घुमक्कड़ी बंजारा मन की - 3

घुमक्कड़ी बंजारा मन की

(३)

तुम्हारे शहर का मौसम बहुत सुहाना लगे

(गुजरात यात्रा)

भारत देश इतनी विवधता से भरा हुआ है कि जितना देखा जाए उतना कम है. इसलिए अहमदबाद गुजरात की यात्रा अभी तक ३ बार कर चुकी हूँ. हर बार इस शहर ने मुझे हैरान किया अपने सुंदर रंग ढंग से, अपनी सरलता से और अपने निस्वार्थ प्रेम से... इन्ही यादों को याद करते हुए चलिए हम चलते हैं.

यह यात्रा कुछ वक़्त पहले की है, होटल के रेट, खाने के रेट बदल सकते हैं तब से अब तक, पर मुझे यकीन है कि यह शहर पहले से ज्यादा बेहतरीन और खूबसूरत हो गया होगा.

अहमदबाद, गुजरात की सैर दिल में एक कोतूहल और कुछ बदलाव देखेने की इच्छा मन में दबी थी बहुत साल पहले द्वारकानाथ जाना हुआ था उस यात्रा की एक धुधंली सी याद कही दिल में अब भी छिपी थी. उसके बाद कुछ साल पहले इस शहर ने भूकंप का कहर झेला था.

दिल में कही था कि कैसा होगा अब यहाँ सब, पर सच में यहाँ के लोग जीना जानते हैं,

वही शहर अपने पूरे शबाब से जी रहा था... वही चहल पहल, और वही टूवीह्लरर्स की भागदौड, सच में अच्छा लगा,

दिन बहुत गरम और पसीने से नहला देना वाला उस पर बेटी के लिए चंद महीनो के लिए एक अददरहने का ठिकाना तलाश करने की मुहिम ने हमे पूरे अहमदाबाद की सैर करवा दी.... शायद वहाँ के लोकल लोग इतना नही देख पाए होंगे जो हमने वहां 4 दिन में देख डाला,

आश्रम रोड से दूर हाई रोड पर बने पेंटा हाउस तक हमने देख डाले...

अंत में पसंद आया वहाँ के सबसे अच्छे इलाक़े वस्त्रापुर में बना एक सुंदर सा घर,

जहाँ कई जगह से आई लड़कियाँ रहती है,

हर घर में झूला और बा :) सच में मेरे दिल को तो भा गये, जगह जगहखाने की मौज, क़दम क़दम पर आपको रेस्तोरेंट मिल जायंगे. एक बात और वहाँ की अच्छी लगी कि वहाँ के लोग जीना जानते हैं, शनिवार, एतवार की शाम शहर को ज़िंदादिली से भर देती है,

दिन भर की गर्मी को शाम की ख़ुशनुमा हवा बरबस यह बात दिल से कहलवा ही देती है कि. "तुम्हारे शहर का मौसम बहुत सुहाना लगे मैं एक शाम चुरा लूं अगर बुरा ना लगे"

साइन्स सिटी अहमदाबाद का आकर्षण

यहाँशाम को चलते रंगीन म्यूज़िकल फाउंटन ने हमारा दिल छू लिया,

तो गाँधी आश्रम और साबरमति के किनारे ने एक शांति सी दी दिल को. ,

अभी पूरे शहर को देखने की प्यास दिल में रह गयी.

चद लफ़ज़ो में शायद इस शहर को ब्यान करना मुश्किल होगा, गाँधी नगर की खूबसूरती, अक्षर धाम का मनमोहक नज़ारा बाँधा कैसे जाएगा, वैसे यहाँ के लोग बहुत ही मदद करने वाले हैं... लॅंग्वेज भी यहाँ की थोडा ध्यान देने पर समझ आ जाती है

चार दिन में इस शहर को समझने के भरपूर मौका मिला पर अभी यह शहर देखना बाकी था तो हम फिर यहाँ तीसरी बार पहुंच गए

फिर ले आया तेरा इश्क मुझे तेरे शहर में

फिर से गांधी जी के शहर में थे इस बार भी दिल जीत लिया वहाँ के रहने वालो ने, हर जगह हमारे लिए नई थी. पर पग पग पर वहाँ के कुछ लोगो ने इतना साथ दिया कि नया शहर भी अपना सा लगने लगा चाहे वह हमारे साथ चलने वाला "ड्राइवर हितेश हो" या सोमनाथ मन्दिर, द्वारका मन्दिर में ऑटो वाला हो.

