काया के जाने के बाद घर की सूरत बदल गई थी, लेकिन वैसा कोहराम नहीं मचा जैसा भूपेंद्र ने सोचा था। वंशिका, जो अब तक आलस्य और सुविधा की आदी हो चुकी थी, उसने अपनी कमर कस ली थी। वह कोई कच्ची खिलाड़ी नहीं थी; शादी के शुरुआती सालों में उसने सास मनोरमा और अपनी मां के कठोर अनुशासन में रहकर घर चलाने की वह कला सीखी थी, जो किसी मैनेजमेंट स्कूल में नहीं सिखाई जाती।
वंशिका ने सुबह जल्दी उठकर बच्चों को तैयार किया, उनके टिफिन में उनकी पसंद का खाना रखा और घर को एक व्यवस्थित रूप दे दिया। वह एक कुशल गृहिणी थी, इसमें कोई दो राय नहीं थी। लेकिन समस्या घर संभालने की नहीं, समस्या भूपेंद्र की उस लापरवाही की थी जो पिछले डेढ़ साल में काया की अति-सक्रियता की वजह से पनप चुकी थी।
भूपेंद्र अब पूरी तरह से काया-निर्भर हो चुके थे। अपनी मोज़े की जोड़ी ढूँढना या अपनी घड़ी को सही जगह पर रखना उनके लिए अब किसी पहाड़ तोड़ने जैसा काम था।
"वंशिका! मेरी नीली फाइल कहाँ है? कल रात यहीं मेज पर रखी थी!" भूपेंद्र ऑफिस के लिए तैयार होते हुए चिल्लाए।
वंशिका रसोई से बाहर आई, हाथ पोंछते हुए बोली, "भूपेंद्र, कल रात तुमने उसे अलमारी के दराज में रखा था। ज़रा चेक तो करो।"
"चेक क्या करूँ? काया होती तो अब तक मेरे हाथ में थमा देती! तुम्हारी वजह से आज फिर मुझे ऑफिस के लिए देर हो रही है। पता नहीं तुम सुबह से करती क्या हो?" भूपेंद्र की आवाज़ में चिड़चिड़ाहट साफ थी।
वंशिका ने एक गहरी सांस ली। "मैं सुबह से बच्चों को तैयार कर रही हूँ, नाश्ता बनाया है, और घर समेटा है। मैं काया नहीं हूँ भूपेंद्र, मैं तुम्हारी पत्नी हूँ। अपनी चीज़ों की जिम्मेदारी थोड़ा खुद भी लेना सीखो।"
भूपेंद्र ने फाइल झपटते हुए ताना मारा, "पत्नी कम और जिम की मालकिन ज्यादा लगती हो। ये जिम-विम छोड़ क्यों नहीं देती? आखिर इतना ज़रूरी क्या है वहां जाना? घर बैठो, बच्चों को देखो। मैं कमा कर दे तो रहा हूँ, क्या कमी पड़ रही है तुम्हें?"
वंशिका की आँखों में चिंगारी भड़क उठी। उसने बेलन पटकते हुए कहा, "कमा कर दे रहे हो? भूपेंद्र, अपनी तीस हजार की सैलरी का हिसाब मुझे मत समझाओ। उस तीस में से हर महीने दस हजार तुम सीधे अपनी माँ के खाते में भेज देते हो। बाकी के बीस में घर का किराया, बच्चों की फीस और राशन कैसे पूरा होता है, कभी पूछा है तुमने? अगर मेरा जिम न हो, तो शायद महीने के आखिरी दस दिन हमें नमक-रोटी पर गुजारने पड़ें।"
भूपेंद्र का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। "क्यों नहीं भेजूँगा पैसे? माँ हैं वो मेरी! उन्होंने मुझे पाल-पोसकर बड़ा किया है। उनका हक़ है मेरे पैसों पर!"
"हक़ से मना नहीं कर रही हूँ, पर अपनी चादर तो देखो!" वंशिका ने पलटवार किया। "लेकिन तुम्हें तो बस काया की महानता दिखती है। आज तुम कह रहे हो कि काया जैसा ध्यान रखती है वैसा मैंने नहीं रखा? भूल गए वो दिन जब इसी घर में मैं सुबह से रात तक खटती थी और तुम सिर्फ गलतियाँ ढूँढते थे?"
