Love is forbidden in this house - 30 in Hindi Love Stories by Sonam Brijwasi books and stories PDF | इस घर में प्यार मना है - 30

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इस घर में प्यार मना है - 30

सुबह की हल्की धूप खिड़की से अंदर आ रही थी। स्विट्जरलैंड की ठंडी हवा कमरे में तैर रही थी। कमरे के दरवाज़े के पास खड़ा मोहन चुपचाप अंदर झाँक रहा था। बिस्तर पर कार्तिक और संस्कृति एक ही कंबल में लिपटे हुए सो रहे थे। संस्कृति का सिर कार्तिक के सीने पर था… और कार्तिक की बाँहें उसके चारों ओर थीं। दोनों इतने गहरी नींद में थे कि उन्हें दुनिया की खबर ही नहीं थी। मोहन की आँखों में शरारत चमक उठी।

वो धीरे से पीछे मुड़ा और फुसफुसाकर बोला—
पारो… इधर आओ ज़रा… बड़ा दिलचस्प सीन है।

पारो धीरे से आई और अंदर झाँका। उसे देखते ही उसके होंठों पर मुस्कान आ गई।

पारो (धीमे से हँसते हुए) बोली - 
अरे वाह… लगता है खुशखबरी जल्दी मिलने वाली है।

तभी शायद उनकी आवाज़ से संस्कृति की नींद खुल गई। उसने आँखें खोलीं…और सामने मोहन और पारो को खड़ा देखकर एकदम चौंक गई।

संस्कृति बोली - 
अरे…!

उसी समय कार्तिक भी जाग गया। दोनों एक पल के लिए एक-दूसरे को देखे…फिर झट से अलग हो गए। दोनों के चेहरे लाल हो गए।

मोहन हँसी रोकते हुए बोला—
गुड मॉर्निंग… boss और और उनकी fevriot employee।
या बोलें भैया भाभी ।

पारो मुस्कुराते हुए बोली—
लगता है गुड न्यूज़ जल्दी मिलने वाली है।

संस्कृति घबरा गई।

वो तुरंत कंबल ठीक करते हुए बोली—
न… नहीं… ऐसा कुछ नहीं है।
वो… वो… यहाँ बहुत ठंड है ना… इसलिए… चिपक कर सो गई थी।

कार्तिक ने भी तुरंत हामी भर दी।

कार्तिक बोला - 
हाँ… हाँ… बिल्कुल… ठंड बहुत थी।

मोहन ने भौंह उठाई।

मोहन (मजाक में) बोला - 
अच्छा… तो स्विट्जरलैंड की ठंड का असर सिर्फ इसी कमरे में हुआ है?

पारो हँसी नहीं रोक पाई।

पारो बोली - 
भाभी… आप दोनों का चेहरा देखो… लाल टमाटर हो गया है।

संस्कृति शर्म से और भी लाल हो गई। उसने तकिया उठाकर मोहन की तरफ फेंक दिया।

संस्कृति बोली - 
जाओ यहाँ से… सुबह-सुबह शुरू हो गए आप लोग!

मोहन और पारो हँसते हुए बाहर भाग गए। दरवाज़ा बंद होते ही कमरे में कुछ पल की चुप्पी छा गई। संस्कृति धीरे से कार्तिक की तरफ देखने लगी। कार्तिक भी मुस्कुरा रहा था।

कार्तिक बोला - 
लगता है अब ये लोग हमें चैन से रहने नहीं देंगे।

संस्कृति हल्के से मुस्कुराई।

संस्कृति बोली - 
तो क्या करें…?

