DASTAN-E-KARB भ्रम से परे क्या है? in Hindi Drama by Azoorey books and stories PDF | DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 3 Scene 4.

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DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 3 Scene 4.

महल में, जहां कई राज़ को राज़ रखने का ज़िक्र था, वहीं अम्हेल भी राज़ बनकर महल आई थी, और इस बात की जुस्तजू मुंशीजी को हो चुकी थी। 

मुंशीजी अम्मा साहब की तरफ़ से सौंपी हुई ज़िम्मेदारी पर ग़ौर ओ फिक्र में थे कि इतने सारे लोगो में ये ज़िम्मेदारी उनको ही क्यों मिली। अम्हेल को लेकर मुंशीजी के ख्यालों में बहुत से नए पहलु बन चुके थे। वो ये नही समझ पा रहे थे की अभी अम्हेल को लेकर अम्मा साहब ने बस दो तीन लोगों पर ही भरोसा किया है क्योंकि अम्हेल अभी इस महल के लिए बिलकुल अनजान है और यहां के लोग उससे अंजान हैं।

ये तो आम सी बात थी कि उसे अभी महल के माहौल को समझने और उसमें ढलने में वक़्त लगेगा, हालांकि अम्मा साहब ये नही जानती है कि रेशम के पिटारो में से क़िमती रेशम को उनलोगों की नज़रों से कबतक बचा के रख पाएंगी जिनके पास उसे नोच कर फेंक देने का हुनर होता है। फिर भी वो पूरी उम्मीद और कोशिश के साथ उसे बचा कर रखना चाहती है इसलिए वो आने वाले वक़्त में हर क़दम को बहुत सोच समझकर रखने के बारे में सोच चुकीं थीं। 

अम्मा साहब ने ये ज़िम्मेदारी भी मुंशीजी को इसी वजह से दी क्योंकि वो जानती है की इस वक़्त महल के लिए यही सही है और मुंशीजी के अंदर ऐसी कला है के वो जल्द से जल्द अम्हेल के मन से अकेलापन और झिझक खत्म कर सके और वो ऐसा ही चाहतीं थीं ताकि अम्हेल बिलकुल बेतकल्लुफ़ हो जाए। वो बस उसे आने वाले वक़्त के लिए तैयार रखना चाहतीं हैं। 

"मेरा काम तो राजकोष प्रबंधक का है। जमीनें और कारोबार देखना है, व्यवसाय पर ध्यान रखना, दस्तावेजों को देखना।... तुम ज़रूर ख़ास होगी तभी आली जनाब ने मुझे ये काम दिया है।" मुंशीजी ने कुर्ते के जेब में से पान निकालते हुए अपनी बनाई हुई दुनिया का मंज़र मसखरे अंदाज़ में अम्हेल के सामने रखा। 

पान मुंह में डालकर फिर मुंशीजी कहने लगे "बेगम साहब के सामने पान नही खा सकता ना, अभी मौक़ा मिला है इसलिए खा रहा हूं, तुम उन्हें बताना मत।"

"नहीं बताएंगे।" उनके मसखरे अंदाज की वजह से अम्हेल ने मुस्कुरा कर कहा

"मैं तो समझा तुम बोलती ही नही, लेकिन तुम मज़ेदार लगती हो मुझे।" मुंशीजी हंसी मज़ाक करने लगे "अच्छा ही हुआ बेगम साहब ने ये काम मुझे दिया, ऐसे हमदोनो एक दूसरे को पहचान जाएंगे तो हमलोग की अच्छी बनने लगेगी, हैना?"

