Samunder ke us Paar - 5 in Hindi Fiction Stories by Neha kariyaal books and stories PDF | समुंद्र के उस पार - 5

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समुंद्र के उस पार - 5

सब लोग एक जैसे नहीं होते... उन्होंने वादा तो कर दिया था, लेकिन अब उनके दिलों में एक नया बीज अंकुरित हो चुका था- लालच का। 

वे समझ चुके थे कि इस टापू पर मौजूद दुर्लभ खनिज, औषधीय पौधे और वो चमकते हुए फूल - किसी और जगह नहीं मिल सकते।
जिसके लिए उन्होंने बहुत सी यात्राएं भी की थी, लेकिन उन्हें कहीं भी ऐसी अनमोल वस्तुएं नहीं मिली।


प्रोफेसर नैनी की चेतावनियाँ उनके लिए सिर्फ एक कहानी बनकर रह गई थीं।

मुखिया ने, जो अभी भी इंसानियत में विश्वास रखते थे, मेरी बातों पर भरोसा करते हुए उन सबको टापू से सुरक्षित लौट जाने की अनुमति दे दी। 

जाते-जाते उन्होंने मुझसे भी साथ चलने को कहा... "आपके लिए अब यहां कोई मतलब नहीं, चलो हमारे साथ।"
लेकिन मैंने मना कर दिया। "मुझे माफ़ करना... मैं इस जगह का रक्षक बन चुका हूँ।
मैं अब उस दुनिया का हिस्सा नहीं रहा।" जिसे मैंने बहुत पहले छोड़ दिया था।
मैं जानता था - अगर मैं गया, तो ये पवित्र जगह सुरक्षित नहीं रह पाएगी।

वो सब वापस लौट गए... शहर में।
और जैसे ही वे पहुंचे, उन्होंने संस्था के बड़े अधिकारियों को सब कुछ बता दिया – उस टापू के बारे में, वहां के खजानों के बारे में, और वहां के रहस्यों के बारे में। 

जिस जगह को छुपा कर रखा गया था सालों तक... वो अब खतरे में आ चुकी थी। 
मनुष्यों की लालच से भरी नज़र उस पर मौनद्वीप पर पड़ चुकी थी।

संस्था के अधिकारी उस टापू के बारे में सुनते ही सक्रिय हो गए। उन्हें वहां छिपी संपदा की खबर मिल चुकी थी।

अब जल्द से जल्द वे वहां पहुंचना चाहते थे। ताकि वे सभी अनमोल वस्तुओं को निकाल कर यहां ला सके । 

कुछ दिनों बाद एक नई टीम बनाई जाती है-  ये टीम पहली टीम से बिल्कुल अलग थी, क्योंकि इस बार टीम प्रोफेशनल्स की, हथियारों से लैस, पूरी तैयारी के साथ थी।

उधर, टापू पर मुझे सब कुछ पहले से आभास सा होने लगा था। ऐसा लग रहा था जैसे कुछ बहुत बड़ी अनहोनी होने वाली थी।
कबीले के लोग भी बेचैन से थे- हवा में बदलाव महसूस हो रहा था। पक्षियों की उड़ान, पेड़ों की सरसराहट... सब किसी अनहोनी की चेतावनी दे रहे थे।

टीम शहर से मौनद्वीप की ओर निकल चुकी थी। वे लोग पूरी तैयारी के साथ थे।
और आदिवासी लोग इन सब बातों से अंजान थे।

एक रात मैंने देखा – दूर समुद्र के किनारे पर कुछ नावें आकर रुकी हैं।
दूरबीन से देखा तो वे लोग उसी संस्था के थे, जिनके साथ मेरी पुरानी टीम थी।
मैं समझ गया अब समय आ गया है। सही में प्रकृति का रक्षक बनने का।
मैं जल्दी से मुखिया के पास पहुंचा और उन्हें सारी बात बताई।

थोड़ी ही देर में पूरे काबिले को बुला लिया गया और कहा "हमें अब सिर्फ प्रार्थना नहीं करनी है... हमें अपनी धरती, अपने जंगल को बचाना होगा।"
पहले तो काबिले के लोग घबरा गए। फिर उन्होंने एक जुट हो कर मुकाबला करने की ठान ली थी।

कबीले के लोगों के पास आधुनिक हथियार नहीं थे, लेकिन फिर भी वे अपने जंगल, अपनी प्रकृति और अपने घर की रक्षा के लिए पूरी तरह मर मिटने को तैयार थे। 

उधर, शहर से आए लोग अब जंगल के भीतर तक पहुंच रहे थे। उन्होंने वहां से बहुमूल्य खनिज और जड़ी-बूटियाँ निकालनी शुरू कर दी थीं। वे धीरे-धीरे उस द्वीप के अस्तित्व को ही मिटा रहे थे।

