इस घर में प्यार मना है… क्योंकि यहाँ प्यार ने कभी किसी को पूरा नहीं छोड़ा। या शायद… क्योंकि इस घर का मालिक प्यार से नफरत करता है। अध्याय 1— एक अनचाही शादी “संस्कृति… तैयार हो जाओ।” माँ की आवाज़ कानों में पड़ी, लेकिन संस्कृति का ध्यान आईने में दिख रही अपनी ही परछाईं पर अटका था। लाल जोड़ा, भारी गहने और आँखों में वो डर… जो किसी दुल्हन का नहीं होता। आज उसकी शादी थी। कार्तिक रघुवंशी से। एक ऐसा नाम… जिसे सुनते ही पूरे शहर में खामोशी छा जाती थी। संस्कृति ने धीरे से खुद से पूछा— “क्या शा
इस घर में प्यार मना है - 1
इस घर में प्यार मना है…क्योंकि यहाँ प्यार ने कभी किसी को पूरा नहीं छोड़ा।या शायद…क्योंकि इस घर का प्यार से नफरत करता है।अध्याय 1— एक अनचाही शादी“संस्कृति… तैयार हो जाओ।”माँ की आवाज़ कानों में पड़ी, लेकिन संस्कृति का ध्यान आईने में दिख रही अपनी ही परछाईं पर अटका था। लाल जोड़ा, भारी गहने और आँखों में वो डर… जो किसी दुल्हन का नहीं होता।आज उसकी शादी थी। कार्तिक रघुवंशी से।एक ऐसा नाम… जिसे सुनते ही पूरे शहर में खामोशी छा जाती थी।संस्कृति ने धीरे से खुद से पूछा—“क्या शादी के बाद ज़िंदगी शुरू होती है… या यहीं खत्म ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 2
कमरे में सन्नाटा था।इतना गहरा… कि संस्कृति की सिसकियाँ भी उसे तोड़ नहीं पा रही थीं।वो वहीं बैठी रही। की तरह सजी… लेकिन किसी बेवा से भी ज़्यादा अकेली।धीरे-धीरे उसने फाइल अपने हाथ से नीचे रख दी। जैसे उसमें लिखा हर शब्द उसके दिल पर किसी ने नुकीले पत्थर से उकेर दिया हो।संस्कृति (खुद से, टूटती आवाज़ में) बोली -“तो यही है… शादी?”उसने कंगन उतार दिए। एक-एक करके। गहने उतार कर इधर उधर फेंक दिए। हर खनक के साथ उसकी उम्मीद टूटती गई।आईने में खुद को देखा—लाल जोड़ा अब बोझ लग रहा था। सिंदूर… जैसे किसी और की कहानी ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 3
संस्कृति अब वर्क फ्रॉम होम में नहीं… बल्कि नियमों के बीच काम करने लगी थी। अकेलापन अब सिर्फ़ घर सीमित नहीं था। वो उसके साथ ऑफिस तक चला जाता।सुबह-सुबह सास की आवाज़ उसके कानों में गूँजती रहती।सास (सख्त लहजे में) बोली -ऑफिस जाना है तो ये बात दिमाग़ में रखना—संस्कृति चुपचाप साड़ी की पल्लू ठीक करती।सास बोली -साड़ी पहनकर जाना।ज्यादा मेकअप नहीं।लिपस्टिक हल्की।बाल खुले नहीं रहने चाहिए।संस्कृति ने सिर हिला दिया।सास बोली -किसी से ज़्यादा बात नहीं करोगी। खासतौर पर मर्दों से।एक और नियम।सास बोली -हँसना नहीं है। ऑफिस घूमने की जगह नहीं है।संस्कृति का दिल और सिकुड़ गया।लेकिन ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 4
घर में शाम का सन्नाटा था। कमरे की खिड़की से हल्की धूप अंदर आ रही थी। लेकिन कमरे में कार्तिक उस हल्की रोशनी के बीच भी पूरी तरह खोया हुआ लगता था।वो थका हुआ था… और मानसिक रूप से पूरी तरह खाली।उसका दिमाग ब्लैंक था। सिर्फ दीवार को घूर रहा था,जैसे दुनिया में कुछ भी न हो।संस्कृति खिड़की से बाहर झांक रही थी। उसके मन में एक ख्याल आया—संस्कृति (मन में) बोली -अगर मैं इस घर को फिर से पहले जैसा बनाना चाहती हूँ…तो पहले घर के बड़े बेटे को अपने वश में करना होगा।पर कैसे?वो कुछ पल के ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 5
शादी को कुछ ही दिन बीते थे।संस्कृति अब भी उस घर को समझने की कोशिश में थी—कि कब, कैसे ठीक होगा।लेकिन उस दिन उसके शरीर ने उसे धोखा नहीं दिया… समाज ने दिया।सुबह-सुबह संस्कृति को दर्द महसूस हुआ।वो समझ गई—पीरियड्स हो गए।उसने चुपचाप अपना काम निपटाने की कोशिश की, लेकिन बातसास तक पहुँच गई।सास की आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी—राम-राम-राम!गंदी लड़की!पूरे घर को अशुद्ध कर दिया!संस्कृति सन्न रह गई।सास ने उसका हाथ ज़ोर से पकड़ा और घसीटते हुए घर के पिछले हिस्से की तरफ ले चली।संस्कृति डर गई।संस्कृति बोली -माँजी… मुझे दर्द हो रहा है…।लेकिन कोई नहीं रुका। ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 6
आधी रात हो चुकी थी। पूरा घर गहरी नींद में था।सन्नाटा इतना गहरा कि कार्तिक के कदमों की आहट खुद ही चुभ रही थी। उसके हाथ में एक पुरानी लोहे की रॉड थी। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। वो उसी घर के पीछे की तरफ बढ़ा… जहाँ वो अंधेरा कमरा था।कार्तिक ने चारों ओर देखा। सब सो रहे थे।उसने ताले पर रॉड मारी—कड़क!एक बार। फिर दूसरी बार।क्लिक!ताला टूट गया। दरवाज़ा खुलते ही सीलन और बदबू का झोंका आया। कार्तिक का दिल और बैठ गया।कमरे के कोने में संस्कृति सिकुड़ी हुई पड़ी थी।चेहरा पसीने से भीगा, होंठ नीले पड़ते ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 7
रात…जब पूरा घर नींद के बोझ से खामोश हो जाता—तभी कदमों की आहट धीरे-धीरे उस अंधेरे कमरे की ओर हर रात आता। बिना आवाज़ किए। बिना किसी को बताए। उसके हाथ में हमेशा एक ही चीज़ होती , डार्क चॉकलेट।छोटी-सी। सादी-सी। पर उस कमरे में किसी खजाने से कम नहीं।संस्कृति उसे देखते ही समझ जाती—आज भी वो अकेली नहीं है। कार्तिक धीरे से उसके पास बैठता।फिर उसे अपनी गोद में बिठा लेता।कार्तिक (हल्की मुस्कान के साथ) बोला -धीरे-धीरे खाना…दर्द में मीठा अच्छा लगता है।संस्कृति बच्चों की तरह छोटे-छोटे कौर लेती। कार्तिक को खिलाने की कोशिश करती।पर कार्तिक बोलता -मुझे ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 8
रघुवंशी हवेली में नियम पत्थर की लकीरों जैसे थे—दिखते नहीं थे, पर हर साँस में महसूस होते थे।और अब…वो धीरे-धीरे मिट रही थीं।कार्तिक और संस्कृति दोनों ने मिलकर घर के नियम तोड़ दिए थे।बिना आवाज़। बिना ऐलान। बिना किसी को बताए।इस घर को अब भी लगता था, सब वैसा ही है। पर एक कमरा झूठ बोल रहा था।जैसे ही घर की लाइटें बुझतीं—कार्तिक संस्कृति के और करीब आ जाता।कार्तिक (मुस्कुराकर) बोला -दिन भर कितनी चुप रहती हो…थक नहीं जाती?संस्कृति उसके सीने पर सिर रखकर धीरे से बोलती—आपके पास आकर सब ठीक हो जाता है।कार्तिक उसे बच्चों की तरह चिढ़ाता। ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 9
सुबह की पहली किरण अभी खिड़की तक पहुँची भी नहीं थी—कि नीचे से चीख़ने–चिल्लाने की तेज़ आवाज़ें हवेली में उठीं।संस्कृति अब भी कार्तिक की बाँहों में थी। दोनों गहरी नींद में—जैसे दुनिया से बेपरवाह। अचानक शोर और बढ़ा। संस्कृति हड़बड़ाकर उठी।संस्कृति (घबराकर) बोली -नीचे… क्या हो रहा है?कार्तिक भी चौक गया। उसने घड़ी की तरफ़ देखा, सुबह हो चुकी थी। दोनों जल्दी-जल्दी नीचे पहुँचे।और जो देखा—पूरा घर जैसे कटघरे में खड़ा था।ननद नाइट ड्रेस में घबराई हुई एक कोने में खड़ी थी।ससुर जी गुस्से से काँप रहे थे।देवर आधी नींद में आँखें मलता हुआ।नौकर–नौकरानियाँ सिर झुकाए चुपचाप।और बीच में—सास।बस ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 10
किसी को नहीं पता था—कि संस्कृति सिर्फ इस घर से नहीं, अपनी ही बीमारी से भी लड़ रही थी।संस्कृति हेलुसिनेशन होते थे। और उसके साथ-साथ स्लीप पैरालिसिस।ऐसी बीमारी जिसमें आँखें खुली रहती हैं,दिमाग जागता रहता है—पर शरीर मर चुका-सा हो जाता है।शादी के बाद जब से कार्तिक हर रात उसके पास सोता था तब वो सुरक्षित थी।क्योंकि उसे पता था अगर डर आएगा तो कोई उसे हिला देगा।कोई कहेगा—मैं यहीं हूँ।काली कोठरी में अंधेरा और गहरा हो गया। सीलन की बदबू।दीवारों से टपकती नमी।संस्कृति घुटनों में सिर छुपाकर रोती रही।संस्कृति (सिसकते हुए) बोली -कार्तिक जी…मुझे डर लग रहा है…।लेकिन ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 11
रात…एक बार फिर पूरी हवेली नींद में डूबी हुई थी। पर इस बार कार्तिक नहीं सोया था। उसकी आँखों नींद नहीं फ़ैसला था।जैसे ही सबके कमरों की लाइटें बुझीं—कार्तिक सीधे उस काली कोठरी की ओर गया। उसके हाथ काँप नहीं रहे थे।धड़ाम!एक ही वार में ताला टूट गया।कार्तिक जैसे ही अंदर घुसा—उसका दिल फट पड़ा। संस्कृति ज़मीन से टेक लगाए बैठी थी।मुँह पर टेप चिपका हुआ। आँखें डर से फटी हुई। शरीर थरथरा रहा था।कार्तिक (टूटती आवाज़ में) बोला -संस्कृति…वो भागकर उसके पास पहुँचा। काँपते हाथों से तुरंत उसके मुँह से टेप हटाया। टेप हटते ही संस्कृति एक पल ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 12
आँगन में अब सन्नाटा नहीं था—वहाँ डर जम गया था। कार्तिक अब भी दरवाज़े की तरफ़ भागना चाहता था—कि उसके पिता आगे आए। आवाज़ शांत थी, पर निर्दयी।ससुर बोले -बहुत हो गया, कार्तिक।उन्होंने कार्तिक के हाथ को ज़ोर से पकड़ा—और मोहन की तरफ़ इशारा किया।वो बोले -तुम दोनों—अभी।कार्तिक और उसका छोटा भाई मोहन—दोनों को एक कमरे में धकेल दिया गया।धड़ाम!दरवाज़ा बंद।बाहर से कुंडी चढ़ी—और ताला।अंदर…कमरे में अँधेरा नहीं था—पर घुटन थी।मोहन घबराया हुआ इधर-उधर देख रहा था।मोहन (काँपती आवाज़ में) बोला -भैया…ये क्या हो रहा है?कार्तिक ने पूरी ताक़त से दरवाज़ा पीटना शुरू किया।कार्तिक बोला -दरवाज़ा खोलिए!आपको अंदाज़ा भी ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 13
गाँव की सीमा। चारों रात भर चलते रहे। पैरों में छाले थे। साँस टूटी हुई थी। सूरज उग चुका , जब उन्हें एक छोटा सा गाँव दिखा।मोहन (थकी आवाज़ में) बोला -भैया…बस…अब नहीं चल पा रहा…।कार्तिक रुक गया। संस्कृति अब भी उसकी गोद में थी। पूजा भी लड़खड़ा रही थी। जैसे ही चारों गाँव की पहली गली में घुसे—लोगों ने उन्हें देख लिया।एक बूढ़ा आदमी (घबराकर) बोला -अरे…ठाकुर साहब!कुछ ही पल में…खबर आग की तरह फैल गई।रघुवंशी आए हैं…जहाँ डाँट पड़नी चाहिए थी वहाँ—लोग सिर झुकाकर खड़े हो गए। औरतें घूँघट में। मर्द नज़रें नीचे।गाँव का प्रधान (काँपती आवाज़ ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 14
वहीं हवेली जो हमेशा कब्र जैसी खामोश रहती थी—आज चीख़ रही थी। नौकरों की लाइन लगी है ।आँगन में नौकर-नौकरानियाँ सिर झुकाए खड़े थे।सास (गुस्से में) बोली -किसकी वजह से वो चारों भागे?!बोलो! किसने मदद की?!कोई जवाब नहीं सिर्फ डर।सास बोली -तुम!एक बूढ़े माली की तरफ़ इशारा करते हुए बोली -तुम्हारी वजह से सब हुआ!माली (काँपते हुए) बोला -मालकिन…मैंने तो…कुछ भी…माली के थप्पड़ पड़ा — छन्न!सास बोली -चुप!सास बोली -आज से तुम…और तुम…और तुम…तीन लोगों की तरफ़ उँगली करके बोली -इस हवेली में नौकरी नहीं करोगे!एक नौकरानी फूट-फूट कर रो पड़ी।नौकरानी बोली -मालकिन…हमारे छोटे छोटे बच्चे हैं…सास बोली -तो ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 15
उस दिन मनमोहन और प्रार्थना किसी काम से गाँव के दूसरे छोरगए हुए थे। घर पहली बार पूरी तरह था। केशव ने मौका देखाकेशव (थोड़ा झिझकते हुए) बोला -सत्यभामा…आज बस हम दोनों…थोड़ी देर बात करें?सत्यभामा (मुस्कुराकर) बोली -क्यों नहीं…छत पर धूप ढल चुकी थी। हवा हल्की ठंडी थी। दोनों पास-पासबैठे। बातों का सिलसिला चालू हुआ।केशव बोला -तुम्हें पता है…मैंने कभी ज़िंदगी से कुछ नहीं माँगा था।सत्यभामा बोली -और अब?केशव (धीरे से) बोला -अब…सिर्फ़ तुम्हें चाहता हूं।सत्यभामा कुछ नहीं बोली। बस नज़रें झुका लीं।केशव बोला -उस हवेली में…मैं पत्थर बन चुका था।पर तुमने…मुझे फिर से इंसान बना दिया।सत्यभामा की आँखें ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 16
दोपहर का खाना खत्म हो चुका था। चारों आँगन में चटाई पर बैठे थे। हवा हल्की-हल्की चल रही थी। ने पानी का गिलास रखते हुए अचानक पूछ लिया—प्रार्थना (मुस्कुराते हुए) बोली -वैसे…भाभी…गुड न्यूज़ कब दे रही हो?सत्यभामा एकदम अटक गई।सत्यभामा बोली -क… क…क्या?!उसके गाल लाल हो गए।मनमोहन (हँसते हुए) बोला -हां भैया…मुझे चाचा बोलने वाला कब आ रहा है ?केशव का गला सूख गया।केशव बोला -तुम दोनों…प्रार्थना (मज़ाक उड़ाते हुए) बोली -और मैं बुआ कब बनूँगी?सत्यभामा ने तकिया उठाकर प्रार्थना की तरफ़ फेंका।सत्यभामा बोली -तुम दोनों बहुत बेशर्म हो गए हो!मनमोहन बोला -बेशर्म नहीं…उत्साहित हैं! भाभी!केशव (हँसते हुए, सिर ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 17
पाँच महीने कैसे पंख लगाकर उड़ गए… किसी को पता ही नहीं चला। उधर हवेली में… एक दिन ससुर पास उसका ख़बरी आया।ख़बरी (धीमी आवाज़ में) बोला -मालिक…वो लोग मिल गए हैं।ससुर (चौंककर) बोला -कहाँ?ख़बरी बोला -पास के ज़िले के.... वीरपुर गाँव में।ससुर की आँखों में आग जल उठी।ससुर बोला -पाँच महीने…और ये लोग यहीं चैन से जी रहे हैं?उसी रात…सास और ससुर कुछ आदमियों के साथ गाँव के लिए निकल पड़े।इधर गाँव में…शाम ढल रही थी। सत्यभामा या बोलो संस्कृतिआँगन में पानी भर रही थी। तभी…उसे दूर से कुछ जानी-पहचानीशक्लें दिखीं। उसका चेहरा।फक्क पड़ गया।संस्कृति (घबराकर) बोली -ये…ये ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 18
वो लोग चले गए। सास–ससुर और उनके आदमी पीछे मुड़े भी नहीं। उन्हें पूरा यकीन था अब सब खत्म। उनकी कहानी निगल चुकी है।लेकिन…कहते हैं ना —जाको राखे साइयां मार सके ना कोय।बाल न बांका कर सके जो जग बैरी होय।।और आज ये सच होने वाला था। बहती हुई दो साँसें नहर का पानी तेज था। खून से लाल होते कपड़े। दो घायल शरीर बहते चले जा रहे थे। कार्तिक का हाथ अब भी संस्कृति की उंगलियों में फंसा था।बेहोशी में भी जैसे उसने छोड़ना नहीं सीखा था। पानी का बहावउन्हें गांव से दूर नीचे की ओर ले गया। ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 19
छोटा सा कमरा। पीली बल्ब की रोशनी। रात गहरी हो चुकी थी।खिड़की से हल्की ठंडी हवा आ रही थी। कमरे के बीच में —एक ही बिस्तर। दोनों दरवाज़ा बंद करके अंदर आए। कुछ पल शांति रही। फिर…दोनों की नजर एक साथ बिस्तर पर पड़ी।रुद्रांश (सीधा) बोला -मैं बेड पर सोऊँगा।खुशी (भौंह उठाकर) बोली -क्यों?रुद्रांश बोला -क्योंकि मैं पहले बोला।खुशी बोली -तो? पहले बोलने से हक मिल जाता है क्या?रुद्रांश ने तकिया उठाकर बेड पर फेंका।रुद्रांश बोला -मैं जमीन पर नहीं सोने वाला।खुशी (हाथ बाँधकर) बोली -और मैं भी नहीं।दोनों आमने-सामने। जैसे कोई युद्ध शुरू होने वाला हो।रुद्रांश बोला -देखो, ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 20
सुबह की हल्की धूप खिड़की से अंदर आ रही थी। कमरे में शांति थी। रुद्रांश अब भी आँखें बंद पड़ा था। उसे याद नहीं था वो कहाँ है। बस…एक एहसास था। एक नरम सी खुशबू। एक गर्माहट। एक मुलायम सा शरीर उसकी बाँहों में सिमटा हुआ। उसकी साँसें उसकी छाती से टकरा रही थीं। रुद्रांश ने हल्की सी भौंहें सिकोड़ लीं।रुद्रांश (मन में) बोला -ये… क्या है?उसे लगा वो सपना देख रहा है। कोई अपना…बहुत अपना…जो उससे लिपटा हुआ है। वो उस एहसास में खो जाना चाहता था। उसने अपनी पकड़ थोड़ी और कस ली। अपने पैर भी धीरे ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 21
दिन बीत रहे थे, पर खुशी और रुद्रांश के बीच लगातार टकराहट बनी रहती थी। हर छोटी बात पर हर छोटी मुस्कान पर शक।सुबह का समय था।खुशी अपने कपड़े बदल रही थी। रुद्रांश बिस्तर पर बैठा था।रुद्रांश (गुस्से में) बोला -तुम इतनी देर क्यों ले रही हो? बस कपड़े बदल रहे हो या फिर… कुछ याद कर रही हो?खुशी (झल्लाकर) बोली -मैं याद क्यों करूँ? तुम खुद ही हर समय गुस्से में रहते हो!रुद्रांश (कड़ा स्वर करके) बोला -और तुम हर वक्त सवाल क्यों करती हो? मुझे चुभती हो!खुशी का गुस्सा और बढ़ गया।वो चिल्लाई —अगर हम सच में ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 22
सूरज की हल्की रोशनी कमरे में फैल रही थी। खुशी की आँखें धीरे-धीरे खुलीं। उसका चेहरा लाल था, लज्जा वो पल भर हिल नहीं पाई। रुद्रांश अभी भी नींद में उससे चिपका पड़ा था। उसके होंठ खुशी की गर्दन पर हल्के से दबे हुए थे। चेहरा भी करीब था, हल्का सा दाब रहा था। हल्के-हल्के खर्राटे कमरे में सुनाई दे रहे थे।खुशी ने धीरे-धीरे सांस ली। मन में एक अजीब-सी गर्माहट। दिल की धड़कनें तेज, लेकिन बाहर से वो बिल्कुल शांत थी। उसने हल्का सा हाथ हिलाया, ताकि रुद्रांश जाग जाए। रुद्रांश ने नींद में हाथ फैलाया और उसे ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 23
दिन-ब-दिन रुद्रांश और खुशी एक-दूसरे के करीब होते जा रहे थे।हर छोटी मुस्कान, हर हल्की छुअन उनके दिलों को रही थी।लेकिन वे दोनों अभी भी नहीं जानते थे कि उनका रिश्ता असल में क्या है। सिर्फ एहसास और गर्माहट थी।एक रात, उन दोनों के बीच की नज़दीकियाँ अब शारीरिक स्तर तक पहुँच गईं। उनकी बाँहों की कसावट, हल्की-हल्की चुम्बन की नर्मी…और आगे सब कुछ अनजाने में हुआ।अगली सुबहखुशी की आँखें धीरे-धीरे खुलीं। पूरा शरीर थका हुआ, हल्का दर्द महसूस हो रहा था। लेकिन इस दर्द में भी उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। दिल कह रहा था — ये ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 24
धीरे-धीरे, खुशी और रुद्रांश की यादें पूरी तरह लौटने लगीं।हर हल्का सा एहसास, हर मुस्कान, हर छुअन उनके भीतर असली पहचान को जगाने लगा। एक शाम, दोनों कमरे में बैठे थे।खुशी ने अचानक कहा—मुझे कुछ याद आने लगा है…हम… हम पहले भी… एक-दूसरे को जानते थे।हम… कार्तिक और… संस्कृति?रुद्रांश की आंखें बड़ी हो गईं।उसने धीमे स्वर में कहा—हाँ… यही सच है। हम… वही हैं। हमने सब भूलकर… खुद को नए नाम दे दिए थे—ख़ुशी और रुद्रांश। पर अब… हमारी असली पहचान लौट रही है।”धीरे-धीरे उन्हें सब याद आया—हवेली, जहां सब कुछ शुरू हुआ। डर, दर्द और मजबूरी के दिन।प्यार ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 25
सगाई के बाद हवेली में जैसे त्योहारों की कतार लग गई। सबसे पहले आई हल्दी की सुबह… हल्दी की का आँगन। पीले फूलों की खुशबू, हल्की धूप और ढोलक की मीठी थाप। बीच में चौकी सजी थी। पूजा पीले रंग की सादी लेकिन खूबसूरत साड़ी में बैठी थी। चेहरे पर हल्की-सी झिझक… और ढेर सारी खुशी। संस्कृति ने खुद हल्दी घोली थी — चंदन, केसर और गुलाबजल मिलाकर।मोहन शरारती अंदाज़ में बोला —आज तो भाभी, हम पूजा को पूरा पीला आम बना देंगे!सब हँस पड़े।बसबसे पहले कार्तिक ने बहन के माथे पर हल्दी लगाई।उसकी आँखों में दुआ थी —मेरी ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 26
