Aur Usne - 7 in Hindi Fiction Stories by Seema Saxena books and stories PDF | और उसने - 7

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और उसने - 7

(7)

“हाँ सही कह रहे हो करते रहो, वह भी काम जरूरी हैं लेकिन आप इतना हार्ड वर्किंग नहीं करेंगे । बल्कि आपको इतनी मेहनत न करके थोड़ा बहुत काम करना चाहिए और सिर्फ पैसा ही मायने नहीं रखता है सबसे पहले शरीर का स्वास्थय जरूरी है । ज़िंदगी भर कमाया ही है । मानसी भी पढ़ लिखकर कुछ बन जाएगी, आपके दोनों बेटे बहुत अच्छे निकले, दोनों बड़ी बेटियाँ भी पढ़ लिख गयी अब मानसी भी बहुत अच्छी निकलेगी, आप विश्वास रखो, सब अच्छा हो जाएगा आप परेशान बिल्कुल मत हो और रेस्ट करो । सुनो अगर मानसी आप पर कोई बोझ है तो कृपया इसे मुझे दे दो, मैं इसकी सारी ज़िम्मेदारी उठा लूँगा ।” डॉ साहब ने पापा को बड़े अपनेपन के साथ समझाते हुए कहा ।

“नहीं नहीं बोझ तो बिलकुल भी नहीं है मैं तो अपनी खुशी से इसे ज्यादा खुश और सुविधायें देने को काम करता हूँ ।“ पापा एकदम से बोल पड़े ।

“ सिर्फ पैसों से ही खुशियाँ नहीं आती हैं, आप अपना भी ध्यान रखें ।”

“जी मैं अपना ध्यान रखूंगा ।“

कितनी बातें अपना समझ कर प्यार से समझा दी, उनकी एक एक बात से अपनापन झलक रहा है।

“आप यह दवाइयाँ ले लेना जल्दी सही हो जाएँगे लेकिन अभी कुछ दिन रेस्ट करना फिर काम पर जाना ठीक है न ?”

“जी बिलकुल सही ।“ पापा मुसकुराते हुए बोले ।

दवाइयाँ लेकर मानसी पापा को लेकर घर की तरफ चल दी वहाँ पर जा कर देखती है कि मम्मी बड़ी परेशान हाल दरवाजे पर खड़ी हुई है,साथ ही अलका की मम्मी भी हैं। उसकी मम्मी और अलका की मम्मी दोनों आपस में बातें कर रही हैं ।

“भाभी जी आप इतना परेशान क्यों है ?” अलका की मम्मी ने कहा । “अगर मानसी के पापा की तबीयत खराब है तो हम लोग हैं ना ? अगर आपके बेटे यहां पर नहीं है तो क्या हुआ मेरा बेटा तो है ना ? वह तो आपके अपने बेटे जैसा ही है। जैसे मेरा बेटा वैसे ही आपका भी बेटा है । कभी भी कोई भी परेशानी हो, बस आप एक आवाज लगाओ । कहते भी है ना पड़ोसी जो होते हैं वह रिश्तेदारों से भी बढ़कर होते हैं आपके अपने रिशेतेदार और बेटे बेटियाँ दूसरे शहर में है लेकिन पड़ोसी आपके पास में है एक आवाज से आपके घर में आ जाएंगे ।“

हाँ मुझे पता है मैं बहुत खुशनसीब हूँ जो मुझे आप जैसे प्यारे पड़ोसी मिले हैं।“

“अच्छा अब यह सब छोड़ो और आप हमें बताओ कि आप लोग खाने में क्या खाओगे ? आज मानसी की मम्मी आप खाना नहीं बनाएंगी । आज मैं खाना बनाकर भेजूंगी, आपको जो भी पसंद है वह आप बताओ ?” अल्का की मम्मी ने पापा को आते देख मुस्कुरा कर उनसे ही पूछ लिया ।

“अरे भाभी जी, आप क्यों परेशान होते हो ? मुझे कुछ भी खाने का मन नहीं है । वैसे जो भी बनेगा वह मैं खा लूंगा।“

