smrti naad book review in Hindi Book Reviews by Vandna Sharma books and stories PDF | स्मृति नाद - पुस्तक समीक्षा

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स्मृति नाद - पुस्तक समीक्षा

पुस्तक =कविता- संग्रह ;स्मृति नाद। लेखिका =अपूर्वा। । प्रकाशक= बोधि जन संस्करण। आवरण संयोजन=शांत, सौम्य। कविताओं की संख्या 45 ।।।।।।। महत्वपूर्ण बिंदु= भाषा मिश्रित ,सरलबोधगम्य, चित्रात्मक , दृष्टिकोण =आशावादी, आशावादी, दार्शनिक भाव =सामयिक,सामाजिक, पारिवारिक नैतिक मूल्यों को दर्शाती स्मृतियों का रूपक भाषा की सुंदरता को बढ़ाता है । विशेष= पत्र साहित्य को पुनर्जीवित करती लेखिका मोबाइल के युग में पुराने पत्रों को संजोए हुए उनकी विरासत को संजोए हुए है। पत्र पढ़कर कैसे हम भावनाओं में डूब जाते हैं ।प्रेम रस का आस्वाद करते हैं।वह आनंद एसएमएस और ईमेल में कहां प्राप्त होता है। यादें शोर मचाती है /यादें साथ निभाती हैं/ सुन सको तो सुनो यह स्मृति नाद है /एक एक पल एक एक पल वो लम्हा फिर से जी जाती हैं अपूर्वा की स्मृति हमको भी स्मृति नाद सुनाती हैं। नाम के अनुरूप एक संवेदनशील लेखिका है अपूर्वा ।पारिवारिक रिश्तों को महत्व देती सांस्कृतिक विरासत को संजोती, हमेशा एक नटखट शरारती हंसी से घर को महकाती । मन के अंदर गहरा समुद्र । अधरो पर चहकती मुस्कान । कितना सौम्य व्यक्तित्व और उतना ही उत्कृष्ट लेखन ।उम्र में छोटी लेकिन गहरे भाव। ख़ुद से ही एक जंग लड़ती, स्मृतियो को अस्त्र बनाकर हर मुसीबत से उभरती,कभी समस्याओं के भंवर में फस्ती तो अपनी मुस्कान से अपने पिता के आशीर्वाद से हमेशा विजयि रहती ।सच में इतना प्यार लेखन। हर लड़की स्मृति नाद पढ़कर खुद को भावनाओं से जुड़ा पाएगी। मायके की यादें,हॉस्टल का अकेलापन। और पिता की प्रेम को हर पल जीती,उनकी उपस्थिति को अपने साथ महसूस करती ।कुछ पंक्ति इतनी मार्मिक है ,अश्रु छलक आए पढ़ते हुए। पिता पुत्री के इस पवित्र प्रेम को क्या खूब लिखा है।एक लड़की के लिए उसके पिता उसके हीरो होते हैं ।हर लड़की उस दर्द को महसूस कर सकती है। जब छूटता है पिता काआंगन । निशब्द हूं मैं। पीछे छूट जाता है/ हथेलियां से /पीहर का आंगन /सब छूट जाता है पीछे /बहुत पीछे। पिता के जाने के बाद/बेटियों को फिर वह चिर परिचित कंधा नहीं मिलता/। पर कुछ बाकी रह जाता है खालीपन भीतर/ क्योंकि थोड़ा तो रह ही जाता है न पापा। प्रकृति से बेहद लगाव रखती हैं लेखिका। अपना अकेलापन, अपना दुःख प्रकृति से बांटती अपूर्वा पूरी प्रकृति को ही अपना बना लेती हैं। आसमान, परिंदे/ बारिश चांद /सूरज सब मुझेअपने/अपने क्यों लगते हैं । अद्भुत लिखा है इन पंक्तियों में, जिंदगी का सार लिख दिया है अपूर्वा ने। कि एक क्षण की उम्र तब तक है, जब तक हम उसे किसी के साथ बांट पाते हैं। कितनी अजीब बात है ना/सब अपनी कलाई पर घड़ी बांधते फिरते हैं/लेकिन बंधे हुए तो हम है/गिनती की सांसे हैं/पता नहीं किसकी घड़ी कब रुक जाए। जितना वक्त एक बुलबुले के पास है/हम सबके पास भी उतना ही वक्त है/लेकिन मैं उतने से वक्तमे भी/अपना घरौंदा बनाती जाऊंगी/न वक्त हारा है/न मैं हारी हूं। लेखिका का संवेदनशील हृदय फुटपाथ पर हेलमेट बेचते लड़के को देखकर उसकी बेबसी पर चीत्कार करने लगता है, मोची और गरीब लड़की को श्रम करते हुए देखते रो पड़ता है भावुक मन । बहुत प्यारा यादों सी भरा काव्य संग्रह है सभी को एक बार जरूर पढ़ना चाहिए। उत्कृष्ट लेखन के लिए अपूर्वा को बधाई और शुभकामनाएं।