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जब बर्फ की एक युवती मरुभूमि में एक युवक से मिलती है तो .. तो जो घटनाएँ घटती है , वह क्या है युवती तस्वीर पत्रकार है तो युवक चित्रकार। दोनों के बीच होते संघर्ष, करी के संघर्ष, ...Read More

  फरवरी का महिना कुछ क्षण पहले ही विदा ले चुका था। अंधेरी रात ने मार्च का स्वागत हिम की वर्षा से किया। वह ग्रीष्म के आगमन की दस्तक का महिना था, किन्तु तेज हिम वर्षा हो रही थी। ...Read More

  वफ़ाई ने घूमकर अपने नगर को देखा। पूरा नगर हिम की चादर में लपेटा हुआ था। पूरी तरह से श्वेत था नगर। केवल श्वेत रंग, बाकी सभी रंग अद्रश्य हो गए थे। मकानों के मूल रंग हिम की ...Read More

  वफ़ाई पर्वत को सब कुछ बताने लगी,”तीन दिन पहले, मैं अपने काम में व्यस्त थी तब ललित ने मुझे बुलाया।“ “वफ़ाई, तुम्हारे लिए एक महत्वपूर्ण अभियान है। इस दैनिक पत्र के तस्वीर विभाग की तुम प्रमुख हो, तुम ...Read More

  वफ़ाई सावधानी से पहाड़ी मार्ग, जो अभी भी हिम से भरा था, पर जीप चला रही थी। मार्ग घुमावदार और ढलान वाला था। हिम के कारण फिसलन भी थी। फिर भी वह अपने मार्ग पर चलती रही। पाँच ...Read More

  “उत्सव सम्पन्न हो गया। इसका अर्थ है कि लोग जा चुके हैं। लोगों के द्वारा बनाया गया कृत्रिम विश्व मिटा दिया गया है, जो केवल एक भ्रम था। मूल और वास्तविक वस्तुएं तो अभी भी है।“ वफ़ाई स्वयं ...Read More

      प्रथम कक्ष साधारण खंड जैसा था। प्रत्येक कोने में धूल, मिट्टी और मकड़ी के जाले फैले हुए थे। मकड़ी ने एक पारदर्शक किन्तु सशक्त दीवार रच दी थी। वफ़ाई वहीं रुक गई और पूरे कक्ष का ...Read More

वफ़ाई ने खींची हुई तसवीरों को केमरे में देखा। वह निराश हो गई। केमरे से बातें करने लगी, “जानु, तुमने यह क्या कर दिया? सभी तस्वीरें एक सी लगती है। मैं उसे हटा देती हूँ।“ वफ़ाई तसवीरों को हटाने ...Read More

  9 जब वफ़ाई जागी तब प्रभात हो चुका था, सूरज अभी अभी निकला था। धूप की बाल किरनें कक्ष में प्रवेश कर चुकी थी। प्रकाश मध्धम था। सूरज की किरणें दुर्बल सी थी। लगता था सूरज किसी के ...Read More

  10 आठ मिनिट के पश्चात वफ़ाई उस स्थान पर पहुँच गई। जीप को एक कोने में छोडकर वह पंखी की दिशा में चलने लगी। बारह से पन्द्रह पंखी थे वहाँ। वफ़ाई के पदध्वनि से वह सावध हो गए। ...Read More

छत के कोने से वफ़ाई ने देखा कि एक युवक धरती की तरफ झुक कर कुछ कर रहा था। धरती पर गिरे हुए रंग इधर उधर बिखरे हुए थे। भूमि पर पानी भी फैला हुआ था। वह युवक उस ...Read More

“और मैं जीत,” युवक ने अपना नाम बताया और फिर आदेश दिया,”वफ़ाई, अपना केमेरा ले लो अन्यथा मैं....” वह आसपास कुछ खोजने लगा। “श्रीमान जीत, मुझे मेरी सभी तस्वीरें भी चाहिए, तभी मैं मेरा केमेरा लूँगी।“  वफ़ाई ने जीत ...Read More

