deep sea in Hindi Short Stories by Vandna Sharma books and stories PDF | गहरा समंदर

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गहरा समंदर

---*कहानी: माफ़ करने के लिए नहीं रुके*  *लेखिका: डॉ वंदना शर्मा*

दिन ढलने ही वाला था, आसमान में बादल छाए हुए थे। सागर समुद्री तट पर बैठा हुआ, समुद्री लहरों को उछलते हुए देख रहा था। वह अपनी अतीत की यादों में खोया हुआ था।सागर एक 45 वर्षीय युवा था। परिवार की जिम्मेदारियों और अपेक्षाओं ने उसे एक गहरा समन्दर ही तो बना दिया था। वह अपना दुःख किसी से ना कहता। हर ग़म को हँसी में टाल देता। कोई पूछता उससे "कैसे हो?", प्रति उत्तर में हँसकर खुद एक सवाल उछालता, "कैसा लग रहा हूँ मैं? एकदम झकास ना"।होते हैं कुछ इंसान ऐसे भी जिन्हें अपनी भावनाएँ व्यक्त करनी नहीं आतीं। प्यार जताना नहीं आता। दुःख बयाँ करना नहीं आता। खुशी का या कहो नकली हँसी का मुखौटा ओढ़े रहते हैं सारे दिन। क्या पता कोई मिला ही न हो उन्हें ऐसा जिसके सामने खुलकर रोयें, अपना दर्द कह पायें, जो उन्हें समझने की कोशिश करे।अँधेरा हो चुका था। सागर ने अपनी घड़ी में समय देखा, आठ बज चुके थे। अपनी जेब से गाड़ी की चाबी निकाली और निकल पड़ा अनजानी राहों पर। आज उसका घर जाने का मन नहीं था। इसीलिए बिना सोचे-समझे बस गाड़ी चला रहा था। अपनी यादों में खोया कब वो अपने गाँव की सड़कों पर मुड़ गया, पता ही न चला।गाँव में सागर के चाचा रहते हैं। जब तक वह गाँव पहुँचा, वहाँ सब खाना खा चुके थे। सब सोने जा रहे थे। सागर वहीं चारपाई पर अपने चाचाजी के पास बैठ गया। "क्या हुआ सागर, बड़े उदास लग रहे हो?" सागर अपने चाचा के गले लगकर रो दिया और बहुत देर तक रोता रहा। फिर शांत होने पर बोला - "आज बाबूजी से झगड़ा हो गया। मैं जानता हूँ बाबूजी मुझे बहुत प्यार करते हैं लेकिन कभी जताया नहीं उन्होंने। आज जो मेरे मन में भरा पड़ा था, सब बोल आया। लेकिन अब दुःख हो रहा है। मुझे ऐसा नहीं बोलना था। पर मैं क्या करूँ, मैं भी इंसान हूँ, मैं भी प्यार और सम्मान चाहता हूँ।शादी से पहले जब बाबूजी डाँटते थे तो मैंने कभी प्रतिउत्तर नहीं दिया जबकि बुरा उस समय भी लगता था मुझे। पर अब जब मैं खुद तीन बच्चों का बाप बन गया हूँ तो भी मुझे सबके सामने डाँटा, गुस्से में आकर मैंने भी बुरा-भला कह दिया और घर से निकल आया।"चाचा ने उसे सांत्वना देते हुए कहा - "रो मत सागर, अच्छी बात ये है कि तुझे अपनी गलती का एहसास है, तू समझता है अपने बाबूजी के प्यार को। तुझे याद नहीं होगा, उस समय तू छोटा था दो फुट का था, जब तू बीमार होता था तो बड़े भैया सबसे ज़्यादा दुखी होते थे, वो ऑफिस से थके आते फिर तेरी सेवा में जुट जाते। अपने कंधे पर बैठाकर तुझे सारा जग घुमाते। तेरी हर जिद पूरी करने के लिए खुद दिन-रात मेहनत करते। वो सिर्फ इसीलिए तुझे डाँटते हैं कि जो दुःख जो गरीबी उन्होंने देखी है वो तुझे ना देखनी पड़े।जब तू हाईस्कूल में प्रथम श्रेणी में पास हुआ था ना, सारे गाँव में मिठाई बाँटी थी उन्होंने। जिंदगी के कष्ट सहते-सहते वो ऊपर से इतने सख्त हो गए कि अपने प्यार को जताना भूल गए। जब तू बी-टेक करने पूना गया था तो पहली बार मैंने उनकी आँखों में आँसू देखे थे तेरे लिए। तुझसे दूर रहने के भाव में कई दिन तक बुखार में रहे पर किसी से कह न पाये कि सागर की याद आ रही है। बेटा, बुढ़ापे में माँ-बाप बस बच्चों के साथ कुछ पल बिताना चाहते हैं, थोड़ा सा सम्मान चाहते हैं। माँ-बाप को कभी बुरा मत समझना। अभी जाओ और उनसे माफी माँगो। और अपने गले लगाना, वो तुम्हें माफ कर देंगे।सागर अपने चाचा के साथ तुरंत अपने बाबूजी से मिलने चल दिया। लेकिन जब घर पहुंचा घर पर ताला लगा था। पड़ोसी ने बताया कि सागर के बाबूजी को पैनिक अटैक आया था। अभी उन्हें पास के ही अस्पताल लेकर गए हैं।सागर ने तुरंत गाड़ी निकाली और अस्पताल पहुँचा। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उसके बाबूजी माफ करने के लिए नहीं रुके और सागर की आँखों में पछतावा देखने से पहले ही इस दुनिया से विदा हो चुके थे।जिस बेटे के लिए उन्होंने अपनी सारी उम्र, सारी जवानी खाक कर दी, उसी बेटे ने जब उनके प्यार को नहीं समझा, गुस्से में उनका अपमान किया तो वे यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाए और उन्हें पैनिक अटैक आ गया।सागर और उसकी माँ का रो-रो कर बुरा हाल था। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।———x———*डॉ वंदना शर्मा*पांडव नगर new delhi ---*