हिम स्पर्श 46

46

 

“वफ़ाई, मेरे पास एक योजना है। तुम्हें रुचि है इसे सुनने में?” जीत ने प्रभात में ही वफ़ाई से संवाद प्रारम्भ कर दिया।

वफ़ाई ने अभी अभी प्रभात की नमाझ पूर्ण की थी। वह नींबू सूप बनाने में व्यस्त थी। वफ़ाई जागते ही मौन थी, शांत थी। जीत के शब्द वफ़ाई के लिए बात करने, उत्तर देने अथवा स्मित देने के लिए पर्याप्त नहीं थे। वफ़ाई मौन ही रही। जीत ने अपने शब्द फिर कहे, लगभग वफ़ाई के कान में।

वफ़ाई का हृदय गति चूक गया, श्वास रुक गया और आँखें बंध हो गई।

जीत पहली बार वफ़ाई के अत्यंत निकट था। जीत की उपस्थिती, जीत का सामीप्य तथा जीत की सुगंध को वफ़ाई अनुभव करने लगी। पवन की उस लहर में वह बह गई। उस क्षण में स्थिर रहने की  क्षमता वह खो चुकी थी।

वफ़ाई ने गहरी सांस ली, दोनों अधरों को चुस्त बंध कर दिया, बाएँ हाथ की मुट्ठी बंध कर ली। सब कुछ शांत था, स्थिर था, गतिहिन था। केवल गेस की ज्वाला गतिमान थी जिस पर नींबू सूप उबल रहा था। उबलता पानी ध्वनि उत्पन्न कर रहा था जो स्पष्ट सुनाई दे रहा था।

क्या केवल पानी ही उबल रहा है अथवा मेरा हृदय भी? वफ़ाई मौन ही रही।

उबलता पानी ज्वाला की उष्णता सह नहीं पाया, बर्तन की सीमाओं को पार कर गया। पानी छलक गया।

वफ़ाई ने आँखें खोली और गेस बंध कर दिया।

उबलता पानी शांत हो गया, ध्वनि अद्रश्य हो गए। जो कुछ गति में था वह स्थिर हो गया। एक तूफान शांत हो गया। वफ़ाई भी। जीत बाहर चला गया।

“सूप तैयार है। इसे पी लो।“ वफ़ाई सूप के दो गिलास के साथ बाहर आई। जीत केनवास पर रचे पर्वत के चित्र के समीप था।

“अवश्य। वफ़ाई झूले पर बैठो।“ जीत ने वफ़ाई को आमंत्रित करते हुए एक गिलास ले लिया। दोनों धीरे धीरे, मौन रहकर, सूप पीने लगे। दोनों ने समय को बहने दिया।  

“क्या योजना है तुम्हारी?” वफ़ाई ने सूप पूरा कर लिया था।

“सरल है। आज पूरा दिवस इस घर को छोड़कर भाग जाते हैं।”

“मैं इस स्थान को छोड़कर कहीं भी नहीं जाऊँगी जब तक मेरा अभियान पूर्ण न हो।“ वफ़ाई अधीर हो गई।

“मैं तुम्हारे उत्साह तथा काम के प्रति समर्पण का सम्मान करता हूँ। किन्तु हे पर्वत सुंदरी, मुझे मेरे शब्द पूरे तो करने दो। क्या इसके लिए मुझे अनुमति है मेरे मित्र?” जीत ने विनम्रता से सिर झुकाया।

‘जी, अनुमति है।“ वफ़ाई झूले पर बैठ गई, हाथों की अदब बनाकर। वह किसी पाठशाला की आज्ञांकित छात्रा लग रही थी।

“भोजन के पश्चात इस मरुभूमि में यात्रा की योजना बनाई है मैंने। इस मरुभूमि में एक पर्वत है। पर्वत है छोटा सा, किन्तु सुंदर है। इस पर्वत का नाम है काला डूंगर। क्या तुम वहाँ जाना पसंद करोगी?”

