DASTAN-E-KARB भ्रम से परे क्या है? in Hindi Drama by Azoorey books and stories PDF | DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 4 Scene 1.

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DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 4 Scene 1.

रात कितनी ही घनी और गहरी हो, सुबह का सूरज तो निकलना ही है। हर रोज़ की तरह आज भी सुबह हुई, आज की सुबह का सूरज सबके लिए अम्नो-सुकून की वजह बना।

वो फिजाएं जिन्हें सूरज के छुप जाने से खुले आम सड़को और रास्तों पर ठिठोलियां करने का हौसला मिला था वो अब थमने लगी, कमज़ोर पड़ने लगी। कभी ये सूरज जो लोगों को बेहाल करता था आज इसी से शहर वालों को सुकून मिलने लगा। 

सागर भाई भी अपने सिपाहियों के साथ मुख्य दरवाज़े पर धूप के तले खड़े उन्हें आज का र्देस देने लगे।
उनका हाव-भाव, तेज और उनका ज़हन सारे सिपाहियो में सबसे तेज़ था इसलिए उनको मुख्या सिप्पाह सालार का मुक़ाम मिला था, और वो उसे बख़ूबी निभाने से कभी पीछे नही हटे। 
दर्स देते हुए उस के बीच किसी दस्तक की आवाज़ सुनकर मुख्य दरवाज़े पर पहुंच गए। वहां पर कागज़ में लिपटा हुआ एक ख़त उन्हें मिला जिसे सागर भाई ने लेकर शरबती को थमा दिया। जब उसे ख़बर हुई की ये ख़त अम्हेल आरा के नाम का है तो वो उसे लेकर दौड़ते हुए, बिना किसी इंतजार, ऐवान-ए-सद्र में पहुंच गई और दरवाज़ा खटखटा कर खड़ी हो गई

"खट्ट खट्ट....।" उसने खटखटाया 

"आजाओ।" अंदर से शेख़ बाबा की आवाज़ आई। शरबती अंदर पहुंचकर अम्मा साहब और शेख़ बाबा के सामने खड़ी हो गई

"बाबा ये ख़त आया है।" 

"कैसा ख़त?"

"अम्हेल के लिए है।"

शेख़ बाबा ने ख़त थाम लिया

"अम्हेल का ख़त।" अम्मा साहब ने कहा। बाबा से ख़त अपने हाथ में लेकर उसे उलट पलट कर देखकर शक में पड़ गई 

"ये बिल्कुल सादा है, क्या किसी ने मज़ाक किया है?"  शेख़ बाबा ने शरबती से कहा

"देने वाले ने बताया कि ये अम्हेल के लिए आया है।" शरबती ने शांत मेज़ाजी से जवाब दिया

अम्मा साहब ने और शेख़ बाबा ने एक दूसरे को सवालिया नज़र से देखा और नज़र नज़र में इस बारे में बात कर लिया कि कहीं ये कोई चलती नहीं, अम्हेल के लिए कोई ख़तरा तो नहीं। 

शेख़ बाबा ने भी उस ख़त को उलट पलट कर देखने के बाद निकाल कर पढ़ना शुरू कर दिया, उसे पढ़कर उन्होंने कहा "ये बिल्कुल ठीक है, कोई ख़तरा नहीं है....  लेकिन शायद ख़बर अच्छी नहीं है।"

"क्या मतलब?" अम्मा साहब ने घबराकर पूछा

"हम अम्हेल से ही पूछते है।" शेख़ बाबा ने आवाज़ लगाकर सुरूर को बुलाया "कुसुम से कह दो अम्हेल को बुला दे।" सुरूर चली गई। फिर शेख़ बाबा ने शरबती से पूछा

"और किसे मालूम है इस बारे में?"

"सेनावीर को।"

"ध्यान रखना ये ख़बर कहीं और ख़ास कर शिक़े-मसकन तक हरगिज़ न पहुंचे।"

इतने में दरवाज़े से मुंशीजी आवाज़ लगाकर अंदर आ गए

"बेगम साहब आपने याद किया?"

