Taapuon par picnic - 62 in Hindi Novel Episodes by Prabodh Kumar Govil books and stories PDF | टापुओं पर पिकनिक - 62

टापुओं पर पिकनिक - 62

स्कूल की पूरी इमारत जगमगा रही थी। इसे तरह- तरह से सजाया गया था।
सामने के बड़े लॉन में बने मंच पर आकर्षक स्टेज सजाया गया था।
जिस मैदान में कभी आर्यन,आगोश, सिद्धांत, मनन, साजिद और मनप्रीत चुपचाप आकर अपनी- अपनी पंक्ति में सुबह की प्रार्थना बोलने के लिए खड़े हुआ करते थे आज उसी के किनारे वाली पार्किंग में उनकी अपनी गाड़ियां खड़ी थीं और वे सब आगोश के साथ स्कूल में होने वाले भव्य आयोजन में शिरकत करने आए थे।
आर्यन भी आ गया था किन्तु वह भीतर प्रिंसिपल साहब के कक्ष में उनके साथ था।
बाहर विद्यार्थियों की भारी भीड़ थी। विद्यालय में पढ़ने वाले मौजूदा छात्र- छात्राएं तो वहां थे ही, स्कूल ने अपने पूर्व छात्र- छात्राओं को भी आज के दिन इस कार्यक्रम में आने की अनुमति दे दी थी। अखबारों में छपी खबरों के आधार पर बहुत से अन्य लोग भी स्कूल परिसर में चले आए थे। आज के दिन किसी के साथ कोई सख़्ती नहीं थी, कोई भी आ- जा रहा था।
आख़िर आर्यन शहर भर का चहेता सितारा था जो कभी इसी परिवेश से निकल कर आज मनोरंजन की दुनिया के आसमान में चमक रहा था। टीवी पर उसके सीरियल घर- घर में देखे जा रहे थे।
तालियों की गड़गड़ाहट और सीटियों के तीखे अनुनाद के बीच प्रिंसिपल साहब आर्यन को अपने साथ मंच पर ले आए।
तालियां रुक ही नहीं रही थीं। कुछ लोग मंच पर फूल फ़ेंक रहे थे। मंच के पार्श्व और कुछ अन्य स्थानों के दायरे में आर्यन के चेहरे को विराट आकार में दर्शाता बड़ा पर्दा लगा था, जिस पर समारोह की झलकियां स्कूल के अहाते के बाहर से भी देखी जा सकती थीं। स्कूल के गेट और गेट के बाहर भी भारी जमावड़ा था।
- आपके उत्साह, आल्हाद और प्यार ने ही मेरी उड़ान को हवा दी है... कहता हुआ आर्यन चुंबनों की बौछार करता हुआ मंच पर घूमा, फ़िर वहां पड़े एक सोफे पर प्रिंसिपल साहब के साथ बैठ गया।
एक लड़के ने माइक संभाला। आर्यन के बारे में सब कुछ बताया जाने लगा। दो लड़कियों ने मंच पर आकर आर्यन और प्रिंसिपल साहब को गुलदस्ते भेंट किए।
पर्दे पर एक- दो वो गीत भी बजाए गए जो आर्यन पर ही फिल्माए गए थे। कुछ महत्वपूर्ण और लोकप्रिय दृश्य भी दिखाए गए जो आर्यन ने अभिनीत किए थे। युवाओं के कहने पर आर्यन ने अपने कुछ संवाद बोल कर बताए। लड़कियों का एक ग्रुप तो मंच पर पहुंच कर आर्यन को अपने साथ में नाचने के लिए भी उठा कर खींच लाया।
- आप की फिल्में कब तक आ रही हैं?
- क्या आप अपनी कहानियां खुद लिखते हैं?
- आपके डायलॉग कौन लिखता है?
- क्या आपने कभी डुप्लीकेट का इस्तेमाल भी किया?
- आपका अगला सीरियल...
आर्यन अपने शुभचिंतकों के ऐसे सवालों का जवाब पूरे धैर्य और उत्साह से दे रहा था।
बीच- बीच में तालियां बजाने की आवाज़ भी गूंजती।
- आप शादी कब कर रहे हैं?
इस सवाल पर आर्यन ने कुछ मुस्कुरा कर कहा अभी तो मेरा प्रेम अपने काम से चल रहा है।
- क्या किसी के साथ डेटिंग...
- नहीं- नहीं, अभी नहीं भाई.. आर्यन ने कहा।
और इसी बीच भीड़ के बीच से उछले एक सवाल ने जैसे सारे माहौल को ही बदल डाला...एक लड़का बोल रहा था- आपके बच्चे कितने हैं?
सन्नाटा छा गया। फ़िर भी कुछ लोगों के हंसने की आवाज़ आई।
... हमने सुना है कि आपका एक बच्चा विदेश में पल रहा है...?
आर्यन भौंचक्का रह गया।
आगोश के इशारे पर दो- तीन लड़कों ने तुरंत सवाल पूछने वाले उस लड़के के पास पहुंच कर उसे बाहर निकालने की कोशिश की..
सब स्तब्ध रह गए। आर्यन कुछ विचलित सा दिखाई दिया। प्रिंसिपल साहब तेज़ी से उठ कर भीतर चले गए, शायद उनका कोई फ़ोन आ गया था।
भीड़ में भी कुछ खुसर- फुसर सुनाई दी और माहौल बिगड़ने लगा।
सवाल पूछने वाले लड़के को अपना इस तरह घसीट कर बाहर ले जाया जाना नागवार गुजरा। वह उत्तेजित हो गया। उसके समर्थन में भी दो- तीन लड़के खड़े हो गए और उन लोगों को रोकने लगे जो उसे बाहर की ओर खींच रहे थे।
... जवाब दीजिए... चुप क्यों हो गए? बताइए अपने चाहने वालों को, ये बात सही है या ग़लत! लड़का लगभग चिल्ला कर ही बोला।
कुछ भगदड़ सी मच गई। साजिद के साथ आए कुछ युवकों ने वहां थोड़ी मारपीट भी कर दी।
एक अध्यापक कुछ रूष्ट स्वर में वहां उपस्थित एक पुलिस अधिकारी से बात करने लगे।
आगोश और साजिद ने आर्यन को इशारा किया और आर्यन तेज़ी से उठ कर मंच से उतर गया।
आर्यन को एक कार में बैठा कर वो दोनों जल्दी से बाहर निकल गए।
भीड़ तितर- बितर होने लगी।
लड़कियों का एक समूह कुछ नाराज़ सा होते हुए दरवाज़े की तरफ़ आर्यन की कार को इंगित करता हुआ भागा पर कार आर्यन को लेकर तेज़ी से निकल गई। सब देखते रह गए।
थोड़ी ही देर में सारा माहौल किसी उजड़े दयार सा निर्जीव हो गया।
लड़के जगह - जगह झुंड बनाकर आपस में बातें करने लगे। स्कूल के स्टाफ ने तुरंत भागदौड़ करके बाहरी लोगों से अहाता ख़ाली करा लिया।
आगोश और साजिद आर्यन को लेकर सीधे आगोश के घर पहुंचे।
रास्ते भर तीनों में से कोई कुछ नहीं बोला। गाड़ी आगोश चला रहा था। आगोश काफ़ी उत्तेजित दिख रहा था जबकि आर्यन पर इस सारे घटना-क्रम का कोई असर नहीं दिखाई दे रहा था। वह निरपेक्ष भाव से बैठा रहा और गाड़ी रुकने के बाद आगे -आगे चलता हुआ आगोश के कमरे में चला आया।
आर्यन को सचमुच अब तक कुछ भी नहीं मालूम था। वो परसों शाम ही तो आया था। किसी को भी समय ही कहां मिला उसे कुछ भी बता पाने का। कल तो दिन भर वो अपने घरवालों के साथ ही था। वो ये भी नहीं जानता था कि मधुरिमा की शादी हो चुकी है।
लेकिन समारोह में उठे सवाल ने जैसे उसे कुछ- कुछ आभास करा दिया कि क्या हुआ है?
उसे तो सहज रूप में यही लगा था कि मधुरिमा ने उसके जाने के बाद एबॉर्शन करा लिया होगा और बात खत्म हो गई होगी। आगोश और सब दोस्तों के यहां होते गर्भपात में कोई कठिनाई भी नहीं थी।
मधुरिमा की शादी किन नाटकीय परिस्थितियों में हुई ये सब उसे कौन बताता?
आर्यन दीवार से एक तकिए का सहारा लगा कर आगोश के बेड पर अधलेटा सा होकर टुकुर - टुकुर ताक रहा था कि कोई कुछ बोले।
साजिद करीब ही एक कुर्सी पर चुपचाप बैठा था।
आगोश कुछ पल के लिए कमरे से बाहर गया फ़िर जल्दी ही लौट आया।
ओह! लेकिन ये क्या?
आगोश ने अपने कपड़े उतार कर फेंक दिए थे और चमड़े की अपनी एक भारी सी बेल्ट हाथ में लिए खड़ा था। आर्यन की आंखों में आंखें डालकर बोला -
... ले..
- क्या? आर्यन ने कहा। साजिद भी कौतूहल से उसकी ओर देखने लगा।
- उठ, पकड़... ये ले.. इस बेल्ट से उधेड़ दे मेरी चमड़ी... मार डाल मुझे! कह कर आगोश ज़ोर - ज़ोर से रोने लगा।
आर्यन और साजिद हक्के- बक्के रह गए।
आर्यन ने जल्दी से उसके हाथ से बेल्ट लगभग छीन कर फ़ेंक दी। और उसका हाथ खींच कर उसे सांत्वना सी देते हुए अपने पास बैठाने की कोशिश करने लगा।
आगोश रोता रहा। बोला- मार मुझे, जान ले ले मेरी।
तेरे अपमान का गुनहगार मैं हूं। मेरा बाप तो इंसानों के जिस्म से बोटियां निकाल- निकाल कर बेचता था मैंने तेरा बच्चा बेच दिया... मार.. हत्या कर डाल मेरी। तेरे अजन्मे बच्चे का सौदागर हूं मैं!
साजिद ने उठ कर उसे चुप कराने की कोशिश की और उसे अपने से भींचते हुए चुप कराने की कोशिश करने लगा।
आर्यन भी उठ कर बैठ गया। वह बोला कुछ नहीं, पर काफ़ी व्यथित सा हो गया। उसे सारी बात का कुछ उखड़ा -उखड़ा सा अनुमान लग गया। उसके चेहरे पर आते- जाते भावों को देख कर साजिद भी घबरा गया... उसे समझ में नहीं आया कि वो क्या करे?

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Prabodh Kumar Govil