“पर्वत? इस मरुभूमि में? तुम सही कह रहे हो?” वफ़ाई उत्साह से भर गई।

“अवश्य ही मैं सही कह रहा हूँ।“

“अदभूत विचार है, जीत। कब जाना है? कैसे जाना है?” प्रसन्नता से वफ़ाई नाचने लगी।

“तुम्हारी जीप से तीन बजे चलेंगे। दो घंटे में पहोंच जाएंगे। रात्रि से पहले लौट आएंगे।“

“लंबे समय के पश्चात पर्वत देखने को मैं उत्सुक हूँ।“ वफ़ाई झूले से उठी और कक्ष में चली गई। प्रवास की तैयारियां होने लगी जो 2.55 पर पूर्ण हो गई।

“जीत, तुम इस काले जींस तथा हल्के नारंगी टी-शर्ट में सुंदर लग रहे हो। अभी तक तुमने यह पहना क्यों नहीं? तुम्हारी चाल में भी एक भिन्न गति दिख रही है। मुझे तो तुम्हारा यह अवतार पसंद आया।“ वफ़ाई ने जीत को देखकर कहा।

“वफ़ाई, तुम भी तो जींस तथा टी-शर्ट में हो। बस रंग भिन्न है। सागर से नीले रंग के जींस में तथा गुलाबी टी-शर्ट में तुम भी मोहक लग रही हो। और यह खेल के जूते? वाह क्या बात है। मुझे भी तुम्हारा यह अवतार पसंद आया।“ वफ़ाई ने स्मित से उत्तर दिया।

“जीत, तुम जीप चलना चाहोगे?” वफ़ाई ने जीप की चाभी जीत को दे दी। जीत चालक स्थान पर जा बैठा। वफ़ाई जीत के बाएँ की बैठक पर बैठ गई। जीप काले पर्वत की तरफ गति करने लगी।

“जीत, तुम इस मार्ग को जानते हो?”

“हाँ। किन्तु तुम्हारे लिए यह नया है। यही कारण है कि मैं इसे धीरे धीरे चला रहा हूँ। तुम इस मार्ग को निहार लो, इसका आनंद लो। 

मार्ग शांत था। एकांत से भरा था। दोपहर की धूप से गरम भी था। पवन कभी दोनों को छूकर बहती थी तो कभी दोनों के अंदर बहती थी।

दोनों मौन थे। जीत जीप चला रहा था तो वफ़ाई मरुभूमि के रूप को पी रही थी। मरुभूमि शांत थी। मौन थी। 

समय स्थिर सा था। गगन भी स्थिर था। मार्ग भी इतना धीरे धीरे कट रहा था कि जैसे वह भी स्थिर हो। दिशाएँ स्थिर थी। गगन में सूरज भी इतनी मंद गति से चल रहा था कि वह भी स्थिर लग रहा था।

वफ़ाई ने जीत को देखा। वह सीधे मार्ग को देख रहा था। वफ़ाई उसे कुछ क्षण देखती रही किन्तु जीत ने उस पर ध्यान नहीं दिया।

वफ़ाई मन ही मन बातें करने लगी, क्या उसे घ्यान भी है कि मैं उसके साथ प्रवास में हूँ। उसके समीप बैठी हूँ।

मुझे ऐसा नहीं लगता। वह अपने काम में इतना डूब गया है...।

मैं ही उससे बात करती हूँ।

“जीत, इस एकांत से भरे दोपहरी मार्ग को देख कर क्या विचार कर रहे हो?”

जीत ने अपने गले को वफ़ाई की तरफ घुमाया जहां उसे वफ़ाई दिखाई दी।

“कुछ कहो...।” वफ़ाई के शब्द हवा में विलीन हो गए।

“शी....श...। गरम पवन की लहरों में मरुभूमि सोई हुई है। उसे बिना व्यवधान के सोने दो।“

“अर्थात मरुभूमि गहन निंद्रा में है?” वफ़ाई ने धीरे से जीत के कान में कहा।

“ना केवल गहन अपितु मीठी भी।“ जीत ने कहा।

पवन का एक टुकड़ा वफ़ाई को छु गया। वफ़ाई को भा गया। वफ़ाई ने सोई हुई मरुभूमि को सोने दिया। वह मौन हो गई।

जीप चल रही थी, समय भी। मार्ग सब कुछ पीछे छोड़ रहा था। जीत तथा वफ़ाई मौन प्रवास कर रहे थे। लगभग डेढ़ घंटे की यात्रा के पश्चात जीप धीरे से रुक गई। वफ़ाई मरुभूमि की मोहकता से बाहर आई।

वफ़ाई ने आस पास देखा। वह पहाड़ी मार्ग पर थे। छोटी छोटी पहाड़ियों से वह घिरे थे। चोटियाँ हरी भरी नहीं थी किन्तु आकर्षक थी।

“क्या हम काले पहाड़ पार आ गए?” वफ़ाई ने उत्सुकता से पूछा।

“नहीं, अभी नहीं। किन्तु हम उसके निकट ही हैं।“

“तो यहाँ जीप क्यों रोक दी? लक्ष्य से पहले रुकना नहीं चाहिए।“

“हे पर्वत कुमारी, लक्ष्य पर पहोंचना और लक्ष्य प्राप्त करना, केवल यही बात सुंदर नहीं होती। लक्ष्य

से भी अधिक सुंदर कई वस्तु, कई बात होती है।“ जीत ने स्मित दिया।

“वह कौनसी बातें है?”

