शाम के करीब छह बजे थे। बाहर बारिश की हल्की फुहारें खिड़की के शीशों से टकराकर नीचे फिसल रही थीं। सड़कों से उठती गीली मिट्टी की सोंधी खुशबू बंद कमरों की उदासी को भेदकर अंदर तक महक रही थी।
राघव अपने पुश्तैनी घर की पुरानी सागौन की अलमारी खाली कर रहा था। यह वही घर था जहां उसने अपने जीवन के सुनहरे दिन बिताए थे, लेकिन अगले हफ्ते से यह चाबी किसी अनजान परिवार के हाथ में होने वाली थी। हर बक्सा, हर कोना अतीत की किसी न किसी परत को खोल रहा था। धूल जमी किताबों को एक गत्ते के डिब्बे में रखते हुए, सबसे नीचे दबी एक गहरे लाल रंग की मखमली डायरी फर्श पर गिर पड़ी।
पन्ने वक्त की मार से पीले और थोड़े भुरभुरे हो चुके थे, लेकिन उनकी जिल्द में आज भी वही पुरानी, पहचानी सी खुशबू थी—सूखे गुलाब और चंदन की। राघव ने जैसे ही कांपती उंगलियों से पहला पन्ना पलटा, पन्नों की तह में छुपी एक गोल, चमकदार नीली कांच की चूड़ी फिसलकर संगमरमर के फर्श पर हल्की खनक के साथ नाचती हुई रुक गई।
उस खनक ने कमरे के सन्नाटे को चीर दिया। राघव का हाथ हवा में ही जम गया। धड़कनें अचानक तेज हो गईं और यादों का एक पूरा बवंडर उसे पंद्रह साल पीछे ले गया।
वह कॉलेज का दौर था—साल 2011।
राघव स्वभाव से बेहद संकोची, किताबों और फॉर्मूलों में उलझा रहने वाला लड़का था। दुनिया के शोर से दूर, अपनी ही एक शांत दुनिया में जीने वाला। और अवनी? अवनी बिल्कुल इसके उलट थी। पूरी दुनिया की चंचलता, रौशनी और बेपरवाह हंसी जैसे उसी के भीतर समाई हुई थी। वह जब हंसती थी, तो ऐसा लगता था मानो किसी वीराने में अचानक बारिश हो गई हो।
दोनों के दिन लाइब्रेरी की उसी पुरानी लकड़ी की खिड़की के इर्द-गिर्द बीतते थे, जहां बाहर लगे गुलमोहर के लाल फूल खिड़की की चौखट पर आ गिरते थे। अवनी जब भी लाइब्रेरी में आती, राघव की गंभीर किताबों पर अपनी हथेलियां रख देती। "इतना भी क्या डूबना राघव? कभी इस खिड़की से बाहर उड़ती चिड़ियों को भी देख लिया करो।" राघव खीझने का नाटक करता, पर सच तो यह था कि किताबों के अक्षरों से ज़्यादा उसका ध्यान अवनी की उंगलियों की हरकतों और उसकी बातों की खनक पर रहता था।
वे दोपहरें बहुत सुहानी थीं। कभी कैंटीन की ठंडी पड़ चुकी चाय को घंटों चम्मच से घुमाते रहना, तो कभी कॉलेज की पुरानी सीढ़ियों पर बैठकर समोसे के दो टुकड़े आपस में बांटना। एक शाम कॉलेज का सालाना जलसा खत्म होने के बाद जब पूरा कैंपस खाली हो चुका था, दोनों ऑडिटोरियम के पीछे वाले खाली मैदान में रात घिरने तक बैठे रहे थे। हल्की ठंडी हवा चल रही थी। अवनी ने अपनी हथेलियों को रगड़ते हुए राघव की जैकेट की आस्तीन को पकड़ लिया था। उसने आसमान में चमकते तारों की तरफ देखकर कहा था, "राघव, अगर हम कभी खो गए तो? अगर ये रास्ते हमें किसी ऐसी जगह ले गए जहां से लौटना मुमकिन न हो?"
