Double Game - 7 in Hindi Women Focused by Jyoti Prajapati books and stories PDF | डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 7

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डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 7

उस रात, डाइनिंग टेबल पर काया के हाथ के बने पुलाव की खुशबू ने भले ही माहौल में थोड़ी मिठास घोल दी थी, लेकिन जैसे ही वंशिका अपने बेडरूम की खामोशी में लौटी, उसके मन का अंधेरा फिर से गहराने लगा। उसने लोन के कागजात तो फाड़ दिए थे, लेकिन उन फटे हुए पन्नों के साथ उसकी उम्मीदें भी बिखरी हुई महसूस हो रही थीं।

वंशिका को अपनी हार का अहसास तब हुआ जब उसे पता चला कि उसके जिम की आधी से ज्यादा मेंबर्स अब पास ही में खुले एक नए, आलीशान 'ग्लोबल फिटनेस' जिम की ओर मुड़ गई हैं। वहाँ की चकाचौंध, नियॉन लाइट्स और विदेशी मशीनों ने उन महिलाओं को सम्मोहित कर लिया था जो कल तक वंशिका की दोस्त बनी फिरती थीं। उसे एक पल में आईना दिख गया था—ये रईस औरतें किसी रिश्ते या वफादारी की नहीं, बल्कि सिर्फ और चकाचौंध की गुलाम हैं। वह खुद भी इसी चकाचौंध के पीछे भागना चाहती थी, लेकिन उसके पास वो बैकअप नहीं था जो इन महिलाओं के पास था।
वंशिका खिड़की के पास खड़ी बाहर की अंधेरी सड़क को देख रही थी। उसे अपना अतीत याद आने लगा। वंशिका का मायका बेहद संपन्न था। वह राजकुमारियों की तरह पली-बढ़ी थी। उसे लगा था कि शादी के बाद भी उसकी दुनिया वैसी ही रहेगी, लेकिन भूपेंद्र के घर की देहली लांघते ही उसके सारे सपने चकनाचूर हो गए।
भूपेंद्र का परिवार नाम के लिए संपन्न था, लेकिन उनकी सोच में ऐसी कंगाली थी जिसने वंशिका का दम घोंट दिया। उसकी सास मनोरमा और ननद शिखा के लिए बहू का मतलब सिर्फ एक ऐसी सेविका था जो उनकी हर आज्ञा का पालन करे। मनोरमा के लिए भूपेंद्र उसका 'राजा बेटा' था, जो अपनी माँ की मर्ज़ी के बिना सांस भी नहीं लेता था।

उस घर में आजादी नाम की कोई चीज़ नहीं थी। उसे नौकरी करने से साफ मना कर दिया गया था। अगर वंशिका को एक साड़ी भी खरीदनी होती, तो सास की अनुमति अनिवार्य थी। कहीं बाहर जाना हो, तो ननद शिखा को साथ ले जाना एक अघोषित नियम था। यहाँ तक कि घर के पर्दे, सोफे की कुशन और रसोई के डिब्बे भी शिखा की पसंद के आते थे। वंशिका की राय का उस घर में वही मूल्य था जो रद्दी के अखबार का होता है—उसे हमेशा इग्नोर किया जाता।

"भूपेंद्र, मुझे शिखा का हर वक्त साथ रहना पसंद नहीं, क्या हमारी अपनी कोई प्राइवेसी नहीं है?" वंशिका ने एक बार विद्रोह करना चाहा था।

पर भूपेंद्र का जवाब हमेशा एक जैसा होता— "वंशिका, माँ और शिखा तुम्हारी भलाई ही तो सोचती हैं। और फिर परिवार में सबको साथ लेकर चलना ही तो संस्कार है।"
बच्चों के आने के बाद वंशिका का सब्र जवाब दे गया। जब उसने देखा कि उसकी परवरिश के तरीकों को भी उसकी सास और ननद नकार रही हैं, तो उसने विद्रोह का झंडा उठा लिया। वह दो साल तक अपने मायके में जाकर बैठ गई। उसे उम्मीद थी कि भूपेंद्र उसे मनाने आएगा, उसे अपनी गलती का अहसास होगा। लेकिन मनोरमा और शिखा ने भूपेंद्र के कान भर दिए थे— "मत जाओ उसके पीछे, खुद अक्ल ठिकाने आएगी तो लौट आएगी।"


