दोपहर का वक्त था। खिड़की से आती धूप अब फर्श पर लंबी लकीरें बना रही थी। घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था, जो काया को भीतर ही भीतर खाए जा रहा था। जब से काया ने उस प्रॉपर्टी डीलर और वंशिका दीदी की बातें सुनी थीं, उसका चैन छिन गया था। उसे लग रहा था कि यह घर, जिसे उसने पिछले डेढ़ साल से अपने पसीने और ममता से सींचा है, उसकी नींव डगमगा रही है।
डेढ़ साल... यह समय कहने को तो कम था, लेकिन काया के लिए यह एक पूरी सदी जैसा था। इसी घर की चौखट ने उसे तब पनाह दी थी जब वह अपने टूटे हुए वैवाहिक जीवन और मायके के तानों से लहूलुहान थी। यहाँ उसे सिर्फ काम नहीं मिला था, बल्कि एक पहचान मिली थी। इस घर के बच्चों की खिलखिलाहट, साहब का वह शांत स्वभाव और दीदी का भरोसा—इन सबने मिलकर काया के मन में एक अनजाना सा अधिकार भाव पैदा कर दिया था। वह भले ही यहाँ एक कर्मचारी थी, लेकिन मन के किसी कोने में वह खुद को इस घर की मूक स्वामिनी समझने लगी थी। उसे लगता था कि अगर रसोई की आग ठंडी हुई या घर के रिश्तों में दरार आई, तो इसकी जवाबदेही उसकी होगी।
काया सिंक में बर्तन मांज रही थी, पर उसके हाथ बार-बार रुक जाते। "क्या दीदी सच में घर के पेपर गिरवी रख देंगी? क्या साहब को इस बात की भनक भी है?" ये सवाल उसके दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहे थे। वह वंशिका दीदी से सीधे पूछने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी। दीदी का स्वभाव अब थोड़ा चिड़चिड़ा हो गया था, और काया नहीं चाहती थी कि उसकी एक पूछताछ दीदी के गुस्से का कारण बने। लेकिन चुप रहना भी उसे गंवारा नहीं था। उसे लगा कि साहब ही इस नाव को डूबने से बचा सकते हैं।
शाम को जब भूपेंद्र ऑफिस से लौटे, तो उनका चेहरा हमेशा की तरह थका हुआ था। काया ने चाय की ट्रे उठाई और बालकनी में ले गई, जहाँ साहब अक्सर अकेले बैठकर ढलते सूरज को देखते थे।
"साहब, चाय लीजिए," काया ने धीमी आवाज़ में कहा।
भूपेंद्र ने बिना मुड़े चाय का कप उठा लिया। "शुक्रिया काया।"
काया वहाँ से गई नहीं। वह वहीं खड़ी रही, जैसे कुछ कहने की छटपटाहट उसके चेहरे पर साफ दिख रही हो।
भूपेंद्र ने उसकी इस झिझक को ताड़ लिया। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा और पूछा, "कुछ कहना चाहती हो काया? कोई परेशानी है? बच्चों ने तंग किया क्या?"
