माँमस् मैरिज - प्यार की उमंग - 9

माँमस् मैरिज - प्यार की उमंग

अध्याय - 9

"रूको रघु।" गणेशराम चतुर्वेदी ने रघु के कन्धे पर हाथ रखकर कहा।

"ये मेरी पेंशन के रूपये है। अपनी चालिस वर्ष की सेवा में मुझे एक भी दिन ऐसा याद नहीं आता जब मैं अपने विद्यालय विलंब से गया हूं या फिर अकारण ही छुट्टी ली हो। इन पांच हजार रूपयों को पचास हजार रुपये बनाना तुम्हारे परिश्रम पर निर्भर करता है।" रघु के मन पर गुरुजी ने अमिट छाप छोड़ दी थी।

राजाराम असावा अपनी बेटी को लेकर शेखर नगर बस्ती पहूंचे। जहां पानी का टेंकर आ चूका था। रहवासी टेंकर से पानी भर-भरकर अपने घरों में ले जा रहे थे। इतना ही नहीं नगरपालिका इंदौर के जलआपुर्ति विभाग के कर्मचारी बस्ती के मुख्य मार्ग पर जलबाधीत स्थान का फौरन पता लगाकर उस स्थान की खुदाई कर उसे दुरुस्त करने में जुट गये थे। सरकारी कार्य में इतनी चुस्ती-फुर्ती देखकर सौम्या आश्चर्यचकित थी।

असावा जी ने सौम्या को समझाते हुये कहा--"धन-दौलत से जो काम नहीं होते वो प्यार और सम्मान के साथ पुरे किये जा सकते है। गणेशराम चतुर्वेदी की छवी शहर में साफ-सुथरी और सम्मानिय है। उनके द्वारा पढ़ाये गये विद्यार्थी आज बडे-बडे पदों पर नौकरी कर रहे है। स्वयं एमएलए साहब गणेशराम चतुर्वेदी के भूतपूर्व छात्र रहे है। गणेशराम चतुर्वेदी के चेहरे पर संतोष का भाव रहता है। अपने बच्चों को भी उन्होंने ऐसे ही प्रभावी संस्कार दिये है। उन्हें स्वयं से अधिक बच्चों पर विश्वास है वे उनके नाम को कभी धूमिल नहीं करेंगे।

संजीव और सुगंधा से तुम भलीभांति परिचित हो। नवीन को तुमने आज आजमा ही लिया। बेटी ऐसे घर में कौन अपनी बेटी नहीं देना चाहेगा? तुम्हारे लिए मैंने गणेशराम चतुर्वेदी से बात की है। और उनके शुरुआती रूझान सकारात्मक ही है। ये तुम्हारे लिए एक अच्छा अवसर है। देर करने में तुम्हारा ही नुकसान है। नवीन जैसा व्यक्ति जो सुबह से शाम तक भुखा प्यासा रहकर सिर्फ मेरे कहने पर बिना कोई लोभ-लालच के वहां मेरी सालगिरह की तैयारी देखता रहा। सोच एक पत्नी के रूप में वह तुझे कितना खुश रखेगा? हमने जान-बूझकर तुम्हें वहीं घर में छोड़ा था ताकी तुम दोनों आपस में कुछ बातचीत करो। अपने गिले-शिकवे दुर करो। मगर तुम थी कि उसका दिल जितने के बजाय उसको परेशान करने में लगी रही।

सौम्या आत्मग्लानि से भर उठी। नवीन के प्रति उसने जो बर्ताव किया उसके लिए वह शर्मिंदगी अनुभव कर रही थी।

सौम्या के हृदय में नवीन प्रवेश कर चूका था। वह अपने झूठे घमण्ड को भूलकर नवीन से शादी करने के लिए तैयार हो गयी। मगर सौम्या के सम्मुख नवीन से माफी मांगना और उससे विवाह हेतु तैयार करना किसी चुनौती से कम नहीं लग रहा था। मन में कुछ निश्चित कर वह सीधे नवीन के मिलने उसके घर के लिए निकल पड़ी।

नवीन घर में अकेला था। शेष पारिवारिक सदस्य पार्टी के लिए निकल चूके थे। नवीन नहाकर रहा था। सौम्या ने द्वार से नवीन के घर में प्रवेश कर लिया। नवीन बाथरूम में था , पानी की आवाज सुनकर सौम्या ने अंदाजा लगा लिया था। नवीन अकेला था यह सोचकर सौम्या प्रसन्न थी। उसने सीधे नवीन के बाथरूम का दरवाजा खटखटाया-

ठकsss ठक sss ठकsss

" कौन है?"

