Love is forbidden in this house - 20 in Hindi Women Focused by Sonam Brijwasi books and stories PDF | इस घर में प्यार मना है - 20

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इस घर में प्यार मना है - 20

सुबह की हल्की धूप खिड़की से अंदर आ रही थी। कमरे में शांति थी। रुद्रांश अब भी आँखें बंद किए पड़ा था। उसे याद नहीं था वो कहाँ है। बस…एक एहसास था। एक नरम सी खुशबू। एक गर्माहट। एक मुलायम सा शरीर उसकी बाँहों में सिमटा हुआ। उसकी साँसें उसकी छाती से टकरा रही थीं। रुद्रांश ने हल्की सी भौंहें सिकोड़ लीं।

रुद्रांश (मन में) बोला - 
ये… क्या है?

उसे लगा वो सपना देख रहा है। कोई अपना…बहुत अपना…जो उससे लिपटा हुआ है। वो उस एहसास में खो जाना चाहता था। उसने अपनी पकड़ थोड़ी और कस ली। अपने पैर भी धीरे से आगे बढ़ाए…जैसे उस गर्माहट को पूरी तरह समेट लेना चाहता हो।खुशी
उसकी बाँहों में थी। उसकी धड़कन तेज़ हो गई। वो जानती थी अब वो जागने वाला है। पर रुद्रांश अभी भी आँखें बंद किए उस एहसास को जी रहा था। उसने गहरी साँस ली। खुशी की खुशबू
उसकी साँसों में उतर गई। एक पल के लिए उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कान आई। जैसे कई साल बाद उसे चैन मिला हो।

पर…धीरे-धीरे उसका दिमाग जागने लगा। याद आया छोटा कमरा।
फर्श। कल रात की लड़ाई। उसका दिल अचानक तेज धड़कने लगा।

रुद्रांश (मन में) बोला - 
ये सपना नहीं है…

उसने झटके से आँखें खोलीं। और…वो जम गया। खुशी उसकी बाँहों में थी। उसका चेहरा उसके सीने से लगा हुआ। उसके बाल
उसकी ठोड़ी को छू रहे थे। उनके पैर आपस में उलझे हुए थे। कुछ सेकंड दोनों स्थिर। रुद्रांश की आँखें फैली हुईं।

रुद्रांश (धीरे, हड़बड़ाहट में) बोला - 
ये… क्या…?

खुशी ने भी धीरे से आँखें खोलीं। दोनों की नजरें मिलीं। एक पल…
लंबा…बहुत लंबा।

खुशी (संभलते हुए) बोली - 
वो… मैं… नीचे आ गई थी…

रुद्रांश (घबराकर) बोला - 
तुम… मेरी बाँहों में क्यों हो?

खुशी (हल्का सा शरमाकर, पर सामान्य दिखाते हुए) बोली - 
आपने पकड़ा हुआ था…

रुद्रांश ने तुरंत अपनी बाँह हटा ली। दोनों अलग हो गए। कमरे में
अजीब सी खामोशी फैल गई। रुद्रांश उठकर बैठ गया। उसने अपने बालों में हाथ फेरा। उसका चेहरा उलझा हुआ था।

रुद्रांश बोला - 
मैंने… कुछ किया तो नहीं?

खुशी का चेहरा लाल हो गया। उसे रात याद थी। पर उसने सिर हिला दिया।

खुशी (धीरे से) बोली - 
आप सो रहे थे…

रुद्रांश ने गहरी साँस ली।

रुद्रांश बोला - 
अजीब है…

उसने अपनी छाती को छुआ।

रुद्रांश बोला - 
ऐसा लगा… जैसे ये एहसास नया नहीं है।

खुशी का दिल एक पल को रुक गया। वो चुप रही। दोनों अलग बैठे थे। पर हवा में कुछ बदल चुका था। कल तक वो दो अजनबी थे। आज…उनके बीच एक अनकहा सच धड़क रहा था।
सुबह पूरी तरह जाग चुकी थी। छोटे से किचन में चूल्हे पर पानी उबल रहा था। खुशी चाय बना रही थी। पर उसका ध्यान उबलते पानी में नहीं…अपने अंदर उठती हलचल में था। उसने चम्मच घुमाई…पर हाथ धीमे पड़ गए।

खुशी (मन में) बोली - 
वो पल… ऐसा क्यों लगा जैसे… पहले भी हुआ हो?

उसकी उंगलियाँ अनजाने में अपनी गर्दन को छू गईं। उसे याद आया रुद्रांश की गर्म साँसें। उसके गाल धीरे-धीरे लाल हो गए। वो झट से संभली।

खुशी बोली - 
क्या सोच रही हूँ मैं…?

फिर भी दिल मान नहीं रहा था। कभी लगता ये एहसास बहुत पुराना है। जैसे बरसों से जाना-पहचाना। कभी शर्म से वो मुस्कुरा देती। कभी खुद ही संभल जाती। चाय उबलकर ऊपर आई।

खुशी बोली - 
अरे!

वो जल्दी से गैस कम करती है। पर उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान अब भी थी। उधर…रुद्रांश कुर्सी पर बैठा था। बाल बिखरे हुए। पर मन कहीं और। वो बार-बार अपने सीने को छू रहा था।
जैसे अब भी महसूस कर रहा हो वो गर्माहट।

रुद्रांश (मन में) बोला - 
ये नया नहीं था…

उसने आँखें बंद कीं। उसे याद आया खुशी का सिर उसके सीने पर।
उसकी खुशबू। उसकी नर्म साँसें। रुद्रांश ने गहरी साँस ली।

रुद्रांश बोला - 
क्यों लग रहा है… जैसे मैं उसे बहुत पहले से जानता हूँ?

