khauf...ek ankahi dastan - 4 in Hindi Thriller by Akassh Yadav Dev books and stories PDF | खौफ़...एक अनकही दास्तान - भाग - 4

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खौफ़...एक अनकही दास्तान - भाग - 4

घर आकर अपने बिस्तर पर धम्म से गिरे साहिल का दिमाग एक दम सुन्न पड़ गया था,उसकी समझ में नही आ रहा था की ये सब क्या हुआ...?
कुछ देर वो उस घटना के बारे में आंख बंद किये सोचता रहा...फिर एक झटके से उसने आंख खोल दी।
अचानक उसकी छठी इंद्री सजग हो गई....जो उसे खतरे की घँटी बजने के संकेत दे रही थी।

उसके दिमाग मे सबसे पहले यही ख्याल आया,"सुबह जब लिसा की लाश मिलेगी, तो सब कुछ साफ हो जाएगा कि उसके साथ कल रात मैं ही था, फिर पुलिस मुझे अरेस्ट कर जब मेरी हड्डियां तोड़ेगी तो मैं शायद सब कुछ सच बक दूंगा"।
अब उसके गले मे फांसी का फंदा कसता हुआ सा महसूस होने लगा था उसे, और फिर वो बुरी तरह हांफते हुए चीख उठा..."नही मैने कुछ नही किया...!!मैंने कुछ भी नही किया "।

वो उठ कर बैठ गया था....और फिर खुद को बचाने के लिए क्या करे ये सोचने लगा।
काफ़ी देर तक सोचते रहने के बाद,अचानक उसके होंठों पर एक मुस्कान थिरक उठी,मानो उसने अपने आप को इस केस से पूरी तरह से बचा लिया हो ।

★★★

डॉक्टर गोयंका
अपने दोनों हाथों को बांधे ,सिर झुकाए चुपचाप उस शानदार एयरकंडीशन ऑफिस में खड़े थे।
और मिस्टर रब्बानी...वो हर शब्द को मानो चबाते हुए बोल रहे थे...!!

"ये कोई मामूली सी भूल नही"
डॉक्टर तुम्हे पता भी है तुमसे कितना बड़ा गुनाह हुआ है...!!
आखिर कौन है वो जो हमारे इस हॉस्पिटल में आ कर इस तरह से कत्लेआम मचा रहा है ?
पहले उसने एलिना और अब लिसा को भी बेरहमी से मार दिया!!"
"और तुम...तुम्हारे होते हुए वो लाश बाहर कैसे चली गई ?
तुम्हे अंदाज़ा भी है,इससे तुमने अपने साथ साथ हमारा भी कितना नुकसान कराया है" ??

"सॉरी सर...मैं नही जानता था कि रात ऐसा कुछ हुआ है,वरना मैं किसी को कानो कान खबर नही होने देता इस वारदात के बारे मे" !!

"नही...नही गोयंका ये सिर्फ सॉरी जितनी छोटी गलती नही है,जो तुम सॉरी बोल कर इससे अपने ग़लती छुपा लोगे"।

"मैं अभी नीचे जा रहा हूँ...और तुम ,तुम यहीं रहोगे मेरे साथ मेरे इस दफ्तर मे, जैसे कि हमेशा से रहते आए हो।
मेरे साथ तुम्हारी ये मीटिंग शाम 4 बजे तक चलेगी, समझे" ??

"यस बॉस"... बस इतना ही कह सके थे डॉक्टर गोयंका।

और रब्बानी अपने रिवाल्विंग चेयर के पीछे लगे एक बड़े से प्रोट्रेट को एक दरवाजे की तरह खोल कर उसके अंदर घुसते चले गए।

.और डॉक्टर गोयंका,वो मानो किसी स्टेच्यू की तरह वहीं जमे रह गए,जहाँ वो पिछले 40 मिनट से खड़े थे ।

★★★

अपनी रेड स्विफ़्ट डिजायर को पोर्च पर खड़ी कर डॉक्टर डेनियल जैसे ही हॉस्पिटल में दाखिल हुए उन्हें मुख्य दरवाजे पर ही बेचैनी से चहलकदमी कर रही नंदिता मिल गई। डेनियल को देखते ही वो उनकी तरफ बढ़ गई और डॉक्टर डेनियल को लेकर सीधे डॉक्टर गोयंका के केबिन में चली गई,जो इस वक्त बाहर से लॉक था।
नांदिता ने चाबी से ताले को खोला और फिर दोनों अंदर केबिन में चले गए ।।

केबिन के अंदर पहुंचते ही डॉक्टर डेनियल ने नंदिता से पूछा " क्या बात है नंदिता,तुम इतनी घबराई हुई क्यूँ हो??"