ठकsss ठक sss ठकsss

सौम्या ने दोबारा आनंद के उद्देश्य से दरवाजा खटखटाया।

"अरे भई, नहा रहा हूं! कौन है?" नवीन ने चिढ़ते हुये कहा।

"मैं हूं सौम्या।" सौम्या ने जवाब दिया।

नवीन हतप्रद था।

"कहिये क्या काम है?" नवीन बोला।

"पहले बाहर तो आइये।" सौम्या ने जवाब दिया।

"मुझे थोड़ा समय लगेगा, आप हाॅल में जाकर बैठिये।" नवीन ने कहा।

"नहीं मेरे पास बैठने का समय नहीं है। आप बाहर आओ नहीं तो मुझे अन्दर बुलाओ।" सौम्या बोली।

"क्या पागलों जैसी बातें कर रही हो सौम्या।" नवीन जल्दी-जल्दी शरीर पर साबुन मल रहा था। उसे सौम्या के जिद्दी स्वभाव का पता था और उपर से बाथरूम के दरवाजे की अन्दर की ओर से लगाने वाले हेन्डल टुटा था। थोड़ा जोर से धक्का देने पर द्वार खुल सकता था।

हुआ भी वही। सौम्या ने धैर्य खोकर द्वार पर हाथों से धक्का मारा। द्वार खुल चूका था। नवीन बाल्टी में भरे पानी से लौटे से जल्दी-जल्दी पानी स्वयं पर उड़ेल रहा था। सौम्या द्वारा धक्के बाथरूम का दरवाजा खोलने पर असहज हो गया। वह द्वार बंद करने दौड़ा। इससे पुर्व ही सौम्या ने बाथरूम के बाहर रखी एक अन्य लोहे की खाली गोल कोठी बाथरूम के द्वार पर अडा दी। जिससे की नवीन के बहुत जोर लगाने पर भी बाथरूम का दरवाजा बन्द नहीं हो पा रहा था। सौम्या भी बाहर से द्वार को अन्दर की तरफ धक्का दे रही थी।

"ये क्या पागलपन से सौम्या।" नवीन गुस्से में बोला।

"प्यार में लोग पागल ही हो जाते है। जैसे की मैं तुम्हारे प्यार में हो गयी हूं।" सौम्या बोली।

"प्यार और तुमसे हूंममम? शक्ल देखी है अपनी?" नवीन फिर बोला।

"हां अपनी शक्ल तो रोज देखती हूं। लेकिन आज तुम्हारा सबकुछ देखकर ही रहूंगी।" सौम्या जोर लगा रही थी।

जब सौम्या नहीं मानी तब नवीन ने गेट छोड़ दिया।

द्वार छोड़ते ही सौम्या झटके से बाथरूम के अन्दर पहूंच गई। वह नवीन से लिपट चूंकी थी। नवीन ने नहाने वाले पानी का शाॅवर खोल दिया। सौम्या पूरी तरह से भीग चूकी थी। उसकी शरारत उसे ही भारी पड़ गई थी। नवीन ने सौम्या को बांहों में जकड़ लिया था।

"मूझे माफ कर दो नवीन। आई लव यू।" सौम्या की आंखे बंद थी। वह अभी-भी नवीन सीने के चिपकी थी।

"आई लव यू टू।" नवीन ने कहा।

सौम्या की खुशी का ठिकाना नहीं था।

सीमा सुबह-सुबह तैयार होकर ऑफिस पहुंच गई। सीमा की खिलखिलाहट और फिल्मी गीत गुनगुनाने से तनु और बबिता को सुबह नाश्ते की टेबल पर यह आभास हो ही गया था कि मनोज जी के कारण आज उनकीमाँम का मुड बहुत ही अच्छा है। मनोज जी धीरे-धीरे उनके हृदय में जगह बनाते जा रहे थे। चाय- नाश्ता कर सीमा खिलखिलाते हुए ऑफिस की ओर निकल पड़ी। ऑफिस में सीमा का पहला सामना कन्हैया शर्मा से हुआ।

"कन्हैया जी!" सीमा ने कन्हैया शर्मा जिस स्थान पर बैठकर काम करते है, वही टेबल पर उनके सम्मुख झुककर प्यार से कहा।