मुंशीजी की ये बात अम्हेल को थोड़ी अजीब लगी इसलिए उसने उनको इस दफ़ा हैरानी से देखा मगर कुछ कहा नहीं। इसपर मुंशीजी ने हंसकर अपनी कही बात की वजा़हत किया

"मेरा मतलब था बेगम साहब ने कहा था न तुम मुझसे किसी भी मसले पर बात कर सकती हो इसलिए मैने कहा,.. वैसे यहां पर सभी ज़्यादातर मुझसे ही मन की बात करते है।"  

"हम्म्म...।" 

"तुम काफ़ी अजीब हो....।" उसके हिम्म पर उन्होंने कहा "ख़ैर कुछ नया नही, इस महल में हर कोई अजीब ही है बल्कि पूरा का पूरा महल ही अजीब है। मेरी नज़र में तो ये अपने आप में ही अजीबो ग़रीब जगह है।"

"क्या मतलब?" मुंशीजी की बातों पर अम्हेल के चेहरे पर झिझक आ गई, वो महल को लेकर पहले से मश्कूक थी और मुंशीजी की ये बात।

मुंशीजी ने चश्मे से झांककर उसकी तरफ़ देखा फिर आगे बढ़ते हुए कहा 

"मतलब तुम्हें मालूम हो ही जाएगा। मगर मैं इतना बता दूं कि इस महल के अपने कुछ उसूल है जिसे कोई भी तोड़ नहीं सकता। वैसे तो बेगम साहब बहुत बड़े दिल कि है किसी को परेशानी और तकलीफ़ में नहीं देख सकती लेकिन जब बात उसूल तोड़ने की या उनके ख़िलाफ़ जाने की हो तो उनका गुस्सा सबपर भारी होता है।

...

इन सारी बातों को याद रखना और साथ में उसूलों को भी। और हां आली जनाब समय की बहुत पाबंद हैं।" बीतते वक़्त का अंदाजा लगाकर मुंशीजी ने कहा

"हां, अंदाज़ा है हमें।" अम्हेल ने बिल्कुल बेतकल्लुफी से कहा जिसपर मुंशीजी हैरानी से उसे देखने लगी

"हा हा हा, यहां पर सबको सब चीजों का पता है, मुझे भी मालूम है लेकिन तुम जानती तो हो पर क्या समझती हो?

"क्या?!" 

"यही की महलों का तो यही उसूल होता है और उसे कोई तोड़ नही सकता। इस महल में सबका अपना कक्ष है और बग़ैर इजाज़त कोई कहीं आ जा नही सकता।" आगे बढ़ते हुए उन्होंने फ़िर कहा "अरे भई सबसे मिलने के लिए तो बहुत चलना पड़ जाता है मुझे।" 

"कुसुम ने इस बारे में बताया था।"

"अच्छा! फ़िर चलो मैं दिखा भी देता हूं।" बातें करते करते मुंशीजी महल के मुख्य दरवाज़े को देखने लगे "मैं जब भी यहाँ से वहां देखता हूं तो सोचता हूं, जब महल की दुनिया इतनी बड़ी होती है तो दुनिया कितनी ही बड़ी होती होगी।" फ़िर उन्होंने कहा "तुम्हे कहीं आना जाना हो तो मुख्य द्वार का ही उपयोग करना, कभी पीछे के द्वार मत जाना, और हां किसी के साथ ही, अकेले नहीं।" 

"जी।"

"चलो आओ अब अंदर चलते है।" वहां से बाएं तरफ़ बढ़ते हुए अम्हेल को महल के बारे में बताने लगे "पीछे की तरफ़ का हिस्सा शिक़े-मसकन तो ख़ाली ही पड़ा रहता है उधर की तरफ़ जाना मना भी है जबतक कुछ बहुत ज़रूरी न आन पड़े।" बात करते हुए मुंशीजी आंगन से होते हुए गलियारे को पार करने लगे। 

"देखो पहुंच गए।" उन्होंने ठहर कर सांस लिया "ये अब्देक़िताह है, इसके ऊपरी हिस्से में महल के मेहमानों का रहने का बंदोबस्त है।" अम्हेल की तरफ़ देखकर मुंशीजी ने कहा "और मैं ये इसलिए बता रहा हूं क्यूंकि ये महल के उसूलों में से एक है, जब तक वज़ीर साहब की इजाज़त न हो, यहां आने जाने की इजाज़त नहीं है। और आपको बिल्कुल नहीं।" आगे बढ़ते हुए मुंशीजी ने कहा "हालात कैसे है नजाने कौन किस मिज़ाज का हो, इसलिए यहां पर शेख़ बाबा की इजाज़त के बग़ैर कोई खादिमा भी नही जाती जल्दी।" 