राघव ने तब पहली बार उसका हाथ अपने हाथ में लिया था। उसकी उंगलियां बर्फ जैसी ठंडी थीं। "रास्ते चाहे जहां भी ले जाएं अवनी, कुछ लोग नक्शों के मोहताज नहीं होते। तुम आंखें बंद करोगी, तो मैं वहीं मिलूंगा।" अवनी ने मुस्कुराते हुए अपना सिर उसके कंधे पर टिका दिया था, और वह पूरी शाम उन दोनों के बीच बिना किसी शब्द के, बस एक-दूसरे की सांसों की आहट सुनते हुए बीत गई थी। कभी-कभी घंटों तक उनके बीच कोई बातचीत नहीं होती थी, लेकिन वह खामोशी भी इतनी भरी-पूरी होती थी कि उसमें किसी लफ्ज़ की गुंजाइश ही नहीं बचती थी।
फेयरवेल से ठीक दस दिन पहले, बारिश की एक ऐसी ही शाम को दोनों पुराने बाज़ार की संकरी गलियों से गुज़र रहे थे। कचौड़ियों की महक और भीगे छतों से टपकता पानी चारों तरफ बिखरा था। एक मोड़ पर एक बूढ़ा आदमी ठेले पर लालटेन की पीली रौशनी में रंग-बिरंगी कांच की चूड़ियां बेच रहा था।
अवनी अचानक रुक गई। उसकी नज़रें गहरे नीले रंग की, सादी कांच की चूड़ियों पर ठहर गईं। उसने मुड़कर राघव की तरफ देखा। उसकी आंखों में बच्चों जैसी चमक थी।
"राघव, कभी जब बहुत बड़े इंसान बन जाओगे, बड़े-बड़े शहरों में रहने लगोगे... तब भी याद रखोगे मुझे? या बाकी सब की तरह भूल जाओगे?" उसने हंसते हुए पूछा था, लेकिन उसकी आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था।
राघव के सीने में कुछ चुभ गया था। उसने अपनी जेब टटोली। उस वक़्त उसके पुराने काले पर्स में कुल जमा बाइस रुपये थे—एक मुड़ा-तुड़ा बीस का नोट और दो सिक्के। उसने बिना कुछ सोचे उस ठेले वाले की ओर हाथ बढ़ाया और दो रुपये की एक नीली चूड़ी खरीद ली।
उसने अवनी का हाथ पकड़ा। राघव ने वह नीली चूड़ी उसकी हथेली पर रख दी और अपनी दोनों हथेलियों से उसके हाथ को ढांप लिया।
"मैं बहुत बड़ा इंसान बनूंगा या नहीं, यह तो वक्त तय करेगा अवनी। लेकिन यह नीला रंग मुझे हमेशा याद दिलाएगा कि जब मेरे पास खोने या पाने के लिए कुछ भी नहीं था, तब मेरे पास तुम थीं। और जो उस वक्त साथ होता है, वो कभी भूला नहीं जाता।"
अवनी ने कुछ नहीं कहा। उसकी पलकों के कोर पर आंसू की एक बूंद चमकी और सीधे उस नीली चूड़ी पर टपक गई। उसने होंठ भींचे और मुस्कुरा दी—एक ऐसी मुस्कान, जो राघव के दिल के सबसे महफूज़ कोने में हमेशा के लिए तराशी गई थी।