मुंशीजी को देखकर सबने अपना रूख बदल लिया।

"क्यों मुंशीजी ये सारे मसले अभी तक हल क्यों नही हुए, ये सारे तो हफ़्ता भर पुराने है।" गायत्री की दी हुई पत्रिकाओं में से पत्रिका उठाकर अम्मा साहब ने शेख़ बाबा को थमाते हुए मुंशीजी से कहा

"बेगम साहब आप तो जानती ही है कि आप कुछ दिनों से परेशान चल रही हैं ऐसे में मैं आपको और कैसे परेशान करता, अनाबी भी दो-तीन दिनों से हाज़िर नहीं हो रही ऐसे में मैं क्या करता।" मुंशीजी ने अम्मासाहब का गर्म मेज़ाज समझते हुए उन्हें अपनी बातों में ले लिया

"जाइए और अनाबी से बता दीजिए ये सारे मसले 3 दिनों में हल हो जाने चाहिए।" अम्मा साहब के रोब ने मुंशीजी को ख़ामोश कर दिया, वो सारी पत्रिकाएं उठाकर कोर्ट रूम की तरफ़ जाने के लिए मुड़ गए और पीछे से कुसुम, अम्हेल और मैथिली को आता देखकर अपनी नाक पर चश्मा चढ़ाकर उन्हें सवालिया नज़रों से देखकर चले गए। 

ये तीनों आकर खड़ी हो गईं। अम्मा साहब ने ख़त अम्हेल की तरफ़ बढ़ाया, जिसे अम्हेल सवालिया नजरों से देखने लगी, और अम्मा साहब ने कहा

"ये तुम्हारे लिए आया है इसे पढ़ो, ये तुम्हारे नाम पर है.....बताओ ये किसकी तरफ़ से आया है?" अम्मा साहब के मन में घबराहट, शक और सवाल था। अम्हेल ने ख़त लेकर देखा और हिचकिचाकर बताया, वो खुला ख़त देखकर मामला समझ चुकी थी

"ये हवेली से आया है....." 
उसके बताने के बाद भी ख़ामोशी बनी रही 

अम्हेल फ़िर ख़त पढ़ने लगी

"मेरी बहन
मुझे माफ़ कर देना, तुम्हे शाहबाद छोड़कर हवेली आने के बाद एक बार भी मैं पलटकर तुम्हारा हाल जानने न आ सका। मैं आना चाहता था मगर तुम्हारे यहां से जाने के बाद हवेली की बहुत सी ज़िम्मेदारीयां मुझपर है जिसे मुझे संभालना ही है। तुम्हे जिस दिन से तुम्हारी जगह से बेदख़ल किया और मजबूर किया उसे छोड़ने पर उस दिन से आवाम हवेली से नाराज़ रह रही है। 

मैंने उन्हें हर तरह से संभालने की कोशिश किया मगर हक़ीक़त उनके सामने आ गई, लेकिन उनमें से कुछ लोग अभी भी तुम्हारे कहे पर ही यक़ीन करते है। अब तो भाई भी ज़्यादातर हवेली के कामों के सिलसिले में ख़ुद ही कस्बे से बाहर रहते है, उनकी ग़ैर मौजूदगी में अम्मीजान और माहम का ख़्याल रखना मेरी ज़िम्मेदारी है। 

हां मुझे याद है मैंने कहा था मैं किसी से नहीं बताऊंगा तुम हवेली से कहां गई हो और मैने नहीं बताया है। अब मुझे कुछ फुर्सत मिल गई है इसलिए मैं दो-चार दिन बाद माहम के साथ तुमसे मिलने छोटी दरगाह आऊंगा। मुझे नजाने क्यों बहुत कुछ बिख़रता नज़र आ रहा है। इसलिए तुम मुझसे ज़रूर मिलना ताकि मैं तुम्हे हवेली का सारा हाल बता सकूं मुझे यक़ीन है इन मसलों का हल तुम्हारे पास ज़रूर होगा।

मिबसाम।" 

