Double Game - 4 in Hindi Women Focused by Jyoti Prajapati books and stories PDF | डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 4

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डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 4

शाम के पांच बज रहे थे। सूरज की सुनहरी किरणें अब नारंगी होकर खिड़कियों से विदा ले रही थीं। घर में एक अजीब सी शांति थी—वह शांति जो किसी बड़े तूफान से पहले या किसी थके हुए दिन के ढलने पर महसूस होती है। काया रसोई में खड़ी थी, उसने अदरक कूटने वाली ओखली उठाई ही थी कि उसे ख्याल आया। उसने अपना फोन उठाया और भूपेंद्र का नंबर डायल किया।
भूपेंद्र उस वक्त दफ्तर में अपनी मेज पर फाइलों के ढेर के बीच घिरा हुआ था। कंप्यूटर की स्क्रीन देखते-देखते उसकी आँखों में जलन होने लगी थी। तभी उसका फोन वाइब्रेट हुआ। स्क्रीन पर काया का नाम देखकर उसके चेहरे की थकान एक पल के लिए गायब हो गई।
"हाँ काया, बोलो। घर पर सब ठीक तो है?" भूपेंद्र ने फोन कान से लगाते हुए पूछा।


"सब ठीक है साहब। बस ये पूछने के लिए फोन किया था कि चाय चढ़ा दूँ? या आज भी दफ्तर की फाइलों के साथ ही डिनर करने का इरादा है?" काया की आवाज़ में एक शरारती खनक थी।


भूपेंद्र मुस्कुरा दिया, उसने अपनी कुर्सी की पीठ से टेक लगाई और बोला, "चाय तो बना लो, लेकिन देखना... आज अदरक ज़रा ज्यादा डालना। खन्ना साहब ने आज दिमाग का दही कर दिया है।"


काया ने वहीं से तंज कसा, "अदरक तो डाल दूँगी, लेकिन दिमाग का दही जो हुआ है, उसे ठीक करने के लिए शक्कर की जगह अक्ल डालनी पड़ेगी क्या? साढ़े पांच बज रहे हैं, अभी तक आप निकले नहीं। बच्चे यहाँ आपका रास्ता देख रहे हैं।"


"अरे भाई, सरकारी फाइलों से ज्यादा सख्त तो तुम्हारी ये बातें हैं," भूपेंद्र ने मज़ाक में कहा, "बस निकल ही रहा हूँ। पंद्रह मिनट में बस स्टैंड पहुँच जाऊँगा।"


"ठीक है, पंद्रह मिनट मतलब पंद्रह मिनट। अगर चाय ठंडी हुई, तो मैं दोबारा गर्म नहीं करने वाली, ये याद रखिएगा," काया ने नकली चेतावनी दी और फोन काट दिया।


फोन रखने के बाद भूपेंद्र के मन में एक अजीब सी संतुष्टि थी। उसे लगा कि इस 'काया... काया...' की रट ने ही उसके घर को जोड़कर रखा है। वह अपनी सीट से उठा, अपना पुराना चमड़े का बैग उठाया और सहकर्मियों को गुड इवनिंग कहकर दफ्तर से बाहर निकल गया।


जब भूपेंद्र घर पहुँचा, तो घर का दरवाजा खुला था। भीतर से अदरक वाली चाय की भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी। जैसे ही उसने जूते उतारे, विहान और अवनी किसी स्प्रिंग की तरह उछलकर उससे लिपट गए।


"पापा! पापा! आज पता है क्या हुआ?" विहान ने उसका बैग खींचते हुए कहा।


"पापा, पहले मेरी बात सुनो! आज मैंने ड्राइंग में 'ए' प्लस लिया है!" अवनी चिल्लाई।


भूपेंद्र ने सोफे पर धप से बैठते हुए दोनों को अपनी गोद में समेट लिया। उसकी दिन भर की फाइलों की धूल और बॉस की डांट इन मासूम आवाजों के आगे धुंधली पड़ गई। काया रसोई से बाहर आई, उसके हाथ में चाय का कप और बिस्कुट की प्लेट थी।


"लो, आ गए महाराजा। बच्चों, ज़रा सांस तो लेने दो अपने पापा को," काया ने कहते हुए चाय की प्याली मेज पर रखी।


विहान शुरू हो गया, "पापा, आज क्लास में राहुल ने रोहन को पेंसिल तोड़ दी, तो मैंने उसे अपनी एक्स्ट्रा पेंसिल दे दी। आपने कहा था न कि शेयरिंग इज केयरिंग?"


