शारदा देवी अस्सी साल की थीं, पर उनकी कमर आज भी सीधी थी और आवाज में वही रौब था जो चालीस साल पहले हुआ करता था। गली-मोहल्ले की औरतें उन्हें देखकर फुसफुसातीं, "शारदा देवी बेटों की माँ कम, उनकी किस्मत की जेलर ज्यादा हैं।"
उनके दो बेटे थे। बड़ा सुरेश, पैंतालीस साल का। पढ़ाई में मन न लगा, दसवीं में दो बार फेल हुआ और अब बाजार में एक छोटी सी मोबाइल रिपेयर की दुकान पर नौकरी करता था। चेहरा भोला, स्वभाव नरम। छोटा नरेश, चालीस साल का। उसने शहर के ही किसी प्राइवेट कॉलेज से जैसे-तैसे एमटेक कर लिया था और तब से खुद को बहुत बड़ा इंजीनियर समझता था। बात-बात में अंग्रेजी झाड़ता, पर नौकरी एक साधारण सी प्राइवेट कंपनी में थी, जहाँ हर छह महीने में उसे नौकरी जाने का डर सताता रहता।
दोनों ही कुंवारे थे। यह इस सदी का सबसे बड़ा आश्चर्य था। ऐसा नहीं था कि रिश्ते नहीं आए। रिश्ते आए, बहुत आए। शुरू-शुरू में तो रिश्तेदार बड़े उत्साह से आते। कोई अपनी जान-पहचान की लड़की बताता, कोई फोटो दिखाता। शारदा देवी सबको बड़े प्रेम से बिठातीं, चाय पिलातीं, फोटो को उलट-पलट कर देखतीं और फिर एक-एक करके खामियां गिनाने लगतीं।
"लड़की की नाक थोड़ी मोटी है।" "रंग जरा दबा हुआ है, हमारे खानदान में नहीं जचेगी।" "यह तो नौकरी करती है, फिर घर कौन संभालेगा? शाम को थकी-हारी आएगी, मेरी सेवा कौन करेगा?" "यह तो बहुत ज्यादा पढ़ी-लिखी है, एम.ए. किया है। ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़कियां जुबान चलाती हैं।"
धीरे-धीरे रिश्तेदारों ने आना बंद कर दिया। उन्हें समझ आ गया था कि कमी लड़कियों में नहीं, शारदा देवी की सोच में है।
शारदा देवी को दरअसल बहू नहीं चाहिए थी। उन्हें एक ऐसी लड़की चाहिए थी जो एक साथ पांच रूप धर सके। वह सुंदर भी हो, ताकि मोहल्ले में शान बढ़े। वह पतली भी हो, ताकि पुराने जमाने के गहने-कपड़े उस पर जचें। वह गृहकार्य में दक्ष भी हो, ताकि सुबह चार बजे उठकर चौका-चूल्हा संभाल ले। वह अच्छा दहेज भी लाए, ताकि बेटे की नाकामी का घाटा पूरा हो जाए। वह उम्र में बहुत छोटी भी हो, ताकि उसे आसानी से दबाया जा सके। और सबसे बड़ी शर्त, वह गूंगी हो। यानी शारदा देवी के सामने कभी मुंह न खोले, कभी सवाल न पूछे, बस सिर हिलाकर 'जी मम्मी जी' कहती रहे।
उन्हें बस एक आज्ञाकारी, घरेलू नौकरानी जैसी बहू की तलाश थी, जो बिना पगार के दिन-रात काम करती रहे और उनकी हां में हां मिलाती रहे।
अब भला ऐसा कैसे हो सकता है, वह भी आज के इस मोबाइल और इंटरनेट के युग में? जो लड़की पढ़ी-लिखी होगी, अपने पैरों पर खड़ी होगी, वह भला गूंगी बनकर क्यों रहेगी? वह क्यों सहेगी?