“नहीं नहीं आज आप बताओ आपकी पसंद का खाना ही बनेगा?” अल्का कि मम्मी ने ज़िद की ।

“ठीक है भाभी जी अगर आप इतना कह रही हो तो मुझे आपके हाथ के आलू टमाटर की सब्जी बहुत पसंद है ।” पापा ने अलका की मम्मी से कहा । पापा का मूड बड़ा अच्छा हो गया है, उनके चेहरे से उदासी गायब हो गई है। जब कोई इतने प्रेम और अपनेपन से बात करता है ना, तो सारे कष्ट सारी तकलीफें दूर हो जाती हैं।

“ठीक है मैं आज आपके लिए टमाटर आलू की सब्जी बनाऊंगी ।“

“हाँ मुझे भी बहुत पसंद है चाची जी, मैं अभी वही खा लेती हूं । टमाटर आलू मेरे फेवरेट है वह भी आपके हाथ के बने हुए । टिफिन में जो सूखे हुए आलू टमाटर की सब्जी अल्का लेकर आती है ना, तो वह सारे मैं ही चट कर जाती हूँ ।” मानसी बीच में बोल पड़ी।

“अच्छा तो यह बात है, तभी मैं कहूँ कि अल्का को तो यह सबज़ी पसंद नहीं है । यह कह कर अल्का की मम्मी हंसने लगी । लग ही नहीं रहा है कि अभी तक पापा की तबीयत को लेकर जो इतना तनाव भरा माहौल बना वो सारा दो पल में दूर हो गया है । मानसी, पापा और उसकी मम्मी घर में आ गए । तभी मानसी ने देखा कि पीछे पीछे अलका उनके घर के अंदर चली आ रही है और उसके हाथ में चाय के दो कप भी हैं।

“मानसी यह चाय मैं चाचा जी और चाची के लिए लेकर आ रही हूं । आज वह कोई काम नहीं करेंगी और तू चुपचाप से अपना आर्टिकल तैयार कर, तुझे बहुत अच्छे से परफॉर्मेंस देनी है न ? मैं और तेरी मम्मी दोनों चाचा जी को देख लेंगी।

“ठीक है ।” मानसी ने हल्के से कहा । कितने अच्छे लोग हैं उसके शहर में सब बिलकुल अपने जैसे बल्कि अपनों से भी बढ़कर । मानसी मन ही मन में सोचने लगी पड़ोसी नहीं है यह तो हमारे अपने हैं जिनसे हमारा पिछले जन्म का कोई बहुत अच्छा रिश्ता है । जो इस जन्म में आकर मिल गए हैं ।

मानसी पापा को लेकर अंदर आ गयी और अलका चाय की ट्रे मेज पर रख कर चली गई । मानसी की मम्मी पापा के पास बैठकर उनका सर दबाने लगी।

मानसी भी वही पर बैठ गयी । उसी समय अल्का नमकीन और बिस्किट की प्लेट भी ले आयी । मानसी तू जा कर अपना काम कर ले, मैं हूँ न तेरे पापा के पास । अल्का ने बड़े प्यार से कहा ।

मानसी की आँखों में खुशी की नमी छलक पड़ी और चुपचाप जाकर अपनी चटाई पर बैठ के अपना काम शुरू कर दिया । उसके पास पेन तो था ही नहीं फिर भी उसने किसी तरीके से एक पेंसिल निकाली और उसी से काम करने लगी ।

यह पड़ोसी नहीं है हमारे बल्कि यह तो हमारे पिछले जन्मों का कोई पुण्य उदय हुआ है जो भगवान ने इनको हमारे पास रहने को भेज दिया है । अपने से भी बढ़कर ईश्वर जैसे जो पास में रहते हैं यह लोग, मानसी की मम्मी मानसी के पापा का सर भी दबाती जा रही हैं और यह कहती भी जा रही हैं कि कोई अपना भी कहां इतना करता है आजकल और यह लोग हैं तो एक इतना करते हैं कि हमारी तो शर्म से नजरें झुक जाती हैं जबकि उनके पास तो इतने तंगी हालात थे हालांकि हम लोग भी इतने अमीर नहीं है लेकिन उन लोगों की हालत तो हमसे भी ज्यादा गिरी हुई है । उन्होंने हमें कभी जरा सी भी भनक तक नहीं लगने दी कि वह परेशान है बल्कि आज देखो कैसे कहा कि भाभी जी, आप और मानसी तीनों हमारी जिम्मेदारी है ।“