भूपेंद्र ने उसकी पीठ थपथपाई, "शाबाश बेटा! यही तो एक अच्छे इंसान की पहचान है। और अवनी, तुम्हारी ड्राइंग तो देखूँ?"


अवनी ने अपनी ड्राइंग बुक दिखाई। काया पास ही खड़ी यह सब देख रही थी। उसने भूपेंद्र की ओर देख कर धीरे से कहा, "ये देखिए, आपके बच्चे आपके ही नक्शेकदम पर चल रहे हैं। आदर्शवाद की पाठशाला घर में ही खुल गई है।"


भूपेंद्र ने चाय की चुस्की ली और मुस्कुराते हुए कहा, "तो इसमें बुरा क्या है काया? ईमानदारी और सादगी ही तो असली दौलत है।"

काया ने एक गहरी सांस ली, "दौलत तो है, पर कभी-कभी इस दौलत से राशन की दुकान पर सामान नहीं मिलता। खैर, आप चाय पीजिये, मैं वंशिका दीदी को देख कर आती हूँ, वो शायद ऊपर जिम वाले कमरे में कुछ काम कर रही हैं।"

काया जब ऊपर गई, तो वंशिका अपने लैपटॉप पर कुछ हिसाब-किताब लगा रही थी। उसका चेहरा उतरा हुआ था। जब वह नीचे आई और भूपेंद्र को बच्चों के साथ खेलते देखा, तो उसके चेहरे पर वह खुशी नहीं आई जो अक्सर आती थी।


भूपेंद्र ने उसकी ओर देखा, "क्या हुआ वंशिका? आज बड़ी गंभीर लग रही हो? जिम में सब ठीक रहा?"


वंशिका उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई। उसने कुछ देर भूपेंद्र को देखा और फिर शांति से बोली, "भूपेंद्र, मुझे अपने जिम का विस्तार करना है। मुझे बगल वाला खाली फ्लैट लीज पर लेना होगा और कुछ नई इम्पोर्टेड मशीनें मंगवानी होंगी।"


भूपेंद्र ने चाय का कप नीचे रखा, "विस्तार? पर वंशिका, अभी तो सब ठीक चल रहा है। हम अपनी ज़रूरतें पूरी कर पा रहे हैं, बच्चे अच्छे स्कूल में जा रहे हैं। और फिर, नया निवेश मतलब बड़ा कर्ज। इस तीस-चालीस हजार की नौकरी में मैं बैंक की किश्तें कैसे भरूँगा?"


वंशिका की आवाज़ में थोड़ी कड़वाहट आ गई, "वही तो समस्या है भूपेंद्र! तुम्हारी ये तीस-चालीस हजार की नौकरी! तुम इसमें खुश हो सकते हो, पर क्या तुमने कभी सोचा है कि हम कहाँ खड़े हैं? आज जिम में मिसेज मल्होत्रा अपनी नई ऑडी की बात कर रही थीं। मिसेज खन्ना के बच्चे गर्मियों की छुट्टियों में स्विट्जरलैंड जा रहे हैं। और हम? हम बस इसी घर और इस छोटी सी आय में अपनी ज़िंदगी काट रहे हैं।"


भूपेंद्र का चेहरा थोड़ा सख्त हुआ, "काट नहीं रहे हैं वंशिका, हम गरिमा के साथ जी रहे हैं। उन लोगों के पास पैसा है, पर क्या उनके पास वो सुकून है जो हमारे पास है? मैं रिश्वत नहीं ले सकता, मैं गलत तरीके से पैसा नहीं कमा सकता। मेरी ईमानदारी ही मेरी सबसे बड़ी संपत्ति है।"