"हां जी सीमा जी।" सीमा से सदैव उपेक्षित होने वाले शर्मा जी ने अधीर होकर कहा।

"कन्हैया जी, आप कितनी प्यार से मुझे चुपके-चुपके देखते रहते है?" सीमा ने इठलाते हुये कहा।

"मssमssमतलब?" शर्मा जी की चोरी पकड़ी गई थी। "मैंने आपको कब देखा?" शर्मा जी का गला सुख गया था। ऑफिस स्टाफ जो देख रहा था।

"कन्हैया जी। अब अनजान बनने का ढोंग तो न करिये। मैं सब जानती हूं। आप छिप-छिप कर मुझे देख ठण्डी-ठण्डी आंहे भी भरते है। चलिए मैं आपकी मदद करती हूं। लिजिए मुझे अच्छे से, जी भरकर देख लिजिये।" ऐसा कहकर सीमा अपनी दोनों बाहें खोल दी। वह चारों ओर घूम-घूम कर स्वयं का प्रदर्शन करने लगी। ऑफिस के अन्य सहकर्मी सीमा के इस व्यवहार पर टकी-टकी लगाये उसे देखते हुये जड़ हो गये। उन्हें शर्मा जी के हावं-भाव देखकर हंसी आ रही थी।

कन्हैया शर्मा झेप गये। वे उठकर वहां से यह कहते हुये चल दिये की 'उन्हें बाॅस ने बुलाया है।' कन्हैया शर्मा को शिक्षा मिल गई थी। ऑफिस की अन्य महिला सहकर्मीयों ने सीमा के इस कदम को उचित ठहराया। अधेड़ उम्र के कन्हैया शर्मा के मनचले स्वभाव से ऑफिस की अधिकांश महिला कर्मचारी परेशान थी। सीमा के सबक़ सिखाने के बाद कन्हैया शर्मा ने फिर कभी ऑफिस की महिलाओं को तंग नहीं किया।

सीमा यह जान चुकी थी की इस जीत में मनोज का दिया मनोबल ही है जिसने उसमें आत्मविश्वास पैदा किया। और अपने सम्मान के लिए लड़ जाने की प्रवृत्ति को जन्म दिया। आत्मसम्मान से जीने की प्रवृत्ति का विकास भी सीमा के अन्दर हो चूका था।

उसने यह घटना मनोज को फोन पर बताई। मनोज ने सीमा की प्रशंसा करते हुये उसे ऐसे ही नि:सकोंची स्वभाव को आत्मसात करने की सलाह दी।

सीमा के द्वारा उपहार में मिले ब्लेक शुट को पहनकर मनोज ने सीमा को दक्षिण भारतीय गोल्डन रंग की गोटेदार चमचमाती सफेद रंग की साड़ी भेंट की।

सीमा आज पहली बार मनोज के घर आई थी। वहीं साड़ी पहनकर। दोपहर का समय था। श्लोक स्कूल मे था और मनोज की मां तीर्थ यात्रा पर गई हुई थी। नौकर-चाकर भी आराम कर रहे थे।

"सीमा! मुझे तुम्हें कुछ अपने बारे में बताना है!" सोफे पर आकर बैठी सीमा के हाथों पर अपना हाथ रखते हुये सामने की ओर बैठे मनोज ने कहा।

"मैं जितना आपके बारे में जान चूकी हूं उससे अधिक जानने की अब मेरी इच्छा नहीं है मनोज!" सीमा ने मनोज के हृदय पर अपना सिर रख दिया।

"नहीं सीमा! ये तुम्हारा मुझ अमिट विश्वास बोल रहा है। तुम्हें मुझ पर इतना भरोसा है तो मेरा भी कर्तव्य बनता है कि अपना बड्डपन दिखाकर तुम्हें वो सबकुछ बता दूं जो तुम्हें पता नहीं है।" अपने दोनों हाथों से सीमा के कन्धों को स्वयं से दुर धकेलते हुये मनोज ने कहा।

सीमा को आभास हो गया था कि अवश्य ही कुछ महत्वपूर्ण बात है जिसे सुनाने के लिए मनोज अधीर हो रहा था। मनोज, सीमा का हाथ पकड़कर उसे अपनी पहली पत्नी की तस्वीर के सामने ले गया।

मनोज ने कहना शुरू किया - " सीमा, ये मेरी पहली पत्नी रत्ना की तस्वीर है।"

