सुबह के साढ़े पांच बजे थे। शहर की भागदौड़ अभी शुरू नहीं हुई थी, लेकिन भूपेंद्र के घर की रसोई से प्रेशर कुकर की पहली सीटी ने दिन के आगाज़ की घोषणा कर दी थी। खिड़की के बाहर हल्की ओस जमी थी, लेकिन भीतर का माहौल गर्माहट और काम की हड़बड़ाहट से भरा था। काया, जो इस घर की धड़कन थी, रसोई के स्लैब पर बिजली की तेजी से हाथ चला रही थी। वह पैंतीस वर्ष की थी, लेकिन उसकी फुर्ती किसी किशोर से कम नहीं थी। सांवला सलोना रंग, चेहरे पर एक स्थायी गंभीरता और आँखों में गजब की सतर्कता। उसने अपने घने बालों का एक जूड़ा बना रखा था ताकि काम में बाधा न आए। उसके हाथों की चूड़ियाँ आपस में टकराकर एक लयबद्ध संगीत पैदा कर रही थीं। कभी वह गोभी काटती, तो अगले ही पल परांठे बेलने लगती।
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 1
सुबह के साढ़े पांच बजे थे। शहर की भागदौड़ अभी शुरू नहीं हुई थी, लेकिन भूपेंद्र के घर की से प्रेशर कुकर की पहली सीटी ने दिन के आगाज़ की घोषणा कर दी थी। खिड़की के बाहर हल्की ओस जमी थी, लेकिन भीतर का माहौल गर्माहट और काम की हड़बड़ाहट से भरा था।काया, जो इस घर की धड़कन थी, रसोई के स्लैब पर बिजली की तेजी से हाथ चला रही थी। वह पैंतीस वर्ष की थी, लेकिन उसकी फुर्ती किसी किशोर से कम नहीं थी। सांवला सलोना रंग, चेहरे पर एक स्थायी गंभीरता और आँखों में गजब की सतर्कता। ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 2
सुबह की सुनहरी धूप अब तीखी होने लगी थी। भूपेंद्र के ऑफिस जाने के बाद घर की हलचल थमी थी, बल्कि उसका स्वरूप बदल गया था। वंशिका अपने कमरे में शीशे के सामने खड़ी थी। वह अपनी फिटनेस को लेकर जितनी संजीदा थी, उतनी ही सचेत वह अपने पहनावे को लेकर भी रहती थी। उसने गहरे नीले रंग की ब्रांडेड जिम-लेगिंग और स्पोर्ट्स टी-शर्ट पहन रखी थी। बालों को ऊँची पोनीटेल में कसकर बांधते हुए उसने एक बार फिर आईने में खुद को निहारा।वंशिका का जिम, जो उसकी पहचान और गर्व का केंद्र था, उनकी ही पॉश कॉलोनी के ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 3
दोपहर के डेढ़ बज रहे थे। सड़क पर स्कूल बसों के हॉर्न की आवाज़ें गूँजने लगी थीं। काया ठीक पर घर पहुँच चुकी थी। उसने अपनी चप्पलें दरवाजे के बाहर करीने से उतारीं और सीधे हाथ धोने के बाद रसोई की ओर बढ़ी। उसे पता था कि अगले दस मिनटों में घर का सन्नाटा बच्चों के शोर-शराबे में बदलने वाला है।जैसे ही डोरबेल बजी, काया ने दरवाजा खोला। सात साल का विहान और पाँच साल की नन्ही अवनी मानो तूफान की तरह भीतर दाखिल हुए। उनके कंधों पर लटके भारी बैग उनकी छोटी पीठ को थोड़ा झुका रहे थे, ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 5
रात के दस बज चुके थे। बच्चों को सुलाने के बाद काया ने पूरे घर का चक्कर लगाया। ड्राइंग की लाइट बंद की, बिखरे हुए खिलौने समेटे और फिर रसोई की ओर बढ़ी। अमूमन इस वक्त तक घर में एक खुशनुमा शांति होती थी, लेकिन आज की शांति भारी थी। भूपेंद्र साहब और वंशिका दीदी के बीच हुई वह बहस हवा में अब भी तैर रही थी।काया ने अपनी छोटी सी डायरी निकाली जिसमें वह घर के राशन का हिसाब लिखती थी। वह हिसाब लिख तो रही थी, पर उसका ध्यान बार-बार साहब के उस थके हुए चेहरे पर ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 4
