सुबह की आपाधापी के बीच घर का माहौल ऊपरी तौर पर तो सामान्य दिख रहा था, लेकिन वंशिका के मन के भीतर एक गहरी उथल-पुथल मची थी। डाइनिंग टेबल पर नाश्ता लगा था। भूपेंद्र साहब अपनी फाइलें देख रहे थे और काया बच्चों के जूतों के फीते बांध रही थी। हर मिनट में "काया, ज़रा मेरा पेन देना," या "काया, विहान का दूध खत्म हो गया," की आवाज़ें गूँज रही थीं।
वंशिका अपनी कॉफी का कप पकड़े चुपचाप यह सब देख रही थी। उसे लग रहा था कि वह इस घर की फ्रेम से बाहर होती जा रही है। उसे अपनी असुरक्षा को ज़बान देनी थी, लेकिन वह जानती थी कि भूपेंद्र के सामने सीधे कुछ भी कहना आग में घी डालने जैसा होगा।
जब बच्चे स्कूल चले गए और काया रसोई की सफाई में व्यस्त हुई, तब वंशिका ने बड़ी सावधानी से बात छेड़ी।
"भूपेंद्र, मुझे लगता है कि हम काया पर कुछ ज़रूरत से ज़्यादा ही निर्भर नहीं होते जा रहे?" उसने बहुत ही सहज लहजे में कहा, जैसे वह घर के प्रबंधन की चिंता कर रही हो।
भूपेंद्र ने अखबार से नज़रें हटाए बिना पूछा, "मतलब? मैं समझा नहीं।"
वंशिका ने थोड़ा और स्पष्ट किया, "मेरा मतलब है कि बच्चे अब अपनी छोटी-छोटी चीज़ों के लिए भी तुम्हें या मुझे आवाज़ नहीं देते। विहान अपनी रुमाल तक खुद नहीं उठाता। और तुम भी... अपनी ऑफिस की फाइलें और घड़ी तक काया से मंगवाते हो। मुझे डर है कि कहीं हमारी अपनी आदतों के साथ-साथ बच्चों का अनुशासन भी न बिगड़ जाए। कल को अगर काया न रही, तो हम तो अपाहिज महसूस करेंगे।"
भूपेंद्र ने अखबार बंद किया और वंशिका को गौर से देखा। उनकी नज़रों में एक अजीब सी तल्खी थी। "अनुशासन की बात कर रही हो या अपने रसूख की, वंशिका? मुझे तो इसमें कुछ गलत नहीं दिखता। काया इस घर को जिस सलीके से संभालती है, उससे मुझे दफ्तर के काम में सुकून रहता है। और बच्चों को वह ममता और समय दे रही है, जो शायद इस जिम और करियर की दौड़ में तुम नहीं दे पा रही हो।"
वंशिका को यह बात चुभ गई। "मैं बच्चों के भविष्य के लिए ही तो मेहनत कर रही हूँ भूपेंद्र! मेरा मतलब सिर्फ इतना था कि घर के बड़ों का एक रूतबा होना चाहिए। अब घर में मम्मा या पापा से ज़्यादा काया का नाम गूँजता है।"
भूपेंद्र का लहजा अब कठोर हो गया। "सच तो यह है वंशिका, कि तुम्हें काया की उपयोगिता से नहीं, बल्कि उसकी सादगी और उस सम्मान से चिढ़ हो रही है जो उसे इस घर में मिल रहा है। तुम चाहती हो कि सब तुम्हारी उंगलियों पर नाचें, जैसे तुम्हारे मायके में होता था। लेकिन यहाँ काया ने अपनी मेहनत से अपनी जगह बनाई है। तुम्हारी ये बातें तुम्हारी असुरक्षा नहीं, बल्कि तुम्हारा अहंकार दिखा रही हैं। तुम बर्दाश्त नहीं कर पा रही हो कि एक मामूली सी औरत, जिसे तुम नौकरानी समझती हो, वह इस घर की धुरी बन गई है।"
"अहंकार? तुम्हें लगता है मैं अहंकारी हूँ क्योंकि मैं अपने घर में अपनी जगह चाहती हूँ?" वंशिका की आवाज़ में आंसू और गुस्सा दोनों थे।
"हाँ, अहंकारी!" भूपेंद्र ने खड़े होते हुए कहा। "तुम्हें लगता है कि पैसा और रुतबा ही सब कुछ है। काया ने जो इस घर को दिया है—वह शांति, वह व्यवस्था—उसकी कीमत तुम कभी नहीं समझोगी। उसे नीचा दिखाना बंद करो।"
भूपेंद्र बिना नाश्ता किए ऑफिस के लिए निकल गए। वंशिका वहीं खड़ी रह गई, उसकी आँखों से आंसू टपक पड़े। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसकी चिंता को भूपेंद्र ने अहंकार का नाम कैसे दे दिया।
अभी तनाव की यह गूँज थमी भी नहीं थी कि काया रसोई से बाहर आई। उसका चेहरा सफेद पड़ा हुआ था और हाथ में उसका पुराना सा मोबाइल फोन था। वह कांप रही थी।
"क्या हुआ काया?" वंशिका ने अपने आंसू पोंछते हुए पूछा।
"दीदी... मेरी माँ... अस्पताल में हैं। भाई का फोन आया था, उनकी हालत बहुत बिगड़ गई है। मुझे अभी गाँव निकलना होगा। डॉक्टर कह रहे हैं कि स्थिति बहुत गंभीर है।" काया की आवाज़ भर्रा गई थी।
वंशिका एक पल के लिए अपनी सारी नाराजगी भूल गई। "गाँव? पर इतनी जल्दी कैसे? और घर..."