ख़त के दौरान ऐवान-ए-सद्र में ख़ामोशी छाई रही। मिबसाम का ख़त पढ़कर अम्हेल के चेहरे पर दिल में उठे दर्द का अक्स साफ़ नज़र आने लगा, ख़त पढ़ने के बाद उसके लब बेजान हो गए, उसकी आंखें नम हो गई लेकिन उसने उन आंसुओं को अपने दिल में उतार दिया। उसके चेहरे की रंगत ये बताने लगी की उसमें लिखा एक एक लफ़्ज़ उसके दिल में खलिश पैदा करने के लिए काफ़ी है। इस ख़त ने सिर्फ अम्हेल को नही बल्कि इसको सुनने वाले हर शख्स को दहला दिया, उन्हें इसके ज़रिए वो मालूम हुआ जिसका ज़िक्र आजतक नहीं हुआ था।

"इसका क्या मतलब है, क्या ये ख़त... बे लोस हवेली से है?" यहां फैली कुछ पल की उदास ख़ामोशी को अम्मा साहब ने अपने सवाल से ख़त्म किया

"ये मेरा भाई है।" उसकी भर्राई आवाज़ से वो ख़ुद कांपने लगी

"उसने ऐसा क्यों लिखा है, बताओ मुझे? क्या तुम शाहबाद गई थी?" अम्मा साहब का दिल इस वक़्त पसीज रहा था, उसमें लिखे लफ़्ज़ उनके ज़हन में भी घूम रहे थे।

उनके सवालों का जवाब अम्हेल अपने अंदर तलाश करने लगी और इस पल इस सवाल का कोई जवाब न दे पाने की वजह से उसने सबके बीच अपने आप को बहुत मजबूर पाया, उसकी आंखों ने सबकुछ बयान कर देना चाहा मगर उसका दिल सबकुछ ज़प्त करके ख़ामोश रह गया।

अम्मा साहब ने फिर पूछा "बताओ ये कैसा पैग़ाम है?" यहां मौजूद सभी की नज़रें ऊसपर ही टिकी नज़र आईं और सबके कान इस सवाल के जवाब की तलब में उसकी तरफ़ थे, लेकिन इन सवालों से बढ़कर ख़त में लिखा कुछ और इसे ग़मग़ीन करता रहा जिसकी वजह से वो किसी भी बात पर ध्यान नही दे पाई। 

अंदर ही अंदर उसका मन दुआ करने लगा की इस पल वो इस हालात से बच जाए क्योंकि उसके पास देने के लिए कोई जवाब नहीं, उसने कुछ बोलने के लिए अपने लब खोले ही थे कि उसकी दुआ क़ुबूल हो गई। अम्मा साहब के बिस्तर पर अहलम लेटी दर्द से कराह उठी जिसकी वजह से अम्मा साहब का ध्यान उसकी तरफ़ चला गया और वो उसके क़रीब चली गईं, और शेख़ बाबा उनके पीछे

"क्या हुआ बेटा, क्या दर्द ज़्यादा हो रहा है?" उन्होंने आहिस्ता से पूछा

"पैर नही मुड़ रहा मेरा।" कराहती आवाज़ में उसने जवाब दिया  

"तुम अपनी जगह रहो, पैरों पर ज़ोर मत दो। मैं डॉक्टर को बुलवा लेता हूं।" शेख़ बाबा ने फौरन कुसुम के ज़रिए डॉक्टर को बुलवाया। 

"पहले छोटे भाई को बुला दीजिए।" उसने कहा

अम्मा साहब अहलम के क़रीब बैठी हुई उसके पैर को सहलाने लगी और मैथिली के ज़रिए ज़य्यान को बुलावा भेज दिया।

ये सब देखकर अम्हेल को सुकून तो मिला की वो इन सारे सवालों से बच गई मगर ख़त में लिखी बातें उसे सताती रही।

कुछ देर में कुसुम डॉक्टर के साथ आ गई

"बाबा डॉक्टर हम्ज़ा आ गए।" सफ़ेद कुर्ते पैजामे पर भूरा कोट पहने हाथ में छोटी सी बक्सी लिए हुए एक नौजवान कमरे में आ गया। कुसुम ने आगे बढ़कर बिस्तर से जुड़ा सफ़ेद झलझला पर्दा गिराकर बिस्तर के क़रीब हम्ज़ा के लिए कुर्सी लगा दिया और फिर केसरी को ढूंढने चली गई