शाम के पांच बज रहे थे। सूरज की सुनहरी किरणें अब नारंगी होकर खिड़कियों से विदा ले रही थीं। में एक अजीब सी शांति थी—वह शांति जो किसी बड़े तूफान से पहले या किसी थके हुए दिन के ढलने पर महसूस होती है। काया रसोई में खड़ी थी, उसने अदरक कूटने वाली ओखली उठाई ही थी कि उसे ख्याल आया। उसने अपना फोन उठाया और भूपेंद्र का नंबर डायल किया।भूपेंद्र उस वक्त दफ्तर में अपनी मेज पर फाइलों के ढेर के बीच घिरा हुआ था। कंप्यूटर की स्क्रीन देखते-देखते उसकी आँखों में जलन होने लगी थी। तभी उसका फोन ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 6
दोपहर का वक्त था। खिड़की से आती धूप अब फर्श पर लंबी लकीरें बना रही थी। घर में एक सा सन्नाटा पसरा था, जो काया को भीतर ही भीतर खाए जा रहा था। जब से काया ने उस प्रॉपर्टी डीलर और वंशिका दीदी की बातें सुनी थीं, उसका चैन छिन गया था। उसे लग रहा था कि यह घर, जिसे उसने पिछले डेढ़ साल से अपने पसीने और ममता से सींचा है, उसकी नींव डगमगा रही है।डेढ़ साल... यह समय कहने को तो कम था, लेकिन काया के लिए यह एक पूरी सदी जैसा था। इसी घर की चौखट ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 7
उस रात, डाइनिंग टेबल पर काया के हाथ के बने पुलाव की खुशबू ने भले ही माहौल में थोड़ी घोल दी थी, लेकिन जैसे ही वंशिका अपने बेडरूम की खामोशी में लौटी, उसके मन का अंधेरा फिर से गहराने लगा। उसने लोन के कागजात तो फाड़ दिए थे, लेकिन उन फटे हुए पन्नों के साथ उसकी उम्मीदें भी बिखरी हुई महसूस हो रही थीं।वंशिका को अपनी हार का अहसास तब हुआ जब उसे पता चला कि उसके जिम की आधी से ज्यादा मेंबर्स अब पास ही में खुले एक नए, आलीशान 'ग्लोबल फिटनेस' जिम की ओर मुड़ गई हैं। ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 8
सुबह की आपाधापी के बीच घर का माहौल ऊपरी तौर पर तो सामान्य दिख रहा था, लेकिन वंशिका के के भीतर एक गहरी उथल-पुथल मची थी। डाइनिंग टेबल पर नाश्ता लगा था। भूपेंद्र साहब अपनी फाइलें देख रहे थे और काया बच्चों के जूतों के फीते बांध रही थी। हर मिनट में "काया, ज़रा मेरा पेन देना," या "काया, विहान का दूध खत्म हो गया," की आवाज़ें गूँज रही थीं।वंशिका अपनी कॉफी का कप पकड़े चुपचाप यह सब देख रही थी। उसे लग रहा था कि वह इस घर की फ्रेम से बाहर होती जा रही है। उसे अपनी ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 9
काया के जाने के बाद घर की सूरत बदल गई थी, लेकिन वैसा कोहराम नहीं मचा जैसा भूपेंद्र ने था। वंशिका, जो अब तक आलस्य और सुविधा की आदी हो चुकी थी, उसने अपनी कमर कस ली थी। वह कोई कच्ची खिलाड़ी नहीं थी; शादी के शुरुआती सालों में उसने सास मनोरमा और अपनी मां के कठोर अनुशासन में रहकर घर चलाने की वह कला सीखी थी, जो किसी मैनेजमेंट स्कूल में नहीं सिखाई जाती।वंशिका ने सुबह जल्दी उठकर बच्चों को तैयार किया, उनके टिफिन में उनकी पसंद का खाना रखा और घर को एक व्यवस्थित रूप दे दिया। ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 10