फिर जिंदगी ने अपनी चाल चली। कॉलेज खत्म हुआ और हकीकत की कड़वी धूप ने सारे ख्वाबों को झुलसा दिया। राघव को परिवार की जिम्मेदारियों ने जकड़ लिया, नौकरियों की भागदौड़ शुरू हुई। अवनी के परिवार के अपने कायदे थे, अपनी बंदिशें थीं। कोई बड़ा झगड़ा नहीं हुआ, कोई जुदाई का खत नहीं लिखा गया, न ही किसी ने बेवफाई की। बस वक्त, दूरियों और मजबूरियों ने चुपचाप दोनों के दरमियान एक लंबी, अंधी दीवार खड़ी कर दी। मोबाइल नंबर बदल गए, शहर बदल गए और धीरे-धीरे रोज की बातें हफ्तों, महीनों और फिर सालों के सन्नाटे में बदल गईं। दोनों अपनी-अपनी जिंदगी के बहाव में बहते चले गए।
कमरे की दीवार घड़ी ने टिक-टिक करते हुए सात बजाए, तो राघव वर्तमान में लौटा।
उसने झुककर फर्श से वह नीली चूड़ी उठाई। कांच पर उंगलियां फेरते हुए उसने महसूस किया कि वक्त ने भले ही सब कुछ छीन लिया हो, लेकिन इस कांच के टुकड़े की ठंडक आज भी वही थी। उसने गहरी सांस ली, डायरी को सीने से लगाया और चूड़ी को बहुत हिफाजत से अपनी जैकेट की अंदरूनी जेब में रख लिया। दिल के किसी कोने में एक हल्की सी टीस उठी—काश, जिंदगी के इस लंबे सफर में बस एक बार यह जान पाता कि अवनी ठीक तो है? क्या वो खुश है?
अगली सुबह स्टेशन का माहौल रोज की तरह कोलाहल भरा था। राघव को शहर छोड़ने से पहले अपनी ट्रेन पकड़नी थी। प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर चाय की एक पुरानी टपरी से कुल्हड़ की चाय का धुआं उठ रहा था। ट्रेन आने में अभी आधा घंटा बाकी था। राघव हाथ में कुल्हड़ लिए एक सीमेंट की बेंच के पास खड़ा था।
तभी ठीक सामने वाली बेंच पर बैठी लगभग छह-सात साल की एक छोटी बच्ची सुबकने लगी। उसके हाथ से एक लाल गैस वाला गुब्बारा छूटकर स्टेशन की ऊंची टिन की छत से जा चिपका था। वह रोते हुए अपनी मां का पल्लू खींच रही थी।
राघव का दिल पसीज गया। वह हमेशा अपने पास बच्चों के लिए कुछ टॉफियां रखता था। उसने मुस्कुराते हुए अपनी जैकेट की अंदरूनी जेब में हाथ डाला ताकि एक चॉकलेट निकाल सके। लेकिन जल्दबाजी में, चॉकलेट के साथ ही वह नीली कांच की चूड़ी भी उंगलियों में फंसकर बाहर आ गई और संगमरमर की बेंच पर गिरकर 'ठन' से खनक उठी।
बच्ची की मां, जो फोन पर किसी से टिकट को लेकर उलझी हुई थी, उस खनक को सुनकर चौंककर पलटी।
"अरे बेटा, रुको... किसी का सामान गिर..."