"क्या हुआ है इन्हें?" हम्ज़ा ने कुर्सी पर बैठते हुए नरमी से पूछा

"कल आधी रात के क़रीब ये फिसल गई थी तभी से इसके पैरों में दर्द है।" शेख़ बाबा ने जवाब दिया

"अच्छा, मैं देखता हूं।" इजाज़त लेकर वो परदे के पार से अहलम के टखनों को उठाकर उसकी जांच करने लगा

"परेशानी की कोई बात नही है। गिरने की वजह से पैरों में सूजन आ गई है और इसी तकलीफ़ की वजह से हरारत है। मैं दवाएं दे देता हूं और इन्हें काढ़ा भी पिलाइए।" फ़िर उसने एक पुडिया निकाल कर कहा "फिलहाल फ़ौरन इन्हें ये गर्म पानी में मिलकर पिला दीजिए।" 

हम्ज़ा के मशवरे पर शेख़ बाबा ने खादिम को ढूंढने के लिए इधर उधर नज़र दौड़ाया पर खुफिया बैठक की वजह से आसपास कोई ख़ादिम भी मौजूद नहीं थे इसलिए वो ख़ुद फौरन शरबती को ढूंढने चले गए। उनके निकलने के बाद मैथिली ने अम्मा साहब के क़रीब आकर उनसे फुसफुसा कर कहा

"आली जान का कक्ष तनहा था, उनतक हमारी आवाज़ नही पहुंची।" मामला समझते हुए, अहलम को देखकर उन्होंने ज़य्यान तक ख़ुद जाने का फैसला लिया।

अम्मा साहब अहलम  को अम्हेल के सुपुर्द करके मैथिली के साथ ज़य्यान की तरफ़ चली गईं। कमरे में सन्नाटा हो गया। हम्ज़ा अम्हेल को देखता रहा, फिर उसने ऐवान-ए-सद्र का कोना कोना देखा फिर उसे देखकर उससे पूछा

"आपकी तारीफ़?" अम्हेल ख़ामोश रही जिसपर उसने कहा "मेरा अरसों से यहां आना जाना है मगर आपको पहली दफ़ा देखा

"हम शागिर्द हैं।" सोच समझकर अम्हेल ने जवाब दे दिया।

उसने फिर दरवाजे की तरफ़ निगाह फेरकर अम्हेल को घूरा और कहा 

"इसके लिए गर्म पानी और कपड़े का इंतज़ाम करवा कर इनके पैरों पर सेक लगवा दीजिए, उससे इनको काफ़ी आराम मिलेगा।"

अम्हेल ने ख़ामोशी से इधर उधर देखा, हमज़ा ने अम्हेल को देखकर कहा "अभी इंतज़ाम कर दीजिए तो बेहतर है, इन्हें बहुत आराम हो जाएगा।"

उसकी बात मानकर अम्हेल खादिम को ढूंढने बाहर चली गई। वो इतनी देर से जिस मौक़े की तालाश में था उसने ये आख़िर ख़ुद से ही बना लिया। अम्हेल के जाने के बाद वो अहलम  से मुखातिब हो गया

"क्या अभी भी दर्द है आपको?" उसने पूछा, अहलम ने जवाब नहीं दिया। उसने लहजा बदलकर कहा

"आप इतनी लापरवाह कैसे हो सकती हैं, चोट रात में लगी थी तो मुझे भी उस वक़्त बुलवाना चाहिए था।" उसके अंदर बेचैनी ज़ाहिर हुई। अहलम  को उसकी ये बात अजीब लगी इसलिए उसने  ख़ुद को और अपने पैरों को समेटकर उससे दूर कर लिया 

"अम्मा साहब ने जब मुनासिब समझा बुलवा लिया।" अहलम ने सख़्त लहजे में कहा

मगर वो अभी भी रुका नहीं उसकी बेचैनी उसके सर पर चढ़ गई और उसने परदे के पार अहलम का हाथ अपने दोनो हाथो से पकड़ लिया