काया जब वापस लौटी, तो उसके कदम पहले की तरह डरे-सहमे नहीं थे। अपनी माँ को खोने का दुख था, लेकिन साथ ही गाँव में अपनी पुश्तैनी ज़मीन और लोगों के बीच रहकर उसे अपनी जड़ों की ताकत का अहसास हो गया था। सबसे बड़ा आत्मविश्वास उसे भूपेंद्र साहब के उस एक मैसेज ने दिया था— "तुम्हारी बहुत कमी महसूस हो रही है।" इन शब्दों ने काया को यह यकीन दिला दिया था कि वह इस घर की ज़रूरत नहीं, बल्कि मजबूरी बन चुकी है।जैसे ही उसने घर की घंटी बजाई, भूपेंद्र साहब ने खुद दौड़कर दरवाजा खोला। काया ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 11
अगली सुबह जब काया की नींद खुली, तो उसके मन में एक योजना थी कि वह बच्चों को जगाएगी, नहलाएगी और वही पुराना मम्मा वाला स्थान फिर से घेर लेगी। लेकिन जैसे ही वह बच्चों के कमरे की ओर बढ़ी, उसने देखा कि वंशिका दीदी पहले ही वहां मौजूद थीं।वंशिका ने पूरी तत्परता से विहान की शर्ट के बटन बंद किए और अवनी के बालों की चोटियाँ गूंथ रही थी। बच्चे चहक रहे थे और अपनी मम्मा से स्कूल की बातें कर रहे थे। काया दरवाजे पर ठिठक गई। उसने सोचा था कि बच्चे उसे देखते ही लिपट जाएंगे, ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 12
जब भूपेंद्र को पता चला कि वंशिका की तबीयत खराब है, तो वे परेशान तो हुए, लेकिन उससे कहीं वेकाया की तत्परता देखकर गदगद हो गए। उन्होंने देखा कि काया कैसे एक साथ तीन मोर्चों पर लड़ रही है—वह रसोई संभाल रही थी, बच्चों को देख रही थी और वंशिका की तीमारदारी भी कर रही थी।भूपेंद्र ने ऑफिस जाने से पहले काया को कमरे के बाहर बुलाया। "काया, मैं सच में धन्य हूँ कि तुम जैसी मददगार हमारे घर में है। इस मुश्किल वक्त में अगर तुम न होती, तो पता नहीं हमारा क्या होता। वंशिका खुशकिस्मत है कि ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 13
वंशिका ने रात भर अपनी योजना को शब्द दिए थे। उसने तय कर लिया था कि वह अब और नहीं करेगी। जैसे ही सूरज की पहली किरण कमरे में दाखिल हुई, उसका बुखार तो उतर गया था, लेकिन मन का उबाल शांत नहीं हुआ था। वह उठकर बाहर जाने ही वाली थी कि मुख्य द्वार पर ज़ोर-ज़ोर से घंटी बजने लगी। इतनी सुबह कौन हो सकता था?जैसे ही काया ने दरवाज़ा खोला, घर का माहौल एक पल में बदल गया। सामने मनोरमा देवी और शिखा खड़ी थीं, उनके हाथों में भारी सूटकेस थे और चेहरों पर वही पुरानी अधिकार ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 14
सुबह की शुरुआत एक अलग ही कोलाहल के साथ हुई। बच्चों के स्कूल जाने का समय था। कल तक बच्चे आँख खुलते ही 'काया-काया' पुकारते थे, आज वे अपनी दादी मनोरमा और बुआ शिखा को सामने देख कर खुशी से झूम उठे। उनके लिए यह एक नया बदलाव था, एक नया उत्साह था।विहान अपनी दादी की गोद में जा बैठा और नन्ही अवनी शिखा बुआ के गले लग गई। काया रसोई के दरवाजे पर खड़ी यह सब देख रही थी। उसे लगा जैसे उसके पैरों के नीचे से ज़मीन सरक गई हो। कल तक जो बच्चे उसके आँचल से ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 15
