Double Game - 12 in Hindi Women Focused by Jyoti Prajapati books and stories PDF | डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 12

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डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 12

जब भूपेंद्र को पता चला कि वंशिका की तबीयत खराब है, तो वे परेशान तो हुए, लेकिन उससे कहीं ज्यादा वे 
काया की तत्परता देखकर गदगद हो गए। उन्होंने देखा कि काया कैसे एक साथ तीन मोर्चों पर लड़ रही है—वह रसोई संभाल रही थी, बच्चों को देख रही थी और वंशिका की तीमारदारी भी कर रही थी।

भूपेंद्र ने ऑफिस जाने से पहले काया को कमरे के बाहर बुलाया। "काया, मैं सच में धन्य हूँ कि तुम जैसी मददगार हमारे घर में है। इस मुश्किल वक्त में अगर तुम न होती, तो पता नहीं हमारा क्या होता। वंशिका खुशकिस्मत है कि उसे तुम जैसी देखभाल करने वाली मिली है।"

काया ने अपनी नज़रें नीची कर लीं। "साहब, ये तो मेरा फर्ज है। दीदी बीमार हैं, तो मैं हाथ पर हाथ धरकर थोड़े ही बैठ सकती हूँ।"

भूपेंद्र को काया की यह सादगी और निस्वार्थ भाव सीधे दिल पर लगा। उनके मन में वंशिका के प्रति जो थोड़ी बहुत सहानुभूति बची थी, वह काया की महानता के नीचे दब गई। उन्हें लगा कि काया सिर्फ एक हाउसहेल्प नहीं, बल्कि इस घर का सुरक्षा कवच है।

उस दिन भूपेंद्र ऑफिस से जल्दी घर लौट आए। घर में एक अजीब सी शांति थी। वंशिका सो रही थी। काया ने हॉल में साहब के लिए अदरक वाली चाय और थोड़े पकौड़े रखे।

"साहब, आप थक गए होंगे। दीदी की फिक्र मत कीजिये, बुखार अब थोड़ा कम है," काया ने धीरे से कहा।
काम के दौरान अनजाने में ही काया की सक्रियता भूपेंद्र के बहुत करीब ले आई थी। जब वह चाय पकड़ा रही थी, तो भूपेंद्र की नज़रें उसकी थकी हुई आँखों पर पड़ीं। "तुम भी थक गई होगी काया। सुबह से एक पल के लिए भी नहीं बैठी हो।"

"साहब, जब तक घर के लोग ठीक न हों, मुझे चैन कहाँ," काया ने अपनी साड़ी का पल्लू संभालते हुए कहा।

भूपेंद्र को महसूस हुआ कि जिस सुकून और अपनेपन की तलाश वे वंशिका में करते थे, वह उन्हें काया की इस बिना मांग वाली सेवा में मिल रहा है। यह सब बहुत ही अनजाने में हो रहा था। न काया का इरादा साहब को रिझाने का था, न भूपेंद्र का इरादा अपनी पत्नी को धोखा देने का। लेकिन परिस्थितियों ने काया को उस सहारा के रूप में स्थापित कर दिया था, जिसकी भूपेंद्र को इस वक्त सबसे ज्यादा ज़रूरत थी।

शाम को विहान और अवनी स्कूल से आए, तो अपनी मम्मा को बीमार देखकर रोने लगे। वे वंशिका के कमरे में जाना चाहते थे, उससे लिपटना चाहते थे।

काया ने तुरंत उन्हें बीच में ही रोक लिया। "नहीं बच्चों, मम्मा को इंफेक्शन है। अगर तुम उनके पास जाओगे, तो तुम भी बीमार पड़ जाओगे। फिर स्कूल कौन जाएगा? मम्मा को डॉक्टर ने आराम करने को कहा है।"
काया ने बच्चों को बड़े ही प्यार से पुचकार कर दूसरे कमरे में ले गई। उसने उन्हें कहानियाँ सुनाईं, उनके साथ गेम खेला और उन्हें व्यस्त रखा। वह बच्चों को माँ से दूर रख रही थी ताकि वंशिका को आराम मिले, लेकिन अनजाने में ही वह बच्चों और माँ के बीच एक दीवार बनती जा रही थी।

