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सर्दियों की सुबह, शीतलहर से समूचा उत्तर भारत कांप रहा था। चरिंद-परिन्द सब हल्कान थे कुदरत के इस कहर से। कई दिनों से सूर्य देवता ने दर्शन नहीं दिये थे । गांव कोहरे और धुँध की चादर में लिपटा ...Read More

सड़कछाप - 2

तेरहवीं होते ही सारे रिश्तेदार विदा हो गये। घर अपनी गति पर लौट आया । शुरू में लोगों को बड़ा उत्साह था बदला लेने, मुकदमा करने का लेकिन भुर्रे क्या कोई मामूली बदमाश तो था नहीं कि पूरे शुकुल ...Read More

सड़कछाप - 3

अमरेश की पढ़ाई ना के बराबर चल रही थी। दुख और संवेदना का समय बीत चुका था। लल्लन की मौत बेशक एक स्थायी दुख था लेकिन उसकी मृत्यु से उपजी सहानुभूति अब समाप्त हो चुकी थी। जिंदगी की कड़वी ...Read More

सड़कछाप - 4

अमरेश और उसकी माँ सरोजा अब लोकपाल तिवारी के घर आकर रहने लगे थे। सरोजा ने अपने हिस्से की खेती बटाई दे दी थी। सरोजा हर महीने-दो महीने पर अपने ससुराल चली जाती और वहां की हाल-खबर ले आती। ...Read More

सड़कछाप - 5

रामजस तिवारी आकर बैठे वो पूरे शुकुल से लौटे थे। गांव नहीं पहुंचे थे कि उन्हें ऐसी खबर मिल गयी कि उनके पैरों के तले की जमीन खिसक गयी। इस खबर की पुष्टि उनके स्तर से हो पाना आसान ...Read More

सड़कछाप - 6

एक रोज रामजस आये तो उनके हाथ मे बाज़ार की कई किस्म की साग-सब्ज़ियां थीं। उन्होंने सरोजा को पुकारा वो आयी तो रामजस ने कहा - ‘’ये सब ले जा खाना बना डाल, मीठा और खीर का भी इन्तेजाम ...Read More

काफी देर बाद सरोजा के होशोहवास काबू में आये। उसे लगता था कि उसका सारा शरीर किसी ने आरी से टुकड़े-टुकड़े कर दिया हो। पूरे बदन के पोर-पोर से बेपनाह दर्द उठ रहा था। पूरा मुंह नोचा-सूजा हुआ था। ...Read More

सड़कछाप - 8

विधाता किसी की सारी प्रार्थनाएं नहीं सुनता। ईश्वर ने भी सरोजा की आधी बात ही सुनी थी। लड़का निष्कंटक हुआ तो रामजस बच गए। अगले दिन सारे रिश्तेदारों की आमद हुई। सुरसता के घर से सारे लोग वापस आ ...Read More

अंधेरा हो गया तो तामशबीन छंट गये और तमाशाई थक गये थे। रामजस और अमरेश एक दूसरे को पकड़े बैठे रहे। जब हाथ को हाथ सूझना बंद हो गया तब मैना ने अपने घर से एक लालटेन जलाकर भेज ...Read More

लड़ते-झगड़ते चाचा-भतीजा घर लौटे। उस रात खाना भी नहीं बना, रामजस चिलम फूंककर और अमरेश ने दालमोठ खाकर काटी। वो सुबह उठा तो दरवाजे पर आकर उसने देखा दोनों गायों का स्थान खाली था। उसे अपने नाना की बात ...Read More

आसफ अली रोड और नाका यही बुदबुदाता रहा वो रास्ते भर। उसकी आदत थी कि एक वक्त में एक वजह को पकड़कर वो जीने-मरने को उतारू रहता था। दो रुपये पचहत्तर पैसे के टिकट को उसने जेब के बजाय ...Read More

-डेढ़ महीने तक खाने -पीने के लिये अमरेश गुरूपाल पर आश्रित रहा, उसके बाद उसके फूफा जय नारायण दिल्ली लौट आये गांव से। जय नारायण जब दिल्ली आये तो उन्हें नानमून की कारस्तानियों की इत्तला मिली। ये उनके लिये ...Read More

खतो-किताबत ने दिल्ली की भयावहता अमरेश के लिये कुछ कम कर दी थी। चचेरा ही सही कहने को उसका अपना परिवार तो था, फ़िर परिवार तो किसी का बिल्कुल ही ठीक नहीं होता सो उसका भी नहीं था। ...Read More

इस बार वो गाड़ी पर बैठा तो चेहरे पर चिंता का कोई लक्षण नहीं था अलबत्ता जेब में पैसे होने का एक महानगरीय आत्मविश्वास से वो लबरेज था। पैंट, शर्ट, चश्मा, रुमाल, हाथ में पॉकेट रेडियो, खिली रंगत उसके ...Read More

अमरेश ने नींव की खुदाई शुरू कराके अपने नाना की शरण ली। उनसे पांच हजार की मदद मांगी और ये भी कहा कि ये मदद नहीं बल्कि उधार होगा और हालात माफिक होते ही वो इस रकम को लौटा ...Read More

अमर बहुत व्यथित था कि कुत्ता उसका भाई औऱ कुत्ते का मल साफ करना उसका रोजगार। कल का सपना बहुत सुहा सुहाना था, सर, लेखक, लड़की जैसी नियामतें उसकी जिंदगी में दस्तक दे रही थीं मगर आज की वास्तविक ...Read More

बतरा को तब अमर की याद आयी जो तुनककर चला गया था कुत्ते का मल फेंकने की बात पर औऱ अपनी पन्द्रह दिनों की तनख्वाह भी नहीं ले गया था। बतरा को अमर जैसे ही खुद्दार और वफादार व्यक्ति ...Read More

सुबह अमर की आंख बहुत देर से खुली। जागते ही उसने शीशे की खिड़की से बाहर देखा तो अभी भी बहुत कोहरा था। उसने घड़ी में वक्त देखा तो साढ़े नौ बज रहे थे। कमरे में कोई नहीं था। ...Read More

अमर कुछ घण्टे वहॉ बिताकर फिर अपने घर लौट आया। लेकिन अपना सब कुछ वहीं छोड़ आया था वो। दिलेराम ने उसे देखकर चैन की सांस ली। अमर को किसी दम चैन ना था। रेवती की बातें उसका कलेजा ...Read More

अमर ने तन -पेट काट कर दिन रात जी तोड़ मेहनत करके और तमाम जोड़-तोड़ और उधारी के बदौलत आखिर प्लाट ले ही लिया। दुजाना के उसने कुछ पैसे रोक लिए क्योंकि उसे घर भी तो बनवाना था। दुजाना ...Read More