“दिखाओ तुमने कैसी तस्वीरें ली है।“जीत वफ़ाई की तरफ मुडा। वफ़ाई ने केमरा खोल दिया। तस्वीरें दिखने लगी.... जीत, चित्राधार, उस पर केनवास, केनवास पर चित्र, चित्र में बादल, गगन के रंग, दूर क्षितिज में सूरज। चित्राधार के पीछे ...Read More

वफ़ाई सीधे मार्ग पर जीप चला रही थी। मार्ग अंधकार भरा था। गगन में अंधेरी रात का प्रभुत्व था। वह मार्ग को देखते जा रही थी। पहले तो यह मार्ग ज्ञात लग रहा था किन्तु धीरे धीरे वह अज्ञात ...Read More

जीत के मोबाइल की घंटी बजना खास और विरल घटना होती थी। घंटी सुनकर उसे विस्मया हुआ। उसने फोन उठाया। “जीत, आपको इस समय फोन करने पर क्षमा चाहूँगा। किन्तु यह अति आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है।“ जीत ने कैप्टन ...Read More

मरुभूमि मौन थी। हवा मौन बह रही थी, मौन गगन देख रहा था, बादल भी मौन यात्रा कर रहे थे, रेत मौन पड़ी थी, मार्ग मौन थे, पंखी भी मौन उड़ रहे थे। सब कुछ मौन था, शांत था। ...Read More

मीठी हवा की एक धारा आई, वफ़ाई, जीत एवं सारे घर को स्पर्श करती हुई चली गई। दोनों को हवा भाने लगी। “किन्तु तुमने मुंबई क्यों छोड़ा? सब कुछ तो सही हो रहा था। सफलता भी, नाम भी, सम्मान ...Read More

सूर्य अस्त होने को दौड़ रहा था। संध्या ने धरती पर प्रवेश कर लिया था। वफ़ाई ने गगन की तरफ देखा। उसे मन हुआ कि वह पंखी बन कर गगन में उड़ने लगे, मरुभूमि से कहीं दूर पर्वत पर ...Read More

“जीत, एक और बात। प्रत्येक कलाकार विशेष होता है, प्रत्येक कला विशेष होती है। दो चित्रकार अथवा दो सर्जक भी भिन्न होते हैं, विशेष होते हैं। यदि दोनों एक सी कला को प्रस्तुत करेंगे तो भी वह भिन्न भिन्न ...Read More

वफ़ाई जागी, घड़ी में समय देखा। रात के तीन बज कर अड़तालीस मिनिट। वह उठ खड़ी ऊई। कक्ष से बाहर निकली। झूले पर जीत गहरी नींद में सोया था। “जीत, स्वप्नों के नगर में हो क्या?” वफ़ाई मन ही ...Read More

चाँदनी के प्रकाश में वफ़ाई मार्ग पर बढ़े जा रही थी। मार्ग शांत और निर्जन था। केवल चलती जीप का ध्वनि ही वहाँ था। यह कैसी मरुभूमि थी जहां दिवस के प्रकाश में भी मनुष्य नहीं मिलता और रात्रि ...Read More

वफ़ाई के जाने के पश्चात जीत व्याकुल था। वह झूले पर बैठ गया। वफ़ाई के साथ व्यतीत क्षणों के स्मरण में खो गया। उसने एक एक क्षण को पकड़ना चाहा जो उसने वफ़ाई के साथ व्यतीत की थी। अपनी ...Read More

  “वफ़ाई, तुम अधिक बोलती हो। क्या तुम चुप नहीं रह सकती?” जीत ने वफ़ाई के प्रति क्रोध से देखा। वफ़ाई ने मीठे स्मित से जवाब दिया। पिछली रात से ही जीत ने मौन बना लिया था जो भोर ...Read More