“कभी कभी लक्ष्य की तरफ ले जाने वाला मार्ग भी लक्ष्य से अधिक सुंदर होता है, मोहक होता है।“

“ऐसा क्या? इस मार्ग का सौन्दर्य क्या है, बताओ तो?”

“क्षण भर प्रतीक्षा करो। मैं सब बताता हूँ। एक बात और जान लो जो लक्ष्य से भी सुंदर है।“ जीत ने वफ़ाई के मुख के भावों को देखा।

“शीघ्र ही बताओ।“ वफ़ाई ने रुचि दिखाई।

“कभी कभी, लक्ष्य की तरफ जाते मार्ग पर साथ चलने वाला साथी सबसे सुंदर होता है।“

“अर्थात, यदि लक्ष्य सुंदर है तो मार्ग की चिंता कैसी? और यदि मार्ग सुंदर है तो लक्ष्य की चिंता कैसी? यह तो सुना था। तुम तो इससे आगे कह रहे हो, कि यदि साथी सुंदर है तो मार्ग और लक्ष्य की चिंता क्यों करें? यही कह रहे हो ना तुम?”

“हाँ। तुमने बात का मर्म ही पकड़ लिया, चतुर छोकरी।“

“वह तो ठीक है। किन्तु यह तो कहो की यहाँ क्या सुंदर है? मार्ग, लक्ष्य अथवा साथी?”

जीत मैं जानती हूँ कि तुम यही कहोगे कि वफ़ाई नाम का साथी सबसे सुंदर है।

वफ़ाई ने आँखें बंध कर ली और जीत के आने वाले शब्दों पर ध्यान धरने लगी। उसके कानों पर जीत के शब्द पड़े,”इस क्षण, प्रवासकी सबसे सुंदर वस्तु इन तीनों में से कुछ भी नहीं है।“

शब्द सुनते ही वफ़ाई चकित हो गई, उसने आँखें खोल दी।

“जीत, मेरी धारणा थी कि ...।“

“सब गलत हो गई न? सबसे सुंदर है प्रवास का यह बिन्दु, यह स्थान।“

“अर्थात एक और वस्तु जो सुंदर है।“

“इस जगह को देखो, यह अजोड़ है।“ जीत जीप से बाहर निकल आया। वफ़ाई भी।

जीत वफ़ाई को मार्ग से ऊपर तीस चालीस फिट ले गया। वहाँ लिखा था- ‘संभावित चुम्बकीय बिन्दु’।

वफ़ाई की आँखों मे प्रश्न था। जीत के पास उत्तर था।

“यह चुम्बकीय बिन्दु है। यहाँ, न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का नियम काम नहीं करता। न्यूटन का नियम कहता है कि प्रत्येक पदार्थ नीचे, धरती की तरफ गति करता है। सदैव ऊपर से नीचे की तरफ जाता है। यदि किसी पदार्थ को ढलान पर रखा जाय तो वह नीचे की तरफ सरकता है। किन्तु यहाँ, पदार्थ ऊपर की तरफ गति करता है। गुरुत्वाकर्षण के विरूध्ध।“ जीत ने समझाया।

“यह पूर्णत: असंभव है। मैं नहीं मानती इस बात को।“

“तुम्हारी यही तो समस्या है, पर्वत कुमारी। किसी की मान्यता, विचार अथवा आवेग से वस्तुएं प्रभावित नहीं होती। वह जैसी होती है वैसी ही रहती है।“

“तुम उपहास तो नहीं कर रहे? क्या तुम अपनी बात सिध्ध कर सकते हो?” वफ़ाई ने जीत का आव्हान किया।

जीत ने उत्तर नहीं दिया। उसने उस बिन्दु पर जीप रख दी। जीप का एंजिन बंध कर दिया। हाथ वाली ब्रेक लगा दी। 

“वफ़ाई, यहाँ आ जाओ। लो यह चाभी और चालक बैठक पर बैठ जाओ।‘ जीत ने जीप के आसपास निशान कर दिया।

“मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है।“ वह जीप में बैठ गई।

“अब हाथ वाली ब्रेक को छोड़ दो और जो होता है उसे देखो, उसे अनुभव करो।“ वफ़ाई ने वैसा ही किया।

जीप का एंजिन बंध था। जीप ढलान पर थी। नियम के अनुसार उसे नीचे की तरफ जाना था, किन्तु वह नीचे नहीं जा रही थी। जीप स्थिर थी।

कुछ क्षण में जीप चलने लगी। वफ़ाई ने देखा की जीप चलने लगी है। धीरे धीरे जीप ऊपर की तरफ गति कर रही थी।

“यह केवल मेरा भ्रम है। जैसे कि मैं विचार कर रही हूँ कि जीप ऊपर कि तरफ गति कर रही है, मुझे वैसा ही भ्रम हो रहा है। यह सत्य नहीं, भ्रम ही है।“  

वफ़ाई ने जीत को देखा। वह दूर खड़े वफ़ाई को निहारता था। वफ़ाई के भाव तथा प्रतिभाव को देख रहा था। उसका स्मित कह रहा था कि जो घटना घट रही है वह विस्मय से भरी है।

‘क्या वास्तव में ऐसा हो रहा है?” वफ़ाई ने पूछा। जीत ने उत्तर नहीं दिया, केवल स्मित दिया।

चार मिनिट बीत चुके थे। जीप ऊपर की तरफ जा रही थी।

“मैं क्या करूँ?” वफ़ाई विचलित हो गई। एक मिनट और व्यतित हो गया। वफ़ाई ने अपना धैर्य खोया और हाथ वाली ब्रेक खींच ली, जीप का द्वार खोल दिया और बाहर आ गई। उसके माथे पर प्रस्वेद था।

वफ़ाई ने गहरी साँसे ली। जीत ने वफ़ाई को पानी धरा। वफ़ाई उसे एक ही घूंट में पी गई।

वफ़ाई शांत हो गई, जीत को देखने लगी। जीत के अधरों पर स्मित अभी भी था।

“तुम स्मित क्यों कर रहे हो?”

“शांत हो जाओ वफ़ाई। खुली आँखों से चमत्कार देखना अभी बाकी है। जीप के चक्रों को देखो।“

“उसे क्या हुआ? चारों के चारों ठीक तो है।“

“चक्र तो ठीक ही है। उस बिन्दु पर देखो जहां तुम्हारे जीप के अंदर जाते ही मैंने एक निशान लगाया था”

“वह तो नीचे है, लगभग बीस फिट नीचे। अर्थात जीप ऊपर की दिशा में इतनी दूरी तक चली है, बिना ईंधन के, गुरुत्वाकर्षण बल के विरूध्ध। यह तो अदभूत है, यह चमत्कार है, यह अकल्पनीय है।

यह कैसे हुआ? जीत, कहीं तुमने तो कोई युक्ति नहीं की ? क्या वास्तव में ऐसा हुआ है अथवा कोई भ्रम हुआ है।“ 

“कभी कभी हमारी आँखों के सामने जो घटता है उसे भी हम मान नहीं सकते। उसे घटते हुए हम अपनी खुली आँखों से देखते हैं किन्तु उसका स्वीकार नहीं कर सकते। उसे हम भ्रम अथवा चमत्कार मान लेते हैं। चमत्कार नाम की कोई भी बात नहीं है इस विश्व में। प्रत्येक बात, प्रत्येक घटना का एक तर्क होता है, कारण होता है। हमें उस घटना के मूल तक जाना होता है। वहाँ तक जाने का कष्ट लिए बिना ही हम उसे चमत्कार अथवा भ्रम कह देते हैं।“

“तो इसके पीछे का तर्क क्या है? कारण क्या है?”

“उस बिन्दु पर लिखे शब्दों को पुन: पढ़ो।“

“संभावित चुंबकीय बिन्दु।” वफ़ाई ने उसे पढ़ा। वफ़ाई अपने बालों को खींचने लगी।

“यह तो आश्चर्य है, विस्मय है।“ जीत ने वफ़ाई को उस विस्मय की अनुभूति करने दिया।

जीत जीप मैं बैठ गया, हॉर्न बजाने लगा। वफ़ाई भी जीप में बैठ गई। जीप मार्ग पर चलने लगी।

वफ़ाई की आँखों में अभी भी विस्मय था। जीत कोई गीत गा रहा था।

कुछ ही क्षणों में पर्वत दिखने लगा।

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