दूसरी ओर, मनोरमा ने वंशिका को परखना शुरू किया। वंशिका सुबह नौ बजे तैयार होकर जिम के लिए निकल वह घर के किसी काम में हाथ नहीं लगाती थी। यहाँ तक कि अगर उसकी अपनी कॉफी की प्याली भी मेज पर रखी हो, तो वह काया को आवाज़ लगाती।शिखा ने एक दिन जानबूझकर वंशिका के सामने दूध का गिलास गिरा दिया। "ओह भाभी! गिर गया, अब क्या करें?"वंशिका ने बिना पलक झपकाए कहा, "काया! ज़रा यहाँ पोछा मार देना।" और वह वापस अपने फोन में व्यस्त हो गई।मनोरमा यह सब देख रही थी। उन्हें लगा कि वंशिका ने खुद ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 16
मनोरमा देवी ने अब बीच का रास्ता चुनने का मन बना लिया था। वे एक मँझी हुई खिलाड़ी की खेल रही थीं। उन्होंने तय किया कि वे न तो पूरी तरह वंशिका की तरफ होंगी और न ही काया को अपना सरमाय बनायेंगी। उनका लक्ष्य साफ़ था—दोनों के बीच ऐसा युद्ध छिड़वा देना कि दोनों एक-दूसरे को काटती रहें और सत्ता की चाबी मनोरमा के पास सुरक्षित रहे।वे वंशिका के सामने काया पर काम का बोझ बढ़ाकर उसका जीना हराम करतीं, ताकि वंशिका को लगे कि सासू माँ उसकी तरफ हैं। वहीं काया के सामने वे वंशिका के आलस ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 17
अगली सुबह घर में सूरज की रोशनी के साथ एक नया तनाव भी उतरा। ऊपरी तौर पर सब सामान्य पर हवा में एक अजीब सी भारीपन थी। भूपेंद्र जैसे ही सोकर उठा, उसने काया को आवाज़ लगाने के लिए अभी मुँह खोला ही था कि काया उसकी चाय और ताज़ा प्रेस की हुई शर्ट लेकर कमरे में दाखिल हो गई। भूपेंद्र कुछ कहता, उससे पहले ही काया ने उसकी घड़ी और रुमाल मेज पर सजा दिए। बिना कहे, बिना पुकारे, काया भूपेंद्र की परछाईं बन चुकी थी।वंशिका जो अभी बिस्तर से उठी ही थी, काया का यह बेरोकटोक बेडरूम ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 18
जिम में सुबह की गहमागहमी अपने चरम पर थी। ट्रेडमिल के चलने की आवाज़ें और भारी संगीत के बीच महिलाएँ कसरत में व्यस्त थीं। शिखा ने अपनी तीखी नज़रों से पूरे जिम का मुआयना किया। उसने गौर किया कि पास में एक नया और आधुनिक जिम खुलने की वजह से यहाँ भीड़ कुछ कम तो हुई थी, लेकिन चूंकि उस नए जिम की फीस काफी ज़्यादा थी, इसलिए वंशिका के यहाँ मध्यम वर्ग की काफी महिलाएँ अब भी आ रही थीं।वंशिका अपनी एक क्लाइंट को डंबल उठाने का सही तरीका समझा रही थी। शिखा पास ही खड़ी थी, उसने ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 19