जीत मौन तो था किन्तु अशांत था। जीवन के जिस अध्याय को मैं पीछे छोड़ चुका हूँ, जिसे छोड़ देने के पश्चात कभी याद नहीं किया,  याद करना भी नहीं चाहता था किन्तु, वफ़ाई उसी अध्याय को पढ़ना चाहती ...Read More

जीत अभी भी गहरी नींद में सोया हुआ था। दिलशाद ने खिड़की खोल दी। एक पूरा टुकड़ा आकाश का खिड़की का अतिक्रमण कर दिलशाद की आँखों में उमड़ गया जो अपने साथ बर्फीली हवा के टुकड़े भी लाया था। ...Read More

जीत तथा दिलशाद मुंबई लौट आए। डॉ॰ नेल्सन ने पूरी तरह से जीत को जांचा, कई टेस्ट भी हुए। “बर्फीले पहाड़ों पर आप की छुट्टियाँ कैसी रही? बड़ा आनंद आया होगा न? कुछ मुझे भी तो बताओ कि पहाड़ों ...Read More

“जीत, मेरा पर्स वहीं टेबल पर ही रह गया। मैं अभी लेकर आई, तुम गाड़ी निकालो।“ दिलशाद ने कहा।   दिलशाद नेल्सन के कक्ष की तरफ दौड़ी, अंदर घुसी। “मेरा पर्स मैं भूल गयी थी।“ वह टेबल पर पड़ी ...Read More

संध्या होते ही दिलशाद नेल्सन के पास जाने निकली। दिलशाद के पैरों में कोई विशेष बात थी, नेल्सन से मिलने को उतावले थे वह। जीत ने उस चाल को भांप लिया, कुछ ना बोला, बस देखता रहा। दिलशाद चली ...Read More

दिलशाद जब घर पहुंची तो जीत आँगन में झूले पर बैठा था। दिलशाद जीत के पास गई और उसके गाल को चूमने के लिए झुकी। दिलशाद की ढीली छाती भी झूली। जीत ने उसे अनुभव किया। वह समझ गया ...Read More

जीत सूर्योदय से पहले ही जाग गया। कुछ समय होस्पिटल में ही घूमता रहा। वह बाहर निकला और राज मार्ग पर आ गया। मार्ग खाली से थे। केवल कुछ कोहरा था। चाय की एक दुकान खुली थी। वहाँ दो ...Read More

जीत की हथेली अनायास ही खुल गई। वह खुली हथेली को देखता रहा। उसे लगा जैसे उसकी बंध मुट्ठी से कुछ फिसल गया हो, सरक गया हो, छुट गया हो।   “क्या था जो अभी अभी हाथों से छूट ...Read More

“गेलिना जी, यह मेरा सौभाग्य है कि आप यहाँ हो।“ जीत ने गेलिना का स्वागत किया। “यह तो मेरा सौभाग्य है कि भारत जैसे अदभूत देश को देखने का मुझे अवसर मिला है. कच्छ प्रदेश को भी। वास्तव में ...Read More

“चौथे दिवस गेलिना भारत भ्रमण को चली गई, वहाँ से स्वीडन लौट गई।“ जीत ने कहा। वफ़ाई जीत को एक मन से सुन रही थी। जीत अभी भी गगन को देख रहा था, जैसे वह गेलिना के साथ व्यतीत ...Read More

  “जीत, चलो मैं मान लेती हूँ कि गेलिना यहाँ आई थी और उसने तुम्हें चित्रकला सिखाई।“ “हाँ, वह आई थी, यहाँ, इस घर में। इस कक्ष में, इस मरुभूमि में वह आई थी। उसे झूला झूलना पसंद था। ...Read More

  वफ़ाई के मन में दुविधा जन्मी। जीत क्यों उस व्यक्ति के शोक में इतना गहन डूब गया है जो व्यक्ति से ना तो उसका कोई संबंध था ना ही वह उसके साथ अधिक समय तक रही थी? वफ़ाई ...Read More