कार्तिक ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।

कार्तिक (धीमे स्वर में) बोला - 
जो होना है… होने दें।

संस्कृति का चेहरा फिर गुलाबी हो गया। खिड़की से आती ठंडी हवा और सुबह की धूप…उनकी नई जिंदगी की एक और हँसती हुई शुरुआत बन गई।

स्विट्जरलैंड में उनकी नई ज़िंदगी धीरे-धीरे एक खूबसूरत लय पकड़ने लगी थी। सुबह सब जल्दी उठते। खिड़की के बाहर बर्फ से ढकी पहाड़ियाँ दिखाई देतीं और ठंडी हवा कमरे में भर जाती।
कार्तिक सबसे पहले उठता। वो किचन में जाकर सबके लिए कॉफी बना देता। थोड़ी देर बाद संस्‍कृति और पारो भी उठ जातीं।

पारो (मुस्कुराते हुए) बोली - 
भाभी… यहाँ की सुबह कितनी शांत होती है ना।

संस्‍कृति बोली - 
हाँ… जैसे जिंदगी ने आखिर हमें सुकून दे दिया हो।

कुछ देर बाद चारों ऑफिस के लिए निकल जाते।

ऑफिस में सब कार्तिक की टीम के रूप में काम करते थे।
कार्तिक उनका कैप्टन था…लेकिन टीम में वो बॉस कम और दोस्त ज़्यादा लगता था।

मोहन कभी-कभी मजाक कह देता—
भैया… ऑफिस में तो थोड़ा सख्त बन जाओ।
वरना लोग समझेंगे हम परिवार चलाते हैं कंपनी नहीं।

कार्तिक हल्का हँस देता।

कार्तिक बोला - 
काम अच्छा होना चाहिए… बाकी सब अपने आप ठीक हो जाता है।

दिन भर मेहनत से काम होता। और उनकी टीम का काम देखकर बाकी लोग भी प्रभावित रहते।

शाम को सब थके हुए घर लौटते। जैसे ही दरवाज़ा खुलता…घर में फिर वही अपनापन लौट आता। पारो और संस्कृति सीधे किचन में चली जातीं। किचन में हँसी गूंजती रहती।

पारो बोली - 
भाभी… आज मैं सब्ज़ी बनाऊँगी।

संस्‍कृति बोली - 
ठीक है… लेकिन नमक ज़्यादा मत डाल देना।

उधर कार्तिक और मोहन घर की सफाई देखते। कभी वैक्यूम क्लीनर चलाते…कभी बर्तन लगा देते।

मोहन (मजाक में) बोला - 
भैया… अगर हमारे कॉलेज के दोस्त हमें ऐसे देख लें…
तो कहेंगे इंजीनियर कम, गृहस्थ ज़्यादा बन गए।

कार्तिक हँसते हुए बोला - 
घर चलाना भी सबसे बड़ा प्रोजेक्ट होता है।

कुछ देर बाद सब साथ बैठकर खाना खाते। उस समय सबसे ज़्यादा बातें होतीं। हँसी, मजाक, और पुरानी यादें।

रात को धीरे-धीरे घर शांत हो जाता। मोहन और पारो अपने कमरे में चले जाते। और कार्तिक और संस्कृति भी अपने कमरे में।
स्विट्जरलैंड की रातें बहुत ठंडी होती थीं। बाहर बर्फ गिरती रहती।
बिस्तर पर लेटी संस्कृति धीरे-धीरे सरककर कार्तिक के पास आ जाती। और ठंड से बचने के लिए उससे चिपक जाती। कार्तिक उसकी इस आदत पर हल्का हँस देता।

कार्तिक (मुस्कुराकर) बोला - 
ये ठंड का बहाना है… या कुछ और?

संस्कृति आँखें बंद किए हुए ही बोलती—
ठंड बहुत है…

कार्तिक धीरे से उसे अपनी बाहों में भर लेता।

कार्तिक बोला - 
तो फिर यहीं रहो… गर्मी मिलती रहेगी।

संस्कृति के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ जाती। कुछ ही पलों में वो गहरी नींद में चली जाती। कार्तिक हमेशा की तरह कुछ देर तक उसे देखता रहता। उसे लगता था…इतने संघर्षों के बाद आखिर उसकी संस्‍कृति को सुकून मिल गया है। खिड़की के बाहर बर्फ गिरती रहती…और कमरे के अंदर दो दिलों की धड़कनें एक शांत, खुशहाल जिंदगी की कहानी लिखती रहतीं।

