वो लोग चले गए। सास–ससुर और उनके आदमी पीछे मुड़े भी नहीं। उन्हें पूरा यकीन था अब सब खत्म। नहर उनकी कहानी निगल चुकी है।
लेकिन…कहते हैं ना —
जाको राखे साइयां मार सके ना कोय।
बाल न बांका कर सके जो जग बैरी होय।।
और आज ये सच होने वाला था। बहती हुई दो साँसें नहर का पानी तेज था। खून से लाल होते कपड़े। दो घायल शरीर बहते चले जा रहे थे। कार्तिक का हाथ अब भी संस्कृति की उंगलियों में फंसा था।
बेहोशी में भी जैसे उसने छोड़ना नहीं सीखा था। पानी का बहाव
उन्हें गांव से दूर नीचे की ओर ले गया। जहाँ नहर थोड़ी चौड़ी होती थी और किनारा मिट्टी का था। एक तेज लहर आई…दोनों धीरे से किनारे की घास में अटक गए।
सुबह गांव उसी समय गांव के दो किसान खेत की तरफ जा रहे थे।
किसान 1 (रुककर) बोला -
अरे… उधर देख…!
किसान 2 बोला -
अरे बाप रे… कोई पड़ा है!
दोनों दौड़ते हुए नहर किनारे पहुंचे। उन्होंने देखा एक युवक और एक युवती खून से लथपथ। सांस…बहुत हल्की।
किसान 1 (घबराकर) बोला -
जिंदा हैं क्या?
किसान 2 ने कान के पास हाथ रखा।
किसान 2 (तेजी से) बोला -
सांस चल रही है! जल्दी कर! गाड़ी ला।
कुछ ही मिनटों में गांव के और लोग इकट्ठा हो गए। किसी ने अपना गमछा जख्म पर बांधा। किसी ने पानी के छींटे मारे। किसी ने ट्रैक्टर-ट्रॉली बुलवाई। संस्कृति हल्का सा कराही।
संस्कृति (बेहोशी में) बोली -
का… र्तिक…जी....
कार्तिक बिल्कुल शांत था।
किसान 1 बोला -
जल्दी! अस्पताल ले चलो! देर मत करो!
सरकारी अस्पताल छोटा था। लेकिन उस दिन वहीं भगवान बैठा था। डॉक्टर भागते हुए आए।
डॉक्टर बोला -
जल्दी स्ट्रेचर लाओ! ऑपरेशन थिएटर तैयार करो!
दोनों को अलग-अलग अंदर ले जाया गया।
नर्स (धीमे) बोली -
बहुत खून बह चुका है…
डॉक्टर बोला -
अभी भी नाड़ी चल रही है। कोशिश करो।
ऑपरेशन थिएटर के बाहर गांव के लोग चुप खड़े थे। किसी को उनका नाम नहीं पता था। किसी को उनकी कहानी नहीं पता थी।
पर सब उनके लिए दुआ कर रहे थे।
एक बूढ़ी औरत हाथ जोड़कर बोली —
हे राम…अगर ये निर्दोष हैं तो इन्हें बचा लेना।
अंदर…डॉक्टर घंटों तक लड़ते रहे। खून रोका गया। चाकू के घाव सीए गए। ड्रिप चढ़ाई गई। समय रुक सा गया था।
कुछ घंटे बाद…डॉक्टर बाहर आए। गांव वाले उम्मीद से उन्हें देखने लगे।
डॉक्टर (गंभीर पर शांत होकर) बोले -
दोनों की हालत नाजुक है…
सबके दिल धक से रह गए।
डॉक्टर (धीरे) बोला -
लेकिन…अब खतरे से बाहर हैं।
एक साथ सबने राहत की सांस ली। वार्ड के अंदर दोनों अलग बेड पर। चेहरे पर पट्टियाँ। हाथों में सलाईन। संस्कृति की उंगलियाँ धीरे से हिलीं। कुछ देर बाद उसकी पलकें कांपीं। उसने धीरे से आंखें खोलीं। छत धुंधली थी।
संस्कृति (बहुत धीमे) बोली -
मैं… जिंदा हूं?
नर्स पास आई।
नर्स (मुस्कुराकर) बोली -
हाँ बिटिया। भगवान ने बचा लिया।
संस्कृति की आंखों से आँसू निकल आए।
संस्कृति (फुसफुसाकर) बोली -
मैं कौन हूं…?
संस्कृति ने आंखें बंद कर लीं। उसी समय दूसरे बेड पर कार्तिक की उंगलियाँ हिलीं। जैसे मौत से लौटकर दोनों ने एक साथ जीना चुन लिया हो। अब कहानी खत्म नहीं हुई थी। अब ये कहानी बदलेगी। क्योंकि…अब वो डरे हुए बच्चे नहीं थे। अब वो जिंदा बचे हुए सच थे।
अस्पताल की सफ़ेद दीवारें अब शांत थीं…पर भीतर एक नई हलचल शुरू हो चुकी थी। डॉक्टर को धीरे-धीरे एहसास हुआ घाव सिर्फ शरीर पर नहीं थे,
यादों पर भी थे।
वार्ड — सुबह
संस्कृति बिस्तर पर बैठी थी। खिड़की से आती धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी। डॉक्टर पास आए।
डॉक्टर (धीरे) बोले -
बेटा… तुम्हारा नाम क्या है?
