पुस्तक समीक्षा उत्तर दो समय
पुस्तक _उत्तर दो समय, कविता संग्रह
लेखिका सविता मिश्रा
प्रकाशक. बोधि प्रकाशन
मूल्य ₹199
कुल कविताएं 79
भाषा=बोध गम्य, सरल, सहज
प्रस्तुत काव्य संग्रह में मिश्रित भाव पढ़ने को मिल मिलेंगे।अधिकांश कविताएं दांपत्य जीवन की मधुरता प्रेम और सुंदरता को दर्शाती हैं। आधुनिक युग में पति-पत्नी के अलग-अलग शहर में कार्यरत , होने के कारण साथ कम समय बीता पाते हैं।कुछ कविताओं में लंबी दूरी वाले प्रेम को छोटी छोटी मधुर स्मृतियों से बड़े प्रेम से पिरोया गया है। कहीं कहीं पढ़कर रोमांच भी उत्पन्न होता है। एक दूसरे की चिंता, परवाह और आदतें कभी मन को गुदाती है तो कभी पलकें भिगो देती हैं।
तुम फिर स्टोर में आ
मुस्कराते, पूछते फिर
चाय बन गई क्या
जब भी खोलती हूं अलमारी/वही खुशबू/अनंत स्मृतियां/
स्मृति में उतर आई चैत पूनो में खिली छत/
न जाने क्या क्या/लिखती उंगलियां/रात भर/चुपचाप झरता रहा/प्रेम का बौर/रात भर
पति के जाने केबाद
कैसे एक स्त्री खुद को जीती है पति की स्मृतियों में डूबी प्रेम को जीती, लेकिन उन पलो को जीती स्त्री के बिछोह को सोचकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं, आंखे भीग जाती हैं, जो हर पल अपने प्रियतम को अपने एहसास में जीवित रखे हुए हैं, संवाद करती है उसकी यादों से...
एकांत के तट पर, तुम और तुम्हारा शहर, श्राद्ध, पीतांबरा दुपहरिया में, बसंत में तुम्हारे बिना, स्मृतिवन, गहराती पद चापे, जब भी..
लेखिका का संवेदनशील हृदय दूसरों की परेशानी देख व्यथित हो जाता है। बिना कहे सुने दूसरों की पीड़ा, भाव समझना उन्हें शब्द देना कवियत्री को मानवता की ऊंचाइयों तक ले जाता है। जहां हर प्राणी और प्रकृति के लिए संवेदना है, करुणा है।
"संधि पत्र, किरन, बसंत में फूल खिलेंगे, पढ़ रहे हैं बच्चे, भीतर तक, विश्वास, यात्रा,अब भी,"
आदि कविताएं करुणा और प्रेम रस से भिगो देती हैं ।
स्त्री विमर्श पर आधारित स्त्री जीवन की कठिनाइयों और स्त्री की जिजीविषा, दृढ़ इच्छा और मजबूत चरित्र वाली स्त्री की विशेषता बया करती कुछ कविताएं
"बोगन बिलिया, उसके भीतर से, वह स्त्री है, रात भर , स्त्रियां,लॉकडाउन में, पके मन वाली स्त्रियां, स्त्री एक, स्त्री दो, जीवन, बचा रहेगा प्रेम, जरूरी है इस समय, घर चलना है अब, टूटेगा जरूर सन्नाटा।"
मित्रता को परिभाषित करती
"कला निधि के लिए," स्मृति परिसर में और अदभुत कल्पना शीलता को दर्शाती काश और पर्व रचनाएं मन मोह लेती हैं।
प्रस्तुत काव्य संग्रह अनेक रंगों और भावों में ढला पठनीय है। और हर लड़की को अपनी जिंदगी से जुड़ा प्रतीत होगा। मायके का मोह कहां छोड़ पाती है एक स्त्री, वृद्धा अवस्था में भी। अपने मायके का कोई भी समाचार पाकर प्रफुलित हो उठता है हृदय।
"पीहर जाती बेटियां," ऐसे भी कहीं छूटता है घर, "हर बार की तरह," आदि कविताएं मायके की याद दिलाती हैं। लंबी कविता खोल दो सारे बंध अब बहुत खूबसूरत लिखी है।
कुछ उत्तम पंक्तियां
"सचमुच सोना चाहती हैं स्त्रियां
अपने वक्त पर अपनी अपनी नींदों से
बेदखल कर देना चाहती हैं बहुत कुछ
यहां तक की सूरज को भी "
"कौन जाने क्यो होगा पीहर की देहरी के पार
जिंदगी ने अभी से सिखा दी है
संधिपत्र की भाषा।"
समीक्षक=डॉ वंदना शर्मा
नई दिल्ली
प्रस्तुत समीक्षा डॉ वंदना शर्मा ने लिखी है काव्य संग्रह सविता मिश्रा का है, पाठकों की प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा। धन्यवाद आपका