दीवार पर टंगी फोटो को सीमा ध्यान से देख रही थी।

"ये तो बहुत सुन्दर है।" सीमा ने आश्चर्य प्रकट किया।

"हां शायद इसी सुन्दरता के वशीकरण ने मुझे रत्ना से प्रेम विवाह करने पर विवश कर दिया था। मेरे पिताजी सुर्यभान ठाकुर इस रिश्ते से प्रसन्न नहीं थे। दोनों भाई भी पिताजी के स्वर में स्वर मिला रहे थे। केवल मां ही थी जिन्होंने मेरी इच्छा को ने केवल मान दिया अपितु घरवालों से रत्ना को स्वीकार करने के लिए तैयार भी कर लिया।

सबकुछ अच्छा चल रहा था। किन्तु एक दिन रत्ना ने पिताजी पर जबर्दस्ती यौन शोषण का आरोप लगाकर पुरे घर में अशांति फैला दी। पिताजी का शहर में एक जाना-पहचाना नाम था। व्यापार और व्यवसाय के बहुत से प्रतिष्ठान के वे अध्यक्ष थे। उनकी दयालू प्रवृत्ति और सहयोगी व्यवहार से बहुत सी चैरिटी संस्थाएं आर्थिक रूप से लाभान्वित हुआ करती थी। शासन-प्रशासन में भी उनकी जहरी पैठ थी। उनकी लोकप्रियता के कारण उन्हें देश की सबसे बड़ी राजनितिक पार्टी भाजपा से एमपी के शहर इंदौर से चुनाव लड़ने का निमंत्रण आया था। लेकिन राजनिति नहीं करना उनका शुरू से ही संकल्प था। रत्ना के इस कृत्य पर पिताजी को गहरा सदमा लगा। हार्ट अटैक में उनकी मृत्यु हो गयी। परिवार में हम रत्ना की झगड़ालू और हिंसक प्रवृत्ति का कारण नहीं जान पा रहे थे। छोटे-मोटे घरेलू झगड़ो पर भी रत्ना सौ नम्बर डायल कर घर में पुलिस बुला लिया करती थी। दोनों भाई रत्ना के व्यवहार से भयभीत होकर विदेश जाकर सेटल हो गये। मां, श्लोक और मैं रत्ना की दादागिरी अब भी झेल रहे थे। मैंने कई मर्तबा उसके असंतोष का कारण जानना चाहा किन्तु शादी के बाद उसने मुझसे कभी सीधे मुंह बात तक नहीं की।" कहते हुये मनोज उस खिड़की के पास आ गया जहां से मुख्य सड़क साफ-साफ देखी जा सकती थी। सड़क किनारे बड़ी-बड़ी बिल्डिंग आकाश छूने को लालायित नज़र आ रही थी। सड़क पर मोटर गाड़ियों की परस्पर प्रतिस्पर्धा साफ-साफ देखी जा सकती थी।

"फिर क्या हुआ।" पीछे से आकर मनोज के कन्धे पर अपना हाथ रखते हुये सीमा ने पुछा।

मनोज ने पलटकर जवाब दिया --

"हुआ वही जो रत्ना चाहती थी। उसने अपनी सास को कभी सास नहीं माना। न ही श्लोक के प्रति कभी ममता दिखाई। श्लोक का लालन-पालन मेरी मां और मैने ही किया। रत्ना को अपनी किटी पार्टीज और महिला मण्डल से फुर्सत नहीं थी। विवाहित होकर भी वह अविवाहित दिखाई देना चाहती थी। साड़ी उसने कभी पहनी ही नहीं। रोका-टोकी पर हजार बातें मां को और मुझे ऐसे सुनाती थी जैसे कि हम कोई बाहर के लोग है। और वह इस घर की मालकिन है। रूपये पानी की तरह बहाने वाली रत्ना पर एक दिन मेरा हाथ विवश होकर उठ ही गया। उसने मेरी मां को गला दबाकर जान से मारने की कोशिश की थी। उसका आरोप था कि मां मुझे रत्ना के खिलाफ भड़काती है। जबकि मां ने उसे और मुझे मिलकर रहने की सलाह के अलावा कभी कोई गल़त बातें नहीं की। मेरी मां भी कमजोर नहीं थी। घर में नौकर-चाकर होने पर भी सत्तर की आयु में भी वह अपना अधिकांश काम शुरू से वही करती है।

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