नंदिता अपने माथे का पसीना पोछते हुए बोली "नही सर मैं आपको यहां कुछ भी नहीं बता सकती,चलिये कहीं बाहर चलते हैं" !! ये कह कर वो लगभग दौड़ती हुई सी बाहर की ओर भागी ,जहाँ डॉक्टर डेनियल की स्विफ्ट कार खड़ी थी।

डॉक्टर डेनियल बिल्कुल हक्के बक्के से नंदिता की हरकतों को देख रहे थे।

कार के बाएं दरवाजे को खोलती हुई नंदिता उसके सीट पर बैठ चुकी थी और लंबी लंबी सांसे ले रही थी।

डॉक्टर जब ड्राइविंग सीट पर आकर बैठे तो वो अपनी आंखें बंद कर पता नही क्या सोच रही थी,पर उसका जिस्म और दिमाग अब पहले की अपेक्षा कुछ शांत हो चुका था।

डॉक्टर डेनियल ने अपनी जेब से चाबी निकाल कर कार की इग्निशन में फंसाया और फिर चाबी को ऊपर की ओर घुमाते हुए अपनी गाड़ी को स्टार्ट कर गाड़ी को एक नम्बर गियर में डालकर आगे बढ़ा दिया।

आधे घटे बाद उनकी गाड़ी एक बहुत ही सुनसान सी जगह पर सड़क के किनारे खड़ी थी,और डॉक्टर डेनियल से नंदिता वो सब कुछ बता रही थी जो उसने अभी थोड़ी देर पहले मिस्टर रब्बानी और डॉक्टर गोयंका के बीच होने वाली मीटिंग के दौरान सुन कर आई थी।
वो उस वक़्त मिस्टर रब्बानी के ऑफीस में ही थी ।

सब कुछ सुनाने के बाद वो डेनियल से बोली "डॉक्टर...!शायद डॉक्टर गोयंका को ये पता है कि लिसा को किसने मारा है"!!

"पर एलिना की मौत कब हुई ??"

डॉक्टर डेनियल के इस प्रश्न से नंदिता को चौंका दिया था।

और वो कहने लगी... "उस दिन जब वो मरीज एलिना के बारे में पूछने लगा था,तो डॉक्टर गोयंका इतनी बुरी तरह बौखलाए क्यूँ थे..? शायद उससे पहले ही एलिना की मौत हो चुकी थी, मुझे लगता है उनकी बौखलाहट की वजह एलिना की मौत ही थी"।

डॉक्टर डेनियल नंदिता को बहुत सी बातें समझाते रहे और फिर बोले "नंदिता तुमने बहुत अच्छा किया ये सब मुझे बता दिया, अब तुम वापस हॉस्पिटल जाओ और बड़ी ही होशियारी से डॉक्टर गोयंका पर नज़र रखो, पर उन्हें ये पता न चलने पाए कि तुम पर उनका कोई राज खुल चुका है, और ना ही तुम उनके सामने ये ज़ाहिर करोगी की एलिना के मौत का राज तुम्हे पता चल चुका है"।।

ठीक है डॉक्टर...इतना कह कर नंदिता अपने माथे पर उभर आये पसीने की बूंदों को पोछने लग गई।

डॉक्टर डेनियल अपनी गाड़ी वापस हॉस्पिटल की ओर मोड़ चुके थे।
पर एलिना की मौत की खबर से दोनो ही के दिमाग को झकझोर कर रख दिया था...और सबसे ज्यादा झकझोर रहा था वो सवाल " डॉक्टर गोयंका और मिस्टर रब्बानी के बीच कौन सी खिचड़ी पक रही थी"...?

★★★

साहिल ने उसी वक़्त अपने फोन से चंद्रशेखर गांगुली को फोन लगाया,जो उसके पिता सेठ हरबंस लाल के बड़े ही अज़ीज़ मित्र और कोलकाता हाई कोर्ट के बड़े ही मशहूर क्रिमिनल लॉयर थे।

जैसे ही उधर से कॉल रिसीव किया गया, साहिल ने बड़े ही अदब से कहा "हलौ काकू,आमी साहिल" ( हेलो अंकल मैं साहिल)
" हां बेटा बोलो,इतनी सुबह सुबह कैसे फोन किया?" "सब ठीक आछे तो??"" ( सब ठीक है न )

"काकू ,एक्चुअली आपसे मिलना है इसी वक्त"।

चंद्रशेखर गांगुली ने कहा "ओके बेटा आ जाओ घर पर"
पर बात क्या है ..साहिल??

"आकर बताता हूँ"...इतना कह कर साहिल ने कॉल डिस्कनेक्ट कर दिया।
और फिर अपने रूम के आलीशान बाथरूम में घुस गया।
जब उसने बाथरूम के आईने में अपने आप को देखा तो ,उसके माथे से गिरे खून के कतरे सुख चुके थे,लेकिन दर्द अभी भी टीस की तरह बार बार उठ रहा था ।

उसने फौरन कपड़े बदले...और फिर अगले 15 मिंट में उसकी कार सोनारपुर रोड पर दौड़ रही थी।

★★★

तहख़ाने के अंदर हॉल में एक बहुत ही बड़े टेबल के दोनो तरफ कुल 14 कुर्सियां लगी हुई थी।
और उन कुर्सियों पर बैठे सभी लोगों की नज़रें जमी हुई थी उस रिवाल्विंग चेयर की तरफ जिस पर मिस्टर रब्बानी विराजमान थे।

सभी के चेहरों पर एक गम्भीरता छाई हुई थी और बीच बीच मे पूरे माहौल में गूंज रही उठती थी मिस्टर रब्बानी की रसूखदार आवाज़।

मिस्टर रब्बानी :- "हम बड़े ही चालाकी से अपने धंधे को अब तक यहां चलाते आ रहे हैं,लेकिन डॉक्टर गोयंका की बेवकूफी ने अब हमें अपने इरादें और अपने इस अड्डे,दोनो बदलने पर मजबूर कर दिया है। आज तक पुलिस इस अस्पताल में नही आई थी,
लेकिन आज पुलिस के कदम पहली बार उस गोयंका के बच्चे की वजह से इस हॉस्पिटल में पड़ गए।
खैर इससे तो निपटा जा सकता है,
लेकिन उसका क्या करें ??

जो हमारा दुश्मन बन कर हमारे हॉस्पिटल की महिला स्टाफों को अपना निशाना बना रहा हैं।
उसे ज्यादा समय तक हम नज़र अंदाज़ नही कर सकते। वो जो कोई भी है,उसे जल्द से जल्द खत्म करना निहयत ही जरूरी हो गया है"।

इसके बाद अपने सिक्युरिटी दस्ते के कमांडर से मुखातिब होते हुए ,मिस्टर रब्बानी बोले "चिन्योटी तुम आज से ही इस मिशन में लग जाओ, और वो क़ातिल जो कोई भी है,इससे पहले की वो तुम सब तक पहुंचे ,तुम उसे ढूंढ कर खत्म कर दो"।

चिन्योटी :- "शाब...!! आपको अब फिक्र करने की ज़ुरूरत नही ,अब हम देख लेगा।

"हमम्म चिन्योटी ,मुझे तुमसे यही उम्मीद है"।

इसके बाद मिस्टर रब्बानी उस तनखाने के उसी विशेष कमरे में गए जहां से वो वापस अपने दफ्तर में जा सके !! इसका सीधा सीधा मतलब था कि हॉस्पिटल के नीचे छुपे इस तहख़ाने की जानकारी बाहरी दुनियां को नहीं थी।
★★★

जैसे ही साहिल ने चंद्रशेखर गांगुली के घर के दरवाजे पर दस्तक दी,नौकर राखाल ने दरवाजा खोला,ये घर साहिल के लिए कोई नया नही था,वो बचपन से यहां आता जाता रहा था।
जैसे ही वह हॉल में बैठे चंद्रशेखर गांगुली के सामने पहुंचा, तो एडवोकेट गांगुली उसे देखते ही चौंक गए "अरे बेटा ये क्या हाल बना रखा है?"
और ये सिर के बाल क्यूँ बिखरे हुए है तुम्हारे ?
साहिल बोला अंकल पहले आप मेरे साथ अपने स्टडी रूम में चलिये,फिर बताता हूँ !

एडवोकेट गांगुली ने घर के नौकर राखाल को चाय स्टडी रूम में ही लाने की बात कह कर साहिल को लेकर अपने स्टडी रूम में ले आए।
उनके स्टडी रूम की दीवारों में लगी सेल्फों में कानून की मोटी मोटी किताबें सजी हुई थी ,एक भी सेल्फ खाली नही थी।

शानदार टेबल और टेबल के उस पार लगा रिवाल्विंग चेयर..कुल मिला कर ये सारी चीजें चंद्रशेखर गांगुली को एक कामयाब एडवोकेट की उपाधि प्रदान कर रही थी, जो कि एक हद तक सच भी था।

एडवोकेट चंद्रशेखर गांगुली जब अपनी रिवाल्विंग चेयर पर बैठ गए तो साहिल ने फौरन दरवाजे को अंदर से बन्द करते हुए उनके सामने आ कर बैठ गया ।

एडवोकेट गांगुली उसे ऐसा करते हुए देख कर सवालिया नज़रों से घूर रहे थे और फिर बड़े ही प्यार से पूछे "ये सब क्या है बेटे"?
तुम कुछ बताओगे भी ?

अभी साहिल एडवोकेट गांगुली को कुछ बताने जा ही रहा था कि दरवाजे पर एक दस्तक हुई,जो एडवोकेट गांगुली को बहुत ही नागवार गुजरी... फिर उन्होंने जब जाना की दरवाजे पर राखाल चाय ले कर खड़ा है,तो फौरन अपनी रिवाल्विंग चेयर से उठते हुए दरवाजे तक गए और राखाल के हाथों से चाय की केतली ले लिए ,और फिर उसे वहीं से वापस भेज दिए।

केतली से गरमा गरम चाय कप में उड़ेलते हुए एडवोकेट गांगुली बोले "बेटा घबरा मत ,जो कुछ हुआ सब कुछ साफ साफ बता...तेरा एडवोकेट काकू है न ,सब कुछ सम्भाल लेगा" ।

साहिल बोला " जानता हूँ अंकल ,तभी तो सीधे आपके पास आ गया"।

और फिर साहिल ने लिसा के साथ मिलने जाने की बात से लेकर होश में आने पर उसकी लाश पाने तक कि हर घटना को अक्षरसः बता दिया और फिर जब वो शांत हुआ तो चिंता की लकीरें उसके माथे पर साफ साफ देखी जा सकती थीं।
फिर उसने कहा ,"यकीन कीजिये अंकल मैंने उसका कत्ल नही किया,मुझे जब होश आया तो कमरे में पूरा अंधेरा था,और जब मैंने अपने मोबाइल की रौशनी में उसे ढूंढने की कोशिश की ,तब तक वो मर चुकी थी,मुझे उसकी लाश मिली वहां,इसीलिए मैं वहां से भाग आया"।

"चिंता नही करो बेटे सबसे पहले तुम मेरे साथ वहां चलो जहां तुम पुलिस के रिकार्ड के मुताबिक पिछले चार दिन से हो ,और फिर अपना मोबाइल फोन भी मुझे दे दो,ये तुम्हारे पास रही,तो तुम्हें मुशीबत में डाल सकती है"।

थोड़ी ही देर में एडवोकेट गांगुली की कार कोलकाता के भीड़ भाड़ वाले सड़कों में दौड़ती हुई अपनी मंजिल की ओर सरपट बढ़ रही थी।

आधे घँटे बाद एडवोकेट गांगुली और साहिल शहर के एक बहुत ही बड़े नरसिंग होम में थे,जो कि एडवोकेट गांगुली के ही एक क्लाइंट का था।

वहां साहिल को एडमिट करने के बाद जब एडवोकेट गांगुली ने डॉक्टर को सबकुछ समझा दिया और फिर जब एडवोकेट गांगुली पूरी तरह संतुष्ट हो कर निकले तो उनके चेहरे में एक सुकून देखा जा सकता था।

अपनी कार की ड्राइविंग सीट पर बैठने के बाद एडवोकेट गांगुली ने अपना मोबाइल फोन निकाला और फिर कांटेक्ट लिस्ट से इंस्पेक्टर सुदीप्तो सेन को फोन किया और कुछ देर बातें करने के बाद कॉल डिस्कनेक्ट कर दिया।

फिर अपनी कार की इग्निशन में चाबी डाल कर गाड़ी स्टार्ट किये और सीधे अपने घर आ गए।

घर आने के बाद पहले एडवोकेट गांगुली ने अपने कपड़े बदले और फिर अपने स्टडी रूम में आकर बैठ गए, राखाल को चाय के लिए उन्होंने पहले ही बोल दिया था ।

वे किसी केस पर कुछ स्टडी कर रहे थे...45 मिंट बाद दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई ,राखाल ने कहा ,"साहब इंस्पेक्टर सुदीप्तो आये हैं !"

एडवोकेट गांगुली ने कहा "अंदर भेज दो"
और फ़ीर उन्होंने अपनी नज़र उस मोटी किताब में गड़ा दी।

गूड मॉर्निंग सर,कहिये कैसे याद किया ?

"बैठो सुदीप्तो, कहो क्या लोगे ,चाय या कॉफी" ??

"सर आप तो जानते ही है मैं खाने पीने के मामले में कितना खुले दिल का हूँ, अंदर आते समय ही आपके नौकर को दो कप चाय का ऑर्डर दे आया हूँ,वो लाता ही होगा",इतना कह कर इंस्पेक्टर सुदीप्तो मुस्कुराने लगा।

एडवोकेट गांगुली ने भी जवाब में मुसकुराते हुए कहा ,"सुदीप्तो थोड़ा कन्ट्रोल रखो खाने पीने में ,वरना बदहज़मी हो जाएगी"।

इंस्पेक्टर सुदीप्तो सेन..सीनियर इंस्पेक्टर कोलकाता पुलिस।
उम्र यही कोई 44-45 वर्ष मंझोला कद ,लेकिन रिश्वत की रोटी खा खा कर तोंद इतना बाहर निकाल चूके थे कि किसी भी लिहाज से 55 से कम के नही लगते थे।

एडवोकेट गांगुली फिर बोले, "सुदीप्तो ,मेरे एक क्लाइंट का फोन कल एयरपोर्ट पर खो गया था,या ये कहो किसी ने चोरी कर लिया था,तो मैं चाहता हूं"...!!!....अभी एडवोकेट गांगुली की बात पूरी भी नही हुई थी कि इंस्पेक्टर सुदीप्तो बोल पड़े, "समझ गया वकील साहब....मैं कल की तारीख में उस मोबाइल की मिसिंग कम्पलेन दर्ज कर लूंगा,अब आप ये बताइए कि फोन की बरामदगी कब की दिखानी पड़ेगी ??

एडवोकेट गांगुली मुस्कुरा पड़े और बोले "सुदीप्तो ,काफी कुछ सिख गए हो ,तुम बदलते वक्त के साथ। "

सुदीप्तो बोला ,"सर कानून की जुबान मैं न समझूंगा तो और कौन समझेगा" ??

इतना कहते कह कर वो चुप हो गया और दरवाजे के उस पार देखने लगा,वो राखाल का इंतज़ार कर रहा था,जिसे वो दो कप चाय का ऑर्डर दे आया था,ओर पता नही राखाल इतनी देर क्यूँ कर रहा था।

एडवोकेट गांगुली उसकी मंशा समझते हुए राखाल को बुलाने के लिए उन्होंने वो बेल दबाया जो उनके टेबल पर पड़ी थी,...बेल बजते ही राखाल हाथ बंधे दरवाजे पर खड़ा था।

एडवोकेट गांगुली बोले,राखाल चा खावाओ इंस्पेक्टर के ( राखाल चाय पिलाओ इंस्पेक्टर को)
थोड़ी ही देर में राखाल चाय बना कर ले आया और
फिर इंस्पेक्टर सुदीप्तो चाय पीने के बाद बोले ,"ठीक है सर अब मैं इज़ाज़त चाहूंगा" !
"ठीक है सुदीप्तो फिर मिलेंगे"।

★★★
लिसा के पोस्टमार्टम रिपोर्ट से ये साफ हो गया था कि कत्ल से पहले उसके साथ बहुत बुरे तरह से ब्लात्कार तो नहीं पर अत्यधिक उत्तेजित होकर सेक्स किया गया था। और उसके जिस्म में पाए गए स्पर्म के अंश भी इस ओर साफ इशारा कर रहे थे।

इंस्पेक्टर कुंदन सिंह एक बहुत ही ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ पुलिस वाला था ,उसकी ईमानदारी के किस्से सभी के जुबान पर होते थे। उसने इस केस को शुरू दिन से ही बड़े गम्भीरता से लिया था।
और इसी सिलसिले में वो डॉक्टर गोयंका के केबिन में बैठा लिसा के बारे में पूछताछ कर रहा था।

डॉक्टर गोयंका ,जो पहले ही मिस्टर रब्बानी के खौफ़ के मारे होश गंवाए बैठे थे,पुलिस के सामने सवाल के जवाब क्या देते ,बस हां या ना में ही वे इंस्पेक्टर कुंदन को सब कुछ बता रहे थे ।

पूछताछ पूरी करने के बाद, जब इंस्पेक्टर कुंदन डॉक्टर गोयंका के केबिन से निकले,तो गोयंका के जान में जान आयी....। जब इंस्पेक्टर कुंदन हॉस्पिटल के बाहर खड़ी अपनी जीप में बैठने के बाद इग्निशन में चाबी फंसा रहे थे,तब तीसरे माले से एक जोड़ी बिल्लोरी आंखे ,उसे ही घूर रही थीं ,पर इंस्पेक्टर कुंदन को इसका भान कैसे होता वो अपनी जीप को स्टार्ट कर के चलता बना।

क़ातिल आस पास ही था...वो वहशी दरिंदा जिसकी आँखे अंधेरे में भी चमक उठती है, जैसे कि वो इंसान ना होकर कोई मांसाहारी नरभक्षी हो। पर सबके नजरों के आस पास होकर भी वो ख़ुद को बड़े ही एहतियात से सबसे छुपाएं हुए था। उसकी मौजूदगी के ख़्वाब ही अब हॉस्पिटल के महिला स्टाफों के रौंगटे खड़े कर दे रहे थे।

आख़िर कौन है वो नकाबपोश..? और कितनों की मौतों के बाद उसके राज खुलेंगे...? सारे लालची गद्दारों के बीच एक ईमानदार पुलिस वाला क्या ईमानदारी से ढूंढ पायेगा क़ातिल को...? डेनियल क्या अब गोयंका से सीधे सीधे सवाल करेगा...? रब्बानी हॉस्पिटल के जिस राज को छुपाने के ख़ातिर जगह बदलने के फ़िराक़ में है, क्या वो राज छुपा रह पाएगा...? क्या लिसा की मौत इस हॉस्पिटल को बर्बाद कर के ही छोड़ेगी...?

तमाम सवालों को बरकरार रखते हुए इस भाग 4 का अंत हुआ। कहानी धीरे धीरे सारे सवालों के जवाब देगी...!! तब तक समीक्षा के माध्यम से आप सब बताएं कि आपको क्या लगता है, क़ातिल आख़िर हैं कौन...? और कहानी का कौन सा क़िरदार आपको सबसे ज़्यादा बुरा इंसान नजऱ आ रहा है अब तक... क़ातिल के अलावा। शायद आपकी समीक्षाओं के बदौलत ही कहानी बेहतर से बेहतरीन बन जाएं इसलिए अपने विचार जरूर लीखें।

अगले भाग के साथ जल्द मिलेंगे।
धन्यवाद....