वो खुद से चिढ़ गया।

रुद्रांश बोला - 
बेवकूफ मत बनो। याददाश्त ही नहीं है तुम्हारी।

फिर भी दिल मान नहीं रहा था। खुशी चाय लेकर बाहर आई।दो कप। उसने एक कप रुद्रांश की तरफ बढ़ाया।  उनकी उंगलियाँ
हल्के से टकराईं। दोनों एक पल को ठिठक गए।

खुशी (संभलते हुए) बोली - 
चीनी कम है… शायद।

रुद्रांश (धीरे) बोला - 
कोई बात नहीं।

दोनों चाय पीने लगे। पर नजरें कभी-कभी एक-दूसरे से टकरा जातीं। और तुरंत हट जातीं। खामोशी थी। पर भारी नहीं।हल्की…
शर्मीली…जैसे दो दिल कुछ याद करने की कोशिश कर रहे हों।

रुद्रांश (अचानक) बोला - 
कल रात…

खुशी का दिल जोर से धड़का।

खुशी बोली - 
हूँ?

रुद्रांश (संभलकर) बोला - 
अगर… मैंने कुछ गलत किया हो तो…

खुशी ने तुरंत सिर हिलाया।

खुशी (धीमे) बोली - 
नहीं। आपने कुछ गलत नहीं किया।

रुद्रांश ने राहत की साँस ली।

फिर बहुत धीरे कहा —
अजीब है… पर अच्छा लगा।

खुशी के होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।

खुशी बोली - 
मुझे भी…

दोनों चौंक गए फिर दोनों हँस पड़े। हल्की सी, सच्ची हँसी। यादें अब भी नहीं लौटी थीं। पर एहसास…वो रास्ता ढूँढ रहे थे। शायद
दिल पहले पहचानता है। दिमाग बाद में।

दिन बीत रहे थे। कमरा वही। शहर वही। दो नाम — खुशी और रुद्रांश। पर अंदर कहीं कुछ जाग रहा था। पहला फ्लैश एक शाम…
खुशी रसोई में खड़ी थी। अचानक…उसकी आँखों के सामने एक झलक आई बहता हुआ पानी। किसी का हाथ कसकर पकड़े हुए।
खून…चीख…

खुशी (अचानक सिर पकड़कर) बोली - 
आह…!

कप उसके हाथ से गिर गया। रुद्रांश भागकर आया।

रुद्रांश बोला - 
क्या हुआ?

खुशी की साँस तेज थी।

खुशी (हकलाते हुए) बोली - 
पानी… कोई… गिर रहा था…

उसका सिर तेज़ दर्द से फटने लगा। कुछ सेकंड बाद सब गायब।

खुशी (हैरान होकर) बोली - 
मैं… क्या बोल रही थी?

रुद्रांश उसे घूरता रह गया। उसी रात रुद्रांश बिस्तर पर बैठा था।
अचानक…उसके दिमाग में एक चेहरा चमका। गुस्से से भरा हुआ।
किसी की आवाज —
“धक्का दे दो!”
नहर का शोर।

रुद्रांश (सिर पकड़कर) बोला - 
आह्ह…!

उसने दीवार पर हाथ मार दिया। खुशी दौड़ी आई।

खुशी बोली - 
क्या हुआ?

रुद्रांश (तेज़ सांसों में) बोला - 
किसी ने… हमें… मारने की कोशिश की थी…

खुशी की आँखें फैल गईं।

खुशी बोली - 
हमें?

कुछ पल…फिर रुद्रांश की आँखें खाली हो गईं।

रुद्रांश बोला - 
मैं क्या बोल रहा था?

दर्द धीरे-धीरे कम हुआ। पर याद फिर गायब। दर्द के बाद दोनों चिड़चिड़े हो जाते।

खुशी बोली - 
आप हर बात पर गुस्सा क्यों करते हो?

रुद्रांश बोला - 
और तुम हर वक्त सवाल क्यों करती हो?

खुशी बोली - 
मैं बात कर रही हूँ!

रुद्रांश बोला - 
मुझे शांति चाहिए!

एक दिन…

खुशी (झल्लाकर) बोली - 
अगर हम पहले से एक-दूसरे को जानते थे… तो शायद हम शादीशुदा भी हो सकते थे!

रुद्रांश ठिठक गया। दिल ने एक धक्का खाया। पर दिमाग खाली।

रुद्रांश (सख़्त होकर) बोला - 
ऐसा कुछ नहीं है। बेकार की कल्पना मत करो।

खुशी को बुरा लगा।

खुशी बोली - 
तो फिर ये सब… ये एहसास… ये डर… क्यों है?

रुद्रांश चुप। उसे भी जवाब नहीं पता था।

रात — खामोशी

दोनों अलग-अलग करवट लेकर लेटे थे। बीच में दूरी। पर…नींद में
रुद्रांश का हाथ धीरे से खुशी की तरफ बढ़ा। और उसकी उंगलियाँ खुशी की उंगलियों से छू गईं। खुशी जाग रही थी। उसने हाथ हटाया नहीं। बस आँखें बंद कर लीं। यादें आती थीं चमकती बिजली की तरह। पर हर बार सिर दर्द के साथ गायब हो जातीं।
जैसे दिमाग सच को रोक रहा हो। पर सच…ज़्यादा देर छुपता नहीं।

आपको क्या लगता है -
क्या अगली बार फ्लैशबैक पूरा होगा?
दर्द और गहरा होगा?