Kaithrin aur Naga Sadhuo ki Rahashymayi Duniya - 7 books and stories free download online pdf in Hindi

कैथरीन और नागा साधुओं की रहस्यमयी दुनिया - 7

भाग 7

कैथरीन ने छाल का एक टुकड़ा तने से अलग किया और उस पर हाथ फेरती हुई देर तक उसे देखती रही। फिर उसने शोल्डर बैग में से डायरी और पेन निकाला और डायरी पर भोजपत्र रखकर लिखने लगी -'अद्भुत, विराट भोजवासा के जंगलों में भोजपत्र से मुलाकात। " वह चकित थी। भोजपत्र पर वह ऐसे लिख रही थी जैसे वह सचमुच कागज ही हो। 

समुद्रतल से करीब 3800 मीटर की ऊँचाई पर और भागीरथी के उद्गम गोमुख से करीब चार किलोमीटर पूर्व स्थित इस दुर्गम पर्वतीय स्थल पर वह देख रही है भोज पत्र के वृक्ष की छाल जो सर्दियों में पतली-पतली परतों के रूप में निकलती हैं, जिन्हे पुरातन काल में भारत के ऋषि मुनि आध्यात्मिक ग्रंथों को लिखने के लिए उपयोग में लाते थे। कितना अद्भुत है ये भोज वृक्ष। हिमालय में 3, 500 से 4, 500 मीटर तक की ऊँचाई पर पैदा होने वाले इस पतझड़ी वृक्ष की ऊँचाई लगभग 20 मीटर तक भी जा सकती है। भोज को संस्कृत में भूर्ज या बहुवल्कल कहा गया है। दूसरा नाम बहुवल्कल ज्यादा सार्थक लगता है उसे। बहुवल्कल यानी बहुत सारे वस्त्रों या छाल वाला वृक्ष। भोज को अंग्रेजी में हिमालयन सिल्वर बर्च और विज्ञान की भाषा में बेटूला यूटिलिस कहा जाता है। 

लिख कर उसने भोजपत्र पर अपने हस्ताक्षर किए। समय और दिनांक लिखकर उसने उसे चूम लिया और डायरी में रख दिया। 

वह एक ऊँची चट्टान पर बैठकर वैली में छल छल बहती नदी को देर तक निहारती रही। तभी देखा उसे ढूंढता हुआ नन्दू इधर ही चला आ रहा था। उसके हाथ में कमंडल था। 

" चलिए मेम साब, आज भोजन नहीं करना है ?"

"नहीं आज भूख नहीं है। मैं भी नागा साधुओं के साथ शाम को ही भोजन करूँगी। कमंडल में पानी हो तो पिला दो। "

उसने कमंडल उसकी ओर बढ़ाया। वह अंजलि में पानी लेकर पीने लगी। 

शाम ढल रही थी। नागा साधु भी तप, साधना, संध्या वंदन से निवृत हो गुफा में पहुँच गए थे। पुरोहित जी ने आलू भूनकर भर्ता बनाया था और स्वादिष्ट खिचड़ी। भोजन के पश्चात नरोत्तम गिरी ने कैथरीन से दिन कैसे बिताया जानना चाहा। कैथरीन ने डायरी में से भोजपत्र निकाला-" देखिए मैंने इस पर लिखने का प्रयास किया है। "

"ओह तो आप भोजपत्र के बारे में जान गईं! "

"मुझे आध्यात्मिक ग्रंथों की पांडुलिपियों के सुरक्षित रहने का कारण भी पता चल गया। यह बर्च की छाल है जो कभी पुरानी नहीं होती। "

"हमेशा नूतन रहने का वरदान मिला है इसे। 

"पुरोहित जी चाय बना कर ले आए। मौसम ने रुख बदलना शुरू कर दिया था। ठंडी हवाएं भोजबासा के जंगलों को मुखरित करती गुफा के अंदर तक चली आ रही थीं। कैथरीन ने अपने ओवरकोट को कान तक चढ़ाकर मफलर ठीक से बांध लिया। 

"आप शक्तिपीठ के बारे में बताने वाले थे महाकाल गिरी। "

"जी माता "महाकाल गिरी ने आसन ठीक से जमाया। 

पुराणों में बहुत विस्तृत वर्णन है इन शक्तिपीठों का। आपको देवी सती की कथा पता ही है कि किस तरह

शिवजी ने खड़े होकर अपने ससुर दक्ष का सम्मान नहीं किया था जिसे दक्ष ने अपना अपमान समझा और उन्होंने शिव के प्रति कटूक्तियों का प्रयोग करते हुए अब से उन्हें यज्ञ में देवताओं के साथ भाग न मिलने का शाप दे दिया। इस प्रकार इन दोनों में मनोमालिन्य हो गया। 

भगवान शिव से प्रतिशोध लेने की इच्छा के साथ दक्ष ने यज्ञ किया। दक्ष ने भगवान शिव और अपनी पुत्री सती को छोड़कर सभी देवताओं को आमंत्रित किया। माता सती ने यज्ञ में उपस्थित होने की अपनी इच्छा शिव के सामने व्यक्त की, जिन्होंने उसे रोकने के लिए अपनी पूरी कोशिश की परंतु माता सती यज्ञ में चली गई। यज्ञ में पहुँचने के पश्चात माता सती का स्वागत नहीं किया गया। इसके अलावा, दक्ष ने शिव का अपमान भी किया। माता सती अपने पिता द्वारा अपमान को झेलने में असमर्थ थीं, इसलिए उन्होंने अपने शरीर का बलिदान दे दिया। 