"आपको अंदाज़ा नहीं आपका दर्द मुझे किस क़दर परेशान करता है।" अपने दिल की बात को सामने लाते हुए उसने अपनी पकड़ थोड़ी मज़बूत करना चाहा मगर उसकी इस हरकत से अहलम ने गुस्से में उसका हाथ झटक दिया। पर हम्ज़ा ने पीछे हटने के बजाए उसे भरोसा दिलाना चाहा और कहा 

"मुझे ग़लत मत समझें, मैं आपसे बस अपने दिल का हाल बताना चाहता हूं।" उसने पर्दा हटकर कहा "इस तरह मुझपर गुस्सा न करें।" 

उसकी हरकतों पर अहलम को बहुत गुस्सा आया और वो डर भी गई। 
अम्हेल ने भी दरवाज़े पर से सब देख लिया जिसकी वजह से उसे अपने साथ हवेली में बीते ऐसे ही मंजर की याद आ गई और उसने अपना आपा एक बार फिर खो दिया। हम्ज़ा की तरफ़ शदीद गुस्से में बढ़कर उसने उसे धकेल दिया, अम्हेल की दख़लअंदाजी इस वक़्त हम्ज़ा को बहुत बुरी लगी क्योंकि उसे लगा था वो अहलम को माना लेगा। 

अम्हेल की इस हरकत पर हम्ज़ा ने बौखला कर, बिना सोचे समझे उसे ढकेल दिया जिसकी वजह से अम्हेल का हाथ मेज़ से लड़कर कर ज़ख्मी हो गया। अम्हेल ने दुबारा अहलम और हम्ज़ा के बीच आकर उसे अपनी गुस्सैल आंखों से घेरकर कहा

"तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ऐसी जुर्रत करने की, क्या तुम्हे याद नही की इस वक़्त तुम कहां खड़े हो?" 

"हमारे बीच से हट जाओ।" जुनूनियत की शिद्दत में उसने अम्हेल की चोट लगी रगें इतनी कस के जकड़ा के उसका हाथ सुन्न पड़ गया। उसका जुनून देखकर अम्हेल के चेहरे पर भी आग बरसने लगी, उसने कुछ कहना चाहा की दरवाज़े पर से कोई चीख़ उठा

"तुम ये क्या कर रही हो? छोड़ो उसे।" शाही लिबास में पतली दुबली खूबसूरत लड़की चमकदार भूरी आंखों से अम्हेल को घूरने लगी

"हम छोड़ दें! तुम्हें मालूम भी है इसने किया क्या है?"

"कुछ नही किया हैं मैंने रानिया ।" अम्हेल की बात काटकर वो चिल्ला उठा

"क्या ग़लत कर दिया इसने? बस बातें ही कर रहा था ना।" रानिया ने आराम से कहा। अम्हेल ने उसकी तरफ़ ताज्जुबी से देखा 

"तुम ये इसलिए कह रही हो क्योंकि तुम्हे अंदाजा नहीं है इसने किया क्या है।"

"मैं बीच में आई हूं? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझसे इस लहजे में बात करने की?" रानिया ने गुस्से में अम्हेल से कहा
"बीच में तुम हो, तुम एक मेहमान हो फिर महल के मामलों में दख़ल अंदाजी करने का हक़ तुम्हे किसने दिया?"

"ख़ामोश हो जाओ तुम दोनो।" इनके झगड़े को रोकने के लिए अम्मा साहब की तेज़ आवाज हवा में गूंज गई "ये क्या हो रहा है?"

"बड़ीमां  ये...।"  

अम्हेल के कुछ बोलने से पहले अम्मा साहब ने अम्हेल की तरफ़ जाकर कहा "क्या ऐसे पेश आते है किसी के साथ?"  

"यहां बदलेहाज़ी हुई है इसलिए हम.." गुस्से की वजह से अम्हेल का लहजा थोड़ा भरी और तेज़ था जिसे सुनकर ज़य्यान नाराज़ होने लगा और उसकी बात काट कर कहा 

"ये किस तरह का लहजा अख़्तियार किया है आपने मासाब के सामने?" 