नया साल मनाने की उमंग और बेटी से मिलने की चाह ने दिल को एक महीने पहले ही तैयारी करने को बेताब कर दिया था. बेटी से मिलना और गुजरात घूमने की इच्छा, और सब बहने और उनके बच्चे साथ.. सच में एक नए साल के स्वागत की नई तैयारी थी.... सफर शुरू हुआ हमारा २६ दिसम्बर से और खत्म हुआ १ जनवरी को. यह कुछ दिन कैसे पलक झपकते ही गुजरे. गुजरात जब मैं आज से लगभग २० साल पहले गई थी तो उस वक्त सोचा भी नही था कि दुबारा क्या तीसरी बार फ़िर यहाँ आना होगा.. पर जो बांके बिहारी की इच्छा... इस बार का घूमना तो एक याद गार पल बन गया सब बहने और उनके बच्चे अपने बच्चे, और एक नया जोश, विश्वास. सब कुछ अदभुत था.

अहमदाबद मेरी नजर से

हमारा सफर शुरू हुआ २६ दिसम्बर से रात को ८ बजे राजधानी से चले और सुबह ठीक १० बजे अहमदाबाद.. रास्ते में की खूब मस्ती आगे घूमने का जोश बढे से ले कर छोटे सब में था.. अहमदाबाद में गेस्ट हॉउस बुक था, सब जा के पहले फ्रेश हुए, और बढ़िया सी चाय पी कर चल पढे सबसे पहले अपने मनपसंद जगह शापिंग. यह जगह "लाल दरवाज़ा" नाम से मशहूर है जम के शापिंग की हम सबने और फ़िर परेशान हो गए कि अब आगे तो इतनी यात्रा करनी है जो खरीदा है उस समान का क्या करें... बहुत मुश्किल से बेटी जहाँ रहती है, पी जी के रूप में उसके कमरे में वह सब समान रखा.. समय भी कम था और आगे जाना था तो शापिंग को दी यही मन मार के लगाम.. और इस के बाद चला हमारा कारवां यू एस पिज्जा की तरफ़.. यह भी एक मजेदार जगह है.. अहमदाबाद की.. तब उस वक़्त में हमने १५५ rs(अब पता नहीं क्या रेट होगा ) में जितना मरजी आए सलाद खायो. पिज्जा खाओ सूप पीयो... गार्लिक ब्रेड खाओ. सच में हर बार कुछ नया सलाद और दिल भर के खाने की छुट. पर बेचारा पेट भी क्या करे, इन सबको खाने के बाद देते हैं आइस क्रीम. वह एक ही देते हैं.. दिल किया सुझाव दूँ भाई यह भी अनलिमिटेड कर दो.

जय द्वारका धीश

द्वारका जाने का समय Tavera से रात को १२ बजे तय हुआ था सबने अपने समान को पैक करके आगे की यात्रा शुरू की, एक बात माननी पड़ेगी कि गुजरात की हाई वे रोड्स और रोशनी सड़कों पर खूब हैं. पूरा रास्ता साफ सुथरा कही से एक बार नही लगा की हम इतनी रात को सफर कर रहे हैं.

दिन में गरम रहने वाला गुजरात रात को काफ़ी ठंडा था, कहीं कहीं कोहरा भी घना सा आया पर सुबह ५ बजे हम द्वारका में थे यहाँ हमारी कोई बुकिंग नही थी, और जिस धर्मशाला रेस्ट हॉउस या होटल में पता कर वही फुल, सुबह होने में अभी देर थी... हलका सा अँधेरा था अभी माहौल में और कुछ ठंडक भी

एक ऑटो वाले ने कहा कि वह हमारे साथ चल कर बता सकता है कि कोई होटल या कुछ देर रहने को जगह मिल जाए, बहुत तलाश करने के बाद एक कमरा मिला ५०० रूपये में तब

हमने कुछ देर ही रुकना था फ़िर आगे निकालना था बेट द्वारका और आगे पोरबंदर के लिए

श्री द्वारका नाथ जी का मन्दिर पश्चिम समुन्दर के किनारे है. यह हिंदू धरम के चार धामों में से एक माना जाता है यहाँ पर कृष्ण जी की प्रतिमा बहुत ही प्रभावशाली है. द्वारकानाथ जी के वस्त्र समय अनुसार बदले जाते हैं, होली, दिवाली. जन्माष्टमी के मौके पर इनका श्रृंगार देखने वाला होता है.. यहीं पर पास ही संगम स्थान भी है. गोमती नदी के दर्शन भी यहीं होते हैं. सब बहुत ही पावन है.