अगले कुछ दिन घर के भीतर एक अजीब से भारीपन में बीते। ऊपर से सब कुछ शांत दिखता था—वही वही नाश्ता और वही औपचारिकताएं। लेकिन अंदर ही अंदर एक घुटन भरी कड़वाहट दीवारों में सिमटने लगी थी। वंशिका ने कई बार कोशिश की कि काया को उसकी औकात याद दिलाए, उसे सलीका सिखाए, लेकिन जैसे ही वह मुँह खोलती, मनोरमा देवी बीच में आ जातीं।"काया, ज़रा इधर आना तो, मेरा सिर दबा दे," या "काया, रसोई देख ले, बहू को तो वैसे भी फुर्सत नहीं," कहकर मनोरमा हर बार काया की ढाल बन जातीं।वंशिका को धीरे-धीरे यह समझ आने ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 20
बाजार से लौटते वक्त काया के कदम हवा में थे, लेकिन दिमाग सचेत था। उसे पता था कि अगर साथ घर घुसे, तो वंशिका की पारखी नज़रें और मनोरमा की शक की सुई उन्हें चीर देगी। उसने बीच रास्ते में ही भूपेंद्र को रुकने का इशारा किया।"साहब, आप पहले जाइये। मैं सब्ज़ियों के बहाने पीछे से आती हूँ। बवाल हो जाएगा वरना," काया ने अपनी साड़ी का पैकेट बड़ी चतुराई से प्लास्टिक के थैले में सब्ज़ियों के नीचे छिपाते हुए कहा।भूपेंद्र मुस्कुराया, उसकी आँखों में एक नई शरारत थी। "तुम बहुत तेज़ हो काया।"भूपेंद्र पहले घर पहुँचा। वह बेहद ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 21
अगली सुबह जब घर के सदस्य डाइनिंग टेबल पर नाश्ते के लिए इकट्ठा हुए, तो सबकी आँखें फटी की रह गई। रसोई से काया बाहर आई, लेकिन वह रोज़ वाली साधारण सूती साड़ी में नहीं थी। उसने वही आसमानी नीली सिल्क की साड़ी पहन रखी थी जिसे भूपेंद्र ने बाज़ार में पसंद किया था। उस साड़ी में काया का रूप निखर कर आ रहा था; वह किसी घर की नौकरानी नहीं बल्कि किसी रईस खानदान की बहू जैसी लग रही थी।वंशिका ने उसे सिर से पाँव तक देखा और उसका माथा ठनका। "काया! यह साड़ी? यह तो कल बाज़ार ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 22
शाम का धुंधलका गहराने लगा था। आसमान में नारंगी और बैंगनी रंग की लकीरें उभर आई थीं। घर में अजीब सी खामोशी छाई थी; मनोरमा और शिखा ड्राइंग रूम में टीवी के सामने थीं और वंशिका बच्चों को होमवर्क कराने में व्यस्त थी।भूपेंद्र ने देखा कि बालकनी में सूखे हुए कपड़े अभी भी टंगे हैं। उसने रसोई की खिड़की से झाँकती काया को इशारा किया और खुद सीढ़ियों की ओर बढ़ गया। काया समझ गई। वह हाथ पोंछती हुई दबे पाँव छत की ओर भागी।छत पर सन्नाटा था। ठंडी हवाएं चल रही थीं। जैसे ही काया ने तार से ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 23
आधी रात के उस सन्नाटे में, जब भूपेंद्र और काया एक-दूसरे के वजूद में खोए हुए थे, अचानक पास कमरे से मनोरमा देवी के ज़ोर-ज़ोर से खांसने की आवाज़ गूँजी। वह आवाज़ किसी बर्फीले पानी के झोंके की तरह थी। दोनों झटके से अलग हुए। काया ने थरथराते हाथों से अपनी साड़ी संभाली और भूपेंद्र ने तेज़ी से अपनी टी-शर्ट ठीक की।मनोरमा के खांसने की आवाज़ थम गई, लेकिन रसोई में अब एक भारी अधूरापन पसरा था। भूपेंद्र की आँखों में अब भी वही प्यास थी और काया के चेहरे पर घबराहट के साथ एक अजीब सी कसक। बिना ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 24
