दृश्य दृष्टिगोचर होता है 
पांचवा तेली का मंदिर दुर्ग के दक्षिण भाग के मध्य प्रतिहार राजाओं द्वारा निर्मित एक दर्शनीय इमारत है जिसे तेली की लाट या तेली के मंदिर के नाम से जाना जाता है दुर्ग पर स्थित सभी भवनों में यह सर्वाधिक ऊंचा है इसका निर्माण नवी शताब्दी में द्रविड़ व भारतीय आर्य शैली का मिश्रण दिखाई देता है इसका वास्तविक नाम संभवत तैलंग मंदिर रहा होगा इसकी ऊंचाई लगभग 100 फीट है तेलंग मंदिर का बाहरी मुख्य द्वार अंग्रेजों द्वारा सन 1881 में अन्य स्थान से लाकर स्थापित किया गया था
 छटा सूरजकुंड यह एक चौकोर कुंड है पूर्व में उल्लिखित किवदंती के अनुसार इसका निर्माण छठी शताब्दी में सूरज सेन द्वारा करवाया गया सिंधिया शासकों ने इसका जीर्णोद्धार करवाकर नवीन रूप प्रदान किया यहां स्थित सूर्य मंदिर के उत्तर की ओर हनुमान जी वह शिव मंदिर हैं जो अति प्राचीन है यही ऋषि गालव की तपस्थली भी है कुंड के मध्य में शिव मंदिर का निर्माण स्वर्गीय जयाजीराव सिंधिया के काल में करवाया गया वर्तमान में भी प्रतिवर्ष कार्तिक मास के अंतिम रविवार को यहां मेला लगता है 
ग्वालियर दुर्ग में गंगोला ताल खंबा ताल कटोरा ताल रानीताल चेदि ताल आदि अनेकों ताल है प्राचीन काल में शत्रुओं द्वारा दुर्ग को घेर लेने पर लंबे समय तक सैनिकों हेतु जल की व्यवस्था इन तालों के कारण बनी रहती थी सूरजकुंड के पूर्व में एक प्राचीन माता का मंदिर है इसका निर्माण 12 वीं शताब्दी का प्रतीत होता है 
सातवां दाता बंदी छोड़ गुरुद्वारा सिखों के छठवें गुरु श्री हरगोविंद सिंह जी की स्मृति में ग्वालियर दुर्ग पर एक भव्य गुरुद्वारा का निर्माण किया गया है जहांगीर के द्वारा गुरु गोविंद सिंह जी को 12 वर्षों तक ग्वालियर दुर्ग में कैद रखने के कारण ही या स्थान सिखों का तीर्थ स्थान बन गया जब विवश होकर जहांगीर द्वारा हरगोविंद सिंह जी को मुक्त करना पड़ा तब उनके साथ कैद अन्य 100 राजाओं को भी मुक्त किया गया सबवे विशेष रूप से बनवाए गए 100 पल्लू वाले गुरु जी की चोगे के शो पल्लू को पकड़कर 100 राजा दुर्ग से बाहर चले गए या गुरुद्वारा पूर्णत संगमरमर का बना हुआ है रंगीन कांटो से अलंकृत यह अत्यंत भव्य एवं विशाल गुरुद्वारा है इसमें दो सरोवर भी हैं इसके गुंबद पर सोने के कलश लगे हुए हैं प्रतिदिन प्रातः काल पूर्व दिशा में उषा की लालिमा प्रस्फुटित होने के पूर्व से ही तथा संध्या के समय भगवान भास्कर के अस्ताचलगामी होते ही श्री गुरु ग्रंथ साहब की वाणी की मधुर ध्वनि दुर्ग के संपूर्ण वातावरण को अत्यधिक शांत और पवित्र बना देती है प्रत्येक अमावस्या को यहां विशेष प्रार्थनाएं व भजन कीर्तन होता है अपार संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं का आवागमन एक मेले का दृश्य उपस्थित कर देता है 
आठवां सिंधिया स्कूल दुर्ग पर प्रकृति की रमणीय गोद में भारत के प्रसिद्ध पब्लिक स्कूल की स्थापना सन 1897 में स्वर्गीय माधवराव सिंधिया प्रथम ने सरदार स्कूल के नाम से की थी सन 1933 में इसका नाम सुननी है स्कूल के रूप में परिवर्तित कर दिया गया दुर्ग की चट्टानों वा घने जंगलों को साफ कर खेल के मैदान व भवन आदि बनाकर प्रत्येक वर्ग के छात्रों की उचित शिक्षा का प्रबंध किया गया इस समय भारत के प्रत्येक प्रांत तथा विदेशों तक से आए हुए छात्र यहां शिक्षा प्राप्त करते हैं उच्च आदर्शों से परिपूर्ण कर्तव्यनिष्ठ तथा समर्पित भाव से अथक परिश्रम करने वाले महान मार्ग दर्शकों के संरक्षण में निरंतर विकास करता हुआ या विद्यालय आज भारत के प्रमुख तम विद्यालय की श्रेणी में पहुंच गया है यहां पर पड़ने वाला प्रत्येक बालक अपने को गौरवान्वित समझता है यहां बालकों के सर्वांगीण विकास की ओर पूर्ण ध्यान दिया जाता है यह एक सामाजिक केंद्र लघु रूप में एक राज्य और मनमोहक वृंदावन है संध्या के शांत वातावरण में इस सिंधिया स्कूल के श्वेत परिधान धारण किए हुए तथा परस्पर वार्तालाप करते हुए बालक अनायास ही गुटूर गू करते हुए श्वेत कपोत ओं की याद दिला देते हैं विकास की संख्या में 100 वर्षों के लंबे सफर को पूर्ण कर सन 1997 में जब सिंधिया स्कूल का शताब्दी समारोह मनाया गया उस समय कार्यक्रम की भव्यता वह विशालता तथा अनूठे सौंदर्य को देखकर अनेकों विदेशी अतिथियों द्वारा उसकी प्रशंसा करते हुए कहा था कि 'एक विद्यालय का उत्सव इतने विशाल व भव्य रुप में मनाए जावे ऐसा हमने विश्व के किसी भी देश में नहीं देखा '