भूपेंद्र, जो अपनी माँ को दुनिया की सबसे श्रेष्ठ महिला मानता था, कभी उसे लेने नहीं गया। अंत में, जब मायके वाले भी बेटी के घर बैठे रहने से परेशान होने लगे और कोर्ट-कचहरी के चक्कर शुरू हुए, तब जाकर भूपेंद्र अलग घर लेने को तैयार हुआ। लेकिन ससुराल से शारीरिक दूरी होने के बाद भी मानसिक जकड़न खत्म नहीं हुई। मनोरमा और शिखा आज भी फोन पर भूपेंद्र को सिखाती रहती थीं और भूपेंद्र आज भी उन्हीं के प्रभाव में था।

वंशिका ने इन सबसे बचने के लिए खुद को काम में झोंक दिया। उसने एक जिम ट्रेनर के रूप में शुरुआत की और फिर अपने पिता की आर्थिक मदद से यह जिम खरीदा। 

भूपेंद्र को आज भी यही लगता था कि यह जिम वंशिका की मेहनत से ज्यादा उसके मायके वालों का अहसान है। वह अक्सर तंज कसता— "इतना तो अपनी बेटी के लिए सब करते ही हैं, इसमें तुमने क्या बड़ा तीर मार लिया?"

आज जब वंशिका अपनी मेज पर बैठी थी, तो उसे डर लग रहा था। अगर यह जिम भी उसके हाथ से निकल गया, तो वह फिर से उसी 'कंजूस और संकीर्ण' परिवार के रहमोकरम पर आ जाएगी। लोन न लेने का फैसला उसने इसलिए किया क्योंकि उसे डर था कि अगर वह किश्तें नहीं चुका पाई, तो भूपेंद्र की तीस हजार की नौकरी उन्हें सड़क पर ले आएगी। और वह फिर कभी अपने मायके वालों के सामने हाथ नहीं फैलाना चाहती थी।
उसे रह-रहकर काया का ख्याल आ रहा था। काया, जिसे भूपेंद्र अपनी आदर्शों की देवी मानता था। काया, जो इस घर को संभाल रही थी। वंशिका को महसूस हो रहा था कि धीरे-धीरे भूपेंद्र की नज़रों में उसका सम्मान कम होता जा रहा है और काया की अहमियत बढ़ती जा रही है।
वंशिका ने शीशे में खुद को देखा। वह खूबसूरत थी, फिट थी, लेकिन भीतर से वह बुरी तरह टूट रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पहचान कैसे बचाए। एक तरफ उसके ससुराल का वो काला अतीत था, दूसरी तरफ भविष्य की अनिश्चितता, और बीच में वह खुद, जो एक ऐसी दौड़ में शामिल थी जिसे वह जीत नहीं पा रही थी।
उसने गहरी सांस ली और लाइट बंद कर दी। लेकिन उसकी आँखों से नींद कोसों दूर थी। उसे लग रहा था कि वह फिर से उसी कैद की ओर बढ़ रही है जिससे वह बरसों पहले भागकर आई थी।


अगली सुबह जब घर में रोशनी की पहली किरण ने दस्तक दी, तो वंशिका की नींद किसी अलार्म से नहीं, बल्कि 'काया' नाम की उस गूँज से खुली जो अब इस घर का मंत्र बन चुकी थी।

"काया, ज़रा तौलिया देना... काया, मेरी सफेद शर्ट कहाँ है? काया, आज न्यूज़पेपर नहीं आया क्या?" बेडरूम से भूपेंद्र साहब की लगातार आती आवाज़ें वंशिका के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रही थीं।
भूपेंद्र अब हर छोटी-बड़ी चीज़ के लिए काया पर पूरी तरह निर्भर हो चुके थे। यहाँ तक कि अपनी रुमाल या मोज़े ढूँढने की कोशिश भी वह खुद नहीं करते थे। और काया? वह किसी मशीन की तरह फुर्तीली थी। वह रसोई से भागकर बेडरूम जाती, फिर बच्चों के पास दौड़ती, और साथ ही साथ यह भी सुनिश्चित करती कि साहब की चाय का तापमान बिल्कुल सही हो।

बच्चे भी कम नहीं थे। "काया, मेरा होमवर्क वाला चार्ट कहाँ है?", "काया, मुझे आज दूध में ज्यादा हॉर्लिक्स चाहिए!" बच्चों की ज़ुबान पर 'मम्मी' से पहले 'काया' का नाम आने लगा था।

