घुमक्कड़ी बंजारा मन की - 15

घुमक्कड़ी बंजारा मन की

(१५)

रानी रूपमती और बाजबहादुर का मांडू

माण्डू एक रूमानी अतीत से अब तक

दिल्ली की सुबह जब बारिश से शुरू होती है तो न जाने क्यों मुझे ” माण्डू” बहुत याद आता है । शायद इसलिए कि वहां की बारिश बहुत ही रूमानी थी। जहाजमहल से जब सब तरफ नजर जाती है तो हरियाली, धुंध और बारिश की खुशबू जैसे पूरे माहौल को आपके जहन में इस तरह बसा देती है कि हर बारिश में वही होने का भ्रम होता है । पर सच तो सच है कहाँ दिल्ली का शोर और कहां वह अतीत से लिपटा हुआ रूमानी माहौल।

इन्दौर से लगभग ९० किमी दूर विंध्य की पहाड़ियों में बसे हुए “माण्डू का नाम तेरहवीं शती में मालवा के सुलतानों ने “शादियाबाद “यानि “खुशियों का शहर” रख दिया था। वास्तव में यह नाम इस जगह को सार्थक करता है। यहां हरी-भरी वादियां, नर्मदा का किनारा यह सब मिलकर “माण्डू को मालवा का स्वर्ग बना देते हैं।

जहांगीर को माण्डू की रातें बेहद पसंद थीं। वह कई बार” माण्डू “आया । उसने जहाज महल को दुबारा से बनवाया । ऐसा वहां के गाइड ने बताया। सन 1617 में जहांगीर जब माण्डू आया तो नूरजहां उसके साथ थी और उसने जलमहल में एक लड़की को जन्म दिया। यहां पर बने अशरफी महल की कहानी भी बहुत रोचक है।

माण्डू “रानी रूपमती और बाजबहादुर” के अमर प्रेम के लिए भी याद किया जाता है । और वहां के रूमानी माहौल को देख कर लगता है कि आज भी वह प्रेम वहां मौजूद है । जहाज महल माण्डू की सबसे बड़ी पहचान है। चारों तरफ पानी से घिरे होने के कारण ऐसा लगता है जैसे हम किसी जहाज पर है । कहने को लोग मांडू को खंडहरों का गाँव भी कहते हैं परंतु इन खंडहरों के पत्थर भी बोलते हैं और सुनाते हैं हमें इतिहास की अमर कहानी । जो आज भी वहां के माहौल में गूंज रही है।

जो प्रमुख स्थान हमने वहां देखे वह हमें वहां इतिहास में रूबरू ले गए सबसे पहले हमने देखा जामा मस्जिद (जामी मस्जिद) : मांडू का मुख्य आकर्षण जामा मस्जिद है, इस विशाल मस्जिद का निर्माण कार्य होशंगशाह के शासनकाल में आरंभ किया गया था तथा महमूद प्रथम के शासनकाल में यह मस्जिद बनकर तैयार हुई थी। इस मस्जिद की गिनती मांडू की नायाब व शानदार इमारतों में की जाती है। यह भी कहा जाता है कि जामा मस्जिद डेमास्कस (सीरिया देश की राजधानी) की एक प्रसिद्ध मस्जिद का प्रतिरूप है। फिर हम पहुंचे अशरफी महल जामा मस्जिद के सामने ही अशरफी महल है। अशरफी का अर्थ होता है 'सोने के सिक्के'। इस महल का निर्माण होशंगशाह खिलजी के उत्तराधिकारी मोहम्मद खिलजी ने इस्लामिक भाषा के विद्यालय (मदरसा) के लिए किया था। यहाँ विद्धार्थियों के रहने के लिए कई कमरों का निर्माण भी किया गया था। जहाज महल के तो द्रश्य ने होश ही गुम कर देते हैं, मांडू को मालवा का कश्मीर भी कहा जाता है. यहाँ बने बाग़ बागीचे जैसे अपने आप में ही खो जाने पर मजबूर करते हैं, उसके बाद हमने देखा नीलकंठ महल मंदिर के समीप स्थित इस महल का निर्माण शाह बदगा खान ने अकबर की हिंदू पत्नी के लिए करवाया था। इसकी दीवारों पर अकबर कालीन कला के नमूने देखे जा सकते हैं। हाथी महल, दरिया खान की मजार, दाई का महल, दाई की छोटी बहन का महल, मलिक मघत की मस्जिद और जाली महल भी दर्शनीय हैं। यहाँ ईको पॉइंट पर पर्यटकों की भीड़ लगी ही रहती है। लोहानी गुफाएँ और उनके सामने स्थित सनसेट पॉइंट भी पर्यटकों को खींचता है।

हरियाली की खूबसूरत चादर ओढ़े हुए मांडू देशी विदेशी पर्यटकों के लिए विशेष तौर पर एक सुंदर पर्यटनस्थल है। वहां जा कर उस माहौल को आज भी महसूस कर सकते है जो रहा होगा । मांडू में प्रवेश के घुमावदार रास्तों के साथ ही मांडू के बारे में जानने की तथा इसकी खूबसूरत इमारतों को देखने की हमारी जिज्ञासा चरम तक पहुँच जाती है। यहाँ के विशाल इमली के पेड़ व मीठे सीताफलों से लदे पेड़ों को देखकर हमारे मुँह में पानी आना स्वभाविक है। यहाँ की कबीटनुमा स्पेशल इमली के स्वाद के चटखारे लिए बगैर भला कैसे हमारी मांडू यात्रा पूरी हो सकती है। आप भी यदि मांडू दर्शन को जा रहे हैं तो एक बार अवश्य यहाँ की इमली, सीताफल व कमलगट्टे का स्वाद चखिएगा।
जुलाई में इस जगह की सुंदरता इस क़दर आपको सम्मोहित कर लेती है कि मेरी तरह आज भी दिल्ली की बारिश में आप जहन से वहीं माण्डू घूम रहे होते है। ( 4 जुलाई 2016) #माण्डू डायरी से

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