अपमान और चोट से क्रोधित भगवान शिव ने तांडव किया और शिव के वीरभद्र अवतार ने दक्ष के यज्ञ को नष्ट कर दिया और उसका सिर काट दिया। सभी मौजूद देवताओं से अनुरोध के बाद दक्ष को वापस जीवित किया गया किंतु सिर के स्थान पर बकरी का सिर लगाया गया। दुख में डूबे शिव ने माता सती के शरीर को उठाकर, विनाश हेतु दिव्य नृत्य किया। अन्य देवताओं ने विष्णु से इस विनाश को रोकने के लिए हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया, जिस पर विष्णु ने सुदर्शन चक्र का इस्तेमाल करते हुए माता सती की देह के 52 टुकड़े कर दिए। शरीर के ये टुकड़े भारतीय उपमहाद्वीप के कई स्थानों पर गिरे और वह शक्ति पीठों के रूप में स्थापित हुए। 

इनके बारे में विभिन्न ग्रंथों में अलग-अलग तरह से गणना की गई है। 

देवी भागवत पुराण में 108, कालिका पुराण में 26, शिवचरित्र में 51, दुर्गा सप्तशती और तंत्र चूड़ामणि में शक्तिपीठों की संख्या 52 बताई गई है। आमतौर पर 51 शक्तिपीठ माने जाते हैं। तंत्र चूड़ामणि में लगभग 52 शक्ति पीठों के बारे में बताया गया है। कहा जाता है कि इन शक्तिपीठों के दर्शन मात्र से ही हर मनोकामना पूरी हो जाती है। 

"शिवजी और दक्ष की कथा तो मैंने पढ़ी है। लेकिन शक्तिपीठों के बारे में मुझे इतनी जानकारी नहीं है कि उनके नाम क्या है और वे किन स्थानों पर हैं। "

"चलिए ले चलते हैं आपको शक्तिपीठों की ओर। "

"अवश्य महाकाल गिरी जी, मैं बिल्कुल तैयार हूँ सब कुछ जानने के लिए। "

महाकाल गिरी इतने चुंबकीय शब्दों में अपनी बातों को विस्तार दे रहे थे कि नरोत्तम गिरी और अष्टकौशल गिरी भी निःशब्द बस सुने जा रहे थे। महाकाल गिरी ने बताया-" माता, पहला शक्तिपीठ हिंगलाज कहलाता है। जो पाकिस्तान में कराची से 125 किमी दूर है। यहाँ सती माता का ब्रह्मरंध (सिर) गिरा था। इसकी शक्ति-कोटरी भैरवी है और भैरव को भीम लोचन कहते हैं। 

पाकिस्तान के कराची के पास ही शर्कररे नामक शक्तिपीठ स्थित है। यहाँ सती माता की आँख गिरी थी। इसकी शक्ति- महिषासुरमर्दिनी व भैरव को क्रोधिश कहते हैं। 

बांग्लादेश के शिकारपुर के पास दूर सोंध नदी के किनारे स्थित है सुगंधा शक्तिपीठ। सती माता की नासिका गिरी थी वहाँ। इसकी शक्ति सुनंदा है व भैरव को त्र्यंबक कहते हैं। "

"तीनों विदेश में?"

"कभी ये देश भी भारत के थे देवी लेकिन फिर सियासत की जंग में बटवारा हो गया। " नरोत्तम गिरी ने लंबी साँस भरते हुए कहा

"बहुत बुरा हुआ, सत्ता की आँच में जलती है प्रजा। "कैथरीन भी व्याकुल आहत सी नज़र आई। 

" तो माता आगे बढ़ते हैं। "महाकाल गिरी ने विषय पर आते हुए बताया -"महामाया शक्तिपीठ भारत के कश्मीर में पहलगाम के निकट स्थित है जहाँ सती माता का कंठ गिरा था। इसकी शक्ति है महामाया और भैरव को त्रिसंध्येश्वर कहते हैं। 

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में माता सती की जीभ गिरी थी। इसे ज्वाला जी स्थान कहते हैं। इसकी शक्ति है अंबिका व भैरव को उन्मत्त कहते हैं। 

त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ

पंजाब के जालंधर में देवी तालाब, जहाँ सती माता का बायां वक्ष (स्तन) गिरा था। इसकी शक्ति है त्रिपुरमालिनी व भैरव को भीषण कहते हैं। 

वैद्यनाथ झारखंड के देवघर में स्थित वैद्यनाथधाम जहाँ सती माता का हृदय गिरा था। इसकी शक्ति है जय दुर्गा और भैरव को वैद्यनाथ कहते हैं और अब नेपाल। नेपाल भी किसी समय भारत का बफर स्टेट था। पहले वहाँ राजशाही थी। अब स्वतंत्र हैं । हमारे आराध्य शिवजी का पशुपतिनाथ मंदिर भी वहीं है जहाँ शिवरात्रि पर भारी भीड़ जुटती है और महामाया शक्तिपीठ का गुजरेश्वरी मंदिर भी वहीं है जहाँ सती माता के दोनों घुटने (जानु) गिरे थे। "

"जी हाँ नरोत्तम गिरी। और माता कैथरीन, महामाया की शक्ति है महशिरा (महामाया) और भैरव को कपाली कहते हैं। 

"एक और शक्तिपीठ है नेपाल में

गंडकी शक्तिपीठ जो मुक्ति नाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है। जहाँ सती माता का मस्तक या गंडस्थल अर्थात कनपटी गिरी थी। इसकी शक्ति है गंडकी चंडी व भैरव चक्रपाणि हैं। हम गए थे नेपाल हमने इनके दर्शन किए हैं। " अष्टकौशल गिरी ने बताया। 

"अच्छा, बहुत सुंदर प्राकृतिक रूप से समृद्ध धरती है नेपाल की। "