शाम ढलते ही जब भूपेंद्र और काया घर लौटे, तो घर की हवा में एक अजीब सी भारीपन थी। के चेहरे पर एक ऐसी तृप्ति और सुकून था जो महीनों बाद दिखा था, वहीं काया की चाल में अब वह मर्यादा और दबदबा नहीं था, बल्कि एक अजीब सा आत्मविश्वास था। उसकी आँखों में एक चमक थी—ऐसी चमक जो किसी युद्ध को जीतने के बाद आती है।वंशिका हॉल में बैठी सोफे पर अपनी फाइल देख रही थी। जैसे ही उसने इन दोनों को घर में प्रवेश करते देखा, उसकी पारखी नज़रों ने एक ही पल में सब कुछ भांप ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 25
वंशिका अपने अंधेरे कमरे में अकेले बैठी थी। पंखे की आवाज़ उसे किसी पुराने जख्म को कुरेदने जैसी लग थी। वह शून्य में ताकते हुए सोच रही थी—'गलती कहाँ हुई? कब और कैसे मेरी सत्ता मेरे ही हाथों से रेत की तरह फिसल गई?'उसने अपनी शादी के शुरुआती दिनों को याद किया। वह दौर, जब वह एक आदर्श बहू बनने की दौड़ में अपनी पहचान खो चुकी थी। ससुराल वालों की उंगली के इशारों पर नाचना उसकी दिनचर्या थी। मनोरमा ने उसे किसी कठपुतली की तरह घुमाया था। घर के अंतहीन काम, लोगों के सामने नीची गर्दन, और यहाँ ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 26
वंशिका जानती थी कि लोग कहेंगे—"मर्द तो मासूम होता है, वह तो फिसल गया, औरत ने ही उसे संभाला होगा।" लोग कहेंगे कि वह एक असफल पत्नी है। कोई यह नहीं पूछेगा कि भूपेंद्र ने अपने बच्चों के भविष्य का क्या सोचा? कोई यह नहीं कहेगा कि भूपेंद्र ने अपनी सात फेरों की कसमें क्यों तोड़ीं?अगली सुबह जब घर की खिड़कियों से धूप की पहली किरण अंदर आई, तो घर का माहौल कल जैसा नहीं था। वंशिका ने अपनी आँखों के काले घेरों को मेकअप से छिपाया और रेशमी साड़ी पहनकर पूरे रौब के साथ कमरे से बाहर निकली। ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 27
वंशिका ने एक नई रणनीति अपनाई। उसने घर पर रुकना कम कर दिया और अपना ज़्यादा से ज़्यादा समय से जिम में देना शुरू कर दिया। उसे समझ आ गया था कि वह घर में रहकर जितना विरोध करेगी, क्लेश उतना ही बढ़ेगा और भूपेंद्र उतना ही काया की ओर झुकेगा। उसने खुद से कहा, "इन्हें जितना वक्त साथ बिताना है, बिताने दो। अति हर चीज़ की बुरी होती है।" वह जानती थी कि जब आकर्षण की चमक धुंधली पड़ेगी और रोज़मर्रा की हकीकत सामने आएगी, तब भूपेंद्र को काया के उसी भोलेपन और सादगी में खोट नज़र आने ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 28
हॉल में बिखरी बेशर्मी की गूँज ने वंशिका के भीतर के धैर्य को राख कर दिया था। वह कमरे छिपकर रोने वाली औरत नहीं थी। उसके भीतर अब वह स्वाभिमानी स्त्री जाग चुकी थी जिसे बरसों तक इस घर की तथाकथित मर्यादा के नाम पर कुचला गया था। वह तमतमाए चेहरे के साथ सीधे मनोरमा के कमरे में दाखिल हुई।मनोरमा बिस्तर पर बैठी माला जप रही थीं, पर उनके कान बाहर रसोई से आती उन अमर्यादित आवाज़ों पर ही टिके थे। वंशिका को अचानक कमरे में देख वे सकपका गईं।"मम्मी जी! चुप क्यों बैठी हैं आप?" वंशिका की आवाज़ ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 29
