प्रताप ने कुछ देर रूक कर कुछ गहरा सोचा और आगे बढ़ गया, धड़कन सामान्य हो चली थी और पसीने की बुंदे उसके रूमाल में समा चुकी थीं लेकिन कुछ सोच तो वह अब भी रहा था। प्रताप के ललाट के ऊपर उभरी लकीरें अब भी सामान्य नहीं हो पायी थी। वह देख तो शुन्य में रहा था। गाड़ी की सांय-सांय और पों-पों की आवाज भी उसका मन नहीं भटका पा रही थी।
घर से निकलते वक्त प्रताप ने अपनी जेब में भुने हुए कुछ चने रखे थे, जो एक एक करके मुंह में डालता और इतना चबाता कि जैसे उसने बत्तीस बार चबाने का संकल्प ले रखा हो। इधर जेब के चने खत्म हुए और प्रताप गनतव्य स्थान पे पहुंचा।
हर सफर की कोई मंजिल होती है और हर कार्य का अपना लक्ष्य होता है। प्रताप घर पहूंचा तो अपनी माँ को चौखट पर बैठा हुआ पाया। प्रताप माँ के बगल में ही बैठ गया और अपनी माँ से कहा ’’ आपसे कितनी बार कहा है कि मेरी प्रतीक्षा न किया करें और पक्का विश्वास है कि आपने अबतक खाना भी नहीं खाया होगा। ’’
माँ अब भी प्रताप को निहार रही थी। उनकी आँखेें मानों जैसे कह रही हो ’’ तु अपना ख्याल नहीं रखता है तो क्या मैं भी तुम्हारा ख्याल नहीं रखुं ?’’
माँ उठी और प्रताप का हाथ पकड़ कर अन्दर ले गयी। प्रताप ने सरसरी निगाह से देखा कि बिछावन बिछा दिया गया है, तकिया ठीक कर दिया गया है और उसका पायजामा समेट कर खुंटे में टांग दिया गया है।
प्रताप ने कहा ’’ माँ, यह सब करने की क्या जरूरत थी, मैं तो आकर समेट ही देता। ’’
माँ ने व्यग्यवश कहा ’’ तब तक तुम्हारा बिखरा हुआ सामान, मेरी ही तरह , मेरे प्रताप का इन्तजार करते न ?’’
हर रोज एक नई उम्मीद जग ही जाती है। रात कितनी भी अंधिकार भरी और थकन भरी हो, सुबह उजियारा भरा और ताजगी भरा होता ही है। इसलिए प्रताप को भी उम्मदी जगी कि आज तो निश्चित कल वाला हाल नहीं होगा, कल काम बनते-बनते, मिलते-मिलते रह गयी, समझ में ही नहीं आया कि कहाँ चुक हो गई। खैर आज तो आज है।
शर्मा वेराइटी शाॅप में ज्योंहि प्रताप ने प्रवेश किया तो मालिक ने प्रताप को उपर से नीचे तक देखा, प्रताप ने सोचा कि हो सकता है कि हर ग्राहक को ऐसे ही देखता हो मालिक।
सामने खड़े प्रताप से दुकान के मालिक रूद्र शर्मा ने पुछा ’’ क्या चाहिए। ’’
प्रताप ने ’ न ’ मंे सिर हिलाया तो मालिक के फिर पुछने से पहले हील प्रताप ने कहा ’’ नौकरी खाली है ?’’