फ़िर मुंशीजी अब्देकितह से आगे लगे दरवाज़े से महल के पीछे मैदान की तरफ़ आ गए "पता नही ये जगह तुम्हे कैसी लगेगी।" 

मैदान बहुत दूर तक फ़ैला हुआ था। वहां के लोगों को अम्हेल तीरंदाजी और तलवारबाज़ी करते हुए देखते देखते मुंशीजी के साथ बढ़ते हुए मुंशीजी की बातें सुनने लगी 

"ये मैदान ख़ास कर जंगजुओं के लिए बना है, इसी मैदान में ये लोग हथियारों से खेलना सीखते है। वैसे तो यहां मेरा कोई काम नहीं लेकिन कभी कभी मुझे यहां भी आना पड़ जाता है। क्या करें मेरे बिना तो महल में कहीं काम ही नहीं चलता।" उन्होंने मसखरा पन करते हुए कहा 

मैदान में आकर अम्हेल के चेहरे पर इस जगह को देखकर नई रंगत दिखी, उसने पुर जोशी से कहा

"मतलब हथियारों में माहिर होना।" मुंशीजी उसके खिले चेहरे को देखकर आगे बढ़ने लगे

"हां, प्रैक्टिस।" ये लफ़्ज़ मुंशीजी ने कुछ दिन पहले सीखा था।

अम्हेल मुंशीजी के पीछे चलने लगी, उसकी नज़र वहां चल रही प्रैक्टिस पर टिकी हुई थी

"चलो कुछ और दिखाता हूं।" 

मुंशीजी के पीछे अम्हेल चलती रही और देखती रही कैसे कहीं पर तलवारबाज़ी हो रही कही पर तीरंदाज़ी और कहीं पर भाले और घुड़सवारियां सीख रहे है। अम्हेल के लिए बेशक ये सबकुछ नया सा था मगर उसके चेहरे पर की चमक साफ कह रही थी की ये सबकुछ अपने सामने होता देखकर वो कितनी ख़ुश हो गई, इन सब से उसके अंदर छुपा बचपन वापस से जाग उठा जो उसने अपनी हवेली की साज़िशो के तहत, उसके नज़रिए से, खो दिया था।

"देर हो रही है, वक़्त तेज़ी से बीत रहा है और जल्दी से जल्दी ऐवान ए सद्र में पहुंचना है।" आगे बढ़ते हुए मुंशीजी ने कहा

"मैदान पार करके महल का बाग़ीचा आ जाता है जो रात में बहुत ख़ूबसूरत लगता है और उधर ही कुतुबखाना भी है। मैं कुसुम से कहूंगा तुम्हे ले जाएगी कभी।"

मुंशीजी मैदान का रास्ता पार करते हुए अब्देकितह के सीध में दरवाज़े से इक़ामतगाह पहुंच गए

"इक़ामतगाह का उसूल भी कुछ अब्देक़ितह जैसा ही है, मगर यहां पर भी मेरा मामला ज़रा अलग है।" मुंशीजी फ़िर मसखरे अंदाज़ में कहकर आगे बढ़ गए इक़ामतगाह के दरवाज़े से बाएं ओर दूरी पर दूसरे दरवाज़े से मुंशीजी बावर्चीखाने के अंदर पहुंचकर शोर मचाने लग गए

"वाह क्या ख़ुशबू, आज क्या बना दिया है आपने मय्या, इतनी अच्छी ख़ुशबू सिर्फ आपके बनाए खाने से आ सकती है।" मज़ाक करते हुए मुंशीजी ने अम्हेल के सामने मय्या को चिढ़ाना शुरू कर दिया। मय्या जो शरीर से बूढ़ी थी मगर दिल से बहुत मज़बूत, वो भी पीछे नहीं हटी, उन्होंने भी मुंशीजी को छेड़ते हुए कहा

