Double Game - 11 in Hindi Women Focused by Jyoti Prajapati books and stories PDF | डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 11

Featured Books
  • Wisps of Smoke - 43

    Wisps of Smoke (A love, romantic, psychological and paranorm...

  • Topography of Bali

    The island of Bali, Indonesia can be small, yet its topograp...

  • World Teachers Day

    The Teacher: The Light of Knowledge, Character and Civilizat...

  • THE GHOST BIKE - PART 3

    PROLOGUE — 2017It was a rainy night in 2017.In a small town...

  • ak adhuri mulakat

    एक अधूरी मुलाकातशहर के एक छोटे से कॉलेज में आरव पढ़ाई करता थ...

Categories
Share

डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 11

अगली सुबह जब काया की नींद खुली, तो उसके मन में एक योजना थी कि वह बच्चों को जगाएगी, उन्हें नहलाएगी और वही पुराना मम्मा वाला स्थान फिर से घेर लेगी। लेकिन जैसे ही वह बच्चों के कमरे की ओर बढ़ी, उसने देखा कि वंशिका दीदी पहले ही वहां मौजूद थीं।
वंशिका ने पूरी तत्परता से विहान की शर्ट के बटन बंद किए और अवनी के बालों की चोटियाँ गूंथ रही थी। बच्चे चहक रहे थे और अपनी मम्मा से स्कूल की बातें कर रहे थे। काया दरवाजे पर ठिठक गई। उसने सोचा था कि बच्चे उसे देखते ही लिपट जाएंगे, काया-काया चिल्लाएंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। बच्चों ने बस उसे एक छोटी सी मुस्कान दी और फिर से वंशिका के साथ मग्न हो गए।

"काया, तुम जाओ और रसोई संभालो। नाश्ता और टिफिन तैयार करो। बच्चों को आज मैंने तैयार कर दिया है और आगे भी मैं ही करूँगी," वंशिका ने बिना पीछे मुड़े, बहुत ही शांत लेकिन अटल स्वर में कहा।

काया हैरान रह गई। उसके हाथों की उंगलियां अपनी साड़ी के पल्लू को मरोड़ने लगीं। वह चुपचाप रसोई में चली गई, लेकिन उसका दिमाग तेज़ी से चल रहा था। उसे समझ आ गया कि ये दस-पंद्रह दिन जो वह घर से दूर रही, उस बीच वंशिका दीदी ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। उन्होंने बच्चों के मन में जमी काया की छवि को धुंधला कर दिया था और अपनी ममता से उस खाली जगह को भर दिया था। काया को महसूस हुआ कि उसकी सत्ता का एक बड़ा किला ढह चुका है।

नाश्ता बनाने के बाद काया ने भारी मन से टिफिन पैक किए। वह इंतज़ार कर रही थी कि शायद वेन आने पर वह बच्चों को नीचे छोड़ने जाएगी, जैसा वह हमेशा करती थी। 
लेकिन वंशिका ने टिफिन उठाए और बच्चों का हाथ पकड़कर बाहर की ओर बढ़ गईं। "चलो बच्चों, वेन आ गई है। आज मम्मा तुम्हें बस तक छोड़ेंगी।"

काया रसोई की खिड़की से नीचे देखने लगी। उसे अपनी हार साफ दिख रही थी। वंशिका ने उसे केवल एक रसोइया की सीमा में बांध दिया था।
तभी बेडरूम से भूपेंद्र की दहाड़ सुनाई दी। "काया! अरे कहाँ मर गई काया? मेरी नीली वाली जुराबें नहीं मिल रही हैं!"

वंशिका ने आज सुबह ही भूपेंद्र की हर चीज़—रुमाल, मोज़े, बेल्ट और घड़ी—बिल्कुल उनकी आँखों के सामने मेज पर सजाकर रखी थी। भूपेंद्र को पता था कि सब कुछ सामने है, लेकिन वो वंशिका को नीचा दिखाने और काया के प्रति अपना पक्ष रखने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते थे। यह उनकी ओर से वंशिका के अनुशासन के खिलाफ एक मौन युद्ध था।

काया रसोई से भागती हुई आई। "आयी साहब! क्या हुआ?"

"देखो न काया, ये जुराबें... कहाँ रख दी हैं दीदी ने तुम्हारी? मुझे तो कुछ मिल ही नहीं रहा है," भूपेंद्र ने मेज पर रखी जुराबों की ओर इशारा करते हुए भी ऐसे अभिनय किया जैसे वह कुछ ढूँढ रहे हों।

काया ने झट से मेज से जुराबें उठाईं और साहब के पैरों के पास झुककर उन्हें थमाने लगी। "ये रही साहब, बिल्कुल आपके सामने तो रखी थीं।"

"अरे भाई, तुम्हारे हाथ से मिलने पर ही चीज़ें दिखती हैं मुझे। इस घर में अब सब कुछ इतना सिस्टम से हो गया है कि इंसान अपनी चीज़ें ही भूल जाए," भूपेंद्र ने ऊँची आवाज़ में कहा, ताकि रसोई की ओर लौटती वंशिका के कानों तक यह बात पहुँच जाए।