"दीदी, मुझे जाना ही होगा। पता नहीं माँ के पास कितना समय है। मैंने सब कुछ व्यवस्थित कर दिया है, बस..." काया ने रोते हुए अपना झोला उठाया। वह इतनी हड़बड़ी में थी कि उसे कुछ सुध नहीं थी।
वंशिका ने उसे कुछ पैसे दिए और वह चली गई। काया के जाते ही घर में एक ऐसा सन्नाटा पसर गया जो डराने वाला था।
शाम हुई। विहान और अवनी स्कूल से लौटे। उनकी पहली पुकार थी— "काया! भूख लगी है! काया, हमारा गेम कहाँ है?"
जब उन्हें पता चला कि काया कुछ दिनों के लिए चली गई है, तो घर में जैसे मातम छा गया। अवनी ने खाना खाने से मना कर दिया क्योंकि उसे वैसे गोल परांठे चाहिए थे जैसे काया बनाती थी। विहान को अपना प्रोजेक्ट नहीं मिल रहा था जो काया ने अलमारी के ऊपर रखा था।
रात को जब भूपेंद्र लौटे, तो घर का नज़ारा बदला हुआ था। सिंक में बर्तन जमा थे, सोफे पर कपड़े बिखरे थे और बच्चे रो-रोकर सोए थे।
"काया कहाँ है?" भूपेंद्र ने थके हुए स्वर में पूछा।
"उसकी माँ की तबीयत खराब है, वह गाँव गई है," वंशिका ने सूखे स्वर में जवाब दिया। वह खुद रसोई में जूझ रही थी, लेकिन उसे समझ नहीं आ रहा था कि कौन सा मसाला कहाँ रखा है।
अगले दो दिन घर में कोहराम मच गया। भूपेंद्र को सुबह अपनी मोज़े की जोड़ी नहीं मिली। चाय का स्वाद ऐसा था कि उन्होंने एक घूँट पीकर छोड़ दिया। बच्चों के स्कूल बैग तैयार नहीं थे, उनकी डायरी पर साइन नहीं हुए थे। भूपेंद्र का वह आदर्शवादी चेहरा अब झुंझलाहट में बदल गया था।
"वंशिका, ये घर है या कबाड़खाना? एक रुमाल तक अपनी जगह पर नहीं है!" भूपेंद्र चिल्लाए।
"मैं अकेली क्या-क्या करूँ भूपेंद्र? मैं जिम भी देखूँ या घर के ये सौ काम? काया ने सब अपनी मर्जी से सेट किया था, मुझे क्या पता उसने क्या कहाँ छिपा रखा है!" वंशिका ने पलटवार किया।
पूरे घर को अहसास हो गया था कि वे जिसे 'सिर्फ एक नौकरानी' समझते थे, वह दरअसल इस घर का ऑक्सीजन थी। काया की अनुपस्थिति में भूपेंद्र का आदर्शवाद और वंशिका की आधुनिकता दोनों धराशायी हो गए थे। घर का हर कोना चीख-चीख कर काया को पुकार रहा था।
भूपेंद्र को वंशिका की बात याद आई..."सब काया पर ज्यादा ही निर्भर रहने लगे हैं।" भूपेंद्र को अपनी उस बात पर पछतावा होने लगा जो जवाब में उन्होंने वंशिका से कही थी, लेकिन उनका पुरुषोचित अहंकार उन्हें झुकने नहीं दे रहा था। वहीं वंशिका को यह देखकर और भी जलन हो रही थी कि काया के बिना यह घर एक मरुस्थल बन गया है।
अचानक फोन की घंटी बजी। काया का फोन था। भूपेंद्र ने झपटकर फोन उठाया।
"काया? कब आ रही हो?" उनकी आवाज़ में वैसी ही बेताबी थी जैसी किसी प्यासे की पानी के लिए होती है।
दूसरी तरफ से काया की सिसकियाँ सुनाई दीं। "साहब... माँ नहीं रहीं।"
भूपेंद्र निशब्द रह गए। अब काया का लौटना अनिश्चित था, और इस घर का कोहराम अब एक लंबी त्रासदी में बदलने वाला था।
क्रमशः
ज्योति प्रजापति
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