वाक्य बीच में ही टूट गया।
सामने अवनी खड़ी थी।
वक्त ने चेहरे पर महीन लकीरें खींच दी थीं, आंखों के नीचे हल्की सी थकान की छाया थी, और कानों के पास के कुछ बाल चांदी की तरह चमक रहे थे। लेकिन वे आंखें... वे वही पुरानी, अथांग और गहरी आंखें थीं, जो लाइब्रेरी की खिड़की पर बैठा करती थीं।
स्टेशन का सारा शोर—कुलियों की पुकार, उद्घोषणा की गूंज, पटरियों पर दौड़ती मालगाड़ी की आवाज—अचानक जैसे किसी म्यूट बटन से बंद हो गई। पूरी कायनात उस एक लम्हे में सिमट गई। पंद्रह साल की लंबी, थका देने वाली खामोशी उन दोनों की आंखों में तैरने लगी। न राघव के मुंह से कोई शब्द निकला, न अवनी कुछ बोल पाई।
अवनी की नज़र धीरे से बेंच पर पड़ी उस नीली चूड़ी पर गई। उसकी सांसें जैसे थम गईं। उसने धीरे-धीरे कदम बढ़ाए और झुककर उस चूड़ी को उठाया। उसकी उंगलियां बुरी तरह कांप रही थीं। उसने उस चूड़ी को अपनी आंखों के करीब लाकर देखा, जैसे यकीन करना चाह रही हो कि यह कोई वहम तो नहीं।
फिर उसने अपनी दाईं कलाई की तरफ देखा। उसकी कलाई में सोने के दो भारी कंगन थे—जिम्मेदारी, गृहस्थी और एक सलीकेदार जीवन के प्रतीक। उसने एक पल के लिए राघव की आंखों में देखा, और फिर बिना एक पल गंवाए, उन सोने के कंगनों को थोड़ा पीछे सरकाया। उसने उस नीली, दो रुपये की सादी कांच की चूड़ी को अपनी कलाई में चढ़ा लिया। पंद्रह साल बाद भी, वह चूड़ी उसकी कलाई में बिना किसी रुकावट के एकदम सही बैठ गई—जैसे वह बनी ही उसी कलाई के लिए थी।
अवनी ने अपना चेहरा उठाया। उसकी बड़ी-बड़ी आंखों से आंसू बहकर गालों पर ढुलक आए थे, लेकिन उसके कांपते होंठों पर वही पंद्रह साल पुरानी, निश्चल मुस्कान खिल उठी थी।
"तुमने इसे... इतने सालों तक संभाल कर रखा था?" अवनी की आवाज़ इतनी धीमी थी कि शायद हवा भी उसे न सुन पाती, लेकिन राघव के सीने में वह किसी मंदिर के घंटे की तरह गूंज गई।
राघव ने अपनी भीगी पलकों को झुकाकर मुस्कुराने की कोशिश की।
"कुछ चीज़ें कभी पुरानी नहीं होतीं अवनी... और कुछ लोग कभी दिल से रुखसत नहीं होते।"
तभी प्लेटफॉर्म पर ट्रेन का भारी हॉर्न गूंजा। धूल उड़ाती हुई लोहे की बोगी धीमी गति से राघव के सामने आकर रुकने लगी। सफर का वक्त हो चुका था। जिंदगी उन्हें एक बार फिर अलग-अलग पटरियों पर ले जाने के लिए तैयार खड़ी थी।
दोनों अच्छी तरह जानते थे कि वे अब उस मोड़ पर हैं जहां से पीछे नहीं लौटा जा सकता। दोनों की अपनी-अपनी जिम्मेदारियां थीं, अपने-अपने संसार थे। लेकिन उन चंद पलों ने उनके सीने पर पंद्रह सालों से लदे भारी बोझ को हमेशा के लिए उतार फेंका था। न कोई शिकायत बची थी, न कोई अधूरापन; जो कहानी सालों से अधूरी छूट गई थी, वह बिना किसी वादे के ही आज मुकम्मल हो चुकी थी।
राघव ने अपना भारी बैग कंधे पर संभाला। उसने झुककर उस छोटी बच्ची के हाथ में चॉकलेट थमाई, अवनी की तरफ देखा और सिर्फ एक बार धीरे से सिर हिलाया।
अवनी ने भी आंसुओं के बीच मुस्कुराते हुए विदाई दी। उसकी कलाई में सोने के कंगनों के बीच वह नीली कांच की चूड़ी सबसे अलग चमक रही थी।
ट्रेन ने धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ी। खिड़की से बाहर देखते हुए राघव के चेहरे पर एक गहरा, असीम सुकून था। उसे समझ आ चुका था कि प्यार का मतलब हमेशा साथ पाना या हासिल करना ही नहीं होता; कभी-कभी किसी को अपनी यादों में पूरी पाकीज़गी के साथ जिंदा रखना ही जिंदगी की सबसे खूबसूरत इबादत होती है।