भूपेंद्र ने जूता पहनते हुए आखिरी तीर छोड़ा, "सच तो यही है वंशिका कि मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं काया के लिए ही कमा कर ला रहा हूँ। कम से कम वह उस पैसे की कद्र तो करती है और मुझे वह सुकून देती है जो तुम कभी नहीं दे पाईं।"
भूपेंद्र बिना पीछे मुड़े घर से बाहर निकल गए, दरवाजा इतनी ज़ोर से बंद किया कि उसकी गूँज पूरे हॉल में सुनाई दी।
दफ्तर पहुँचकर भी भूपेंद्र का मन शांत नहीं था। लंच ब्रेक के समय उसके सहकर्मी मेज के चारों ओर बैठे अपनी पत्नियों की तारीफों के पुल बांध रहे थे।
"यार, कल मेरी एनिवर्सरी थी। पत्नी ने क्या शानदार दावत बनाई थी! सच में, घर की औरत अगर सलीकेदार हो तो बाहर की कोई परेशानी महसूस नहीं होती," खन्ना साहब अपनी मूंछों पर ताव देते हुए कह रहे थे।
भूपेंद्र चुपचाप अपना टिफिन देख रहा था। उसके दिमाग में फिर से तुलना का दौर शुरू हो गया। उसने सोचा कि काया कैसे बचत करती है। कैसे वह मामूली पैसों में भी घर का राशन ऐसे मैनेज करती थी कि कभी किसी चीज़ की कमी नहीं हुई। उसे याद आया कि जब पिछले महीने कुछ मेहमान आए थे, तो काया ने कितनी समझदारी से कम बजट में भी राजसी स्वागत किया था।
फिर अचानक उसे वंशिका का चेहरा याद आया। उसे ध्यान आया कि शादी के शुरुआती वर्षों में वंशिका भी तो यही सब करती थी। वह भी बचत करती थी, वह भी घर को स्वर्ग बनाकर रखती थी। लेकिन फिर उसके अहंकार ने करवट ली। उसे याद आया कि कैसे वंशिका ने उसकी माँ मनोरमा और बहन शिखा का अपमान किया था (जैसा कि उसे उसकी माँ और बहन ने बताया था)। उसे लगा कि वंशिका ने सिर्फ अपनी आजादी के लिए उसके परिवार को तोड़ा। उसने मन ही मन वंशिका के उस महत्व को फिर से दबा दिया। 'नहीं, वंशिका सिर्फ अपने बारे में सोचती है। काया अलग है। वह निस्वार्थ है,' उसने खुद को समझाया। उसने अपनी पत्नी के त्याग और उसकी मेहनत को फिर से काया की सेवा के नीचे दफन कर दिया। उसका
पुरुषोचित अहंकार उसे यह मानने की अनुमति नहीं दे रहा था कि वंशिका एक मजबूत और स्वावलंबी स्त्री है जो घर और बाहर दोनों संभाल रही है।
शाम को भूपेंद्र घर लौटा तो उसे लगा कि घर फिर से बिखरा होगा। लेकिन वंशिका ने सब कुछ चकाचक रखा था। उसने बच्चों को पढ़ाकर सुला दिया था और खुद अपनी डायरी में जिम का हिसाब लिख रही थी।
भूपेंद्र ने देखा कि घर तो सही सलामत है, पर वह अधिकार गायब है जो काया के समय उसे मिलता था। वंशिका उसे पानी देने तो आई, पर उसके चेहरे पर वह दासी वाला भाव नहीं था जो भूपेंद्र की ईगो को सहलाता था। वहां एक आत्मसम्मान वाली स्त्री थी जो अपना फर्ज पूरा कर रही थी, पर झुक नहीं रही थी।
भूपेंद्र को यह खामोशी और यह अनुशासन खलने लगा। उसे काया की कमी और भी खलने लगी—न केवल काम के लिए, बल्कि इसलिए भी क्योंकि काया के सामने वह खुद को मालिक महसूस करता था, जबकि वंशिका के सामने वह खुद को छोटा महसूस करने लगा था।
उसी रात भूपेंद्र ने चुपके से काया को मैसेज किया— "तुम्हारी बहुत कमी महसूस हो रही है। जल्दी वापस आ जाओ।"
वह नहीं जानता था कि यह मैसेज और उसकी यह बढ़ती हुई निर्भरता आने वाले समय में उसके वैवाहिक जीवन की नींव को पूरी तरह हिला देने वाली है। उधर गाँव में काया, जो अपनी माँ के अंतिम संस्कारों में व्यस्त थी, इस मैसेज को पढ़कर एक अजीब सी कशमकश में थी। उसे समझ आ रहा था कि उसकी अहमियत उस घर में अब एक कर्मचारी से कहीं ज्यादा हो चुकी है।
क्रमशः
ज्योति प्रजापति
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