संस्कृति ने डॉक्टर की तरफ देखा। कुछ पल सोचा।
संस्कृति (उलझन में) बोली -
नाम…?
उसकी भौंहें सिकुड़ गईं।
संस्कृति बोली -
मुझे… याद नहीं…
दूसरे बेड पर कार्तिक बैठा था। डॉक्टर उसकी ओर मुड़े।
डॉक्टर बोले -
और तुम्हारा नाम?
कार्तिक ने झुंझलाकर जवाब दिया —
अगर पता होता तो पूछते क्यों?
डॉक्टर ने एक-दूसरे की तरफ देखा। उन्हें समझ आ गया दोनों की याददाश्त जा चुकी थी। डॉक्टर ने कुछ रंगों के कार्ड सामने रखे।
लाल। नीला। पीला। हरा।
डॉक्टर बोले -
ये कौन सा रंग है?
संस्कृति ने तुरंत कहा —
लाल।
डॉक्टर बोले -
और ये?
संस्कृति बोली -
नीला।
कार्तिक ने भी सही जवाब दिए। डॉक्टर ने राहत की सांस ली।
डॉक्टर (नर्स से धीरे) बोले -
बेसिक मेमोरी ठीक है।
पर पर्सनल मेमोरी पूरी तरह चली गई है।
कुछ दिन बाद इलाज चलता रहा। पट्टियाँ हटने लगीं। घाव भरने लगे। पर एक नई समस्या खड़ी हो गई।
एक दिन…
संस्कृति बोली -
आप मुझे ऐसे क्यों घूर रहे हैं?
कार्तिक (चिढ़कर) बोला -
तो क्या करूँ? तुम हर वक्त हंसती क्यों रहती हो?
संस्कृति बोली -
तो रोऊँ क्या?
कार्तिक बोला -
चुप रहो!
संस्कृति (गुस्से में) बोली -
आप कौन होते हैं मुझे चुप कराने वाले?
दोनों एक-दूसरे को नहीं जानते थे। कोई रिश्ता याद नहीं। कोई बीता हुआ कल नहीं। बस दो अजनबी एक ही कमरे में। डॉक्टर ने दूर से देखा। उन्हें एहसास हुआ इन दोनों को सिर्फ दवाई नहीं, नई शुरुआत चाहिए।
एक दिन डॉक्टर ने दोनों को बुलाया।
डॉक्टर बोले -
देखो… अभी तुम्हें अपना अतीत याद नहीं है।
पर जिंदगी रुकी नहीं रहती।
दोनों चुप।
डॉक्टर (मुस्कुराकर) बोले -
जब तक यादें वापस नहीं आतीं…मैं तुम्हें नए नाम देता हूँ।
संस्कृति ने हैरानी से देखा।
डॉक्टर बोले -
तुम हमेशा मुस्कुराती रहती हो…दर्द में भी हंस देती हो।
इसलिए आज से तुम्हारा नाम होगा — खुशी।
संस्कृति के चेहरे पर सचमुच मुस्कान आ गई।
संस्कृति बोली -
खुशी…
डॉक्टर ने कार्तिक की ओर देखा।
डॉक्टर बोले -
और तुम…हर बात पर गुस्सा करते हो।
जिद्दी हो। अंदर बहुत आग है तुम्हारे।
तुम्हारा नाम होगा — रुद्रांश।
कार्तिक ने हल्की तिरछी मुस्कान दी।
कार्तिक बोला -
नाम से क्या बदल जाएगा?
डॉक्टर बोले -
शुरुआत बदल जाएगी।
अस्पताल से बाहर कुछ हफ्तों बाद दोनों डिस्चार्ज हो गए। डॉक्टर ने एक छोटे शहर में किराए का कमरा दिलवा दिया। एक साधारण कमरा। लकड़ी का बिस्तर। एक छोटी अलमारी। खिड़की से आती धूप। डॉक्टर ने चाबी उनके हाथ में दी।
डॉक्टर बोले -
अभी तुम दोनों एक-दूसरे का सहारा हो।
शायद…यही रिश्ता तुम्हें आगे ले जाए।
डॉक्टर चले गए। कमरे में सन्नाटा।
खुशी (धीरे) बोली -
तो… हम साथ रहेंगे?
रुद्रांश (कंधे उचकाकर) बोला -
लगता तो यही है।
खुशी (मुस्कुराकर) बोली -
अच्छा है। कम से कम कोई तो है जो मेरा झगड़ा झेल लेगा।
रुद्रांश (हल्का चिढ़कर) बोला -
मैं झेलूँगा? तुम झेलोगी मुझे।
दोनों की आँखें मिलीं। पहली बार हल्की सी हँसी दोनों के बीच आई। उन्हें नहीं पता था वो कौन थे। कहाँ से आए थे।किसने उन्हें मारने की कोशिश की। पर एक बात सच थी मौत उन्हें खत्म नहीं कर पाई। अब उनकी कहानी नए नामों के साथ फिर शुरू हो चुकी थी।
क्या उनकी पुरानी यादें लौटेंगी?
क्या अतीत फिर उनका पीछा करेगा?
या खुशी और रुद्रांश
एक नई कहानी लिखेंगे…?