"तुम्हारी ईमानदारी हमें बड़ी गाड़ी नहीं दिलाएगी भूपेंद्र!" वंशिका थोड़ा ऊँची आवाज़ में बोली। "आज के दौर में ईमानदारी का अचार नहीं डाला जाता। हमें अपनी लाइफस्टाइल बदलनी होगी। लोग हमें हमारे बैंक बैलेंस से आंकते हैं, हमारे आदर्शों से नहीं। अगर मैं जिम बड़ा नहीं करूँगी, तो वो रईस औरतें मेरे पास आना बंद कर देंगी। उन्हें 'लक्ज़री' चाहिए, और लक्ज़री के लिए पैसा चाहिए।"


भूपेंद्र ने एक लंबी सांस ली। वह जानता था कि यह बहस कहाँ जा रही है। "वंशिका, पैसा कमाना बुरा नहीं है, लेकिन पैसे के पीछे अंधा होकर भागना और अपनी चादर से बाहर पैर पसारना खतरनाक है। हम मिडल क्लास लोग हैं, और इसी में हमारी सुरक्षा है।"


"सुरक्षा नहीं, यह डर है!" वंशिका ने पलटवार किया। "तुम डरते हो बड़ा सोचने से। तुम डरते हो रिस्क लेने से। तुम बस अपनी उस छोटी सी डेस्क और उन धूल भरी फाइलों में सिमट कर रह जाना चाहते हो। पर मैं नहीं! मुझे वह सब चाहिए जो उन औरतों के पास है। मुझे वह चमक-धमक चाहिए।"


काया रसोई के दरवाजे पर खड़ी यह सब सुन रही थी। उसके हाथ में रात के खाने के लिए काटी जा रही सब्जियां थीं। उसने देखा कि कैसे एक ही छत के नीचे दो अलग-अलग संसार टकरा रहे थे। एक ओर भूपेंद्र का वह पुराना, मजबूत और आदर्शवादी संसार था, और दूसरी ओर वंशिका का नया, चकाचौंध भरा और महत्वाकांक्षी संसार।


विहान और अवनी, जो कुछ देर पहले शोर मचा रहे थे, अब शांत होकर अपने मम्मी-पापा को देख रहे थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अचानक हवा में यह भारीपन क्यों आ गया है।


भूपेंद्र उठा और बिना कुछ बोले खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया। बाहर अंधेरा बढ़ रहा था। उसने धीमी आवाज़ में कहा, "वंशिका, शांति और सुकून की कोई कीमत नहीं होती। एक बार इस दौड़ में शामिल हो गए, तो फिर कभी वापस नहीं मुड़ पाओगी।"


वंशिका ने अपना लैपटॉप बंद किया और बिना जवाब दिए अपने कमरे की ओर बढ़ गई। उसके कदमों की आहट में एक ज़िद थी, एक ऐसा संकल्प जो शायद आने वाले दिनों में इस घर की शांति को भंग करने वाला था।
काया ने चुप्पी तोड़ी, "साहब... डिनर लगा दूँ? या थोड़ी देर बाद?"


भूपेंद्र ने पीछे मुड़कर देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी बेबसी थी। "लगा दो काया। भूख तो अब नहीं है, पर बच्चों ने नहीं खाया होगा।"


उस रात, डाइनिंग टेबल पर वह हंसी-मज़ाक नहीं था जो रोज़ होता था। सिर्फ बर्तनों के टकराने की आवाज़ें आ रही थीं। काया सबको खाना परोस रही थी, पर उसका मन कहीं और था। उसे डर लग रहा था कि वंशिका की ये ऊँची उड़ान कहीं इस छोटे से, प्यारे से घोंसले को बिखेर न दे।




क्रमशः

ज्योति प्रजापति 

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