करीब एक घंटे बाद, जब मनोरमा और वंशिका की बहस थककर शांत हुई, तो घर में एक भारी सन्नाटा गया। वंशिका अपने कमरे में लौट गई, उसका शरीर टूट रहा था पर मन पत्थर हो चुका था। मनोरमा अपने बिस्तर पर गिर पड़ीं, उन्हें पहली बार लगा कि उन्होंने अपनी बहू को हराने के चक्कर में अपने बेटे को ही खो दिया है।भूपेंद्र और काया रसोई से बाहर निकले। काया के चेहरे पर एक अजीब सी तृप्ति थी और भूपेंद्र की आँखों में वही लाल घेरे। उसने हॉल में खड़ी वंशिका को एक बार फिर हिकारत से देखा, जैसे ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 30
जिम के काम निपटाने के बाद वंशिका भारी मन से शबनम के बताए पते पर पहुँची। यह शहर की एडवोकेट महिमा का दफ्तर था। महिमा अपनी तीखी बुद्धिमत्ता और पारिवारिक विवादों को सुलझाने की अपनी अनूठी शैली के लिए प्रसिद्ध थीं।दफ्तर के भीतर पहुँचते ही वंशिका ने अपनी पूरी कहानी कह सुनाई—भूपेंद्र का विश्वासघात, काया की घुसपैठ और मनोरमा की चुप्पी। महिमा ने बड़े गौर से सब सुना और फिर एक गहरी नज़र वंशिका पर डाली।"वंशिका, पहली गलती तुम्हारी है," महिमा ने सपाट लहजे में कहा। वंशिका ठिठक गई। महिमा ने आगे कहा, "तुम्हें उसे घर पर रखना था, ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 31
बिस्तर पर अब सिर्फ वासना का खेल चरम पर था। भूपेंद्र ने काया के दोनों हाथों को अपने एक से पकड़कर उसके सिर के ऊपर ले जाकर लॉक कर दिया। काया का बदन बेबस था, पर उसकी मुस्कान विजयी थी। भूपेंद्र का दूसरा हाथ काया के शरीर पर बड़ी निर्लज्जता से रेंग रहा था, उसकी उंगलियाँ काया के मांस को अपनी मुट्ठी में भर रही थीं।काया की साड़ी एक तरफ बेतरतीब ढंग से आधी उतरी हुई थी, उसका मखमली बदन पसीने की बूंदों से चमक रहा था। भूपेंद्र पागलों की तरह उसके होंठों को कुचल रहा था, जैसे वह ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 32
अगली सुबह जब शहर की गलियों में लोग अपने काम के लिए निकल रहे थे, भूपेंद्र अपनी मर्यादा और की पोटली को श्मशान घाट पर छोड़कर सीधे शहर के एक नामी वकील के दफ्तर जा पहुँचा। उसकी आँखों में नींद कम और काया के जिस्म का नशा ज़्यादा था। वह जल्द से जल्द वंशिका के नाम का कांटा अपनी ज़िंदगी से निकाल फेंकना चाहता था।वकील श्रीवास्तव ने चश्मा ठीक करते हुए भूपेंद्र की बात सुनी। "तलाक? देखिए भूपेंद्र जी, यह इतना आसान नहीं होता जितना फिल्मों में दिखता है। अगर आपसी सहमति है, तो प्रक्रिया थोड़ी तेज़ हो सकती ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 33
काया एक शातिर दिमाग औरत थी। वह भूपेंद्र के चेहरे पर छाई हवाइयों और उसकी उखड़ी सांसों को देखकर गई थी कि मामला कुछ गड़बड़ है। उसे शक होने लगा था कि कहीं अंतिम क्षणों में आकर भूपेंद्र डर न जाए या अपने कदम पीछे न खींच ले। काया ने ठान लिया था कि वह आज ही इस अनिश्चितता का अंत कर देगी। उसे अब कानून का कोई खौफ नहीं था। उसने अपने आस-पड़ोस में ऐसे कई मामले देखे थे जहाँ पति दो-दो पत्नियों को लेकर घूम रहे थे। उसे पता था कि एक बार शादी हो गई, तो ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 34