"हाँ माता, एक शक्तिपीठ बहुला पश्चिम बंगाल के अजेय नदी तट पर स्थित बाहुल स्थान पर है जहाँ सती माता का बायां हाथ गिरा था। इसकी शक्ति है देवी बाहुला व भैरव को भीरुक कहते हैं। 

दाक्षायणी तिब्बत स्थित कैलाश मानसरोवर के मानसा के पास है जहाँ पाषाण शिला पर सती माता का दायां हाथ गिरा था। इसकी शक्ति है दाक्षायणी और भैरव अमर। 

विरजा ओडिशा के विराज में उत्कल में यह शक्तिपीठ स्थित है। यहाँ सती माता की नाभि गिरी थी। इसकी शक्ति विमला है व भैरव को जगन्नाथ कहते हैं। "

"ओडीशा, उत्कल याने उड़ीसा, हमने देखा है जगन्नाथपुरी में विमला देवी का मंदिर। वहाँ चावल से बनाए गए पकवान चढ़ाए जाते हैं। हमने चढ़ाए भी और खाए भी। "

"वाह, माता आप तो बहुत पुण्यशालिनी हैं। इतने तीर्थ आपने कर लिए। " पुरोहित जी तपाक से बोले। 

इस वार्तालाप के बीच महाकाल गिरी ने कमंडल में से पानी पी लिया उसका गला सूख रहा था। मौन रहकर तपस्या करने वाले साधु इतना अधिक प्रवचन एक साथ देना कष्टकारी समझते हैं। फिर भी कैथरीन जैसी जिज्ञासु हो तो बताने में आनंद ही आता है। वह बताने लगा-

"उज्जयिनी पश्चिम बंगाल के उज्जयिनी नामक स्थान पर है, जहाँ माता की दाईं कलाई गिरी थी। इसकी शक्ति है मंगल चंद्रिका और भैरव को कपिलांबर कहते हैं। 

त्रिपुर सुंदरी त्रिपुरा के राधाकिशोरपुर गांव के माता बाढ़ी पर्वत शिखर पर स्थित है जहाँ सती माता का दायां पैर गिरा था। इसकी शक्ति है त्रिपुर सुंदरी व भैरव को त्रिपुरेश कहते हैं। 

भवानी बांग्लादेश चंद्रनाथ पर्वत पर छत्राल (चट्टल या चहल) में स्थित है जहाँ सती माता की दाईं भुजा गिरी थी। भवानी इसकी शक्ति हैं व भैरव को चंद्रशेखर कहते हैं। 

भ्रामरी पश्चिम बंगाल के जलपाइगुड़ी के त्रिस्रोत स्थान पर स्थित है जहाँ सती माता का बायां पैर गिरा था। इसकी शक्ति है भ्रामरी और भैरव को अंबर और भैरवेश्वर कहते हैं। 

कामाख्या असम के कामगिरि में स्थित नीलांचल पर्वत के कामाख्या स्थान पर स्थित है जहाँ सती माता का योनि भाग गिरा था। कामाख्या इसकी शक्ति है व भैरव को उमानंद कहते हैं। "

"कामाख्या देवी जागृत देवी हैं। वैसे तो सभी शक्तिपीठ की देवियाँ जागृत मानी जाती हैं लेकिन कामाख्या देवी बिल्कुल धरती पर जन्म ली हुई स्त्री की तरह हर महीने रजस्वला भी होती हैं और उनके खून से रंगे कपड़े भक्तगण बड़ी श्रद्धा से एक-एक टुकड़ा लेते हैं। हर महीने 3 दिन तक उनका मंदिर बंद रहता है। इस दौरान उनके दर्शन करना निषेध है। 

कामाख्या मंदिर सभी शक्तिपीठों का महापीठ माना जाता है। इस मंदिर में देवी दुर्गा या माँ अम्बे की कोई मूर्ति या चित्र आपको दिखाई नहीं देगा। बल्कि मंदिर में एक कुंड बना है जो कि हमेशा फूलों से ढका रहता है। इस कुंड से हमेशा ही जल निकलता रहता है। चमत्कारों से भरे इस मंदिर में देवी की योनि की पूजा की जाती है और योनी भाग के यहाँ होने से माता यहाँ रजस्वला भी होती हैं। 

दूसरे शक्तिपीठों की अपेक्षा कामाख्या देवी मंदिर में प्रसाद के रूप में लाल रंग का गीला कपड़ा दिया जाता है। कहा जाता है कि जब माँ को तीन दिन का रजस्वला होता है, तो सफेद रंग का कपड़ा मंदिर के अंदर बिछा दिया जाता है। तीन दिन बाद जब मंदिर के दरवाजे खोले जाते हैं, तब वह वस्त्र माता के रज से लाल रंग से भीगा होता है। इस कपड़े को अम्बुवाची वस्त्र कहते है। इसे ही भक्तों को प्रसाद के रूप में दिया जाता है। "

"यह कैसे संभव है नरोत्तम गिरी। " कैथरीन ने आश्चर्य से पूछा। 

"भारत की धरती इसी तरह के आश्चर्यों से भरी है माता। "पुरोहित जी ने कहा-" अब देखिए न यह भी कम आश्चर्य नहीं है कि आप सात समंदर पार से भारत आई हैं हम नागाओं पर रिसर्च करने, काम करने और लिखने। "

"नहीं, यह आश्चर्य नहीं है। यह भारत की अन्य देशों में महत्ता का सबूत है। आगे बताइए महाकाल गिरी अभी तो बहुत से शक्तिपीठ बाकी हैं। " कैथरीन ने मुस्कुराते हुए कहा। 

कहने की देर थी कि महाकाल गिरी तत्काल ही बताने लगा-"

