कहाँ गईं तुम नैना - 1


          कहाँ गईं तुम नैना  (1)


आदित्य अपने जिम में वर्कआउट कर रहा था। उसका मोबाइल वाइब्रेट करने लगा। ट्रेडमिल पर भागते हुए उसने चेक किया तो कोई अंजान नंबर था। उसने फोन काट दिया। 
जब वह जिम से निकलने लगा तो फिर उसी नंबर से कॉल आई। इस बार उसने फोन उठा लिया।
"हैलो..."
"मि. आदित्य..."
"जी बोल रहा हूँ। आप कौन ?"
"मैं मिसेज़ चटर्जी...दिल्ली से बोल रही हूँ। नैना आपकी पत्नी का नाम है।"
"जी...लेकिन दो साल पहले हम अलग हो गए।"
"ओह....लेकिन मुझे तो यही नंबर दिया गया।"
"किसने दिया ये नंबर ?"
"मि. आदित्य मैं नैना की लैंडलेडी हूँ। मखानी अपार्टमेंट्स में मेरे फ्लैट में वह पिछले एक साल से रह रही है। उसकी सोसाइटी के सेक्रेटरी ने मुझे उसकी एक सहेली का नंबर दिया। उसने मुझे आपका नंबर दिया।"
आदित्य सोंच में पड़ गया। ऐसी कौन सी बात है कि मिसेज़ चटर्जी ने मेरा नंबर लेकर मुझे कॉल किया।
"मिसेज़ चटर्जी मुझे फोन करने का कोई खास कारण है।"
मिसेज़ चटर्जी की तरफ कुछ देर शांती रही। जैसे वह कुछ सोंच रही हों। उनकी यह खामोशी आदित्य को परेशान कर रही थी।
"मिसेज़ चटर्जी क्या हुआ ?"
"मि. आदित्य बात ये है कि करीब पंद्रह दिन से मैं नैना से संपर्क करने की कोशिश कर रही हूँ। लेकिन उसका कोई पता नहीं चल रहा। उसका फोन भी नहीं लग रहा है।"
मिसेज़ चटर्जी की बात सुन कर आदित्य को नैना की चिंता हो गई। भले ही अब दोनों अलग हो गए थे। पर आदित्य के दिल में आज भी नैना के लिए जगह थी। दोनों ने एक दूसरे के साथ बहुत अच्छा समय बिताया था। रिश्ते के बिगड़ने पर भी एक दूसरे के प्रति कड़वाहट लाए बिना दोनों ने अपनी राहें अलग कर ली थीं। 
"मिसेज़ चटर्जी आपने उसके ऑफिस में पता किया ?"
"सोसाइटी के सेक्रेटरी ने उसकी सहेली चित्रा  जो उसके चैनल में ही काम करती है का नंबर दिया था। उसने बताया कि नैना ने अपने ऑफिस से दस दिनों की छुट्टी ली थी। किसी को इसका कारण नहीं पता। ना ही कोई जानता है कि वह कहाँ गई थी। अब तो छुट्टी लिए हुए करीब पच्चीस दिन हो गए। पर उसका कुछ पता नहीं।"
आदित्य के लिए यह खबर सचमुच चौंकाने वाली थी। वह अब नैना को लेकर गहरी फिक्र में था। 
"यह तो सचमुच चिंता की बात है।"
"हाँ मि. आदित्य मुझे भी फिक्र है उसकी। नैना बहुत अच्छी लड़की है। एक बेटी की तरह मुझे सम्मान देती है। मैं तो इस उम्र में दौड़ धूप नहीं कर सकती। इसलिए आपको बता दिया। अगर आपको कुछ पता चले तो मुझे ज़रूर बताइएगा।"
"आपका बहुत शुक्रिया मिसेज़ चटर्जी। जैसे ही नैना के बारे में पता चलेगा मैं आपको बताऊँगा।"
कार चलाते हुए आदित्य सोंच रहा था कि आखिर नैना गई कहाँ। पहले भी वह छुट्टी पर जाती थी तो सही समय पर लौट आती थी। लेकिन इस बार अभी तक नहीं लौटी। उसका फोन भी नहीं लग रहा। आदित्य के दिमाग में कई तरह के खयाल आ रहे थे। 
आदित्य ने लाख भुलाने की कोशिश की पर उसके दिल में नैना के लिए प्यार अभी भी वैसा था जैसा आठ साल पहले। जब उसने पहली बार नैना के सामने अपने प्यार का इज़हार किया था। नैना ने भी उसके प्यार को स्वीकार कर लिया। दोनों ने शादी कर ली। लेकिन फिर ना जाने किसकी नज़र लग गई। रिश्ते में दरार आ गई। दोनों अलग हो गए। 
घर पहुँचा तो बेला ने पूँछा।
"सर आज जिम से लौटने में देर हो गई ?"