36 “जीत, आ जाओ सब तैयार है। यह केनवास तुम्हारी प्रतीक्षा में है।“ जीत ने केनवास को देखा। वह उसे आमंत्रित कर रहा था। वह दो तीन कदम चला और रुक गया। उसने केनवास को फिर देखा। उसे अंदर ...Read More

37 एक सुंदर प्रभात के प्रथम प्रहार ने सो रहे जीत को जगा दिया। वह झूले से उठा। गगन को देखा। अभी भी थोड़ा अंधकार वहाँ रुका हुआ था। चंद्रमा स्मित कर रहा था। जीत ने चंद्रमा को स्मित ...Read More

38   “तुम मुझे चित्रकला कब सिखाओगे?” वफ़ाई ने पूछा। “वफ़ाई, मुझे विस्मय है कि तुम अभी भी सीखना चाहती हो।“ “मैं मेरा वचन पूर्ण करना चाहती हूँ।“ “तुम उतावली हो रही हो।” “कोई संदेह, जीत?” “जिस से तुम ...Read More

39   दो दिवस तक वफ़ाई अविरत रूप से चित्रकारी सीखती रही। अब वह गगन, बादल, पंखी आदि के चित्र बनाने में सक्षम थी। किन्तु वह तूलिका से संतुष्ट नहीं थी क्यों कि वह वफ़ाई की इच्छानुसार रंग भरने ...Read More

40 वफ़ाई चित्रकारी के अभ्यास में व्यस्त थी। जीत क्या करूँ क्या ना करूँ की दुविधा में झूले पर बैठा था। लाल, गुलाबी, नारंगी भाव जो जीत ने वफ़ाई के मुख पर देखे थे उसने जीत के मन पर ...Read More

41   “एक अपूर्ण कदम नामक चित्र मैं अभी रचने नहीं जा रही हूँ। तुम अपने पैर धरती पर रख सकते हो। अपूर्ण कदम पूर्ण कर सकते हो।“ वफ़ाई हंसने लगी। जीत ने अपूर्ण कदम पूर्ण किया। “जीत, नींबू ...Read More

42   एक दिवस और व्यतीत हो गया। चित्रकारी में अपनी अपनी प्रगति पर वफ़ाई तथा जीत संतुष्ट थे। एक दूसरे की सहायता से, एक दूसरे के सानीध्य से चित्रकारी की नयी नयी रीति सीख रहे थे। कल से ...Read More

43 “श्रीमान चित्रकार, नई भाषा के लिए धन्यवाद। इस के द्वारा सर्जित मौन के लिए भी धन्यवाद। मुझे भी मौन पसंद है। किन्तु, कुछ बात मैं इस भाषा से व्यक्त नहीं कर पा रही हूँ। मुझे पुन: शब्दों के ...Read More

44   “मैं भूल गई थी कि तुम यहाँ हो, मेरे साथ। मैं कहीं विचारों में खो गई थी। मैं भी कितनी मूर्ख हूँ?” वफ़ाई ने स्मित दिया, जीत ने भी। जीत ने तूलिका वहीं छोड़ दी, झूले पर ...Read More

45   “हाय अल्लाह। मुझे आश्चर्य है कि मैं इन अनपेक्षित गलियों में कैसे भटक गई? मैं उद्देश्य को भूल गई और अज्ञात-अनदेखे मार्ग पर चलती रही। जीत, मैं भी कितनी मूर्ख हूँ।“  “वफ़ाई, ज्ञात एवं पारंपरिक मार्ग पर ...Read More

46   “वफ़ाई, मेरे पास एक योजना है। तुम्हें रुचि है इसे सुनने में?” जीत ने प्रभात में ही वफ़ाई से संवाद प्रारम्भ कर दिया। वफ़ाई ने अभी अभी प्रभात की नमाझ पूर्ण की थी। वह नींबू सूप बनाने ...Read More