प्रयाग उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (प्रयाग) के संगम तट पर स्थित है ललिता शक्तिपीठ जहाँ सती माता के हाथ की अंगुली गिरी थी। इसकी शक्ति है ललिता और भैरव को भव कहते हैं। 

जयंती बांग्लादेश के खासी पर्वत पर स्थित है। जयंती मंदिर नाम से जहाँ सती माता की बाईं जंघा गिरी थी। इसकी शक्ति है जयंती और भैरव को क्रमदीश्वर कहते हैं। 

युगाद्या पश्चिम बंगाल के युगाद्या स्थान पर स्थित है जहाँ सती माता के दाएं पैर का अंगूठा गिरा था। इसकी शक्ति है भूतधात्री और भैरव को क्षीर खंडक कहते हैं। 

कालीपीठ कोलकाता के कालीघाट में स्थित है जहाँ सती माता के बाएं पैर का अंगूठा गिरा था। इसकी शक्ति है कालिका और भैरव को नकुशील कहते हैं। 

किरीट विमला पश्चिम बंगाल के मुर्शीदाबाद जिला के किरीटकोण ग्राम के पास स्थित है जहाँ सती माता का मुकुट गिरा था। इसकी शक्ति है विमला व भैरव को संवत्र्त कहते हैं। 

विशालाक्षी यूपी के काशी में मणिकर्णिका घाट पर स्थित है जहाँ सती माता के कान के मणिजडि़त कुंडल गिरे थे। शक्ति है विशालाक्षी मणिकर्णी व भैरव को काल भैरव कहते हैं। "

"अच्छा, अंगों के अलावा जेवर गिरने से भी शक्तिपीठ बन गए?"

कैथरीन के इस प्रश्न का किसी के पास उत्तर नहीं था इसलिए महाकाल गिरी ने अपना वक्तव्य जारी रखा-"

कन्याश्रम नामक स्थान पर सती माता का पृष्ठ भाग गिरा था। इसकी शक्ति है सर्वाणी और भैरव को निमिष कहते हैं। 

सावित्री शक्तिपीठ हरियाणा के कुरुक्षेत्र में है जहाँ सती माता की एड़ी (गुल्फ) गिरी थी। इसकी शक्ति है सावित्री और भैरव को स्थाणु कहते हैं। 

गायत्री अजमेर के निकट पुष्कर के मणिबंध स्थान के गायत्री पर्वत पर स्थित है जहाँ सती माता के दो मणिबंध गिरे थे। इसकी शक्ति है गायत्री और भैरव को सर्वानंद कहते हैं। 

श्रीशैल बांग्लादेश के शैल नामक स्थान पर स्थित है जहाँ सती माता का गला (ग्रीवा) गिरा था। इसकी शक्ति है महालक्ष्मी और भैरव को शम्बरानंद कहते हैं। 

कांची देवगर्भा पश्चिम बंगाल के कोपई नदी तट पर कांची नामक स्थान पर स्थित है जहाँ सती माता की अस्थि गिरी थी। इसकी शक्ति है देवगर्भा और भैरव को रुरु कहते हैं। 

कालमाधव मध्यप्रदेश के सोन नदी तट के पास स्थित है जहाँ सती माता का बायां नितंब गिरा था, जहाँ एक गुफा है। इसकी शक्ति है काली और भैरव को असितांग कहते हैं। 

शोणदेश मध्यप्रदेश के शोणदेश स्थान पर स्थित है शोणाक्षी जहाँ सती माता का दायां नितंब गिरा था। इसकी शक्ति है नर्मदा और भैरव को भद्रसेन कहते हैं। 

शिवानी उत्तर प्रदेश के चित्रकूट के पास रामगिरि स्थान पर स्थित है जहाँ सती माता का दायां वक्ष गिरा था। इसकी शक्ति है शिवानी और भैरव को चँड कहते हैं। 

वृंदावन के भूतेश्वर स्थान पर स्थित है उमा जहाँ सती माता के गुच्छ और चूड़ामणि गिरे थे। इसकी शक्ति है उमा और भैरव को भूतेश कहते हैं। 

शुचि नारायणी कन्याकुमारी-तिरुवनंतपुरम मार्ग पर है वहाँ शुचितीर्थम शिव मंदिर है, जहाँ पर सती माता के दंत (ऊर्ध्वदंत) गिरे थे। शक्तिनारायणी और भैरव संहार हैं। 

वाराही पंचसागर"

"हाँ यह अज्ञात स्थान पर है इसका पता अभी तक नहीं चला है। " नरोत्तम गिरी ने जानकारी देते हुए आगे बताया -"इधर तो सती माता के निचले दंत (अधोदंत) गिरे थे। और इसकी शक्ति है वराही और भैरव को महारुद्र कहते हैं। 

और अपर्णा शक्तिपीठ तो सरहद के उस पार बांग्लादेश के भवानीपुर गाँव के पास करतोया तट स्थान पर है जहाँ सती माता की पायल गिरी थी। इसकी शक्ति अर्पणा और भैरव को वामन कहते हैं। "

कैथरीन इतनी विस्तृत जानकारी सुनकर अवाक थी। केवल महाकाल गिरी ही नहीं अष्टकौशल गिरी और नरोत्तम गिरि भी सभी जानकारी रखते हैं। कमाल है, वह तीनों की विद्वत्ता की कायल हो गई। महाकाल गिरी आगे के शक्तिपीठ बताने लगे-

"श्रीसुंदरी लद्दाख के पर्वत पर स्थित है जहाँ सती माता के दाएं पैर की पायल गिरी थी। इसकी शक्ति है श्रीसुंदरी और भैरव को सुंदरानंद कहते हैं। "

"हमने लद्दाख देखा है पर इस स्थान से अपरिचित रहे। " कैथरीन ने कहा। 

"अगर देखना है तो दोबारा जाना पड़ेगा माता। "

"जरूर जाएंगे पुरोहित जी। "

कितने शक्तिपीठ हो गए महाकाल गिरी?"

