राशिफ़ल - 1 in Hindi Humour stories by किशनलाल शर्मा books and stories Free | राशिफ़ल - 1

राशिफ़ल - 1

अखबार आते ही रोज़ की तरह दिन भर का भविष्य जानने के लिए,पेज पलटा।राशिफ़ल वाले कालम में अपनी राशि पर नज़र पड़ते ही आंखे फ़टी सी रह गई।कंही गलती से दूसरी राशि तो नही देख गए।यह  भरम होते ही एक बार फिर से"मिथुन" राशि पर हमने नज़रे जमा दी ।हमारा भरम निर्मूल था।हमने अखबार में अपना राशिफ़ल ही देखा था।
हमारे दिमाग मे बार बार हमारी   राशि मेे  लिखे शब्द ,सवारी से  खतरा,घूम रहे थे।हम   डयूटी पर रोज़ रिक्शे से जाते थे।बनिये की दुकान तो थी नही,जब मन मे आया  खोली, मन मे नही आया तो छुट्टी कर दी।
अपना राशिफ़ल देखते ही हमारा मन उदास हो गया।बेमन से नित्यकर्म से निपटकर हम तैयार हो गए।हमे तैयार देखकर रोज़ की तरह पत्नी खाना परोसकर ले आयी।हमारा मन खाना खाने का बिल्कुल नही था।लेकिन खाना तो खाना था।इसलिए दो चार ग्रास उल्टे सीधे मुँह में ठूसकर उठ खड़े हुए।कम खाना खाकर उठता देखकर पत्नी ने टोका था,"अरे।खाया क्यो नही?क्या बात है?तबियत तो ठीक है।"
हमने पत्नी की किसी बात का जवाब नहीं दिया।हम मुँह से कुछ नही बोले,लेकिन हमारे चेहरे को देखकर पत्नी ताड गई कि हम आज उदास है।हमारी उदासी का कारण जानने के लिए पत्नी ने बार बार हमें कुरेदा।पत्नी के लाख प्रयासों के बाद भी हम मौन धारण किये रहे।
पत्नी से विदा लेते समय मेरी कालेरी  के उपन्यास वेंडता का वह दृश्य आंखों के सामने घूम गया ,जिसमे नायक अपनी पत्नी से विदा लेता है।नायक को सुबह जल्दी बहार जाना था।वे तैयार होकर पत्नी के कमरे में उससे विदा लेने पहुचता हैं।उसकी पत्नी सो रही थी। उसके पास ही उसकी बच्ची सो रही थी।नायक ने पत्नी को जगाना उचित नही समझा।पत्नी को सोता देखकर कमरे से विदा होते हुए उसके दिल मे रह रह कर ख्याल आ रहे थे कि मैं अपनी पत्नी से शायद फिर न मिल पाउ।हमें भी रह रह कर ख्याल आ रहा था शायद पत्नी से हमारी यह अंतिम मुलाकात हो।
पत्नी से विदा लेकर हम दरवाजे से बाहर निकले ही थे कि बिल्ली हमारा रास्ता काट गयी।घर से निकल ते ही अपसकुन हो गया था। कुछ देर तक खडे रहकर हम पहले किसी ओर के गुजर ने का इन्तजार करते रहे।लेकिन दस मिनट के इन्तजार के बाद भी कोई नही गुजरा था।ज्यादा इन्तजार करते तो ऑफिस जाने को देर हो जाती।बीसवीं शताब्दी के वैज्ञानिक युग मे भी हम रूढ़िवादीता और अंधविश्वास मे फंसे हुए थे।अपने दिल को मजबूत करके हम चल दिये।
गली के नुक्कड़ पर पहुंचते ही एक आदमी हमसे आ टकराया।उसके हाथ मे एक कागज था।जिस पर लिखे पते पर वह पहुँचना चाहता था।हमने कागज़ हाथ में पकड़कर उसको पता समझाने के लिए नज़रे ऊपर उठाई थी।उसके कि चेहरे पर नज़र पड़ते ही हम कागज़ फेंक कर ऐसे भागे, मानो दिन में ही भूत देख लिया हो।जो आदमी हमसे पता पूछना चाहता था,वह काना था।
घर से निकलते ही दूसरा अपशकुन हो गया था।अब हमें हमारी राशि सही होती नजर आने लगी।घर से निकलते ही दो दो अपशकुनों ने राशिफल के सच होने का एहसास हमारे दिल मे जगा दिया दिया था।
(1978 में दीवानातेज़ में प्रकाशित पहली रचना)
शेष अगले भाग मे

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