महिमा की मुस्कान अब गायब हो चुकी थी। उसने एक गंभीर वकील की तरह फाइल मेज पर रखी और की आँखों में झाँका।"वंशिका, अब भावनाएं छोड़ो और कानून का काला सच सुनो। तुम चाहती हो कि मैं पुलिस भेजूँ और काया को घर से बाहर निकाल दूँ, लेकिन हकीकत इतनी आसान नहीं है। कानून की नज़र में घर अब केवल तुम्हारा नहीं रहा।"महिमा ने समझाना शुरू किया... चूँकि भूपेंद्र उस घर का मालिक या सह-मालिक है और काया ने उससे शादी कर ली है (चाहे वह गैर-कानूनी ही क्यों न हो), वह उस घर में घरेलू नातेदारी के तहत ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 35
अगली सुबह जब सूरज की रोशनी उस घर की खिड़कियों से टकराई, तो वंशिका के लिए वह घर अब नहीं, बल्कि एक कुरुक्षेत्र बन चुका था। महिमा और शबनम के समझाने के बाद, वंशिका ने अपने आँसू पोंछ लिए थे। उसके चेहरे पर अब वह बेचारगी नहीं थी, बल्कि एक बर्फीली खामोशी थी जो किसी बड़े तूफान के आने का संकेत दे रही थी। वह एक टैक्सी लेकर वापस उस घर पहुँची। जैसे ही उसने घर के भीतर कदम रखा, उसे अपनी ही मेहनत से सजाई हुई चीज़ें अब पराई लगने लगीं।हॉल में भूपेंद्र और काया पहले से ही ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 36
वंशिका को गुप्त सूत्रों से यह पुख्ता जानकारी मिल चुकी थी कि भूपेंद्र अब बेरोज़गार हो चुका है। जब यह बात शबनम और महिमा को बताई, तो महिमा के चेहरे पर एक कुटिल संतोष भरी मुस्कान छा गई।महिमा ने अपनी मेज़ पर रखे पेपरवेट को घुमाते हुए कहा, "वंशिका, यह तुम्हारी पहली जीत है। जब आर्थिक नींव हिलती है, तो हवस का महल सबसे पहले गिरता है। लेकिन याद रखना, अब जो समय आएगा, वह तुम्हारे लिए अग्निपरीक्षा जैसा होगा। अब तक तुम घर के भीतर लड़ रही थी, अब तुम्हें समाज से लड़ना होगा।"महिमा ने वंशिका की आँखों ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 37
मनोरमा देवी के कानों तक यह खबर पहुँच चुकी थी कि उनके राजा बेटे की नौकरी जा चुकी है। खबर उनके लिए किसी वज्रपात से कम नहीं थी, लेकिन असली कहर तो अभी टूटना बाकी था। अब तक जो काया एक मासूम, सेवाभावी नौकरानी का मुखौटा ओढ़े हुए थी, वह अब अपने असली और भयानक रंग में आ चुकी थी। उसे पता चल गया था कि तिजोरी अब खाली होने वाली है, इसलिए उसने घर की सत्ता अपने हाथ में लेने की कवायद शुरू कर दी।मनोरमा, जो पिछले कई दिनों से अपमान के डर से अपने कमरे में दुबकी ...Read More
डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 38
काया ने महसूस कर लिया था कि भूपेंद्र पिछले कुछ दिनों से उखड़ा-उखड़ा रहता है। उसके चेहरे की हवाइयाँ उसकी चुप्पी काया को आशंकित कर रही थी। उसे लगा कि शायद वंशिका की याद या घर के वकील के बढ़ते खर्चे के कारण आई तंगी भूपेंद्र को उससे दूर कर रही है। उसने अपनी पकड़ मज़बूत करने के लिए एक नया और घातक उपाय सोचा। वह बाज़ार गई और अपनी मर्यादा की बची-कुची कतरनें भी बेच आई। उसने अपने लिए ऐसी फ्रॉक खरीदी जो किसी भी सभ्य घर के आंगन में तबाही लाने के लिए काफी थी।घर आकर जब ...Read More