"36 हो गए। कपालिनी 37 वां शक्तिपीठ है जो पश्चिम बंगाल के पूर्वी मेदिनीपुर के पास तामलुक स्थित विभाष स्थान पर स्थित है। जहाँ माता की बायीं एड़ी गिरी थी। इसकी शक्ति है कपालिनी (भीमरूप) और भैरव को शर्वानंद कहते हैं। 

चंद्रभागा गुजरात के जूनागढ़ प्रभास क्षेत्र में स्थित है जहाँ सती माता का उदर गिरा था। इसकी शक्ति है चंद्रभागा और भैरव को वक्रतुंड कहते हैं। 

अवंती उज्जैन नगर में शिप्रा नदी के तट के पास भैरव पर्वत पर स्थित है जहाँ सती माता के ओष्ठ गिरे थे। इसकी शक्ति है अवंति और भैरव को लम्बकर्ण कहते हैं। 

भ्रामरी महाराष्ट्र के नासिक नगर स्थित गोदावरी नदी घाटी स्थित जनस्थान पर स्थित है जहाँ सती माता की ठोड़ी गिरी थी। शक्ति है भ्रामरी और भैरव है विकृताक्ष। 

सर्वशैल स्थान आंध्रप्रदेश के कोटिलिंगेश्वर मंदिर के पास स्थित है जहाँ सती माता के वाम गंड अर्थात गाल गिरे थे। इसकी शक्ति है राकिनी और भैरव को वत्सनाभम कहते हैं। 

गोदावरी तीर शक्तिपीठ है। यहाँ माता के दाहिने गाल गिरे थे। इसकी शक्ति है विश्वेश्वरी और भैरव को दंडपाणि कहते हैं। 

रत्नावली कुमारी बंगाल के हुगली जिले के रत्नाकर नदी के तट पर स्थित है जहाँ सती माता का दायां स्कंध गिरा था। इसकी शक्ति है कुमारी और भैरव को शिव कहते हैं। 

उमा महादेवी भारत-नेपाल सीमा पर जनकपुर रेलवे स्टेशन के निकट मिथिला में स्थित है जहाँ सती माता का बायां स्कंध गिरा था। इसकी शक्ति है उमा और भैरव को महोदर कहते हैं। 

कालिका तारापीठ पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के नलहाटि स्टेशन के निकट नलहाटी में स्थित है जहाँ सती माता के पैर की हड्डी गिरी थी। इसकी शक्ति है कालिका देवी और भैरव को योगेश कहते हैं। 

जयदुर्गा कर्नाट यह स्थान भी अज्ञात है। यहाँ सती माता के दोनों कान गिरे थे। इसकी शक्ति है जयदुर्गा और भैरव को अभिरु कहते हैं। 

वकरेश्वर महिषमर्दिनी पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले में पापहर नदी के तट पर स्थित है जहाँ सती माता का भ्रुमध्य अर्थात मन गिरा था। शक्ति है महिषमर्दिनी व भैरव वक्रनाथ हैं। 

यशोरेश्वरी बांग्लादेश के खुलना जिले में स्थित है जहाँ सती माता के हाथ और पैर गिरे (पाणिपद्म) थे। इसकी शक्ति है यशोरेश्वरी और भैरव को चण्ड कहते हैं। 

फुल्लरा पश्चिम बंगाल के लाभपुर स्टेशन से दो किमी दूर अट्टाहास स्थान पर स्थित है जहाँ सती माता के ओष्ठ गिरे थे। इसकी शक्ति है फुल्लरा और भैरव को विश्वेश कहते हैं। 

भले ही सती देवी थीं लेकिन थीं तो स्त्री। एक स्त्री के शरीर के इतने टुकड़े !क्या इससे अधिक व्यथित कर देने वाली कोई बात हो सकती है? आपको नहीं लगता कि भगवान विष्णु सुदर्शन चक्र का इस्तेमाल कभी-कभी गलत भी कर लेते हैं?"

"इस तरह तो कभी सोचा नहीं देवी। इस पर अवश्य सोचा जा सकता है और इस पर तर्क भी दिए जा सकते हैं। " नरोत्तम गिरी के कहने पर कैथरीन ने इस बात का समर्थन किया -"हाँ अवश्य भविष्य में कभी इस पर हम वाद विवाद करेंगे। पहले सभी शक्तिपीठों के बारे में महाकाल गिरी से जान लेते हैं। बताइए महाकाल गिरी जी। "

महाकाल गिरी आगे बताने लगा-"

नंदिनी पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के नंदीपुर स्थित बरगद के वृक्ष के समीप स्थित है जहाँ सती माता का गले का हार गिरा था। शक्ति नंदिनी व भैरव नंदीकेश्वर हैं। 

इंद्राक्षी श्रीलंका में संभवत: त्रिंकोमाली में स्थित है जहाँ सती माता की पायल गिरी थी। इसकी शक्ति है इंद्राक्षी और भैरव को राक्षेश्वर कहते हैं। 

अंबिका विराट भी अज्ञात स्थान पर है जहाँ सती माता के पैर की अंगुली गिरी थी। इसकी शक्ति है अंबिका और भैरव को अमृत कहते हैं। यह 52 वाँ शक्तिपीठ है। 

इसके अलावा पटना-गया इलाके में भी कहीं मगध शक्तिपीठ माना जाता है। पर इसे मान्यता नहीं मिली। "

"इनमें से कुछ शक्तिपीठ तो अघोरियों की साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ माने गए हैं। "

"हाँ नरोत्तम गिरी जी उनमें से

तारापीठ का श्‍मशान बहुत महत्वपूर्ण है। 

"तारापीठ किसे कहते हैं ?"

