: प्रकरण 5 :
मांकवा से वापस आने के बाद मेरे सभी घाव भर गये थे. बदले हुए माहौल से मैं स्वस्थ महसूस कर रहा था. छुट्टिया भी ख़त्म होने वाली थी.
मैं स्कूल जाने लगा था. साथ में बीती हुई यादें दोबारा जिवंत हो गई थी. हर बार मेरे कानो में अनन्या की एक ही बात दस्तक देती रहती थी.
" I am not your lover!, "
मैं दुनियादारी से बिल्कुल अज्ञात था. मेरे पिताजी ने भी मुझे कुछ सिखाया नहीं था. जो कुछ सिखा था वह अनन्या से ही सिखा था. वह मेरे लिये मानो शिक्षिका बनकर रह गई थी. उस बात का मैंने उस के सामने इजहार भी किया था. लेकिन उस ने नकारते हुए मुझे कहां था.
" मैं भला कौन होती हूं सिखाने वाली? मैंने जो कुछ सिखा हैं उस का जश दिव्येश को जाता हैं. सचमुच में वह मेरा गुरु हैं. "
लेकिन उस ने मेरे साथ जो किया था, अनन्या के साथ मेरा वर्तन दोहराया था तो मैं उसे मन ही मन नफ़रत करने लगा था. अनन्या को भी वह बुरा लगा था.
मेरा पढ़ाई का अहम साल था. मैं एस एस सी में पढ़ रहा था. सत्रीय इम्तिहान नजदीक आ गया था. मैंने ठीक से उसे पास कर दिया था. तब तक सब कुछ ठीक चल रहा था.
लेकिन उस के बाद मैं बीमार पड गया था. मुझे टाइफोइड हो गया था. डेढ़ महिने तक मैं बिस्तर से उठ नहीं पाया था.
उन दिनों दोबारा अनन्या की यादो ने मुझे पुन : अपनी आगोश में कैद कर लिया था.
मेरे दिमाग़ में आत्म हत्या करने के विचार भी आरुढ होने लगे थे. हर घड़ी मुझे मर जाने के ख्याल सताने रहते थे.
' मैं आत्म हत्या करने जा रहा हूं. '
ऐसे ख्याल से मैंने पिताजी के नाम एक चिट्ठी भी लिख डाली थी.
उस वक़्त मुझे अनन्या की एक बात याद आ रही थी.
उस ने ' सुजाता 'फ़िल्म की पूरी कहानी मुझे सुनाई थी.
वह एक अछूत कन्या थी. सब लोग उस से दूर रहते थे. कोई उसे प्यार नहीं करता था. यह बात उसे खाये जा रही थी. इस मन : स्थिति में वह मुशलाधार बारिश में आत्म हत्या करने को निकल पड़ती हैं.
रास्ते में परम पूज्य महात्मा गांधीजी की प्रतिमा पर उस की नजर पड़ती हैं. उस के नीचे कोई मेसेज अंकित किया हुआ था:
" मरे कैसे आत्म हत्या कर के कभी नहीं. आवश्यकता हो तो तो जिन्दा रहने के लिये मरे."
इस बात से उस की आंखे खुल गई थी, और वह रुक गई थी.
इस बात को याद कर के मुझे अपनी हरकत पर गुस्सा आया था.
मेरे दिमाग़ में कई सवाल उठे थे.
परिवार ने मेरे साथ क्या गलत किया था? . सब लोग मुझे चाहते थे. उन्हें क्यों बेकार में सजा देना? मेरे जाने से उन्हें कितना सदमा लगेगा?
मैं जहर की शीशी मुंह तक ले गया था. लेकिन घर के सभी सदस्यों के बारे में सोचकर मैंने जहर कई शीशी को कचरे की टोपली में फेंक दिया था.
और मैं बच गया था. इस लिये मैंने उस वक़्त ईश्वर का पाड माना था.
स्कूल के कुछ दिन बचे थे. उन दिनों मुझे अपने ही दोस्त की बहन के लिये मानो इन्फेक्शन हो गया था. मुझे वह अच्छी लग रही थी. उस से बात करने का मन होता था.
उन दिनों मैंने एक फ़िल्म देखी थी. ' मेरे मेहबूब' फ़िल्म की नायिका और उस लड़की की हेयर स्टाइल मुझे उस की ओर खिंच रही थी. लेकिन मैं उस का मुंह देखने के सिवा ओर कुछ नहीं कर पाया था.
मैंने अपनी बात श्याम को बताई थी.
यह फ़िल्म देखने का असर था. उस ने मुझे सलाह दी थी.
" फ़िल्म देखने की बजह से ऐसा हो रहा हैं. तुम फ़िल्म देखना बंद करो. "
मैंने उस की बात सुनकर तीन महिने फिल्मे नहीं देखी थी.
एस एस सी की इम्तिहान को दो महिने बचे थे. मैं सब कुछ भुलाकर पढ़ाई में व्यस्त हो गया था.
हमारी पीढ़ी हर पीढ़ी में मैं पहला लड़का था जो इस मुकाम तक पहुंचा था. इस बात से मेरे मात पिता को बड़ा गौरव महसूस कर रहे थे.
मैंने समय आने पर इम्तिहान दी थी और मैं पास भी हो गया था. यह जानकर मेरे पिताजी काफ़ी हरख विभोर हो गये थे. उन्हों ने मुझे रिस्ट वोच का उपहार दिया था.
मैं