"हाँ...किसी का फोन आ गया था। इसलिए कुछ देर हो गई।"
"मैंने नाश्ता टेबल पर रख दिया है। मैं चलती हूँ।"
बेला रोज़ सुबह का नाश्ता बना कर चली जाती थी। उसके बाद दोपहर बाद आकर घर की सफाई और शाम का खाना बना कर चली जाती थी। बेला बाहर निकलने के लिए दरवाज़ा खोल ही रही थी कि आदित्य ने उसे रोक लिया।
"बेला कुछ दिनों के लिए मैं बाहर जा रहा हूँ। बस तैयार होकर निकल जाऊँगा। कब तक लौटूँगा कह नहीं सकता। तुम एक दो दिन में आकर घर की सफाई कर दिया करना।"
"ठीक है सर..."
बेला के जाने के बाद आदित्य तैयार होने चला गया। आदित्य ने तय कर लिया था कि वह खुद दिल्ली जाकर नैना के बारे में पता करेगा। नाश्ता करते हुए उसने अपनी बिज़नेस पार्टनर शीरीन को फोन किया। 
"गुड मार्निंग...शीरीन मैं कुछ दिनों के लिए दिल्ली जा रहा हूँ। तुम संभाल लेना।"
"ओके...कब लौटोगे।"
"कह नहीं सकता..."
"क्या बात है आदित्य ? कोई समस्या है क्या ?"
"हाँ नैना का कुछ दिनों से कोई पता नहीं चल रहा है। मैं जाकर देखता हूँ। कोई ज़रूरी काम हो तो संपर्क कर लेना।"
"ओह...सचमुच चिंता की बात है। बट यू डोंट वरी आदित्य....मैं संभाल लूँगी। जैसे ही कुछ पता चले मुझे भी बताना।"
आदित्य ने एक बैग में अपना सामान डाला। घर लॉक किया और दिल्ली के लिए निकल गया। दिल्ली में उसके पापा का एक फ्लैट था। उनके जाने के बाद उसने फ्लैट किराए पर दे दिया था। लेकिन पिछले कुछ महीनों से वह खाली पड़ा था। वह तय नहीं कर पा रहा था कि उसे किराए पर दे या बेंच दे। फिलहाल उसने सोंचा था कि जितने दिन दिल्ली में रहेगा वह उसी फ्लैट में रहेगा। फ्लैट की चाबी उसके पापा' के दोस्त अरुण दयाल के पास थी। उसने उन्हें फोन कर बताया कि वह कुछ दिनों तक फ्लैट में रहेगा। उसने उनसे गुज़ारिश की कि यदि हो सके तो अपने नौकर को भेज कर फ्लैट की सफाई करवा दें।
अचानक आदित्य के मन में एक सवाल उभरा। चित्रा ने मिसेज़ चटर्जी को उसका नंबर दिया था। लेकिन वह चित्रा के बारे में नहीं जानता था। तो फिर चित्रा के पास उसका नंबर कैसे आया। इसका मतलब चित्रा और नैना एक दूसरे के बहुत नज़दीक होंगी। नैना ने ही चित्रा को उसका नंबर दिया होगा। पर नैना ने उसका नंबर चित्रा को क्यों दिया होगा। अलग होने के बाद से तो उसके और नैना के बीच ही कोई बातचीत नहीं हुई थी। चित्रा ने वह नंबर मिसेज़ चटर्जी को दिया। पर उसने खुद ही उसे फोन कर नैना के बारे में क्यों  नहीं बताया। इन सारे सवालों के जवाब चित्रा से ही मिल सकते थे। 
कार चलाते हुए आदित्य को कुछ थकावट महसूस होने लगी। उसने एक ढाबे पर रुक कर चाय पीने का फैसला किया। चाय पीते हुए उसने मिसेज़ चटर्जी को फोन कर चित्रा का नंबर एसएमएस (SMS) करने को कहा।