ज़य्यान और अम्मा साहब की बात पर अम्हेल थम गई और अपने भाव पर शक करने लगी की शायद उसने ग़लत जगह पर ग़लत गुस्सा किया, शायद रानिया ने भी सही कहा था वो तो बस मेहमान ही तो है, उसे बोलने का हक़ कैसे हुआ। इन सोचों के साथ उसने अपना क़दम पीछे कर लिया, इस वक़्त अम्मा साहब ने भी कुछ कहना चाहा पर उससे पहले शेख़ बाबा भी कुसुम के साथ दरवाज़े पर आ गए।

"क्या हो रहा है यहां पर ये सब?" उन्हें देखकर सभी लगभग घबरा गए। कुसुम काढ़ा लेकर अहलम को देखकर उसके क़रीब भाग गई, और रानिया ने फौरन आगे बढ़कर कहा 

"मैं कुसुम की तलाश में यहां आई थी तो मैने शोर सुना जब अंदर आई तो देखा अम्हेल हम्ज़ा पर गुस्सा कर रही थी।"

उसके जवाब पर उन्होंने अम्हेल से पूछताछ किया

"क्या ये सच है? ऐसा करने की क्या वजह थी?" उन्होंने शक्की अंदाज़ में पूछा 

कई दिनों से अम्हेल उनके सामने ही थी इसलिए वो उसे भी ख़ूब समझ चुके थे और इसी वजह से उन्होंने मामला ख़ुद उससे सुनना चाहा 

"आपके जाने के बाद सबकी ग़ैर मौजूदगी में इसने अहलम  से बदलेहाज़ी किया..." अम्हेल की नमुकम्मल बात पर रानिया ने झट्ट से कहा

"ये मामले को ग़लत नज़रिए से समझ रही है।"

"ख़ामोश हो जाइए रानिया आप।" अम्हेल की बात सुनकर शेख़ बाबा का पारा आसमान छूने लगा था फिर रानिया ने उसे ओर बलंद कर दिया, उनकी गुस्से पर नाराज़गी जताते हुए वो कमरे से चली गई जिसके बाद शेख़ बाबा फिर अम्हेल से मुक़ातिब हो गए 

"जब हमने उसे रोकना चाहा तो उसने हमपर भी हमला कर दिया।" अम्हेल ने आगे बताया तबतक कुसुम ने अम्मासाब के कान में फुसफुसाते हुए कुछ बताया जिससे उनके चेहरे की रंगत बदल गई और उन्होंने एक नज़र अहलम को देखा। वो भी शदीद गुस्से में थी।
फ़िर अम्मा साहब ने सब बाबा को बताया। 

अम्हेल को सुनकर हम्ज़ा ने कुछ बोलना चाहा मगर शेख़ बाबा की गुर्राहट ने उसे थरथराने पर मजबूर कर दिया

"तुम्हारी इतनी मजाल कि तुम शाही ख़ानदान की बेटी पर नज़र डालो।" उनके गुस्से पर ज़य्यान भी समझ गया कि क्या बात हुई है इसलिए उसेने जलाल में आकर फ़ौरन उसके घुटनो पर पैरों से मारकर उसे नीचे गिरा दिया ताकि वो कुछ भी करने के क़ाबिल न रहे। 
हमज़ा अब पूरी तरह से घिर चुका था।

मैथिली के बुलावे पर सागर भाई और सारंगा भाई ने कुछ सिपाहियों के साथ डॉक्टर हम्ज़ा को शेख़ बाबा के कहने पर बंदी बना लिया जिसके बाद शेख़ बाबा ने सबके सामने एक नई पेशी का ऐलान कर दिया

"कोर्ट रूम में इसकी पेशी की तयारी करो, तबतक इसे नज़रबंद रखा जाएगा।
.... इसकी ग़लती की कोई माफ़ी नहीं।"

उनके हुक्म की तामील हुई, वो लोग हम्ज़ा को लेकर चले गए। उनके पीछे अम्हेल भी मिबसाम का ख़त लिए चली गई। शेख़ बाबा खड़े अपनी ग़ैर ज़िम्मेदारी पर अफ़सोस करने लगे और वहां से चले गए।

कुसुम अहलम के सिरहाने खड़ी थी और अम्मा साहब भी उसके क़रीब बैठ गई, उन्हें देखकर अहलम ने कहा