पर शारदा देवी यह कहां समझती थीं। उनके मन में एक और गहरा, अनकहा डर बैठा था, जिसे वह खुद भी स्वीकार नहीं करती थीं। उन्हें डर था कि अगर कोई तेज-तर्रार, समझदार बहू आ गई तो वह उनके बेटों को उनसे छीन लेगी। वह उन्हें लेकर अलग घर बसा लेगी। उनके जीवन भर के जोड़े हुए गहने, उनकी एफडी, सब कुछ हड़प लेगी और उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ आएगी।
टीवी के सीरियलों ने इस डर को और पक्का कर दिया था। इसी डर और अहंकार के चलते वह अनजाने में ही अपने बेटों की सबसे बड़ी दुश्मन बनी हुई थीं। वह हर रिश्ते में कोई न कोई कमी निकालकर, कोई न कोई बहाना बनाकर अपने ही हाथों से अपने बेटों का घर बसने नहीं दे रही थीं। उन्होंने अपने अहं के आगे किसी को कुछ न समझा।
इस सब का सबसे पहला शिकार बना बड़ा बेटा सुरेश। वह स्वभाव से ही दब्बू था। मां के आगे कभी बोल नहीं पाया। जब भी कोई रिश्ता आता, वह चुपचाप एक कोने में बैठकर सुनता रहता। उसे कोई भी लड़की बुरी नहीं लगती थी। उसे तो बस एक साथी चाहिए था। पर मां हर बार मना कर देती।
धीरे-धीरे उसकी उम्र पैंतालीस को छूने लगी। दोस्तों के बच्चे जवान हो गए। दुकान पर लोग उसे 'कुंवारा बाबा' कहकर चिढ़ाने लगे। वह अंदर ही अंदर टूट गया। अपनी मां के इन 'शुभ कर्मों' को देखते हुए एक रात वह चुपचाप एक झोला उठाकर घर से निकल गया। पीछे एक चिट्ठी छोड़ गया, "माँ, तुमने मुझे कभी किसी के लायक नहीं समझा। अब मैं संसार के ही लायक नहीं रहा।"
सुनने में आया कि वह शहर से बहुत दूर, गंगा किनारे किसी आश्रम में रहने लगा है। उसने भगवा वस्त्र धारण कर लिए हैं। उसने उस संसार से ही संन्यास ले लिया, जिसे उसकी मां ने उसे कभी बसाने ही नहीं दिया।
मां पर इसका कोई असर नहीं हुआ। उन्होंने मोहल्ले में कह दिया, "मेरा बड़ा बेटा तो साधु-संत हो गया है, बहुत पुण्यात्मा है।"
अब सारी उम्मीदें छोटे बेटे नरेश पर थीं। पर नरेश का घमंड तो मां से भी चार कदम आगे था। उसका घमंड अभी दूर नहीं हुआ था। उसने किसी प्राइवेट विद्यालय से एमटेक किया था और खुद को बहुत बड़ा इंजीनियर समझता था। वह जाने कौन सी दुनिया की सोच रखता था।
वह चाहता था कि लड़की आज्ञाकारी भी हो, जो मां के पैर दबाए। वह पूरी घरेलू भी हो, जो अच्छा खाना बनाए। और साथ में वह नौकरी करके पैसे भी कमाकर लाए, ताकि उसकी छोटी तनख्वाह में मदद हो सके। यानी उसे एक नौकरानी, एक रसोइयन और एक एटीएम, तीनों एक ही लड़की में चाहिए थे।
अब भला ऐसी सर्वगुण सम्पन्न पत्नी उसे कैसे मिल सकती है? वह यह भूल गया था कि उस लड़की की तरफ से भी तो कुछ मांगें हो सकती हैं। वह लड़की भी तो चाहेगी कि लड़का अच्छा कमाता हो, उसका अपना घर हो, उसका स्वभाव अच्छा हो।
वह आईने में खुद को नहीं देखता था। चालीस साल की उम्र, माथे पर झलकता गंजापन, निकला हुआ पेट, एक अनिश्चित सी नौकरी और मां के पल्लू से बंधा व्यक्तित्व। उसके पास देने के लिए क्या था?
सच तो यह है कि भारतीय समाज में शादी कोई राजा-महाराजाओं का स्वयंवर नहीं होती। यह वैसे भी एक समझौता ही होती है। दो अपूर्ण लोगों का मिलन। कोई भी पूर्ण नहीं होता। दोनों एक-दूसरे की कमियों को देखते हैं, उन्हें निभाते हैं, उन्हें अपनाते हैं और तब जाकर अपनी एक नई, अधूरी-सी सुंदर कहानी लिखते हैं। जो पूर्णता की खोज में निकलता है, वह अकेला ही रह जाता है।
आज शारदा देवी के दो मंजिला मकान में गहरा सन्नाटा पसरा है। नीचे के कमरे में शारदा देवी अपनी माला जपती रहती हैं। ऊपर के कमरे में उनके अनुज पुत्र नरेश, सर्वगुण सम्पन्न पत्नी के इंतजार में बालकनी में बैठे हैं। उनकी आंखें गली में आते-जाते लोगों को तकते-तकते थक गई हैं। उनके हाथ में आज भी एक पुरानी डायरी है, जिसमें उन्होंने अपनी 'आदर्श पत्नी' की सूची लिख रखी है।
बाहर शाम ढलने को है। आसमान में लालिमा फैल गई है। पक्षियों के झुंड चहचहाते हुए अपने-अपने घोंसलों की ओर लौट रहे हैं। चींटी भी अपने बिल में जा चुकी है। सबको अपना घर मिल गया है, सबको अपना साथी मिल गया है।
सिवाय उन दो लोगों के, जिन्होंने अहंकार, डर और लालच में अपना ही घर उजाड़ लिया। वे आज भी एक ऐसी मृगतृष्णा के पीछे भाग रहे हैं, जो कभी मिलनी ही नहीं थी।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली