कुछ हफ्ते बीत चुके थे। संस्कृति का पेट थोड़ा-सा दिखने लगा था।
कार्तिक अब पहले से भी ज्यादा ओवरप्रोटेक्टिव हो गया था।
अगर संस्कृति उठती तो वो बोलता —
रुको… मैं कर देता हूँ।
अगर वो पानी लेने जाती तो —
रुको… मैं लाता हूँ।
मोहन हर बार मज़ाक उड़ाता।
मोहन बोला -
भैया… भाभी प्रेग्नेंट हैं, ग्लास की गुड़िया नहीं।
पारो हंस पड़ती। लेकिन असली ड्रामा तो अभी बाकी था।
एक रात लगभग 1 बजे…सब सो चुके थे। अचानक संस्कृति उठकर बैठ गई। उसका चेहरा अजीब-सा था। कार्तिक की नींद खुली।
कार्तिक बोला -
क्या हुआ संस्कृति?
संस्कृति धीरे से बोली —
मुझे… पानीपुरी खाने का मन कर रहा है।
कार्तिक थोड़ा चौंका।
कार्तिक बोला -
इस समय?
संस्कृति ने धीरे से सिर हिलाया।
संस्कृति बोली -
हाँ… लेकिन… मीठी चटनी और आइसक्रीम के साथ।
कार्तिक कुछ सेकंड उसे देखता रह गया।
कार्तिक बोला -
क्या?
संस्कृति शर्म से हंस पड़ी।
संस्कृति बोली -
पता नहीं क्यों… बस मन कर रहा है।
इतने में पीछे से आवाज आई —
भाभी!!!
दोनों ने पलटकर देखा। दरवाजे पर मोहन खड़ा था। पता नहीं कब से सुन रहा था।
मोहन नाटकीय अंदाज में बोला —
इतिहास में पहली बार…पानीपुरी + आइसक्रीम कॉम्बिनेशन सुन रहा हूँ।
पारो भी पीछे से आ गई।
पारो बोली -
फिर से क्रेविंग शुरू हो गई?
संस्कृति ने शर्माते हुए सिर झुका लिया। कार्तिक ने जैकेट उठाई।
कार्तिक बोला -
चलो मोहन।
मोहन चौंका।
मोहन बोला -
कहाँ?
कार्तिक बोला -
भाभी की क्रेविंग पूरी करने।
मोहन छाती चौड़ी करके बोला —
हाँ! आखिर मैं चाचा बनने वाला हूँ।
मेरी भी जिम्मेदारी है।
पारो हंसते हुए बोली —
जिम्मेदारी कम… ड्रामा ज्यादा है।
थोड़ी देर बाद…कार्तिक और मोहन फिर से रात में दुकान ढूंढते घूम रहे थे। एक जगह उन्हें पानीपुरी का स्टॉल दिख गया। मोहन खुश हो गया।
मोहन बोला -
मिल गई!
लेकिन जब कार्तिक ने पूछा —
आइसक्रीम है?
वाले वाले वाले वाले वाला बेचने वाला आदमी उन्हें घूरने लगा।
वो बोला -
पानीपुरी में… आइसक्रीम?
मोहन बोला —
भाई… प्रेग्नेंसी क्रेविंग है।
लॉजिक मत ढूंढो।
घर पहुँचकर…संस्कृति सोफे पर बैठी इंतजार कर रही थी।
मोहन ने बड़े गर्व से प्लेट रखी।
वो बोला -
लो भाभी…दुनिया की पहली आइसक्रीम पानीपुरी।
संस्कृति हंस पड़ी। उसने पानीपुरी ली… उसमें आइसक्रीम डाली… और खा ली। सबकी नजरें उसी पर थीं। कुछ सेकंड बाद…
संस्कृति बोली —
हम्म…अजीब है… लेकिन अच्छा है।
मोहन बोला —
मुझे भी टेस्ट करना है।
पारो चिल्लाई —
नहीं!!!
लेकिन मोहन ने खा ली। अगले ही सेकंड…उसका चेहरा बिगड़ गया।
मोहन बोला -
हे भगवान!!!
सब हंस पड़े।
मोहन पेट पकड़कर बोला —
ये बच्चा अभी से मेरी परीक्षा ले रहा है।
संस्कृति पेट पर हाथ रखकर हंस पड़ी। कार्तिक प्यार से उसे देख रहा था। उसे बस एक ही खुशी थी संस्कृति खुश थी। और उस घर में एक छोटे से मेहमान के आने की खुशी हर दिन बढ़ती जा रही थी।
समय धीरे-धीरे बीत रहा था। संस्कृति की प्रेग्नेंसी को अब कुछ महीने हो चुके थे। उस सुबह स्विट्ज़रलैंड की ठंडी धूप खिड़की से कमरे में आ रही थी। संस्कृति अलमारी के सामने खड़ी थी। उसने हल्की सी ढीली पीच रंग की अनारकली पहनी। जैसे ही उसने आईने में खुद को देखा…वो कुछ पल के लिए रुक गई। उसका हाथ धीरे-धीरे उसके पेट पर चला गया। अब उसका बेबी बंप साफ दिखाई दे रहा था। उसकी आँखों में हल्की चमक आ गई। उसी वक्त पीछे से कार्तिक आया। वो रुक गया। पहली बार उसने भी इतना साफ संस्कृति का बेबी बंप देखा था। कुछ पल के लिए वो बस उसे देखता रह गया।
कार्तिक धीरे से बोला —
संस्कृति…
संस्कृति मुस्कुराई।
संस्कृति बोली -
देखिए… हमारा बच्चा अब सच में दिखने लगा है।
कार्तिक धीरे-धीरे उसके पास आया। उसने झुककर बहुत प्यार से उसके पेट पर हाथ रखा। उसकी आँखों में एक अलग-सी चमक थी…जैसे कोई सपना सच हो रहा हो। इतने में दरवाज़ा धड़ाम से खुला। मोहन अंदर घुस आया।
मोहन बोला -
भाभी! आज नाश्ते में—
वो बोलते-बोलते रुक गया। उसकी नजर संस्कृति के पेट पर गई।
मोहन की आँखें गोल हो गईं।
मोहन बोला -
ओहोहोहो!!!
संस्कृति हंस पड़ी।
मोहन उत्साह में लगभग कूदते हुए बोला —
भैया!!! अब तो मिनी बॉस साफ दिखाई दे रहा है!
कार्तिक मुस्कुरा दिया। मोहन अचानक घुटनों के बल बैठ गया।
उसने संस्कृति के पेट के पास जाकर धीरे से कहा —
हैलो छोटे बॉस…
संस्कृति और पारो हंसने लगीं।
मोहन बोलता रहा —
मैं तुम्हारा कूल चाचा हूँ।
जब तुम आओगे ना…मैं तुम्हें सबसे पहले बाइक चलाना सिखाऊंगा।
पारो ने तुरंत उसके सिर पर हल्की चपत लगाई।
पारो बोली -
पहले चलना तो सीख लेने दो बच्चे को!
सब हंस पड़े। फिर कार्तिक भी धीरे से झुका। उसने संस्कृति के पेट पर हाथ रखा। उसकी आवाज़ बहुत नरम हो गई।
कार्तिक बोला —
हेलो… बेटा…
कुछ सेकंड वो चुप रहा।
फिर बोला —
मैं तुम्हारा पापा हूँ।
ये कहते ही उसकी आवाज़ हल्की भर्रा गई। संस्कृति ने तुरंत उसकी ओर देखा। कार्तिक की आँखें थोड़ी नम हो गई थीं।
वो धीरे से बोला —
मैं वादा करता हूँ…तुम्हें कभी किसी दर्द से गुजरने नहीं दूँगा।
संस्कृति की आँखें भी भर आईं।
उसने कार्तिक का चेहरा पकड़कर धीरे से कहा —
आप पहले ही बहुत अच्छे पापा बन चुके हैं।
मोहन फिर बोल पड़ा —
अरे! रोना-धोना बंद करो…
फिर पेट की तरफ देखकर बोला —
छोटे बॉस…देख रहे हो ना?
तुम्हारे पापा बहुत इमोशनल हैं।
पारो हंस पड़ी।
पारो बोली -
और तुम्हारे चाचा बहुत ड्रामेबाज।
कमरे में हँसी गूंज उठी। संस्कृति ने अपने पेट पर हाथ रखा।
उसे लग रहा था…अब उनकी जिंदगी में सच में एक नया सूरज उगने वाला है। ☀️
शाम का समय था। बाहर हल्की बर्फ गिर रही थी और कमरे में हीटर की गर्माहट फैली हुई थी। संस्कृति सोफे पर आराम से बैठी थी। कार्तिक उसके पास लैपटॉप लेकर ऑफिस का काम कर रहा था। पारो किचन में चाय बना रही थी और मोहन मोबाइल पर कुछ देख रहा था। अचानक…संस्कृति का हाथ अपने पेट पर चला गया।उसके चेहरे पर अजीब-सी हैरानी आई।
संस्कृति धीरे से बोली —
कार्तिक जी…
कार्तिक ने नजर उठाई।
कार्तिक बोला -
क्या हुआ?
संस्कृति थोड़ा घबराकर बोली —
अभी… अभी ऐसा लगा जैसे पेट में कुछ हिला।
कार्तिक तुरंत घबरा गया।
कार्तिक बोला -
क्या?! दर्द हो रहा है क्या?
डॉक्टर को फोन करें?
संस्कृति हल्का-सा हँस पड़ी।
संस्कृति बोली -
नहीं… दर्द नहीं…बस… जैसे किसी ने अंदर से हल्का सा धक्का दिया हो।
तभी अचानक फिर से वही हलचल हुई। संस्कृति की आँखें चमक उठीं।
वो बोली -
कार्तिक जी! फिर से हुआ!
कार्तिक का चेहरा देखने लायक था।
वो घबराकर बोला —
अरे… ये… ये ठीक है ना?
इतने में मोहन दौड़कर आ गया।
मोहन बोला -
क्या हुआ??
पारो भी किचन से भागकर आई।
संस्कृति हँसते हुए बोली —
लगता है… बच्चे ने पहली बार किक मारी है।
एक सेकंड के लिए सब चुप।
फिर मोहन उछल पड़ा —
क्या बात है!!! छोटे बॉस ने पहली किक मार दी!
वो तुरंत घुटनों के बल बैठ गया और पेट के पास बोलने लगा —
ओये छोटे…इतनी जल्दी फुटबॉल प्रैक्टिस शुरू?
पारो हँस पड़ी।
पारो बोली -
तुम्हारे चाचा को देखकर ही सीख रहा होगा।
मोहन बोला —
भैया! पक्का फुटबॉलर बनेगा ये!
कार्तिक अभी भी थोड़ा घबराया हुआ था। संस्कृति ने उसका हाथ पकड़ा और धीरे से अपने पेट पर रखा। कुछ सेकंड बाद...हल्की-सी फिर किक महसूस हुई। कार्तिक की आँखें फैल गईं।
कार्तिक बोला -
ये… ये सच में हिला!
उसकी आँखें चमकने लगीं।
वो धीरे से बोला —
हमारा बच्चा…
संस्कृति मुस्कुरा दी।
मोहन अचानक बोला —
अच्छा!
अब एक जरूरी मीटिंग होगी!
सब उसकी तरफ देखने लगे।
कार्तिक बोला -
किस बात की?
मोहन बोला —
नाम की मीटिंग!
पारो हँसते हुए बोली —
सही बात है।
संस्कृति भी मुस्कुराने लगी।
मोहन बोला —
अगर लड़का हुआ तो नाम होगा…वीर!
कितना दमदार नाम है।
पारो तुरंत बोली —
नहीं! लड़का हुआ तो नाम होगा आरव।”
मोहन बोला —
ये क्या हुआ?
इतना सीधा नाम?
पारो ने मुँह बना लिया।
पारो बोली -
और तुम्हारा वीर क्या सुपरहीरो है?
संस्कृति हँसते हुए बोली —
मुझे तो आर्यवीर अच्छा लगता है।
मोहन बोला —
भाभी… आपने तो दोनों मिला दिए!
अब कार्तिक चुप बैठा था। सबने उसकी ओर देखा।
संस्कृति बोली —
आप बताइए।
कार्तिक कुछ सेकंड सोचकर बोला —
अगर लड़का हुआ…तो नाम होगा संस्कार।
कमरे में कुछ पल शांति रही। फिर पारो मुस्कुराई।
पारो बोली -
बहुत प्यारा नाम है।
संस्कृति बोली -
अपने हम दोनों के नाम को जोड़ कर बनाया है ना ये नाम।
कार्तिक बोला -
हां! क्योंकि वो हम दोनों के प्यार की निशानी होगा।
अब बारी लड़की की थी।
मोहन बोला —
अगर लड़की हुई तो नाम होगा…नन्ही बॉस!
सब जोर से हँस पड़े।
पारो बोली —
सीरियस रहो!
मोहन बोला -
मेरा मतलब मोहिनी।
पारो बोली -
अपने जैसे ही रख लीजिए।
फिर पारो बोली —
मुझे आराध्या नाम पसंद है।
संस्कृति बोली —
मुझे आस्था अच्छा लगता है।
सबने कार्तिक की ओर देखा।
कार्तिक ने धीरे से कहा —
अगर लड़की हुई…
वो संस्कृति की ओर देखने लगा।
फिर बोला —
तो उसका नाम होगा संशिका।
संस्कृति चौंक गई।
संस्कृति बोली -
क्या?
कार्तिक मुस्कुराया।
कार्तिक बोला -
ये भी मैने हम दोनों के नाम को मिलकर ही मिलाया है। क्योंकि वो हमारे प्यार की निशानी है।
संस्कृति की आँखें नम हो गईं।
मोहन तुरंत बोला —
ठीक है! तो फाइनल लिस्ट ये रही।
वो गिनने लगा —
लड़का — वीर, आरव, आर्यवीर, संस्कार।
लड़की — आराध्या, अनन्या, और मिनी संस्कृति i mean संशिका।
पारो हँसते हुए बोली —
मिनी संस्कृति नहीं!
मोहन बोला —
ठीक है…पत्नी जी।
कमरे में फिर से हँसी गूंज उठी। संस्कृति ने अपने पेट पर हाथ रखा। अंदर से फिर हल्की सी हलचल हुई। जैसे छोटा-सा मेहमान भी इस बहस में अपनी राय दे रहा हो। 😄