कहानी - कुछ खास है
नेहा की ननद रीना आई थी। बस के लंबे सफर के बाद भी रीना इतनी ऊर्जावान, इतनी खुश लग रही थी जैसे अभी पार्लर से आई हो। घर आते ही पूरे घर में रौनक हो गई। नेहा ने खुशी-खुशी खाना खिलाया, चाय पिलाई और बहुत से उपहार दिए। सब हँसी-खुशी चल रहा था।
करीब दो घंटे बाद ही रीना ने अपना बैग उठाते हुए कहा -
"भाभी मैं चलती हूँ, मुझे चंडीगढ़ निकलना है आज ही। मम्मी-पापा की खबर लेकर कल सुबह ही वापिस भी आना है।"
नेहा ने आश्चर्य से कहा - "इतनी जल्दी! दीदी, बस के सफर में थक गई होगी, आज रात आराम कर लो, सुबह निकल जाना।"
रीना ने हंसते हुए कहा - "नहीं भाभी, मुझे थकान नहीं होती। आगे का सफर भी मैं बस से ही करने वाली हूँ।"
नेहा उसे प्यार और सम्मान से विदा करती है।
रीना के जाने के बाद नेहा अकेली आँगन में बैठी सोचने लगती है - "दीदी कितनी स्वस्थ और ऊर्जावान हैं। बस के सफर में बोर नहीं होती और न ही थकती है। एक मैं हूँ, बस के नाम से ही सिर दर्द होने लगता है। भीड़ देखकर घबराहट होती है। कल किसी डॉक्टर से परामर्श करूँगी।"
अगले दिन नेहा घर का काम खत्म कर एक मनोचिकित्सक के पास जाती है और उनसे अपनी समस्या बताती है -
"सर, मुझे किसी से बात करने का मन नहीं करता। मैं सबसे घुल-मिल नहीं पाती। भीड़ से डर लगता है। बस से या जनरल सीट से सफर नहीं कर पाती हूँ। मुझे अपनी प्राइवेसी हर जगह चाहिए। मैं सहज नहीं हो पाती सबके साथ। ऐसा नहीं है कि मैं बातूनी नहीं हूँ, पर किसी-किसी के साथ ही खुल पाती हूँ। मुझे कोई समस्या तो नहीं है?"
डॉक्टर ने कुछ देर सोचा और मुस्कुराते हुए कहा -
"नेहा, तुम्हें कोई समस्या नहीं है। तुम पूर्णतया स्वस्थ हो। तुम्हारा IQ लेवल सामान्य से थोड़ा अधिक है।"
नेहा चौंक गई।
डॉक्टर बोले, "हाँ, इसीलिए तुम्हें हर चीज खास और परफेक्ट चाहिए। जरूरी नहीं कि एक आम इंसान सब जगह एक जैसा फील करे। मनःस्थिति परिस्थिति पर भी निर्भर करती है। तुम्हें भीड़ में थकान इसलिए लगती है क्योंकि तुम्हारा दिमाग ज्यादा गहराई से सोचता है।"
फिर डॉक्टर ने कहा, "तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ, तुम्हें जवाब मिल जाएगा।"
चूहिया की कहानी
एक बार एक नदी के किनारे एक तपस्वी ऋषि सूर्य को अर्घ्य दे रहे थे। तभी ऊपर से एक बाज एक छोटी सी चूहिया को अपने पंजों में दबाकर ले जा रहा था। चूहिया फड़फड़ा रही थी। बाज की पकड़ ढीली हुई और चूहिया सीधे ऋषि के हाथों में आ गिरी।
ऋषि ने उसे सहलाया, आश्रम ले आए, उसे प्यार से रखा। फिर अपने तप के बल से उन्होंने उस चूहिया को एक सुंदर कन्या बना दिया। कन्या आश्रम में ही बड़ी होने लगी।
जब वह विवाह योग्य हुई तो ऋषि से बोली, "पिताजी, मेरे लिए श्रेष्ठ वर खोज दीजिए।"
ऋषि ने सबसे तेजस्वी वर - सूर्य देव का आह्वान किया। सूर्य आए। कन्या ने कहा, "नहीं, मैं सूर्य से विवाह नहीं कर सकती, इतना ताप मैं नहीं सह पाऊँगी। उनसे श्रेष्ठ कौन है?"
सूर्य ने कहा, "बादल मुझे ढक देते हैं, बादल मुझसे श्रेष्ठ हैं।"
ऋषि ने बादल को बुलाया। कन्या बोली, "बादल तो हवा से इधर-उधर भटकते रहते हैं, उनका कोई ठिकाना नहीं।"
इस पर ऋषि बोले, "बादल का रास्ता पहाड़ रोकते हैं, पहाड़ बादल से श्रेष्ठ हैं। क्या तुम पहाड़ से विवाह करना चाहोगी?"
चूहिया रूपी बालिका ने कहा - "ऋषिवर पहाड़ तो एक जगह स्थिर रहते हैं, कहीं नहीं जाते। एक छोटा सा मजबूत चूहा भी पहाड़ में छेद कर देता है। मुझे लगता है मेरे लिए वही उपयुक्त वर है।"
ऋषि उसकी बात सुनकर मुस्कुराए और बोले - "तुम्हारी गलती नहीं है नादान चूहिया। मैंने तुम्हें श्रेष्ठ जीवन देने की कोशिश की, लेकिन मूलतः तुम चूहिया ही हो, तुम्हें यह जीवन रास नहीं आया।"
ऋषि ने फिर से उसे अपने तप से चूहिया बना दिया और कहा, "जाओ किसी चूहे से ही विवाह करो।"
डॉक्टर ने नेहा को समझाते हुए कहा - "देखा तुमने? कहानी में जो जैसा होता है उसे वैसे ही लोगों का साथ पसंद आता है। चूहिया को सूर्य या बादल नहीं, चूहा ही पसंद आया।"
"तुम कुछ खास हो नेहा। इसीलिए तुम्हें हर चीज खास चाहिए। ये तुम्हारा गुण है, अवगुण नहीं। तुम रीना नहीं हो और रीना तुम नहीं है। रीना बहिर्मुखी है, उसे बस में मजा आता है। तुम अंतर्मुखी हो, तुम्हें गहराई पसंद है।"
"तुम किसी से बात नहीं करना चाहती, ऐसा नहीं है। तुम सब से बात नहीं करना चाहती। तुम चुनिंदा लोगों से, गहरी बात करना चाहती हो। और यही तुम्हारी सुंदरता है।"
नेहा की आँखें भर आईं। सालों से जो बात उसे बोझ लग रही थी, आज हल्की लग रही थी।
डॉक्टर ने आखिर में कहा, "इसलिए तुम चिंता मत करो। तुम पूर्णता स्वस्थ हो। अपने जैसे विचारशील दोस्त बनाओ। उनसे साहित्य पर जी खोलकर चर्चा करो। बस का सफर नहीं कर पाती तो मत करो, अपनी प्राइवेसी को सम्मान दो।"
नेहा को सब समझ आ गया। वह प्रसन्नतापूर्वक घर आ गई।
घर आकर उसने अपनी अलमारी से अपनी सबसे प्यारी किताब निकाली - जिसे वह महीनों से 'समय नहीं है' कहकर नहीं पढ़ पा रही थी। उसने खिड़की के पास बैठकर किताब खोली।
बाहर वही शोर था, वही दुनिया थी। पर अंदर अब शांति थी।
उसे समझ आ गया था कि वह खराब नहीं है, वह बस कुछ खास है।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली