: : प्रकरण : 4 : :
एक दिन मैं बाहर चोल में आराम खुर्शी डालकर बैठा था. उस वक़्त किसी ने मुझे बताया था.
" गली के नुक्कड़ पर कुछ लोग अपूर्व की धुलाई कर रहे हैं. "
वह मेरा दोस्त था उस को बचाना मेरा फ़र्ज था.
मैं तुरंत दौड़कर नुक्कड़ पहुंच गया था.
कौन उसे मार रहा था?. यह देखकर मैं चौंक सा गया था.
मेरे तीन क्लास मेट्स, नजदीकी दोस्त यह हरकत कर रहे थे. उन्हें भला अपूर्व से क्या दुश्मनी थी?.. वह लोग उसे कैसे पहचानते थे?
वह लोग क्यों अपूर्व को मार रहे थे?
एक साथ कई सवाल उठे थे.
उन्हें देखकर मुझे विश्वास हुआ था. मेरे कहने पर वह लोग उसे छोड़ देंगे. लेकिन यहाँ तो बिल्कुल उल्टा माजरा हुआ था. उन्हों तो मुझे पहचानने से भी इन्कार कर दिया था..
यह बिल्डिंग के वही लड़को की साजिश थी जिस को मेरा अनन्या के साथ बातचीत का सिलसिला शुरू होने से तकलीफ हुई थी. बाद,
उस वक़्त सच्चाई क्या थी? मुझे कुछ पता नहीं था. मैंने जाकर अनन्या को बताया था.
"कुछ लोग अपूर्व को मार रहे हैं. "
यहाँ तक तो बात ठीक थी. लेकिन मैंने ' अनाड़ी ' की भूमिका निभाते हुए खुलासा किया था.
" तीनो मेरे दोस्त हैं. "
अब उस का क़ोई क्या मतलब निकालेगा?
कोई भी सवाल कर सकता था.
मैंने ही उस को मारने का षडयंत्र रचा होगा.
उसे बचाना मेरा कर्तव्य था. इसी लिये मैं दौड़कर नुक्कड़ पहुंच गया था. उसे मारने वाले मेरे अपने ही दोस्त ही निकले थे.
अनन्या के दिमाग़ में यह सवाल उठना लाजिम था यह मेरी ही साजिश थी.
लेकिन मैंने ऐसा कुछ नहीं किया तो उसे मेरी नियत पर संदेह हुआ था.
अनन्या ने भले कुछ नहीं कहां था. लेकिन उस की बोडी लैंग्वेज ने मुझे ऐसा मानने के लिये प्रेरित किया था, मैंने हीं अपूर्व को मारने के लिये ऐसी साजिश की थी.
इस मुआमले में मैंने बेवकूफी कर के अपने को कसूरवार साबित किया था.
एक हप्ते के बाद पिताजी के परम मित्र किशोर भाई की बेटी की शादी थी. उन्हों ने एक हप्ते पहले हमें बुलाया था.
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नीला बिल्कुल मेरे साथ चल रही थी. बार बार हमारे देह आपस में टकराते थे. मैं बिंदास्त उस के कंधो पर हाथ रखकर चल रहा था.
उस पर नीलाने कोई दिक्कत नहीं थी.. मेरी कुहनी एक दो बार उस की छाती को छू गई थी. उस पर भी नीला ने क़ोई प्रतिभाव या एतराज व्यक्त नहीं किया था.
नदी पहुंचकर उस ने मुझे आदेश दिया था.
" कपड़े उतारो और कूद पड़ो. "
" मुझे तैरना नहीं आता!! "
मेरा खुलासा सुनकर उस ने मुझे आश्वस्त किया था.
" कोई बात नहीं किनारे के पास बैठकर पानी डालकर अपनी मुराद पूरी कर लेना."
इतना कहकर वह भी अपना फ्रोक निकालकर ब्रा सहित नदी में कूद गई थी. उस की ब्रा में दो काली गोटिया सांगोपाग दिख रही थी
उस को देखकर भाविका भी नीला की स्थिति में आकर नदी में कूद पड़ी थी.
15/20 मिनट पानी में रहकर हम लोग बाहर आ गये थे. ठंडा पानी मुझे माफिक नहीं आता था.मैं कांप रहा था.