स्विट्जरलैंड के उस छोटे से फ्लैट में अब जिंदगी पूरी तरह बस चुकी थी। चारों के बीच हँसी-मजाक का सिलसिला रोज़ चलता रहता। उस सुबह भी सब साथ बैठे चाय पी रहे थे। मोहन और कार्तिक ऑफिस जाने की जल्दी में थे। तभी अचानक संस्कृति का चेहरा पीला पड़ गया। वो जल्दी से उठी…और भागकर वॉशरूम में चली गई। अंदर से उल्टी की आवाज़ आई। पारो घबरा गई। वो दरवाज़े के पास खड़ी हो गई।

पारो (चिंता में) बोली - 
भाभी… क्या हुआ? सब ठीक है?

कुछ देर बाद संस्कृति बाहर आई। उसका चेहरा थोड़ा कमजोर लग रहा था।

पारो बोली - 
आप बैठिए… मैं पानी लाती हूँ।

संस्कृति सोफे पर बैठ गई। पारो जल्दी से पानी लेकर आई। संस्कृति ने थोड़ा पानी पिया… लेकिन फिर भी उसका मन ठीक नहीं हो रहा था। उधर कार्तिक और मोहन ऑफिस के लिए निकल चुके थे। पारो बार-बार संस्कृति को देख रही थी। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि अचानक ऐसा क्या हो गया।

पारो (संकोच से) बोली - 
भाभी… आपने कुछ गलत खा लिया क्या?

संस्कृति हल्का सा मुस्कुरा दी।

संस्कृति बोली - 
नहीं… मुझे तो याद भी नहीं कि मैंने ऐसा कुछ खाया हो।

इतना कहते-कहते फिर से उसका मन मचलने लगा। वो फिर वॉशरूम की ओर दौड़ी। पारो अब सच में परेशान हो गई थी।
वो पीछे-पीछे गई और दरवाज़े के बाहर खड़ी हो गई। कुछ देर बाद जब संस्कृति वापस आई तो पारो ने उसे पकड़कर सोफे पर बैठा दिया।

पारो (चिंता से) बोली - 
भाभी… ऐसा तो नहीं कि आपको बुखार हो गया हो?

संस्कृति ने सिर हिलाया।

संस्कृति बोली - 
नहीं… बस अजीब सा लग रहा है।

पारो अचानक सोच में पड़ गई। उसने धीरे-धीरे संस्कृति की तरफ देखा। फिर उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।

पारो (शरारती अंदाज़ में) बोली - 
भाभी… एक बात पूछूँ?

संस्कृति ने हैरानी से उसे देखा।

संस्कृति बोली - 
क्या?

पारो थोड़ा पास आकर धीरे से बोली—
कहीं… ये वो वाली बात तो नहीं?

संस्कृति समझी नहीं।

संस्कृति बोली -
कौन सी बात?

पारो मुस्कुरा पड़ी।

पारो बोली - 
वही… जिसके लिए मोहन जी और मैं आपको रोज़ चिढ़ाते थे।

संस्कृति की आँखें एक पल के लिए बड़ी हो गईं। उसे अचानक कुछ याद आया। उसने धीरे से अपना हाथ पेट पर रख लिया।
कुछ पल के लिए दोनों चुप हो गईं। कमरे में एक अजीब-सी खामोशी थी…लेकिन उस खामोशी में एक नई उम्मीद की धड़कन छिपी हुई थी।

पारो ने धीरे से कहा—
भाभी… शायद हमें डॉक्टर के पास जाना चाहिए।

संस्कृति अभी भी थोड़ी हैरान थी। उसने धीमे से सिर हिला दिया।

संस्कृति (धीमे स्वर में) बोली - 
अगर सच में ऐसा हुआ… तो?

पारो की आँखें चमक उठीं।

पारो खुशी से बोली - 
तो भाभी… इस घर में सचमुच छोटी-सी खुशखबरी आने वाली है।

संस्कृति के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई…लेकिन उसके दिल की धड़कन अब तेज हो चुकी थी। उसे खुद भी यकीन नहीं हो रहा था कि शायद…उसकी जिंदगी में एक नई कहानी शुरू होने वाली है।

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