Basanti ki Basant panchmi - 13 in Hindi Fiction Stories by Prabodh Kumar Govil books and stories PDF | बसंती की बसंत पंचमी - 13

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बसंती की बसंत पंचमी - 13

रसोई में गैस पर बनने वाली कढ़ी उबल- उबल कर आधी रह गई थी लेकिन श्रीमती कुनकुनवाला का उधर ध्यान ही नहीं था। शायद रख कर भूल गई हों। वो तो गनीमत थी कि बर्तन बहुत बड़ा लिया गया था और दूसरे गैस भी एकदम कम मोड पर थी इसलिए उबल कर फैली नहीं।
वो पिछले पच्चीस मिनट से फ़ोन पर ही थीं। श्रीमती चंदू उन्हें समझाते - समझाते थक गईं कि उन्होंने जॉन को कोई रुपए नहीं दिए। ना- ना, कहा न, प्रोड्यूसर और डायरेक्टर को भी नहीं दिए... अरे देती तो वहीं सबके सामने देती न, अकेले में मैं किसी से मिली ही कब? और बेटे जॉन को देने का तो सवाल ही नहीं, उस बच्चे को क्यों दूंगी? देने होते तो आपको ही देती ना! पर ये बात कम से कम छह- सात बार दोहरा देने के बाद भी श्रीमती कुनकुनवाला उनकी एक मानने को तैयार नहीं थीं। वो यही कहे जा रही थीं कि आपने ये अच्छा नहीं किया, कहीं फ्रेंडशिप में भी कोई ऐसे किसी के साथ करता है?
खिन्न होकर जब उन्होंने फ़ोन रखा तब तक भी उन्हें चंदू की बात पर रत्ती भर यकीन नहीं हुआ।
लेकिन जब यही जवाब वीर ने भी दिया तो वो आपे से बाहर हो गईं। उन्हें ये सब अपने ख़िलाफ़ कोई षडयंत्र जैसा लगने लगा। उन्हें लगा कि इन सब ने आपस में सलाह करके कोई फ़ैसला ले लिया और उन्हें बताया तक नहीं। जबकि पार्टी ख़ुद उनके यहां ही थी। फ़िल्म की बात उन्होंने ही सबको बताई, प्रोड्यूसर डायरेक्टर उनके घर आए... फ़िर भी उन्हें ही किसी ने कुछ नहीं बताया। सोचा होगा कि मैं प्रोड्यूसर से मिल कर पहले ही अपनी बात मनवा लूंगी इसलिए उसका मुंह रुपयों से बंद करने का प्लान बना लिया! देखो, बताओ, और अपने आप को मेरी फ्रेंड कहती हैं! ऐसी होती हैं फ्रेंड? अरे फ्रेंड तो एक दूसरे के लिए बहनों- भौजाइयों से बढ़ कर होती हैं... उनके आंसू तक छलक आए।
वो तो गनीमत रही कि उन्हें तत्काल रसोई में कढ़ी छलकने का ख्याल आ गया तो वो फ़ोन बंद करके भागीं नहीं तो न जाने क्या- क्या खरी खोटी सुनातीं इस मिसेज़ वीर को। न जाने क्या समझती है अपने आप को?

दो दिन श्रीमती कुनकुनवाला बिल्कुल अनमनी सी रहीं। उन्होंने न तो अपनी किसी फ्रेंड को फ़ोन किया और न ही किसी का फोन उठाया।
लेकिन तीसरे दिन उनसे रहा न गया। सुबह नाश्ते से निवृत होने के बाद अपना मोबाइल फोन उठाया और चुपचाप एक कुर्सी लेकर अकेली बालकनी में आ जमीं।
उन्होंने सोचा अरोड़ा को फ़ोन करूं। तुनक कर बैठी होगी। उस दिन न जाने क्या- क्या सुना दिया था उसे। चलो कोई बात नहीं, एक बार थोड़ी माफ़ी मांग लूंगी। अब क्या कोई जान थोड़े ही लेगी। ग़लती तो उसी की थी। मैंने थोड़ी खरी- खोटी सुना भी ली तो क्या हुआ। सॉरी बोलने में क्या जाता है। कम से कम ज़बान को कुछ चलने का मौक़ा तो मिले, ऐसे कब तक मुंह में दही जमा कर बैठी रहूंगी।
उन्होंने अभी श्रीमती अरोड़ा का नंबर स्क्रीन पर लिया ही था कि ड्राइंग रूम से जॉन की आवाज़ आई। न जाने किस बात पर झुंझला रहा था। ध्यान देकर सुना, कह रहा था- कमाल है यहां से एक कुर्सी कहां चली गई, अभी तो जमा कर गया था।
श्रीमती कुनकुनवाला हड़बड़ा कर कुछ कहने ही जा रही थीं कि जॉन सिर खुजाता हुआ बालकनी में ही चला आया। वहां उन्हें बैठी देख कर झुंझलाया- क्या मम्मी आप भी, आप कुर्सी ही उठा लाईं वहां से.. अभी तो मैं रख कर गया था।
श्रीमती कुनकुनवाला उसकी बात पर गरम हो गईं फ़िर भी उसे समझाते हुए बोलीं- तो तू कुर्सी दूसरी ले ले बेटा, क्या हो गया जो मैं उठा लाई तो!
- ओह मम्मी, आप समझोगी नहीं। मैंने एक पार्टी रखी है आज। अभी मेरे फ्रेंड्स आने वाले हैं। उन्हीं के लिए तो गिन कर कुर्सी जमा रहा था, लाओ ये दे दो, आपके लिए मैं पापा की स्टडी से दूसरी ला देता हूं।
कहते हुए जॉन मम्मी की कुर्सी खींचने लगा। मम्मी ने कुछ खीज कर उधर देखा।