"चुप रह शैतान, तू फिर आ गया मुझे तंग करने। अभी तुझे कुछ नही मिलने वाला।" मुंशीजी उनकी बात पर हंसते हुए अम्हेल को बताने लगे 

"देखा तुमने मय्या को, कितना परेशान करती है मुझे।" फ़िर उन्होंने कहा "अरे मैं तो पीछे वाला रास्ता पकड़ने वाला था, खाने की खुशबू मुझे बावर्चीखाने तक खींच ले आई।" 

महल में नए मेहमान आने की ख़बर तेज़ी से फैल चुकी थी इसलिए सभी अम्हेल को देखकर अंदाजा लगा ले रहे थे की यही नई सदस्य है। बावर्चीखाने में भी सभी ये बात समझ चुके थे, अम्हेल को देखकर मय्या ने आगे बढ़कर कहा

"महल में स्वागत है तुम्हारा।" 

"आपका शुक्रिया।" अम्हेल ने जवाब दिया

मुंशीजी मय्या को छेड़कर आगे बढ़ गए। बावर्ची से आगे जाकर मुंशीजी अम्हेल के साथ खाना खाने वाले कमरे में पहुंच गए जिसमें बड़ी सी मेज़ और उसके ईर्द गिर्द कुर्सियां रखी थी और वहां से निकलकर सहन में पहुंच गए।

फ़िर नाक पर चश्मा नाक पर चढ़ाकर मुंशीजी ने कहा 

"अब हम ख़ास जगह चलते है।" फ़िर उन्होंने अम्हेल को देख कर कहा "असल में घूम कर आते तो समय लग जाता और समय नहीं है मेरे पास इसलिए मैंने छोटा रास्ता लिया।" 

फ़िर वो सहन से काफी आगे सामने का दरवाज़ा पार करके गलियारा पार करते हुए एक बड़े से कमरे में पहुंच गए। कमरे में कई निगार नक़्क़ाशी और तस्वीर टंगी हुई थी, और सब महल के पुराने सदस्यों की थी। अम्हेल उसे ध्यान से देखने लगी।

"ये लोग कौन हैं?" सबकी तस्वीर देखकर अम्हेल की जानने की इच्छा बढ़ गई

"ये स्वर्गीय मीर साहब है और ये स्वर्गीय मीर ए महल।" उन्होंने एक एक तस्वीर के बारे में बताया "और ये स्वर्गीय रानी मासा। और ये दोनों मीर साहब के माता पिता।" अम्हेल अभी भी उन सारी तस्वीरों को ध्यान से देख रही थी

"ये कितने उदास लग रहें हैं।" अम्हेल ने धीरे से कहा

"मानना पड़ेगा, काफ़ी अच्छी परख है तुम्हारी।" मुंशीजी भी अम्हेल के साथ मीर ए महल की तस्वीर को देखने लगे "ये जब तक महल में रहे सिर्फ़ दुखी रहे महल और अपने आवाम की वजह से। आख़िर कार जंग में शहादत देकर उन्होंने महल और हम सब को बचा लिया वरना महल समेत हमसब किसी की गुलामी कर रहे होते। ये तस्वीर आली जनाब बेगम साहब ने तब बनवाया था जब जंग की शुरुआत होने वाली थी, शायद इसीलिए आपको इस तस्वीर में उदासी नज़र आ रही है।"  

पुरानी कहानी की एक उदास हवा चली और मुंशीजी आगे बढ़ गए "चलिए एक और जगह है अभी।" और उस कमरे से निकलर सफेद पर्दा हटाकर वो कोर्ट रूम में पहुंच गए 

"यहां हम सब आ चुके है मगर आपको मालूम नही ये है महल का सबसे ख़ास हिस्सा 'कोर्ट रुम' नाम से तो आप समझ ही गई होंगी लेकिन फ़िर भी बता देता हूं।" उन्होंने कोर्ट रूम के अंदर आकर कहा