विहान ने मासूमियत से पूछा, "काया, मम्मा कब ठीक होंगी? हमें मम्मा के हाथ का खाना खाना है।"

काया ने उसे गोद में उठाते हुए कहा, "जल्द ही बेटा। तब तक काया है न? आज मैं तुम्हें वो जादुई कहानी सुनाऊंगी जो मेरी माँ मुझे सुनाती थी।"
धीरे-धीरे बच्चे भी काया की बातों में लग गए। वंशिका अपने कमरे में लेटी हुई बाहर से आती हँसी और काया की आवाज़ सुन रही थी। उसे महसूस हो रहा था कि उसके बीमार होते ही उसका अस्तित्व इस घर से गायब हो गया है। वह बेबस थी। उसे काया की सेवा पर कृतज्ञ होना चाहिए था, लेकिन उसे डर लग रहा था। उसे लग रहा था कि काया की यह 'सेवा' उसके परिवार के चारों ओर एक ऐसा घेरा बना रही है, जिसे वह ठीक होने के बाद भी शायद ही तोड़ पाएगी।

भूपेंद्र रात को देर तक हॉल में काया के साथ बच्चों की पढ़ाई और घर के बजट पर चर्चा करते रहे। उन्हें लग रहा था कि ज़िंदगी कितनी आसान हो सकती है अगर कोई काया जैसा समझदार साथ हो।
घर के उस सन्नाटे में, जहाँ वंशिका बीमारी से लड़ रही थी, काया और भूपेंद्र के बीच एक अनकहा, अदृश्य बंधन और मज़बूत होता जा रहा था—पूरी तरह अनजाने में, लेकिन बेहद गहराई से।

रात के ग्यारह बज चुके थे। घर में एक भारी सन्नाटा पसरा था, जो केवल घड़ी की टिक-टिक से टूट रहा था। वंशिका अपने कमरे में दवा के असर से अधनींद और अधजगेपन की स्थिति में लेटी थी। बाहर हॉल में हल्की रोशनी जल रही थी। काया ने बच्चों को सुला दिया था और अब वह रसोई समेटने के बाद हॉल में रखे सोफे के कोने पर बैठी अपनी साड़ी का पल्लू सही कर रही थी।

भूपेंद्र वहीं पास की कुर्सी पर बैठे थे। आज उनके मन में एक अजीब सी हलचल थी। उन्होंने काया को दिन भर मशीन की तरह काम करते देखा था—बीमार पत्नी की सेवा, बच्चों का शोर और रसोई की जिम्मेदारी।

भूपेंद्र ने खामोशी तोड़ते हुए पूछा, "काया, एक बात बताओ... तुम्हारे अंदर इतना अपनापन, इतना धैर्य आता कहाँ से है? मैं देख रहा हूँ कि पिछले कुछ दिनों से वंशिका तुम्हें नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है। उसने रसोई बदल दी, तुम्हें बच्चों से दूर करने की कोशिश की, यहाँ तक कि आज भी उसने तुमसे ठीक से बात नहीं की। फिर भी तुम... तुम किसी सगे से भी बढ़कर उसकी सेवा कर रही हो। तुम्हें बुरा नहीं लगता?"

काया ने अपनी नज़रें झुका लीं और एक धीमी मुस्कान के साथ जवाब दिया, "साहब, बुरा मानकर किसका भला होगा? मैं इस घर को सिर्फ एक नौकरी की जगह नहीं मानती। दीदी बीमार हैं, तो मेरा धर्म है उनकी सेवा करना। रही बात नीचा दिखाने की, तो साहब, जो ऊँचा होता है उसे ही नीचे गिराने की कोशिश की जाती है। मैं तो वैसे भी जमीन से जुड़ी औरत हूँ, मुझे और नीचे कौन गिराएगा? और फिर, जब आप जैसा इंसान पीठ पर हाथ रखने वाला हो, तो दुनिया की कड़वाहट ज़हर नहीं लगती।"