पर वही बात कि पण्डे आपको बहुत परेशान करेंगे और गोमती नदी के दर्शन हेतु ले जायेंगे तो वहाँ इतनी काई है कि पैर फिसलने का डर होता है. और उस पर पंडो का इजहार की यहाँ पर आचमन करो.. खैर हम सबने तो श्रद्धा पूर्वक बस हाथ जोड़े और प्रसाद अपनी श्रद्धा से वहाँ अर्पण किया.

अब पेट पूजा की बारी थी सुबह से सबको हिदायत दे दी थी कि पहले दर्शन होंगे फ़िर खाने पीने की बात कोई करेगा, खाने की लिए जब जगह देखी तो सब तरफ़ ढोकला. दाल वडा, और कुछ नमकीन दिखी.. बताया गया कि यहाँ के लोग यही नाश्ता करते हैं. अब बच्चे यह सब खाने की तैयार नही थे.

बहुत मुश्किल से कुछ दूर जाने पर एक पंजाबी होटल मिला. पर वहाँ का सर्विस करने वाला बन्दा शायद हमसे भी ज्यादा थका था. इतनी देर में पूरी आलू, लाया कि हम सब कि भूख भी बाय बाय बोल गई

आगे चले बेट द्वारका की तरफ़. यह समुन्दर के बीच में बना द्वारका नाथ जी का मन्दिर है. इस पर जाने के लिए मोटर बोट करनी पड़ती है. अब तक १२ बज चुके थे और गरमी पूरी तरह से हावी थी... एक तो धूप तेज सामने सारा समुन्दर जिसका पानी बहुत ही साफ था और उस पर मोटर बोट वाले तब तक नही चलते जब तक सवारी पूरी से भी ज्यादा न हो जाए. कृष्ण कृष्ण करके मोटर बोट चली.. वहाँ पहुंचे तो पता चला कि मन्दिर के द्वार अभी ४ बजे से पहले नही खुलेंगे, बाहर से माथा टेका... फ़िर वही की मोटर बोट तभी चलेगी जब तक यह पूरी तरह से भर नही जाती है.. उस दिन जो धूप में हम सब की हालत हुई भूल नही सकते हम उस समय को. किनारे पहुँचते ही पीया खूब सारा पानी ठंडा तो जान में जान आई. आगे बढ़ा हमारा कारवां इसके बाद पोरबंदर

पोरबंदर की सैर

यहाँ पर हमारी बुकिंग पहले से ही तोरण गेस्ट हॉउस में बिटिया ने करवा रखी थी बहुत ही सुंदर जगह समुन्दर के किनारे.. खुला सा गेस्ट हॉउस देख के ही आधी थकावट उतर गई. थोड़ा फ्रेश हुए. और सामने बीच पर जा के बहुत देर तक बेठे रहे. यहाँ के समुन्दर का पानी इतना खारा है कि किनारे पर बालू सख्त चट्टान सी हो चुकी है. ठंडी हवा में जितनी देर बैठ सकते थे बैठे फ़िर भूख लगने पर वहाँ के स्वागत होटल में गए. बहुत ही अच्छा खाना था वहाँ का अब सब बहुत थके हुए थे. पर कोई सोने के मूड में नही था. सो कुछ देर बात गपशप की. कुछ देर हँसी मजाक के बाद सब कि आँखे बंद होने लगी, और जब सुबह उठे तो सब एक दम उगते सूरज से फ्रेश थे. सब फटाफट रेडी हुए और हमारा शुरू हुआ सबका फोटोशेशन.. सबने खूब फोटो लिए और चल पढे फ़िर गाधी जी के जन्म स्थान की और.

बहुत ही सुंदर जगह. वहाँ पग पग पर गांधी जी के होने का एहसास था और दिल में था ख़ुद के भारतीय होने का गर्व. यहाँ कुछ देर रुकने के बाद चल पढे हम सोमनाथ की तरफ़.