अलका की मम्मी, अलका और उसका भाई जो अलका से करीब 12 साल बड़ा है, वह तीनों खाने का सारा सामान लेकर उसके घर पर ही आ गए । टमाटर आलू की सब्जी, रोटी, मूंग की दाल और सलाद फिर सारे लोगों ने एक साथ में बैठकर ही खाना खाया हालांकि मानसी के पापा को खाना खाने का बिल्कुल मन नहीं कर रहा क्योंकि उनका मुँह थोड़ा सा कड़वा हो गया है लेकिन जब सब लोग साथ में बैठे तो हंसते बोलते हुए वे भी खाना खाने लगे । अच्छा लग रहा है, सब बहुत खुश हो रहे हैं । कितना अच्छा माहौल हो गया है । कितने अच्छे दिन हैं । पास पड़ोसी भी बिल्कुल अपने जैसे होते हैं, और अपनों से ज्यादा करते भी हैं ।

मानसी ने खाना खाते हुए अलका से पूछा, अच्छा पहले तू यह बता कि तूने क्या बनाया है ? कहीं सब कुछ चाची जी ने ही तो नहीं बनाया है ना ?

नहीं मानसी, आज मैंने दाल बनाई है, सलाद मेंने काटा है और आटा भी मैंने ही गूँद कर दिया है और मम्मी के साथ रोटियां भी सिकवाई हैं इतनी सारी मम्मी की हेल्प की है मैंने ।

हां मुझे पता है, तूने बहुत काम किया होगा क्योंकि तुझे घर के काम बहुत पसंद है ना । मानसी ने चुटकी ली ।

हां यार कुछ तो पसंद होना ही चाहिए, तू पढ़ाई लिखाई में इतनी आगे है तो मैं घर के काम में हो परफेक्ट जाती हूं, यार कुछ तो आना ही चाहिए । वरना जिंदगी में क्या करेंगे ? ऐसे बिना कुछ किये धरे ही रो रो कर कैसे काटेंगे ? अलका हंसते हुए बोली ।

कितने हंसमुख हैं यह सब लोग कभी किसी दुख को दिखाते ही नहीं हैं । एक टाइम ऐसा भी रहा, जब उनका के घर में इतनी दिक्कत हुई, खाने के लिए भी प्रॉब्लम होती, उसके भाई की जॉब नहीं लगी, पापा का एक्सीडेंट हो गया, कोई भी नहीं हेल्प करने वाला, तो मानसी के पापा ने उन लोगों की बहुत मदद करी । कहते भी हैं ना, कि हम जैसा जिसके साथ जैसा करते हैं बदले में हमें वैसा ही मिलता है बल्कि उससे 4 गुना होकर मिलता है अच्छा या बुरा कुछ भी ।

यह लोग जब भी परेशान होते, तो मानसी के पापा हर तरह से हेल्प करने के लिए पहुंच जाते । पैसों से, सामान से, या फिर घर गिरहस्ती के राशन आदि या फिर कपड़े, हर चीज की हेल्प करते, वे उनसे कहते जो भी तकलीफ या परेशानी हो तो हमें बताएं अलका के पापा नहीं रहे तो क्या हुआ मैं तो अभी जिन्दा बैठा हूँ उनका बड़ा भाई ।

हम अगर किसी को फूल देते हैं तो हमें बदले में ज्यादा फूल खुशबू के साथ मिलते हैं अगर हम साफ या सच्चे मन से कोई काम करें तो उसमें सफलता निश्चित है । अल्का और उसकी मम्मी दोनों लोग चले गए लेकिन उसका भाई थोड़ी देर बैठा रहा । वो थोड़ी देर पापा के पास बैठा फिर मानसी के पास आकर बैठ गया और उसको आर्टिकल के लिए तैयारी करते देखता रहा। वो पेंसिल से लिख लिख कर बार बार रबड़ से मिटा रही । तो वह उसको बताने लगा कि इस तरह से लिखो या यह सही करो। इसलिऐ वो काफी देर तक बैठा रहा और उसे समझाता रहा फिर वह चला गया । उसके बड़े भाई के बराबर ही है करीब 32 साल के तो हो ही गए होंगे । भाई की उमर में 1, 2 साल बड़े ही होंगे । उसके अपने भाई तो उससे काफी साल बड़े हैं। बड़े वाले भाई उससे करीब 20 साल बड़े हैं । बस वही सबसे छोटी है घर में इसलिए सबकी लाडली भी है पर वह सब इतनी दूर रहते हैं, जब कभी जरा बहुत देर को मिलते हैं तो अभी उसी वक्त लाड़ प्यार दिखा पाते हैं । वरना उन्हें कुछ नहीं पता कि मानसी अकेले मम्मी-पापा के साथ रह रही है, किस हाल में है, कैसी हैं, उन लोगों को फिक्र इसलिए नहीं है क्योंकि उनकी अपनी गृहस्थी है, अपने बच्चे हैं, घर हैं । छोटे वाले भाई जरूर थोड़ी बहुत देखभाल कर लेते हैं, वैसे उसे किसी चीज कि कोई जरूरत नहीं है लेकिन जब कभी भी उनका आना होता है, तो उसके लिए खूब गिफ्ट आदि लेकर आते हैं, जो कुछ भी उसे चाहिए, वों सब भी दिला जाते हैं। लेकिन इस सब से क्या होता है जब उनकी जरूरत होती थी तब वे पास में नहीं होते हैं ।