काया ने गहरी सांस ली और अपनी हिम्मत बटोरी। "नहीं साहब, बच्चे तो बहुत अच्छे हैं। परेशानी बच्चों से नहीं... परेशानी घर की आबो-हवा से है। साहब, मैं छोटी मुँह बड़ी बात कह रही हूँ, पर दीदी इन दिनों बहुत परेशान हैं। उनके सपने बड़े हैं, इसमें कोई खराबी नहीं है, पर उन सपनों की आंच कहीं घर की शांति को न जला दे। आप उनसे खुलकर बात क्यों नहीं करते? मैंने सुना है... वो कुछ बड़ा जोखिम लेने की सोच रही हैं।"
भूपेंद्र ने चाय का कप मेज पर रखा और एक लंबी, गहरी सांस ली। उनकी आँखों में उदासी की एक परत सी तैर गई। उन्होंने काया को बहुत ध्यान से देखा। उनके सामने एक ऐसी औरत खड़ी थी, जिसका अपना घर उजड़ चुका था, जो खुद गरीबी और समाज के थपेड़े खाकर यहाँ पहुँची थी। लेकिन फिर भी, वह अपने दुखों को भूलकर उनके परिवार को टूटने से बचाने की फिक्र कर रही थी।
भूपेंद्र के मुँह से अचानक ही तुलनात्मक शब्द निकल पड़े। "काया, तुम कितनी अलग हो। तुम्हारे पास न कोई बड़ी डिग्री है, न तुम उन रईस औरतों की तरह जिम जाती हो, न ही तुम्हें ऊँची गाड़ियों की चाहत है। फिर भी, तुम्हें इस घर की नींव की फिक्र है। और एक तरफ वंशिका है... जिसके पास सब कुछ होते हुए भी वह उस चमक-धमक की दौड़ में अंधी हो गई है जिसे वह खुशहाली समझती है।"
भूपेंद्र थोड़ा और करीब आए और बोले, "कभी-कभी मुझे लगता है कि घर चलाने के लिए सिर्फ पैसा या रसूख नहीं, बल्कि तुम्हारी जैसी सादगी और समझदारी चाहिए होती है। काश वंशिका तुम्हारी आधी सादगी भी अपना लेती, तो शायद आज मुझे अपने ही घर में अजनबी जैसा महसूस न होता। तुम इस घर की सिर्फ देखभाल नहीं करती काया, तुम इसे जोड़कर रखती हो।"
भूपेंद्र की ये बातें सुनकर काया के भीतर जैसे बिजली सी दौड़ गई। उसने अपनी नज़रें नीचे झुका लीं। आज तक किसी ने उसकी तुलना किसी बड़े व्यक्ति से इतने सम्मान के साथ नहीं की थी। उसे अपनी तारीफ सुनकर एक ऐसी अनजानी खुशी महसूस हुई जिसका कारण उसे खुद समझ नहीं आ रहा था। उसके चेहरे पर एक हल्की सी लाली छा गई।
वह कुछ कह नहीं पाई, बस धीरे से "जी साहब" कहकर वहाँ से चली गई। लेकिन उस शाम, रसोई में काम करते समय उसके हाथ पहले से ज्यादा फुर्ती से चल रहे थे। साहब की वे बातें उसके कानों में शहद की तरह घुल रही थीं—'तुम इस घर को जोड़कर रखती हो।'
काया को लगा कि उसकी मेहनत सफल हो गई। भले ही वह एक दासी थी, पर इस घर के मालिक की नज़रों में उसका स्थान उस आधुनिक मालकिन से कहीं ऊपर था जो घर की शांति को दांव पर लगा रही थी। एक अजीब सा सुकून उसके दिल में उतर गया था, जिसने उसे और भी ज्यादा समर्पित बना दिया था।
वहीं दूसरी ओर, वंशिका अपने कमरे में बैठी लोन के उन कागजों को फाड़कर फेंक चुकी थी। उसने फैसला बदल लिया था, लेकिन इस बदलाव की खबर न तो भूपेंद्र को थी और न ही काया को। घर के भीतर का यह गलतफहमी भरा कोहरा अब और भी गहरा होने वाला था।
भूपेंद्र की उन बातों ने काया के मन के किसी सोए हुए कोने को जगा दिया था। वह रसोई में वापस तो आ गई थी, लेकिन उसके कदम ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे। वह बार-बार उन्हीं शब्दों को दोहरा रही थी—'तुम्हारी जैसी सादगी चाहिए।' उसे महसूस हुआ कि इस घर की दीवारों के बीच उसकी अहमियत अब सिर्फ एक काम करने वाली बाई की नहीं रह गई है, बल्कि वह इस घर की रक्षक बन चुकी है।
शाम की उस भारी खामोशी के बीच, काया ने तय किया कि आज वह खाने में कुछ ऐसा बनाएगी जो स्वाद के साथ-साथ मन की कड़वाहट को भी सोख ले। उसने मसालों के डिब्बे खोले, ताज़ा खड़े मसाले कूटे और रसोई को एक ऐसी खुशबू से भर दिया जो बरसों पुराने किसी उत्सव की याद दिलाती थी।
तभी बाहर मुख्य द्वार खुलने की आवाज़ आई। वंशिका दीदी जिम से लौट आई थीं। उनके चेहरे पर थकान और एक अनकही ऊहापोह थी। उन्होंने सोफे पर अपना बैग फेंका और बिना किसी से बात किए सीधे अपने कमरे की ओर बढ़ गईं। भूपेंद्र अभी भी बालकनी में ही बैठे थे। दोनों के बीच खामोशी की एक ऊंची दीवार खड़ी थी, जिसे लांघने की हिम्मत फिलहाल किसी में नहीं थी।
काया ने डाइनिंग टेबल सजाना शुरू किया। उसने करीने से प्लेट्स लगाईं और बच्चों को आवाज़ दी। "विहान, अवनी! चलो जल्दी आओ, आज आपकी पसंद का शाही पनीर और केसरिया पुलाव बना है!"