हम लोग बाहर आकर रेत में बैठकर बाते कर रहे थे.
उस समय एक युवान शख्स हमारे पास आया था.
नीला ने उस का परिचय करवाया था.
" यह हैं डोक्टर निलेश!! "
नीला उस से बहुत खुलकर बाते कर रही थी.
उन के बीच कुछ कनेक्शन था. जिस का मुझे कोई इल्म नहीं था.
मैं किशोर अंकल और उस के परिवार के आग्रह के कारण अकेला एक हप्ता मांकवा में रुक गया था.
उस दौरान मुझे नीला के बारे में बहुत कुछ अनापशनाप सुनने को मिला था. मैं उस के ओर करीब आ गया था. कथित डोक्टर निलेश के साथ उस का आड़ व्यवहार था..उस का भी पता चला था.
उस की मौसी की बहु की बड़ी बहन ने मुझे उस के बारे में बताया था.
उस समय मुझे सेक्स के बारे में कुछ पता नहीं था. फिर भी अनजाने में मुझ से नीला के साथ कुछ गलत हरकत हो गई थी.. इस लिये खुद नीला का व्यवहार जिम्मेदार था.
एक बात मेरे कुले पर फोडा हुआ था. उस की मा ने मेरे लिये हल्दी का लेप तैयार किया था. मैं उसे लगाने दूसरी रूम में जा रहा था. उस वक़्त नीला बेधड़क मेरे पीछे आई थी. उस ने मुझे ओफर किया था.
" मैं आप को लेप लगा दूं? "
उस की बात सुनकर मैं चकित रह गया था.
युवान क्या मध्यम उम्र की औरत भी ना करे ऐसी ओफर नीला ने बेधड़क मुझ से की थी.
मैंने खुद भीतर जाकर अपने हाथो लेप लगाया था. उस से वह नाराज हो गई थी. उस ने मुझे बुद्धू होने का शिर पाव भी दिया था.
मुझे उकसाने के लिये वह कुछ ना कुछ हरकते करती रहती थी.
वह अपनी बहन के 15 वर्षीय लडके को अपनी गोद में बिठाकर उस के गालों को चूमती थी.
इस बहाने मुझे गलत करने के लिये आमंत्रित करती थी. जिस का मुझे उस वक़्त कुछ पता नहीं था.
आखिर मुंबई लौटने का समय आ गया था.
उस की अगली रात वह मेरे से डेढ़ फिट की दुरी रखकर सो गई थी. मैंने भावुक होकर उसे सवाल किया था:
" कैसी हो बहन? "
यह पूछते हुए मेरा हाथ अनायास उस के पेट पर आ गया था. लेकिन मैंने कुछ नहीं किया था.
मेरी जगह अन्य कोई होता तो?
उस ने नीला को नहीं छोड़ा होता.
मैं सुबह में तैयार होकर एक पड़ोसी युगल के साथ बस में स्टेशन पहुंचा था. वह लोग श्री नाथजी जा रहे थे. वह शादी का नया जोड़ा था. किशोर भाई ने उन्हें मुझे ठीक से गाड़ी में बिठाने की गुजारिश की थी.
लेकिन वह दोनो तो रोमियो जुलियट की तरह गाड़ी आते हीं उस में चढ़ गये थे. और उस के पीछे मैं ज्यू त्यु भीड़ को चीरते हुए गाड़ी में चढ़ गया था.
गाड़ी में चढ़ते ही मुझे चाय की तलप लगी थी. मैंने चाय वाले से चाय का कप ख़रीदा था.
दोपहर को डेढ़ बज गये थे. और मैं दहानू रोड पहुंचा था. मैंने स्टेशन के फेरी वालों से भेल का पैकेट खरीद कर नास्ता किया था. शाम को चार बजे मैं मुंबई सेन्ट्रल पहुंच गया था.
मुझे देखकर पिताजी को अचरज हुआ था
मैं उम्र में छोटा था. और मैं अकेला इतनी दूर से यात्रा कर के मुंबई आया था., उस बात से चकित हुए थे, साथ में प्रभावित भी हुए थे.
0000000000000 ( क्रमशः)