जब वह अपने फ्लैट पर पहुँचा तब अरुण अंकल वहाँ मौजूद थे। उनके नौकर रमेश ने फ्लैट की सफाई कर दी थी।
"थैंक्यू अंकल आपने सफाई करवा दी। नहीं तो इतने दिनों से बंद पड़े फ्लैट में कैसे रह पाता।"
"तुमने कहा था कि कुछ दिन दिल्ली में ही रहोगे। क्या कोई खास काम है यहाँ।"
अरुण अंकल आदित्य के परिवार की तरह ही थे। नैना और आदित्य के अलग होने पर वह बहुत दुखी हुए थे। आदित्य को लगा कि नैना के बारे में जान कर वह परेशान हो जाएंगे। 
"हाँ अंकल थोड़ा काम था यहाँ।"
पर अरुण अंकल ने नैना के बारे में ही बात शुरू कर दी।
"जब से तुम और नैना अलग हुए उसने तो मुझसे भी रिश्ता तोड़ लिया। तुमसे कभी उसकी बात हुई।"
अरुण अंकल अभी भी नैना की फिक्र करते हैं। यह सोंच कर आदित्य को लगा कि उनसे कुछ भी छिपाना ठीक नहीं है।
"दरअसल अंकल मैं नैना के कारण ही यहाँ आया हूँ।"
"सब ठीक तो है ना ?"
"नहीं अंकल...उसकी लैंडलेडी मिसेज़ चटर्जी ने आज सुबह मुझे फोन कर बताया कि नैना का कोई पता नहीं लग रहा है। वह अपने चैनल से दस दिनों की छुट्टी लेकर गई थी। अभी तक नहीं लौटी। उसका फोन भी बंद है। इसलिए मैं बिना समय गंवाए आ गया।"
"अच्छा किया बेटा। नैना का तुम्हारे अलावा है भी कौन। कितना अच्छा लगता था तुम लोगों को एक साथ देख कर।"
कहते हुए अरुण अंकल की आँखों में नमी आ गई। 
"तो क्या पुलिस में रिपोर्ट लिखाई है ?"
"पता नहीं अंकल। शायद उसके ऑफिस वालों ने लिखाई हो। मैं देखता हूँ। नहीं तो मैं रिपोर्ट दर्ज़ कराऊँगा।"
अरुण अंकल साथ में खाना लाए थे। आदित्य ने उनके साथ बैठ कर खाना खाया। अरुण अंकल उसी बिल्डिंग में रहते थे। जाते हुए वह कह गए कि जितने दिन आदित्य यहाँ है वह रमेश के हाथ खाना भिजवा दिया करेंगे। वह साफ सफाई भी कर जाया करेगा। 
अरुण अंकल के जाने के बाद आदित्य ने चित्रा को फोन मिलाया। पहली बार में फोन नहीं उठा। आदित्य ने दस मिनट के बाद फिर फोन मिलाया। इस बार चित्रा ने फोन उठा लिया।
"हैलो... चित्रा मैं आदित्य....."
"आदित्य... मैं जानती थी कि तुम फोन करोगे।"
"अच्छा... तुमने मिसेज़ चटर्जी को मेरा नंबर दिया था। तुमको..."
"आदित्य तुम्हारे सारे सवालों के जवाब मैं मिल कर दूँगी।"
"हाँ मैं भी तुमसे मिलना चाहता हूँ। क्या तुम मेरे फ्लैट में आ सकती हो ?"
चित्रा आने को तैयार थी। आदित्य ने उसे पता बता दिया। आदित्य को थकान लग रही थी। यह थकान शरीर से ज्यादा मन की थी। नैना के बारे में सोंच कर वह परेशान था। सोफे पर लेट कर वह पुराने दिनों को याद करने लगा। 

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