मालिक ने आँखें कड़ी कर कहा ’’ बाहर मैंने लिख रखा है कि आदमी की जरूरत है? ’’
प्रताप ने ’न’ में सिर हिलाया तो मालिक ने कहा ’’तो आदमी की जरूरत जहाँ है, वहाँ जाओ। ’’ मालिक अपने हिसाब-किताब में लग गए। प्रताप ज्योंही दुकार के बाहर निकलने लगा तो दुकान के मालिक रूद्र शर्मा ने कहा ’’ ठहरो, तुम तो चलते ही बने, एक बार भी रोना नहीं रोए, एक बार भी नहीं कहा कि ’’ मुझे नौकरी की सख्त जरूरत है। ’’
प्रताप ने कहा ’’ बहुत दिनों से भटक रहा हूं, कहीं काम नहीं बना , इसलिए सोचा कि शायद आज भी काम न मिले, इसलिए लौट रहा था। ’’
रूद्र शर्मा ने गहरा सोचा और अपने दुकान में काम कर रहे एक लड़के से पुछा ’’ मोहन काफी दिनों से नहीं आ रहा है, कुछ पता है कि आएगा या नहीं ? ’’
उस लड़के के द्वारा ’न’ में सिर हिलाए जाने के बाद, मालिक ने प्रताप से कहा ’’ ठीक है, आज से तुम्हारी नौकरी पक्की। मन लगाकर काम करना, हमको भरोषा है कि तुम मेरी उम्मीद पर खरा उतरोगे। ’’
रोज की तरह आज भी प्रताप की माँ चौखट पर बैठकर प्रताप का इन्तजार कर रही थी लेकिन आज उसके पिता जी भी आज वहीं बैठ कर इन्तजार कर रहे थे।
प्रताप की नौकरी की बात सुनकर माँ तो बहुत खुश हुई, लेकिन पिता ने कहा ’’ चलो अच्छा है, लेकिन मेरे साथ खेत में हाथ बंटाते तो अच्छा होता। ’’
आज प्रताप को तन्ख्वाह मिली तो माँ और पिता के लिए कपड़े ले आया और मिठायी भी ले आया। माँ नई सारी पहन कर खुश थी लेकिन पिता ने कहा ’’ मेरा छोड़ देते और तुम अपने लिए ही कपड़ा ले लेते तो अच्छा होता। ’’
प्रताप को ऐसा महसुस हुआ कि माँ-पिता हमेशा देने के लिए बने हैं। संतान की खुशी में ही अपनी खुशी समझते हैं। प्रताप ने माँ और पिता के पाँव छुकर आर्शिवाद लिए और मन ही मन भगवान से प्रार्थना की कि इनका आर्शिवाद हमेशा बनाए रखिएगा।
उधर दुकान में लम्बी छुट्टी के बाद मोहन जब काम पर लौटा तो मालिक अचरज में पड़ गए। प्रताप को काम पर रखकर बहुत खुश तो थे लेकिन मोहन ने भी काफी दिनों तक साथ दिया था, इसलिए अचरज में होते हुए भी मालिक ने मोहन को भी काम पर रख लिया।
मोहन की तनख्वाह से तो उसके पिताजी के द्वारा उपजाए गए अनाज से घर समृद्ध हो गया। कुछ मदद मांगने वाले भी उम्मीद के साथ आए। जिनको मदद मिली उनका तो ठीक है मगर जिनको मदद नहीं मिली उनलोगों ने डाही प्रवृति अपना लिया।
प्रताप के पिता सुख लाल की जी की तबियत में अचाकन गिरावट आयी। नतीजा यह हुआ कि खेत का काम अधुरा रह गया।
सुखलाल जी ने अपने प्रताप से कहा ’’ बेटा, अब मेरी हालत नहीं है कि खेत में काम कर पाउं, तबियत खराब कब तक रहेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता है, तुम अपना काम भी करते रहो और किसी को बोलकर खेत का काम भी करवा दो। ’’
प्रताप ने गुड्डू से कहा तो उसने साफ मना कर दिया, खेत में काम करने से । छोटू ने भी कहा ’’ मेरे खेत में ही बहुत काम पड़ा हुआ है। ’’
गहरी चिंता में पड़े प्रताप को समझ ही नहीं आया कि सही निर्णय लिया या कि गलत निर्णय। उसने मालिक से कहा ’’ मालिक कल से काम पर नहीं आउंगा, पिता जी की तबियत खराब है, खेत संभालना ही पड़ेगा। ’’ एक तरफ मालिक को गुस्सा के साथ अचम्भा लगा लेकिन मोहन के मुखमंडल पर खुशी की लहर दौड़ गयी।
प्रताप ने पिता से कहा ’’ कोई तैयार नहीं हुआ, अब आप चिंता न करें, मैं ही खेत संभाल लूँगा। प्रताप के काम छोड़ने का अफसोस तो हुआ ही लेकिल क्या किया जा सकता था, समृद्धि में तो थोड़ी कमी आयी लेकिन प्रताप ने पुरी खेती संभाल ली।
समाप्त