"छोटे भाई ने अम्हेल के साथ ग़लत सुलुख़ किया, उनकी कोई ग़लती नही थी।"

"हम उससे बात कर लेंगे, तुम आराम करो।"

"उसका हाव भाव पहले भी मुझे पसंद नही था लेकिन मैने उसे नज़रंदाज़ कर दिया था।....
मासाब जिस दिन आप कुसुम के साथ दरगाह गई थीं उस दिन अनाबी के लिए वो महल आया था और उस दिन भी उसने मुझे अजीबो गरीब बात किया।"

"इसका ज़िक्र तुमने मुझसे क्यों नही किया?" 

"मैं नहीं समझ पाई थी उसकी बातों का मतलब। मगर आज मैं समझी और अय्या ने मेरा साथ न देकर उसकी तरफ़ दारी किया। उन्होंने ग़लत किया। उन्होंने ने भी अम्हेल का दिल दुखाया है।"

"मैं इस बारे में सबसे बात करूंगी। तुम फिलहाल ये सब अपने ख़्याल से निकाल दो।"

"मैने जैसे ही देखा कि अय्या आ गई हैं तो मुझे लगा कि अब तो हम्ज़ा बचेगा नही,...
लेकिन ऐसा नही हुआ और मैं बस देखती रह गई।" 

"मैं इस बारे में भी उससे बात कर लूंगी।" 

अहलम ने उनकी बात मान लिया मगर उसके मन में  रानिया और अम्हेल का रवय्या घूमने लगा जिससे उसके मन में अम्हेल के लिए एक ख़ास जगह बनने लगी।

ये मामला मामूली नहीं था, ये हादसा सबके दिल में समंदर में डूबे खज़ाने की तरह समा गया। आज की सुबह जो लोगों के लिए सुकूनदेह थी अब वही उनके लिए नए महाजों की सुबह बनी जिसका मुक़ाबला सबको करना है। 

ऐसे ही एक सूरते-हाल का सामना अम्हेल भी कर रही थी—अपने कमरे की छत पर खड़ी हाथ में मिबसाम का ख़त लेकर उसमें लिखे एक एक लफ़्ज़ को याद करते हुए ऐवान-ए-सद्र में बीते हालात के बारे में सोचकर शाहबाद के दिनों को याद करने लगी।

"क्या रानिया ने सही कहा, क्या हमे जाना ही नही चाहिए था। मेरी आंखों के सामने वो सारा मंजर आ गया था बाबजान इसलिए शायद मेरा गुस्सा बेक़ाबू हो गया था।"

खुले आसमान में उड़ती चिड़िया की चहचाहट सुनते हुए अम्हेल इन्हिं सारे ख़्यालों में गुम थी।

शेख़ बाबा अपने बचपन के साथी, जिगरी दोस्त और मुंह बोले भाई - मीर साहब की तस्वीर के पास खड़े उसे निहारते सोचते रहे की वो मीर साहब की सौंपी हुई ज़िम्मेदारी को मुकम्मल करने में नाकामयाब रहे, की उनके रहते महल के अंदर ऐसा क़िस्सा पेश आ गया, वो अपनी भूल की माफ़ी तलब करने लगे, वो कहने लगे उनसे ऐसी चूक हो गई जिसे सुधारा नही जा सकता। उदास और बेबस वो तस्वीर के सामने देर तक खड़े रहे।

मीरास महल की बेहद क़ीमती मीरास को आज पामाल करने की कोशिश की गई जिसकी वजह से महल की दरो-दीवारों पर गहरे निशान पड़ गए। महल की फिज़ा में बेचैनी छा गई, हर तरह की आवाज़ों ने अपने आप को ख़ामोश कर लिया। गुस्से का ये आलम था की इस ठंड के माहौल में महल में हर तरफ़ आग बरसने लगी थी। कोर्ट रूम पेशी के लिए तयार हो गया। मीरास महल के वो सारे फर्द जो बरसों से इसके लिए जीते आए है हम्ज़ा की सज़ा सुनने के लिए बेक़रारी से मुंतज़िर हो गए।