47   “गाँव को छोड़ने के पश्चात पहली बार किसी पर्वत को देख रही हूँ। हे काले पर्वत, तुम अदभूत हो।“ वफ़ाई काले पर्वत से मोहित हो गई। वह किसी भिन्न जगत में चली गई। जीत ने उसे उस ...Read More

47   “गाँव को छोड़ने के पश्चात पहली बार किसी पर्वत को देख रही हूँ। हे काले पर्वत, तुम अदभूत हो।“ वफ़ाई काले पर्वत से मोहित हो गई। वह किसी भिन्न जगत में चली गई। जीत ने उसे उस ...Read More

49   “यह चोटी साढ़े चार सौ मिटर की ऊंचाई पर है। यह कच्छ का सर्वोच्च सूर्यास्त बिन्दु है।“ जीत बताने लगा। वफ़ाई ने उसके शब्द नहीं सुने। वह पर्वत के चारों तरफ देख रही थी। वह मुग्ध थी, ...Read More

50 रात के अंधकार में घर की भीत से परे देखते हुए जीत स्वयं से बातें कर रहा था। वहाँ अंधकार है। क्या यह रात्री के कारण है? दिवस के प्रकाश में भी तो वहाँ....। वह अंधकार नहीं एकांत ...Read More

51   नींद से उठकर वफ़ाई द्वार पर खड़ी हो गई। बाहर अभी भी रात्रि का साम्राज्य था। सब कुछ शांत था, स्थिर था। रात्रि धीरे धीरे गति कर रही थी। वफ़ाई ने झूले को देखा। जीत वहाँ बैठा ...Read More

52 “जीत, अभी ना जाओ। कुछ क्षण ओर बैठो मेरे समीप।“ वफ़ाई ने जीत का हाथ पकड़ लिया। जीत ने वफ़ाई के हाथ को देखा, वफ़ाई के मुख के भावों को देखा तथा घात देकर अपना हाथ छुड़ा लिया। ...Read More

53 “जीत, मेरे चित्र को देखो तो। देखो, मैंने आज कुछ नया किया है।“ वफ़ाई उत्साह से भरी थी। जीत वफ़ाई के केनवास को देखने लगा। वफ़ाई झूले पर बैठ गई। जीत ने केनवास को ध्यान से देखा। केनवास ...Read More

54 “स्वप्न क्या होते हैं? कैसे दिखते हैं? उनका रंग कैसा होता है? कहाँ से वह आते हैं? क्यों आते हैं? कहाँ चले जाते हैं? वह अपने साथ क्या लाते हैं? हम से वह क्या छिन ले जाते हैं? ...Read More

55 जीत वफ़ाई को देखता रहा। वह मार्ग पर दौड़ रही थी, जीत से दूर जा रही थी। जीत की आँखों से ओझल हो गई, रेत से भरे मार्ग पर कहीं खो गई। समय रहते वफ़ाई लौट आई। जिस ...Read More

56 वफ़ाई लौट आई। झूले पर बैठ गई। एक स्वप्न, उस स्वप्न का चित्र जो जीत ने रचा था, वफ़ाई को विचलित कर रहा था। स्वप्न तथा उस के चित्र के संकेतों को समझने का प्रयास कर रही थी। ...Read More

57   अचानक जीत झूले से उठा और वफ़ाई की तरफ भागा। जाती हुई वफ़ाई के हाथ पीछे से पकड़ लिए। वफ़ाई के बढ़ते चरण रुक गये। वफ़ाई का शरीर आगे तथा दोनों हाथ जीत के हाथो में पीछे ...Read More

58   वफ़ाई और जीत झूले पर थे, एक साथ, प्रथम बार, वास्तव में। दोनों एक दूसरे के अत्यंत समीप थे। “पिछले सात घंटों से हमने एक भी रेखा, एक भी बिन्दु चित्रित नहीं किया, जानते हो तुम जीत?” ...Read More