 9, उरवाई घाटी दुर्ग में पश्चिम से प्रवेश करने का द्वार कुरवाई घाटी में हरियाली का साम्राज्य है पावस ऋतु के काले काले मेघ जब घुमड़ घुमड़ कर बरसते हैं तब यह दुर्ग हरित परिधान धारण कर अपने नवीन रूप में शोभायमान होने लगता है वर्षा के झरने की जलधारा वृक्षों एवं झाड़ियों के बीच में से होकर जब बहती है तब  उरवाईघाटी के सौंदर्य में और अधिक अभिवृद्धि हो जाती है घाटी मयूर की ध्वनि से गुंजित हो जाती है जहां-तहां नाचते हुए मयूर पर्यटकों के मन को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं जूही के पशुओं की सुगंध से संपूर्ण घाटी सुवासित हो उठती है 
दुर्ग में प्रवेश पाने के लिए विशेष रुप से उरवाई घाटी का ही उल्लेख मिलता है यह मार्ग आक्रमणकारियों के लिए स देवी आकर्षण का केंद्र रहा उरवाई घाटी के बाहर के हिस्से में बहुत सुंदर बावरिया तथा कुए थे इन को सुरक्षित रखने के लिए 13 वी में शताब्दी में अल्तमस ने अत्यंत सुदृढ़ दीवार का निर्माण करवाया जिससे घाटी में बने आठ हुए और 9 बावरिया सुरक्षित हो गए इन कुओं का पानी दुर्ग की दीवार के अंदर से बेहकर तथा छनकर इन कुओं में पहुंचता है उस काल में केवल इन कुओं का पानी ही स्वादिष्ट एवं स्वास्थ्य वर्धक समझा जाता था घूमने और छिपने के लिए कुरवाई घाटी  के घने जंगल तथा पीने हेतु बावरियों का पानी आदि की सुविधा जनक स्थिति के कारण प्राचीन काल में तेंदुए इस घाटी को ही अपना विश्राम स्थल बनाया करते थे ग्रीष्म ऋतु में बहुधा वे घाटी की सड़कों पर घूमते हुए देखे जा सकते थे घाटी से चढ़ते हुए जब उरवाई द्वार पर आते हैं तो मन में ऐसा आभास होने लगता है कि हम एक विगत वैभव पूर्ण इतिहास के द्वार पर आकर खड़े हो गए हैं घाटी में प्राचीन इतिहास के अनेकों अवशेष बिखरे पड़े हैं विशालकाय जैन मूर्तियां स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण है जिन्हें देखकर पर्यटक आश्चर्यचकित हो जाते हैं जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों में सबसे बड़ी 57 फीट ऊंची आदिनाथ जी की मूर्ति है इनका निर्माण काल 15 वी शताब्दी माना जाता है बाबर ने भी इस घाटी के सुंदर से प्रभावित होकर बाबरनामा में इसकी प्रशंसा की है 
ग्वालियर दुर्ग का सौंदर्य प्रत्येक ऋतु में अत्यंत ही लुभावना लगता है सावन भादो की अविरल झड़ी में दुर्गे की शोभा अवर्णनीय हो जाती है नवीन हरित परिधान से सुसज्जित यहां के मनोहारी वातावरण में एक अद्वितीय सौंदर्य और उन्माद सा छा जाता है वर्षा समाप्त होते ही शरद ऋतु की पूर्णिमा की चंद्र ज्योत्सना का दूधिया आलोक दुर्ग पर छा जाता है कार्तिक मास की शीतल प्रभात बेला में भगवान अंशुमाली की प्रथम कोमल स्वर्णिम रश्मि ओं का स्पर्श तन मन को आनंद से भर देता है वसंत ऋतु के आते ही कोयल का पंचम स्वर संपूर्ण दुर्ग पर गुंजित हो उठता है मौलश्री कचनार अमलतास मंदार और टेसू के फूल मानव बसंत ऋतु का स्वागत करते हुए प्रतीत होते हैं फूलों की भीनी भीनी सुगंध संपूर्ण दुर्ग को सुभाषित कर देती है प्रत्येक ऋतु में उषा की लालिमा के साथ पूर्व दिशा में उगते हुए भगवान भास्कर का स्वागत करती हुई दुर्ग की बोर तथा संध्याकाल में अस्ताचलगामी दृश्य अत्यंत ही मनोहारी प्रतीत होते हैं विभिन्न ऋतु में निरंतर नवीनता लिए हुए दुर्ग के इस अनूठे सौंदर्य को मैंने बहुत निकट से देखा और अनुभव किया है उसका संपूर्ण चित्रण कर पाना लेखनी की सामर्थ नहीं है