फिर क्या था…चट मंगनी, पट ब्याह! हवेली एक बार फिर सज उठी। इस बार दुल्हन थी — पारो। सादगी लाल जोड़ा, माथे पर सिंदूर…चेहरे पर हल्की घबराहट, लेकिन आँखों में भरोसा।शादी पूरे रीति-रिवाज से हुई। मोहन ने फेरे लेते समय पारो का हाथ कसकर थामा —जैसे वादा कर रहा हो —अब कभी अकेली नहीं छोड़ूँगा।पूजा भी ससुराल से आई थी। अपनी छोटी भाभी को देखकर वह खिल उठी।पूजा (हँसते हुए) बोली—अब तो आपकी भी देवरानी आ गई! भाभी, अब आप अकेली नहीं रहीं।संस्कृति मुस्कुराई। सच में… उसकी देवरानी आ चुकी थी।अगले दिन मुंह दिखाई की रस्म थी। हवेली में ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 27
रात गहरी चुकी थी। हवेली के आँगन में सन्नाटा था…सिर्फ घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी। संस्कृति अपने में खिड़की के पास बैठी थी। चाँदनी हल्की-सी उसके चेहरे पर पड़ रही थी…लेकिन उसकी आँखों में आज उजाला नहीं था। आज पारो को संभालते-संभालते उसके अपने पुराने ज़ख्म हरे हो गए थे। उसे वो दिन याद आने लगे…वो भी एक ऐसी ही रात थी। उसे पहली बार उस घर में पीरियड्स हुए थे।डरी हुई थी… नई-नई बहू… कुछ समझ नहीं आ रहा था।तभी उसकी सास…या कहो काकी सास…उसका हाथ कसकर पकड़ लिया था।वो बोली -चलो! यहाँ रहने की इजाज़त ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 28
कुछ महीने बीत गए। हवेली की जिंदगी अब पूरी तरह बदल चुकी थी। सुबह सब अपने-अपने काम में लग लेकिन एक खास बात थी कि कार्तिक, संस्कृति, मोहन और पारो… चारों एक ही कंपनी में काम करते थे। कंपनी का नाम शहर की सबसे बड़ी टेक कंपनी में गिना जाता था। और वहाँ…कार्तिक उनकी टीम का कैप्टन था।ऑफिस का बड़ा-सा कॉन्फ्रेंस हॉल। स्क्रीन पर प्रोजेक्ट की रिपोर्ट चल रही थी। सामने कंपनी के डायरेक्टर बैठे थे।डायरेक्टर मुस्कुराते हुए बोले —मिस्टर कार्तिक…आपकी टीम ने जो प्रोजेक्ट बनाया है…वो हमारी कंपनी के लिए गेम चेंजर साबित हुआ है।कमरे में तालियाँ गूंज ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 29
विमान धीरे-धीरे स्विट्जरलैंड के पहाड़ों और झीलों के ऊपर से गुजर रहा था। नीले आकाश और सफेद बर्फीले पहाड़ों दृश्य सबके दिल को आनंदित कर रहा था।कार्तिक, संस्कृति, मोहन और पारो अपने नए ऑफिस पहुँचे।कार्यालय बहुत बड़ा, मॉडर्न और ग्लास से ढका हुआ था।हर जगह कर्मचारी व्यस्त थे, लेकिन स्वागत और उत्साह साफ दिखाई दे रहा था। कार्तिक ने टीम का ध्यान खींचा।कार्तिक बोला -यहाँ हम सब मिलकर काम करेंगे।हमारी टीम के लिए ये एक बड़ा अवसर है।और मैं चाहता हूँ कि हम सब साथ रहें और साथ आगे बढ़ें।संस्कृति ने मुस्कान के साथ मोहन और पारो की ओर ...Read More
इस घर में प्यार मना है - 30
सुबह की हल्की धूप खिड़की से अंदर आ रही थी। स्विट्जरलैंड की ठंडी हवा कमरे में तैर रही थी। के दरवाज़े के पास खड़ा मोहन चुपचाप अंदर झाँक रहा था। बिस्तर पर कार्तिक और संस्कृति एक ही कंबल में लिपटे हुए सो रहे थे। संस्कृति का सिर कार्तिक के सीने पर था… और कार्तिक की बाँहें उसके चारों ओर थीं। दोनों इतने गहरी नींद में थे कि उन्हें दुनिया की खबर ही नहीं थी। मोहन की आँखों में शरारत चमक उठी।वो धीरे से पीछे मुड़ा और फुसफुसाकर बोला—पारो… इधर आओ ज़रा… बड़ा दिलचस्प सीन है।पारो धीरे से आई और ...Read More