जय सोमनाथ जी की

पोरबंदर से सोमनाथ का रास्ता बहुत ही सुंदर है.. बहुत ही हरियाला सा.. नारियल और केले के खेत मन मोह लेते हैं.. इसी रास्ते में आया "माधवपुर बीच" बहुत ही सुंदर और साफ. कुछ देर रुक के हमने यहाँ खूब मस्ती की

. फोटो और यहाँ पर खूब सारा नारियल पानी पीने के बाद चल पड़े आगे, सोमनाथ मन्दिर.

यहाँ पर बुकिंग नही थी और यही पर एक अनजान ऑटो वाले ने हमारी बहुत मदद की.. बिना किसी स्वार्थ के उसने हमे उस अनजान जगह पर कई अच्छे होटल दिखाए, पर नए साल के स्वागत में वहाँ सब होटल खाली नहीं थे, उस अनजान ऑटो वाले ने हमारी बहुत मदद की और आखिर हमे मिल ही गया एक गेस्ट हॉउस..

समान रखा और सोमनाथ मदिर के दर्शन किए. बहुत ही सुंदर मन्दिर है यह समुन्दर के किनारे बना हुआ ख़ुद में कई इतिहास समेटे. पहले भी कई लुटा गया कई बार बना कई बार टूटा और अब भी शायद आतंकवाद के निशाने पर है तभी बहुत ही ज्यादा सिक्यूरिटी थी.

यहाँ हमे पता नही था पहले सो ज्यादा फोटो नही ले पाये यहाँ के. रास्ते में विरावल भी देखा जहाँ कृष्ण जी को तीर लगा था और रात को देखा लाईट एंड साउंड शो जो सोमनाथ मन्दिर बनने और टूटने की पूरी कथा बताता है. अच्छा लगा इसको और अच्छा बनाया जा सकता है. पर जितना भी देखा बहुत पसंद आया. समुन्दर की लहरों की आवाज़ उस पर शिव की आरती. सुंदर मन को मोह लेने वाली थी यह.. कभी न भूलने वाला समां है यह

रात के दस बजने वाले थे हमने रात्रि दर्शन किए और खाना खा के सो गए.. नही नही चुप चाप नही.. कुछ देर आज के घूमने की बातें और कुछ गाने और शरारते कर के.. छोटी बेटी को थोड़ा सा बुखार आ गया था सो सबको कहा अब सो जाओ, ताकि कल दियू के निकला जा सके.

दियू के भव्य नज़ारे

यह सोमनाथ से से सिर्फ़ ८० किलोमीटर की दूरी पर है. रास्ता बहुत ही सुंदर वही नारियल और केले के पेड़.. और जब गेस्ट हॉउस पहुंचे तो बस वह देख के मज़ा आ गया. यह जगह थी दियू से १० किलोमीटर दूर.

दियू शहर बहुत ही सुंदर है. घर इतने सुंदर है कि बस वही देखते रहने को दिल करता है. पर बीच उतना ही गंदे पानी का शायद वहाँ होने वाली वाटर गेम्स और चलने वाली मोटर बोट ने पानी को साफ नही रहने दिया. खूब मौज की यहाँ खूब वाटर गेम्स पैरा सीलिंग की पानी गन्दा था पर हम कहाँ बाज आने वाले थे खूब पानी में खेले और रात को दियू का नजारा लिया रात का.

अगले दिन था इस साल का आखिरी दिन. इस दिन वहाँ का प्रसिद्ध फोर्ट देखा चर्च देखा और फ़िर की वाटर गेम्स पर शाम होते ही यहाँ का माहौल अजब रंग से रंगने लगा. सब तरफ़ पिय्कड़ ही पिय्कड़ दिखने लगे. वहाँ से हम भागे क्रूस में जहाँ जम के डांस किया और नए साल का स्वागत.. फ़िर वापस होटल में अपने. अगले दिन वापसी थी. कभी न भूलने वाली यादगार यात्रा थी यह. बहुत मदद की हमारी गाड़ी के ड्राइवर हितेश ने, और बच्चो के हँसते गाते जोश वाले माहौल ने.. अब फ़िर से इंतज़ार है एक ऐसे ही और यादगार सफर का... !!

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S Nagpal 2 months ago

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Ranju Bhatia 3 months ago