"शक्तिपीठ का ही दूसरा नाम है माता। कोलकाता से 180 किलोमीटर दूर स्थित तारापीठ धाम की विशेषता वहाँ का महाश्मशान है। वीरभूम की तारापीठ (शक्तिपीठ) अघोर तांत्रिकों का तीर्थ है। यहाँ आपको हजारों की संख्‍या में अघोर तांत्रिक मिल जाएंगे। तंत्र साधना के लिए जानी-मानी जगह है तारापीठ, जहाँ की आराधना पीठ के निकट स्थित श्मशान में हवन किए बगैर पूरी नहीं मानी जाती। कालीघाट को तांत्रिकों का गढ़ माना जाता है

दूसरा महत्वपूर्ण स्थान है कामाख्या देवी का मंदिर जो असम के नीलांचल पर्वत पर स्थित है। प्राचीनकाल से सतयुगीन तीर्थ कामाख्या वर्तमान में तंत्र-सिद्धि का सर्वोच्च स्थल है। कालिका पुराण तथा देवीपुराण में 'कामाख्या शक्तिपीठ' को सर्वोत्तम कहा गया है और यह भी तांत्रिकों का गढ़ है। 

तीसरा है रजरप्पा का श्मशान। रजरप्पा में छिन्नमस्ता देवी का स्थान है। रजरप्पा की छिन्नमस्ता को 52 शक्तिपीठों में शुमार किया जाता है लेकिन जानकारों के अनुसार छिन्नमस्ता 10 महाविद्याओं में एक हैं। उनमें 5 तांत्रिक और 5 वैष्णवी हैं। तांत्रिक महाविद्याओं में कामरूप कामाख्या की षोडशी और तारापीठ की तारा के बाद इनका स्थान आता है। 

चौथा है चक्रतीर्थ का श्‍मशान जो मध्यप्रदेश के उज्जैन में चक्रतीर्थ नामक स्थान पर है और गढ़कालिका का स्थान तांत्रिकों का गढ़ माना जाता है। उज्जैन में काल भैरव और विक्रांत भैरव भी तांत्रिकों का मुख्‍य स्थान माना जाता है। 

"वैसे तो सभी 52 शक्तिपीठ तो तांत्रिकों की सिद्धभूमि हैं ही इसके अलावा कालिका के सभी स्थान, बगलामुखी देवी के सभी स्थान और दस महाविद्या माता के सभी स्थान को तांत्रिकों का गढ़ माना गया है। कुछ कहते हैं कि त्र्यम्बकेश्वर भी तांत्रिकों का तीर्थ है। "

"कहते नहीं बल्कि है पुरोहित जी। त्र्यम्बकेश्वर तांत्रिकों का महत्वपूर्ण स्थान है। " नरोत्तम गिरी ने कहा। 

कैथरीन को और भी बताने की इच्छा से नरोत्तम गिरी ने बताया-"

"और महाकाल गिरी तंत्र की मुख्य 10 देवियां भी हैं जिन्हें 10 महाविद्या कहा जाता है-

1. काली, 2. तारा, 3. षोडशी, (त्रिपुरसुंदरी), 4. भुवनेश्वरी, 5. छिन्नमस्ता, 6. त्रिपुर भैरवी, 7. द्यूमावती, 8. बगलामुखी, 9. मातंगी और 10. कमला। 

इन सभी महाविद्याओं की आराधना तांत्रिक करते हैं। "

"मैं गई तो नहीं हूँ लेकिन जम्मू के कटरा स्थित वैष्णो देवी मंदिर के दर्शनों के बाद भैरव बाबा के मंदिर भी दर्शनों के लिए जाना पड़ता है, जिसे आवश्यक भी कहा गया है। ये भैरव बाबा कौन हैं?"

भैरव बाबा को शिव का अंश अवतार माना जाता है देवी कैथरीन और ये तांत्रिकों के प्रमुख पूजनीय भगवान हैं। इन्हें शिव के 10 रुद्रावतारों में से एक माना गया है। भैरव के 8 रूप हैं-

1. असितांग भैरव, 2. चंड भैरव, 3. रूरू भैरव, 4. क्रोध भैरव, 5. उन्मत्त भैरव, 6. कपाल भैरव, 7. भीषण भैरव, 8. संहार भैरव। "

"और शिव के 10 रुद्रावतार कौन से हैं नरोत्तम गिरी महंत। "

1. महाकाल, 2. तार, 3. बाल भुवनेश, 4. षोडश श्रीविद्येश, 5. भैरव, 6. छिन्नमस्तक, 7. धूमवान, 8. बगलामुख, 9. मातंग और 10. कमल। ये दस रुद्रावतार माने गए हैं। "

"वाह क्या बात है नरोत्तम गिरी। आपकी जिव्हा पर नाम विराजमान हैं। "

"हाँ महाकाल गिरी। गहन अध्ययन किया है मैंने इन सभी विषयों का। 

अघोर संप्रदाय के व्यक्ति शिव जी के अनुयायी होते हैं। इनके अनुसार शिव स्वयं में संपूर्ण हैं और जड़, चेतन समस्त रूपों में विद्यमान हैं। इस शरीर और मन को साध कर और जड़-चेतन और सभी स्थितियों का अनुभव कर के और इन्हें जान कर मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है। आगे आप बताएं महाकाल गिरी। आप के मुख से सुनना अच्छा लगता है। "