59 “यह सुंदर तो है।“ जीत ने अभी अभी वफ़ाई का जो चित्र रचा था उसे देखकर वफ़ाई बोली। जीत ने प्रतिक्रिया नहीं दी। “जीत, तुम यदि किसी यौवना को केनवास पर चित्रित करना चाहते हो तो तुम्हें अधिक ...Read More

60 वफ़ाई झूले के निकट एक क्षण के लिए रुकी। झूले को पूरी शक्ति से धकेला और कूदकर झूले पर चढ़ गई, खड़ी हो गई। झूला गति में आ गया, वफ़ाई भी। वफ़ाई के दोनों हाथ पूरे खुले हुए ...Read More

61   “क्या हुआ, जीत?” वफ़ाई जीत की तरफ दौड़ी, जीत का हाथ अपने हाथ में लिया, “जीत, जीत. तुम ठीक तो हो?” वफ़ाई के शब्द हवा में ही रह गये। जीत ने उसे नहीं सुना। जीत अभी भी ...Read More

62   द्वार पर वफ़ाई खड़ी थी। वह जीत को ही देख रही थी। जीत चौंक गया। कब से वफ़ाई यहाँ खड़ी होगी? क्या वह मेरे अंदर चल रहे द्वंद को देख रही होगी? जीत ने अपने आप को ...Read More

63 “उठो चलो, कहीं बाहर चलते है। कुछ अंतर साथ साथ चलते हैं।“ वफ़ाई ने कहा।   “इस मरुभूमि में कहाँ जाएँगे हम?” “क्यूँ? मरुभूमि में नहीं चल सकते क्या? चलने के लिए रास्ता ही तो चाहिए।“ “चरण भी ...Read More

64   वफ़ाई के मन में कई योजनाएँ आकार ले रही थी। रोग तथा मृत्यु से अधिक मृत्यु का भय और दिलशाद के द्वारा किया गया विश्वासघात जीत की समस्या है। जीत में जीवन अभी भी बाकी है। जीत ...Read More

65   मैं बार बार क्यूँ अकेला हो जाता हूँ? जब भी कोई मेरा साथी बन जाएगा ऐसी अपेक्षा जागती है तब ही वह मुझसे बिछड़ जाता है। यह कैसा खेल है मेरे साथ, ए जिंदगी तेरा? किन्तु यह ...Read More

66 संध्या ढलने को थी। समय, एक लंबी यात्रा करके सूरज को पश्चिम दिशा तरफ ले जा रहा था। जीत ने आँखें खोली तब गगन के रंग बदल गए थे। स्वच्छ नीले गगन पर कहीं कहीं सफ़ेद हिम जैसे ...Read More

67 भोजन का समय हो गया। जीत प्रतीक्षा करने लगा कि अभी वफ़ाई कहेगी,”जीत, भोजन तैयार है। आ जाओ।“ वह प्रतीक्षा करता रहा। कोई आमंत्रण नहीं आया। अभी तक वफ़ाई ने पुकारा क्यूँ नहीं?   वह नहीं पुकारेगी।   ...Read More

68 “तुम्हारे आने की, तुम्हारे पदचाप की ध्वनि सुनाई नहीं दी। जीप की ध्वनि भी नहीं सुनाई दी। मुझे ध्यान ही नहीं रहा तुम्हारे आने का।“ जीत ने द्वार की तरफ देखा। जीप वहाँ खड़ी थी।  “मैं कोई छुपते ...Read More

69 अचानक जीत ने अपने हाथों को खींच लिया। वफ़ाई की प्रेम की लहरें ज्वाला में बदल गई। आग का एक दरिया उभर आया जो धधक रहा था। वफ़ाई us आग में जलने लगी। वह चिख उठी, “जीत, मत ...Read More

70   “क्यूँ कि तुम एक मुस्लिम लड़की हो। तुम्हारा धर्म तुम्हें इस बात की अनुमति नहीं देता। माथे पर बिंदी लगाना, श्रुंगार करना आदि तुम्हारे धर्म के विरूध्ध है। यह सब हिन्दू लड़कियों के लिए ही है। तुम ...Read More