वंशिका हॉल में दाखिल हुई और उसने देखा कि कैसे भूपेंद्र जानबूझकर काया को काम पर लगा रहे हैं। उसने मेज की ओर इशारा करते हुए कहा, "भूपेंद्र, वो मोज़े कल रात से वहीं रखे थे। तुम्हें आवाज़ लगाने की ज़रूरत नहीं थी।"

भूपेंद्र ने वंशिका की ओर देखा भी नहीं। वे काया से बोले, "काया, ज़रा जूते पॉलिश कर देना। और हाँ, आज टिफिन में वो पुरानी वाली बात होनी चाहिए। पिछले दस दिनों का सारा बेस्वाद खाना आज भूलना चाहता हूँ मैं।"
वंशिका तिलमिला गई। उसे लगा जैसे उसकी मेहनत पर किसी ने कालिख पोत दी हो। उसने पिछले दस दिनों में अपनी नींद हराम करके घर संभाला था, और आज भूपेंद्र सबके सामने उसे एक असफल गृहिणी साबित करने पर तुले थे।

"भूपेंद्र, क्या तुम्हें वाकई लगता है कि पिछले दस दिनों में तुमने जो खाना खाया वो बेस्वाद था?" वंशिका की आवाज़ कांप रही थी।

भूपेंद्र ने अपना बैग उठाया और एक कुटिल मुस्कान के साथ कहा, "स्वाद सिर्फ मसालों में नहीं होता वंशिका, बनाने वाले के समर्पण में होता है। काया के हाथ में वो अपनापन है। तुम तो बस एक ज़िम्मेदारी समझकर काम करती हो। काया, तुम वाकई इस घर की जान हो।"

काया के चेहरे पर फिर से वही चहक लौट आई। साहब ने उसे वंशिका के सामने जो सम्मान दिया था, उसने उसके सारे घाव भर दिए। वह और भी उत्साह से भूपेंद्र के छोटे-छोटे काम करने लगी।

भूपेंद्र जाते-जाते एक और वार कर गए, "वंशिका, तुम बेकार में घर के नियम बदल रही हो। घर जैसा चल रहा था वैसा ही अच्छा था। काया को सिखाने की कोशिश मत करो, बल्कि उससे कुछ सीख लो।"

भूपेंद्र दफ्तर के लिए निकल गए। घर में अब भारी खामोशी थी। वंशिका हॉल के बीचों-बीच खड़ी थी, अपमान और गुस्से से उसकी आँखें लाल थीं। काया उसके बगल से रसोई की ओर जाने लगी, तो उसके चलने के अंदाज़ में एक नई ठसक थी।

वंशिका ने मन ही मन खुद को संभाला। उसने महसूस किया कि उसका पति उसे नीचा दिखाने के लिए एक बाहरी औरत का सहारा ले रहा है। उसने काया की ओर देखा, जो अब गुनगुनाते हुए बर्तन समेट रही थी।
'अभी नहीं काया,' वंशिका ने सोचा, 'अभी मेरी तबीयत ढीली है, इसलिए तुम खेल लो अपना खेल। पर याद रखना, ये घर मेरा है, और इस घर की मालकिन मैं ही रहूँगी।'
वंशिका ने एक लंबी सांस ली और अपनी दवा लेने के लिए मुड़ गई। उसे पता था कि असली लड़ाई अब शुरू हुई है।

पिछले कुछ दिनों के मानसिक तनाव और घर के भीतर चल रहे शीत युद्ध ने वंशिका के शरीर पर गहरा असर डाला था। शाम होते-होते उसका शरीर टूटने लगा और रात तक उसे इतना तेज़ बुखार चढ़ गया कि वह बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थी। उसकी आँखें जलन के मारे लाल थीं और माथा तवे की तरह तप रहा था।

अगली सुबह जब घर में काया-काया की रट शुरू हुई, तो वंशिका ने उठने की कोशिश की, लेकिन चक्कर खाकर वापस तकिए पर गिर पड़ी। काया ने जैसे ही कमरे में प्रवेश किया, उसने देखा कि दीदी की हालत वाकई खराब है।

काया के भीतर की ममता और सेवा भाव इस समय जाग उठा। उसने तुरंत ठंडे पानी की पट्टियां लीं और वंशिका के माथे पर रखने लगी। "दीदी, आप बिल्कुल चिंता मत कीजिये। मैं हूँ न, सब संभाल लूँगी। आप बस आराम कीजिये," काया ने बड़े ही कोमल स्वर में कहा।

वंशिका चाहकर भी विरोध नहीं कर पाई। उसकी चेतना धुंधली हो रही थी। उसने देखा कि काया कितनी तन्मयता से उसकी सेवा कर रही है। काया ने उसे दवा दी, उसके पैर दबाए और उसे सूप बनाकर पिलाया। ऊपरी तौर पर यह एक निस्वार्थ सेवा थी, लेकिन इस सेवा ने काया को एक बार फिर उस घर के केंद्र में ला खड़ा किया था।




क्रमशः

ज्योति प्रजापति 

सर्वाधिकार सुरक्षित