अल्का के भाई के जाने के करीब 1 घंटे के बाद अलका ने छत के ऊपर से ही आवाज लगाई, मानसी तू तो आज छत पर सोने को आने वाली है ना, तूने कहा कि तुम छत पर पानी से छिड़काव करोगी लेकिन चाचा जी की तबीयत खराब होने से कुछ कर ही नहीं पायी । पर कोई बात नहीं, मैंने छत पर छिड़काव कर दिया है तू बस सोने के लिए ऊपर आ जाना।

“यार अभी मैं डिबेट की तैयारी कर रही हूँ। 1 घंटे के बाद आती हूँ। तू ऐसा कर कि तू सो जा। मुझे अभी देर लग जायेगी।”

“लगने दो देर, मैं तेरा इंतजार कर रही हूं । तू आज जल्दी सो जा, सुबह उठकर बाकी की तैयारी कर लेना । चाचा जी भी सो गए हैं उनको रेस्ट की जरूरत है ना, तेरी वजह से उनको डिस्टर्ब हो रहा होगा । चाची जी भी सो गयी है ?चल अब तू छत पर आ जा । मैंने यहाँ सोने का मन बना लिया तो आज हम दोनों छत पर ही सोएंगे।“ अल्का ने जिद की ।

“ठीक है मैं आती हूँ। यह तो मैंने ही सोचा और मैंने ही डिसाइड किया कि हम दोनों छत पर सोएंगे, बातें करेंगे, मस्ती करेंगे लेकिन तब इस लेख के बारे में भूल ही गयी । अब इसकी तैयारी ज्यादा जरूरी है ।“,मानसी ने समझाते हुए कहा।

“यार कल संडे है ना, यह भी भूल गई तू, मानसी कल आराम से तैयार कर लेना।” अल्का भी कहाँ मानने वाली ।

“अरे हां यार मैं तो भूल ही गई । पापा के चक्कर में सारी बातें मेरे दिमाग से निकल गई कि कल संडे है । चलो अब कल ही करूंगी । ठीक है मैं अभी आती हूँ।” मानसी ने लाइट बंद की और अपनी चादर तकिया लेकर छत पर आ गयी । छत पर अलका ने चटाई बिछाकर उस पर दरी बिछा रखी है ।

“क्या हम दोनों अकेले ही छत पर सोएंगे ? मानसी को अकेले छत पर सोने में डर का अहसास हुआ ।

“नहीं मानसी, मेरी मम्मी और भाई भी सो रहे हैं । उन दोनों ने उधर फोल्डिंग बिछाया हुआ है वे उस पर लेटे हुए हैं । लेकिन हम दोनों यहाँ जमीन पर ही सोएंगे, ठीक है ना?”

“हाँ तब ठीक है, देख अल्का यह तारे कितने करीब लग रहे हैं, इतने पास हैं, बिलकुल पास कि लग रहा है हाथ बढ़ाओ और छूलो, है ना अल्का ?” मानसी ने तारों की तरफ देखते हुए कहा ।

“हाँ सच में, वैसे मानसी अपना यह छोटा शहर कितना प्यारा है न, यहाँ पर ज्यादा ऊँची ऊँची बिल्डिंग भी नहीं है और सबके पास अपनी अपनी छत भी है ।” अल्का बोली ।

क्रमशः...