वंशिका बिस्तर पर लेटी यह सब सुन रही थी। उसे अचानक अपनी शादी के वे शुरुआती दिन याद आ गए, जब वह इस घर की 'वंशिका' नहीं, बल्कि सबकी 'ज़रूरत' थी। उस समय भूपेंद्र के पुराने घर में सुबह की शुरुआत बिल्कुल ऐसी ही होती थी, बस नाम अलग था।
"वंशिका, मेरी चाय! वंशिका, ज़रा माँ की दवाइयां देना! वंशिका, शिखा के कॉलेज का टिफिन तैयार है क्या?"
उस समय वंशिका को लगता था कि वह एक पढ़ी-लिखी, आधुनिक लड़की से सीधे एक अनपेड लेबर (मुफ्त की नौकरानी) बन गई है। सुबह पांच बजे उठने से लेकर रात के बारह बजे तक, उसका वजूद सिर्फ दूसरों की सेवा करने तक सिमट गया था। वह यादें आज भी उसके ज़हन में ताज़ा थीं—ढेर सारे कपड़े धोना, रसोई में घंटों पसीने में जलना, और फिर सबकी पसंद का ध्यान रखते हुए बर्तन मांजना। उस कैद में उसने खुद से वादा किया था कि अगर कभी उसे मौका मिला, तो वह इस घरेलू चक्की से खुद को बाहर निकाल लेगी।

जब वह अलग हुई और उसने अपना जिम शुरू किया, तो उसने सबसे पहला काम काया को रखने का किया। उसे लगा था कि काया के आने से उसे वह आज़ादी मिलेगी जिसका उसने सपना देखा था। शुरू में सब ठीक था। काया के आने से वंशिका को घर के कामों से मुक्ति मिल गई और वह अपने जिम और अपने शरीर पर ध्यान देने लगी। उसे सुकून था कि अब उसे किसी की चाय बनाने या कपड़े प्रेस करने की चिंता नहीं करनी पड़ती।
लेकिन आज, जब वह अपने ही घर में 'काया... काया...' की रट सुन रही थी, तो उसे एक अजीब सा डर सताने लगा। उसे महसूस हुआ कि जिस आज़ादी को पाने के लिए उसने घर के कामों से नाता तोड़ा था, वही आज़ादी अब उसे अपने ही परिवार से बेदखल कर रही है।
भूपेंद्र जिस तरह काया से अपनी हर चीज़ मंगवाते थे, उसमें एक अधिकार था, एक ऐसा जुड़ाव था जो कभी वंशिका और उनके बीच हुआ करता था। काया का भाग-भाग कर काम करना और भूपेंद्र की हर ज़रूरत को बिना कहे समझ लेना, वंशिका को अपने पुराने दिनों की याद दिला रहा था। फर्क सिर्फ इतना था कि तब वह मजबूर थी, और आज काया यह सब एक ऐसी मुस्कान और समर्पण के साथ कर रही थी जिसने भूपेंद्र का दिल जीत लिया था।

वंशिका को लगा कि वह इस घर में अब सिर्फ एक अतिथि बनकर रह गई है। वह जिम जाती है, पैसे कमाने की जुगत करती है, लेकिन घर की असली डोर काया के हाथ में है। काया ने बड़ी चालाकी से (या शायद अनजाने में ही) वंशिका की वह जगह ले ली थी जो एक पत्नी और माँ की होती है।
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। काया हाथ में नींबू-पानी का गिलास लिए खड़ी थी। "दीदी, आपकी ड्रिंक। और आज नाश्ते में मैंने आपकी पसंद का ओट्स उपमा बनाया है, साहब कह रहे थे कि आप कल परेशान थीं तो शायद आज कुछ हल्का खाना चाहेंगी।"

वंशिका ने गिलास ले लिया, पर उसकी नज़रें काया के चेहरे पर जमी थीं। 'क्या यह औरत सच में इतनी भोली है? या यह साहब को अपनी सादगी के जाल में फंसा रही है?' वंशिका ने मन ही मन सोचा।

भूपेंद्र बाहर हॉल में बच्चों के साथ हँस रहे थे। काया ने जिस कुशलता से घर संभाला था, उसने भूपेंद्र को एक मानसिक शांति दे दी थी, और वही शांति अब वंशिका के लिए बेचैनी का कारण बन रही थी। वंशिका को लग रहा था कि उसने एक नौकरानी नहीं रखी, बल्कि अपने ही घर में एक प्रतिद्वंद्वी खड़ी कर ली है। परेशानी के वक्त में इंसान नकारात्मक ज्यादा सोचने लगता है और शायद वही वंशिका के साथ हो रहा था और कहीं न कहीं अपनी लापरवाही की वजह से उसका डर ठीक भी था।





क्रमशः

ज्योति प्रजापति 

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