बच्चों के शोर ने घर के सन्नाटे को थोड़ा कम किया। कुछ ही देर में पूरा परिवार डाइनिंग टेबल पर था। वंशिका और भूपेंद्र आमने-सामने बैठे थे, लेकिन उनकी नज़रें अपनी-अपनी प्लेटों में गड़ी थीं। तनाव इतना साफ था कि उसे महसूस किया जा सकता था।
लेकिन जैसे ही काया ने गर्म-गर्म पुलाव की ढक्कन हटाया, रसोई से निकली वह सोंधी और शाही खुशबू पूरे डाइनिंग एरिया में फैल गई। वह खुशबू इतनी सम्मोहक थी कि वंशिका और भूपेंद्र, दोनों ने अनजाने में ही अपनी नज़रें ऊपर उठाईं।
भूपेंद्र ने पहला निवाला लिया और उनकी आँखों में एक चमक सी आ गई। "कमाल है काया! आज तो मसालों का तालमेल बिल्कुल सटीक है। इस पुलाव की खुशबू ने तो दिन भर की सारी थकान ही मिटा दी।"
वंशिका, जो अब तक अपने ख्यालों में खोई हुई थीं, उन्होंने भी सब्जी चखी। उनके चेहरे की सख्ती थोड़ी ढीली पड़ी। "वाकई काया, आज खाने का स्वाद कुछ अलग ही है। तुमने पनीर में जो खड़े मसालों का तड़का दिया है, वह बहुत उम्दा है। बाहर के बड़े से बड़े रेस्टोरेंट में भी ऐसा स्वाद नहीं मिलता।"
बच्चों ने तो जैसे मोर्चा ही संभाल लिया था। "काया, आप बेस्ट कुक हो! कल भी यही बनाना," विहान मुँह भरते हुए बोला।
थोड़ी देर पहले जो घर श्मशान जैसी शांति ओढ़े हुए था, वहां अब स्वाद की चर्चा होने लगी थी। भूपेंद्र और वंशिका ने एक-दूसरे की ओर देखा। हालांकि कोई औपचारिक सुलह नहीं हुई थी, लेकिन उस खाने के स्वाद ने उनके बीच के तनाव की बर्फ को थोड़ा पिघला दिया था। दोनों ने मिलकर काया की तारीफ की।
काया एक कोने में खड़ी यह सब देख रही थी। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और होठों पर एक गहरी संतुष्टि वाली मुस्कान थी। उसे अपनी एक मूक जीत का अहसास हो रहा था। उसे लगा कि उसने अपनी मेहनत और स्वाद के जरिए उस बिखरते हुए परिवार को कम से कम आधे घंटे के लिए एक मेज पर ला खड़ा किया है।
वंशिका दीदी, जो अपनी महत्वाकांक्षाओं में घर को भूल रही थीं, और भूपेंद्र साहब, जो अपनी खामोशी में सिमट रहे थे—दोनों को आज काया की ज़रूरत महसूस हुई थी।
काया को लगा कि वह इस घर की सिर्फ काया नहीं,
बल्कि आत्मा बनती जा रही है। उसके मन में यह विचार और दृढ़ हो गया कि इस परिवार की बागडोर अब वास्तव में उसके हाथों में है। उसे लगा कि वह अपनी इस सेवा और समर्पण से इस घर को कभी बिखरने नहीं देगी।
उस रात जब वह अपने कमरे में सोने गई, तो उसे थकान नहीं बल्कि एक नई ऊर्जा महसूस हो रही थी। उसे लग रहा था कि वह इस घर की अनिवार्य ज़रूरत बन चुकी है। साहब की तारीफ और दीदी का वह स्वीकार भाव उसके लिए किसी मेडल से कम नहीं था। उसने खिड़की से बाहर देखते हुए खुद से वादा किया कि वह इस घर की शांति का पहरा इसी तरह देती रहेगी।
क्रमशः
ज्योति प्रजापति
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