महाकाल गिरी प्रतीक्षा में ही था कि उससे कोई बोले और वह आगे बताए-" मेरे अहोभाग्य, आपको मेरे द्वारा दी जानकारी अच्छी लग रही है। माता, अघोर संप्रदाय के साधक समदृष्टि के लिए नर मुंडों की माला पहनते हैं और नर मुंडों को पात्र के तौर पर प्रयोग भी करते हैं। चिता की भस्म का शरीर पर लेपन और चिताग्नि पर भोजन पकाना इत्यादि सामान्य कार्य हैं। अघोर दृष्टि में स्थान भेद भी नहीं होता अर्थात महल या श्मशान घाट एक समान होते हैं। "

"आप वाराणसी जरूर जाना माता और काशी विश्वनाथ और भैरव बाबा के दर्शन अवश्य करना। " अष्टकौशल गिरी ने कैथरीन से कहा। 

"हाँ मैं अवश्य जाऊँगी वहाँ। मुझे तो पूरा भारत ही सतयुग के दौर का लगता है। जगह-जगह मंदिर, जगह-जगह आध्यात्मिक क्रियाएं, कथाएं, इतने सारे ग्रंथ, इतने सारे पँथ। इतना सब कुछ समझने में तो यह जन्म काफी नहीं है। " कैथरीन ने अपनी आँखों में अपार श्रद्धा प्रकट करते हुए कहा। 

"न जाने कितने युगों के हमारे ऋषि-मुनियों, तपस्वियों की खोज संधान और तपस्या का परिणाम है यह सब। हम तो बूँद मात्र ही समझ पाए हैं माता। 

वाराणसी को भारत के सबसे प्रमुख अघोर स्थान के तौर पर मानते हैं। भगवान शिव की स्वयं की नगरी होने के कारण यहाँ विभिन्न अघोर साधकों ने तपस्या भी की है। यहाँ बाबा कीनाराम का स्थल एक महत्वपूर्ण तीर्थ भी है। काशी के अतिरिक्त गुजरात के जूनागढ़ का गिरनार पर्वत भी एक महत्वपूर्ण स्थान है। जूनागढ़ को अवधूत भगवान दत्तात्रेय के तपस्या स्थल के रूप में जानते हैं। 

अघोरपन्थ की तीन शाखाएँ प्रसिद्ध हैं - औघड़, सरभंगी, घुरे। इनमें से पहली शाखा में जो औघड़ आए वे किनाराम बाबा के गुरु थे। कुछ लोग इस पन्थ को गुरु गोरखनाथ के भी पहले से प्रचलित बतलाते हैं और इसका सम्बन्ध शैव मत के पाशुपत अथवा कालामुख सम्प्रदाय के साथ जोड़ते हैं। 

इस पन्थ को साधारणत: 'औघड़ पथ ' भी कहते हैं। इसके अनुयायियों में सभी जाति के लोग, मुस्लिम तक हैं। विलियम क्रुक ने अघोरपन्थ के सर्वप्रथम प्रचलित होने का स्थान राजपूताना के आबू पर्वत को बतलाया है, किन्तु इसके प्रचार का पता नेपाल, गुजरात एवं समरकन्द जैसे दूर स्थानों तक भी चलता है और इसके अनुयायियों की संख्या भी कम नहीं है। "

"वाह ग्रेट, अद्भुत है अघोर पंथ। "

"असम, जिसे कभी कामरूप प्रदेश के नाम से भी जाना जाता था, ऐसा ही एक स्थान है जहाँ रात के अंधेरे में शमशाम भूमि पर तंत्र साधना कर पारलौकिक शक्तियों का आह्वान किया जाता है। यहाँ होने वाली तंत्र साधनाएं पूरे भारत में प्रचलित हैं। यूँ तो असम में अभी भी कुछ समुदायों में मातृ सत्तात्मक व्यवस्था चलती है लेकिन कामरूप में इस व्यवस्था की महिलाएं तंत्र विद्या में बेहद निपुण हुआ करती थीं। 

तारापीठ : तारापीठ को तांत्रिकों, मांत्रिकों, शाक्तों, शैवों, कापालिकों, औघड़ों आदि सबमें समान रूप से प्रमुख और पूजनीय माना गया है। इस स्थान पर सती पार्वती की आँखें भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से कटकर गिरी थीं इसलिए यह शक्तिपीठ बन गया। 

और सुनिए माता प्रयागराज जहाँ महाकुंभ का मेला भरता है सैकड़ों वर्ष पहले जब प्रयागराज पूरी तरह से घनघोर जंगल व वनस्पतियों का केंद्र था। तब तीनों ओर नदियों से घिरा व गंगा, यमुना, सरस्वती का यह मिलन क्षेत्र व आध्यात्मिक स्थल हमेशा से देवताओं व साधु-संतों को अपनी ओर आकर्षित करता रहता था। मान्यता है कि चार सौ साल से अधिक समय पहले एक औघड़ साधु शिव की आज्ञा अनुसार प्रयागराज आए। घनघोर जंगल के बीच उन्होंने मिट्टी से ही शिवलिंग स्थापित किया और वहीं पर अपनी धूनी रमा दी। जब लोगों का इस निर्जन वन क्षेत्र में आने जाने का क्रम बढ़ गया और लोग इस दिव्य स्थल पर दर्शन करने के लिए आने लगे तो अचानक रहस्यमय तरीके से वह औघड़ साधु गायब हो गए। औघड़ साधु के बारे में सिर्फ लोगों को इतना पता था कि वह कैलाश पर्वत से आए थे और उसके बाद लोगों ने उन्हें कभी नहीं देखा। जनश्रुति है कि हर रात्रि में औघड़ साधु यहाँ विश्राम करते हैं और सुबह शिवलिंग के आसपास साफ सफाई और भगवान का सर्वप्रथम पूजन करते हैं। सुबह मंदिर जाने वाले इस बात का हमेशा से दावा करते हैं, लेकिन अब खुली आँखों से कोई भी उस औघड़ साधु को नहीं देख पाता है। 

इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग को उसी औघड़ साधु के नाम पर कमौरी महादेव के रूप में प्रसिद्धि मिली है। अब इस जगह पर एक सुंदर मंदिर बन चुका हैं। बेहद ही शांत वातावरण में आश्चर्यजनक तरीके से यहाँ विभिन्न फूलों की सुगंध की अनुभूति होती है। लेकिन, यहाँ फूलों का स्रोत कहाँ है, आज तक कोई नहीं जान पाया है। यहाँ आसपास न फूलों के बाग हैं न कुछ ऐसा जिसे फूलों की महक का कारण बताया जा सके। लोग इसे चमत्कार मानते हैं और यह इसकी ख्याति को चार चाँद लगाता है। कमौरी महादेव के दर्शन के लिए देश विदेश से लोग आते हैं। "

अपनी तरफ से अष्टकौशल गिरी ने कैथरीन को अघोरियों की सारी जानकारी दे दी थी। जानकारी देते हुए वह कई बार अतीत में गोते लगाता रहा। सोचता रहा अच्छा हुआ उसने अघोरी पंथ त्यागकर नागा पंथ अपना लिया। उसे लगता है अब वह ईश्वर के अधिक नजदीक है। 

इस समय गुफा में धूनी में चटखती लकड़ियों की आवाज थी और चिलम के धुँए के चक्र में बैठे महाकाल गिरी और नरोत्तम गिरी थे जो कैथरीन को किसी फरिश्ते से कम नहीं लग रहे थे। इतना ज्ञान, इतनी विद्वत्ता जिन्हें वह साधारण साधु समझ रही थी वह किसी महाविद्यालय के प्रोफेसर से कम नहीं थे। बल्कि अधिक ही थे। 

घंटा भर और बैठी कैथरीन गुफा में। 

"कुछ अपने बारे में भी बताइए माता। " पुरोहित जी ने पूछा। 

"पुरोहित जी मुझे मालूम था आप यह सवाल मुझसे जरूर पूछेंगे। और पूछना भी चाहिए हम एक दूसरे को जान लें तभी तो आगे का सफर तय होगा। मैं अनमैरिड हूँ, अविवाहित। उम्र 37 वर्ष। एक बेटी है मेरी 16 वर्ष की। मैंने उसे गोद लिया है। "

"आपकी दत्तक पुत्री! "पुरोहित जी ने पूछा। 

" जी हाँ, मैंने उसका जास्मिन नाम बदलकर, आद्या रख दिया है। हिंदू आध्यात्म में आद्या शक्ति का प्रतीक है। वह आद्या कैथरीन बिलिंग के नाम से जानी जाती है। सिडनी में मेरा बुटीक है। वह भी बुटीक में फैशन डिजाइनिंग का काम सीख रही है। मैं उसे बहुत प्यार करती हूँ। हिंदू आध्यात्म ने मुझे बहुत ज्यादा प्रभावित किया है। दावा तो नहीं करती पर लगभग सभी आध्यात्मिक ग्रंथों को मैंने पढ़ा है और इसीलिए संस्कृत भी सीखी मैंने। इतना तो कहूँगी कि हिंदी और संस्कृत में साहित्य का विपुल भंडार है भारत के पास। बहुत साल लगेंगे उस भंडार को पढ़ने में। लेकिन पढ़ने की प्रतिज्ञा कर ली है मैंने। इस बार तो समय नहीं है, देर से मिले आप लोग, लेकिन भविष्य में और भी बहुत कुछ आपसे जानना चाहूँगी। अब विदा चाहती हूँ। "

कहते हुए वह उठने का उपक्रम करने लगी। 

कैथरीन की विद्वता से तीनों नागा सन्यासी और पुरोहित जी बहुत प्रभावित हुए। चारों उसे तंबू तक विदा करने आए। 

"अब आप से न जाने कब मुलाकात होगी। हम सुबह 4:00 बजे तप के लिए पहाड़ों पर चले जाएंगे। "

नरोत्तम गिरी ने उदासी नहीं आने दी चेहरे पर। 

"नरोत्तम गिरी हम शीघ्र मिलेंगे। दुनिया इतनी भी बड़ी नहीं। " कहते हुए उसने नरोत्तम गिरी के दोनों हाथ पकड़कर माथे से लगा लिए। थोड़ी देर मानो पत्ता भी नहीं खड़का। थोड़ी देर मानो सृष्टि थम गई। यह कैसा एहसास था जो नरोत्तम गिरी के लिए कैथरीन के हृदय में हो रहा था। यही शायद सृष्टि का वह चरम बिंदु है जिसमें चराचर जगत समाया हुआ है। आदि अंत से परे। 

वह तंबू का पर्दा उठा रही थी कि पुरोहित जी ने रोका -"रूकिए माता, यह आपके लिए हमारी तरफ से। हमें याद रखना और सुबह जाने से आधे घंटे पहले जगा देना। या हम स्वयं ही जाग जाएंगे। जड़ी बूटी वाली चाय से आपका थरमस भर देंगे। " कहते हुए पुरोहित जी ने भोजपत्र पर लिखे हुए भगवत गीता के कुछ श्लोक उसे दिए। कैथरीन ने भोजपत्र माथे से लगाए और सबका अभिवादन करते हुए तंबू के अंदर प्रवेश किया। लगा जैसे तंबू में नरोत्तम गिरी पहले से मौजूद है। और कह रहा है "रुक जाओ। "

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