भूपेंद्र उसकी इस सादगी और गहराई पर एक बार फिर मुग्ध हो गए। उन्हें लगा कि वंशिका के पास डिग्रियाँ तो बहुत हैं, पर जीवन की समझ काया के पास ज़्यादा है।
बात का रुख मोड़ने के लिए भूपेंद्र ने मज़ाक में कहा, "वैसे काया, तुम बातें तो बड़ी-बड़ी कर लेती हो, पर आज जो तुमने सूप बनाया था, उसमें नमक थोड़ा कम नहीं था? मुझे तो लगा शायद तुम दीदी की सेवा में अपना स्वाद ही भूल गई हो।"

काया ने तुरंत पलटवार किया, "अच्छा साहब! तो अब आपको नमक भी नाप-तोल कर चाहिए? जब मैं नहीं थी, तब तो आप उबला हुआ खाना भी अमृत समझकर खा रहे थे। अब मैं आ गई हूँ, तो हुजूर के नखरे फिर से सातवें आसमान पर पहुँच गए हैं।"

भूपेंद्र खिलखिलाकर हँसे, "अरे, वो तो मजबूरी का नाम महात्मा गांधी था। पर इसका मतलब ये तो नहीं कि तुम मुझे मरीज वाला खाना खिलाओगी। आखिर इस घर का असली मरीज कौन है, ये तो देख लिया करो!"

काया ने आँखें नचाते हुए कहा, "इस घर में मरीज तो सिर्फ दीदी हैं, पर नखरे आपके उनसे भी बड़े हैं। अगली बार अगर नमक कम लगे, तो खुद रसोई में आकर डाल लीजियेगा, मैं तो अब वही बनाऊँगी जो मुझे सही लगेगा। आखिर रसोई पर अब मेरा आधा हक़ तो वापस आ ही गया है।"

भूपेंद्र ने बराबरी से जवाब दिया, "आधा हक़? वाह! मतलब तुम अभी से बँटवारे की बात कर रही हो? याद रखना काया, इस घर का बजट आज भी मेरे हाथ में है। अगर मैंने राशन कम कर दिया, तो तुम्हारी ये स्वाद की सल्तनत एक दिन में ढह जाएगी।"

काया ने हंसते हुए जवाब दिया, "बजट आपके हाथ में होगा साहब, पर चाबी तो मेरे ही पास रहती है। और भूखे पेट तो आप दफ्तर की एक फाइल भी नहीं हिला पाएंगे। तो सोच लीजिये, पंगा किससे ले रहे हैं!"

दोनों के बीच यह हल्की-फुल्की, तंजभरी तकरार काफी देर तक चलती रही। वे एक-दूसरे को बराबरी से जवाब दे रहे थे, जैसे दो पुराने दोस्त हों। उनकी हंसी की आवाज़ें और बातचीत के अंश बंद दरवाजे के पार वंशिका के कानों तक पहुँच रहे थे।

वंशिका बिस्तर पर लेटी तिलमिला रही थी। बुखार की तपिश से ज़्यादा उसे यह बातचीत जला रही थी। उसे महसूस हो रहा था कि उसकी बीमारी ने काया को वह मौका दे दिया है जो वह बरसों की मेहनत से भी नहीं पा सकती थी। उसे लग रहा था कि उसका पति, जो कभी उसके साथ ऐसी बातें करता था, अब एक बाहरी औरत के साथ उस स्तर की आत्मीयता साझा कर रहा है।
'काया ने मेरे बच्चों को मुझसे दूर किया, मेरी रसोई छीनी और अब वह मेरे पति के मन में अपनी जगह पक्की कर रही है,' वंशिका ने दांत पीसते हुए सोचा।
उसने अंधेरे कमरे में छत की ओर देखते हुए एक ठोस निर्णय लेने का निश्चय किया। उसे समझ आ गया था कि अब केवल निर्देश देने से काम नहीं चलेगा। उसे इस जड़ को ही उखाड़ फेंकना होगा, चाहे इसके लिए उसे कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।

वंशिका ने खुद से वादा किया कि जैसे ही वह कल सुबह बिस्तर से उठेगी, वह इस घर के समीकरणों को हमेशा के लिए बदल देगी। उसकी कमजोरी अब उसके संकल्प में बदल रही थी।




क्रमशः

ज्योति प्रजापति 

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