"इतनी देर से हम घूम रहे हैं और इतनी देर में मुझे समझ आ गया है कि आप है तो वैसे काफ़ी जिज्ञासु।" उनकी बात सुन कर अम्हेल ने उन्हें देखा "आप इन रंगों के बारे में सोच रहीं हैं न?" उन्होंने पूछा

"मैं रंगों के बारे में सोच रही थी और ये की ये कितना ख़ूबसूरत लग रहा है।" 

"दिखने में जितना खूबसूरत है उतना ही खतरनाक भी है।" मुंशीजी ने हंसकर बताया

"क्या मतलब?" 

"मतलब ये जो ख़ूबसूरत लग रहा है वो उससे ज़्यादा बोझिल और भारी है। ये दीवानों के रंग ओहदा बताते है।

जैसे ये काला है तो ये ब्लैक कोर्ट इस पूरे महल का मालिक होता है, छोटे से लेकर बड़े तक उनके कंधों पर होता है उन मसलों का बोझ, और इसलिए उसकी जान एक एक पल खतरे में रहती है, और ये लाल रंग, रेड कोर्ट तब काम में आता है जब ब्लैक कोर्ट की ख़ास ज़रूरत नही होती और ब्लू कोर्ट तो मीर साहब के ज़माने से वज़ीर साहब का ही है और ये ग्रीन कोर्ट पर बैठने वाले राजकोष प्रबंधक होते है यानी की मैं।" 

"और ये व्हाइट कोर्ट?" अम्हेल ने उत्सुक होकर झट से पूछा।

"देखा! ये मैने जानबूझ के नहीं बताया था आपकी जिज्ञासा देखने के लिए।" फ़िर उन्होंने कहा "ये व्हाइट कोर्ट हर उलझे मामले सुलझाने के लिए है और कस्बे और महल की शांति बनाए रखने के लिए है।"

"यानी कि ये रंगों की ख़ूबसूरती अपने आप में अहमियत रखते है।" 

"जी बिल्कुल सही, इसमें से एक भी गायब हो जाता है तो अफरा तफ़री का आलम हो जाता है मगर बेगम साहब ही हैं जो दशकों से इन सभी को बख़ूबी संभाल रहीं हैं।"

मुंशीजी ने अपने उन ख्यालों को मद्दे नज़र रखते हुए कहा जो उन्होंने अम्हेल के बारे में अपने ज़ेहन में ख़ुद बनाया था, अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर दिया।

"अब हमलोगो को चलना चाहिए।" चलते चलते भी मुंशीजी अम्हेल को कुछ जानकारियां देते गए "अब आप शिक्षा में व्यस्त हो जाएंगी तो महल के पीछे किताबघर की तरफ़ जा सकती हैं, वही उसके पास एक जगह है बाग़-ए-शादान उसको आप कुसुम के साथ देख लीजिएगा, ये कन्याएं अक्सर संध्या वहां टहलने जातीं हैं।" 

मुंशीजी इक़ामतगाह की तरफ़ का रास्ता पार करने के लिए अम्हेल से बात करते करते आगे बढ़े तो देखा कि शेख़ बाबा, मैथिली, शरबती और कुसुम मौजूद किसी मसले पर चर्चा में थे मगर उन दोनो को देखते ही ख़ामोश हो गए।

"क्या हो गया वज़ीर साहब माहौल इतना गरम क्यों लग रहा है?" मुंशीजी ने संजीदगी को भांपते हुए मसखरा अंदाज अपना लिया, मुंशीजी को देखकर तीनों अपने अपने रास्ते चली गई। शेख़ बाबा ने भी बात बदलते हुए पूछा

"महल का चक्कर लगा आए?" 

"जी बिलकुल पूरे महल में घुमा लाया इसे मैं बस शिक़े-मसकन कि तरफ़ नही गया।" 

"ये अच्छा किया आपने। मैं ऐवान-ए-सद्र की तरफ़ ही चल रहा था चलीए साथ ही चलते है।"

चलते चलते शेख़ बाबा मुंशीजी से कहने लगे "इसके आने की ख़बर तो पूरे महल को हो चुकी है इसलिए अब ज़्यादा मसला नहीं है मगर मुंशीजी उस बात का ख़ास ख़्याल रखना है जिसकी मैने ताकीद किया था आपसे।"

"उनके लिए आप फिक्रमंद मत होइए फिलहाल, क्योंकि वो तो अभी किसी मसले में उलझीं हुई है। क्या आपको ख़बर नहीं की कितने दिनों से उनका ध्यान भी कोर्ट रूम पर नहीं है?" मुंशीजी ने उनका इशारा समझते हुए जवाब दिया

"अच्छा!" शेख़ बाबा थोड़ा ताज्जुब में पड़ गए उसके बाद उन्होंने कहा "ठीक है मैं अनाबी से बात करता हूं इस मसले पर, अभी बहु बेगम ने फ़ैसला लिया है की अम्हेल की तालीम कल से शुरू हो जाएगी।"

"जी इसलिए मैने कह दिया है किताबघर वो कभी भी किसी के साथ भी जा सकती है।" 

इनके बीच में हो रही बातें अम्हेल भी पीछे चलते चलते सुनती रही और मन ही मन घबराती रही। 

"अभी ये बच्ची महल में नई है, मैने बात किया है और बच्चियों के साथ घुलेगी मिलेगी तो थोड़ा बेहिचक, बेतकल्लुफ होगी।" 

"अच्छा अच्छा ऐसी बात है, ये तो अपने बिल्कुल सही कहा।"  मुंशीजी ने कहा

बातें करते करते तीनों ऐवान-ए-सद्र पहुंच गए। दरवाज़ा खटखटा कर अंदर गए तो देखा अम्मासाहब कई पत्रिकाओं से घिरी बैठी थीं।

"आ गई ये पत्रिकाएं?" बाबा ने पूछा

"गायत्री कह रही थी पूराना मसला अभी तक हल नही हुआ?" शेख़ बाबा अपनी जगह पर बैठ कर पत्रिका पलटने लगे उसके बाद अम्मासाहब ने मुंशीजी से कहा

"देर हो गई मुंशीजी?"

"अभी समय है बेगम साहब, कुछ पल बचे है।"

"ठीक है फिर आप अम्हेल के साथ चलीए हम आते है। खाने के वक़्त की घंटी यानी सदाए जरस बजते ही वो लोग मेज़ पर पहुंच गए जहां अलग अलग तरीक़े के ख़ुशबूदार पकवान रखे थे। अम्मा साहब ने शाही कुर्सी पर बैठकर बाक़ी लोगों की इत्तेला लिया

"क्या आज कोई मेज़ पर नहीं आएगा?"

"अम्मासाहब कल से अनाबी की तबयत नासाज़ है जिस वजह से उनका और रानिया  बीबी का नाश्ता शिक़े-मसकन में ही लगा दिया गया है।" रुक्मणि ने अम्मासाहब के सवाल का जवाब दिया

इस ख़बर से अम्मासाहब का पीला पड़ा चेहरा अपनी रंगत बदलते साफ़ नज़र आने लगा जैसे उन्हें इस ख़बर से सुकून मिला हो

"और वली-ए-मीर कुछ देर पहले ही निकल गए हैं।" उसने आगे बताया। इतनी देर में ज़य्यान अहलम के साथ आ गया  

"निकल गए, कहां निकल गए?"

"हां बेगम साहब, उन्हें जमीनों और खेतों पर जाना था ना, वहीं गए होंगे।" मुंशीजी ने भूली बात को याद करके अम्मासाहब को बताया

"बेहतर।

....

खाना शुरू करें आपलोग।" महल के सदस्य बग़ैर आवाज़ किए नाश्ता करने में मसरूफ़ हो गए।