मैं ये सब देख रहा था... और हर बीतते पल के साथ मेरा हृदय भारी होता जा रहा था। कबीले के लोग, जो इतने सीधे-सादे थे, अब अपनी आखिरी सांस तक उस टापू को बचाने के लिए लड़ने को मजबूर हो गए थे।

कहां वे मासूम कबीले वाले और कहां आधुनिक तकनीकों से लैस टीम के सदस्य। 
ये तो सरासर अन्याय था। 

जब लालच अपनी सीमाएं पार कर गया, तब कबीले वालों ने मुकाबला करने का निर्णय लिया। और फिर शुरू हुई एक भयावह लड़ाई... हमारी टीम ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया था। कबीले के ज़्यादातर लोग मारे गए... जंगल की आत्मा घायल हो गई... और जो बच, वो छिप गए।

चारों तरफ आग से लिपटा जंगल था।

लेकिन उस तबाही में, सबसे ज़्यादा टूट मैं गया था।
उन शहर वालों के चेहरे पर एक बार भी पछतावे की लकीर नहीं आई। उन्हें बस चाहिए था जंगल की समृद्धि और मैं? 
मैं वहाँ खडा... बस देखता रहा... मैं जानता था - इस सब का ज़िम्मेदार मैं भी था। 
अगर मैंने उन्हें उस द्वीप के बारे में न बताया होता, तो शायद ये सब कभी न होता।
अंदर से मैं टूट चुका था, अब मैं सिर्फ एक जिंदा लाश बन गया था। 

 सब कुछ नष्ट करने के बाद जब वे मुझे भी जबरन अपने साथ शहर ले गए, तो मेरा मन पहले ही मर चुका था। 
 वापस लौटने के बाद मैं उदास रहने लगा। जो भी हुआ मैं उसे कभी भूल नहीं सकता था।

कुछ दिनों बाद, मैंने वो नौकरी छोड़ दी... और उसी कॉलेज में प्रोफेसर की नौकरी कर ली।
मैंने सोच लिया था कि अब से मैं बच्चों को प्रकृति का महत्व समझाऊंगा।
जो भी मेरे और उस मौनद्वीप के साथ हुआ वो दोबारा कभी नहीं होगा।

जो दर्द मेरे भीतर था, वो कभी किसी से कह नहीं पाया लेकिन उस दर्द को शब्दों में ढालकर इस किताब में जरूर उतारा है।
ताकि जो तब हुआ, वो फिर कभी न हो... इतना कहते-कहते प्रोफेसर नैनी की आंखें भर आईं।
वे चुपचाप अपने गम में डूब गए... क्योंकि आज भी उन्हें लगता था उस तबाही में उनका भी एक हिस्सा है।

तृषा भी इस पूरी कहानी से बहुत दुखी थी। लेकिन वह प्रोफेसर से कहती है, "इसमें आपकी कोई गलती नहीं है। कृपया खुद को दोष मत दीजिए।" 

रवि भी सहमति में कहता है, "हां प्रोफेसर, आपने जो किया, वो आपके विवेक से किया... आपने किसी का बुरा नहीं चाहा।" बल्कि अपने तो आदिवासी कबीले की हर सम्भव मदद की थी।

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद, तृषा प्रोफेसर से पूछती है, "क्या आपको पता है, बाद में उस टापू पर क्या हुआ?" प्रोफेसर नैनी धीमे स्वर में कहते हैं, "नहीं...
मेरे लौट आने के बाद वहां क्या हुआ, मुझे भी कभी पता नहीं चला।"
मुझे तो लगता है वहां कोई गया भी नहीं होगा।
और जाते भी क्यों सब कुछ तो पहले ही समाप्त हो चुका है।

तृषा कुछ सोचते हुए पूछती है, "तो फिर... आज भी उस टापू पर वो रोशनी कैसी?
वो क्यों दिखाई देती है?"

प्रोफेसर मुस्कुराते हैं और कहते हैं, "ये तो वहीं जाकर ही पता चलेगा।"
तृषा के चेहरे पर अब दृढ़ता थी। "हां... मैं जाऊंगी। 

मैं जानना चाहती हूं कि उस रोशनी के पीछे क्या है।" रवि उत्साह से कहता है, "मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगा।" तृषा हल्की मुस्कान के साथ कहती है, "ठीक है, चलना।
लेकिन याद रखना, वहां खतरा भी हो सकता है।" रवि आत्मविश्वास से कहता है, "मुझे खतरों से डर नहीं लगता। लेकिन... हम जाएंगे कैसे?"

प्रोफेसर कहते हैं...

"मैंने तृषा को उस जगह का नक्शा पहले ही दे दिया है। तृषा पुष्टि करती है, "हां, मेरे पास है वो नक्शा।"

प्रोफेसर दोनों की ओर देख कर गम्भीर स्वर में कहते हैं, "अगर इस देश के सभी नौजवान तुम दोनों जैसे सोचने लगें, तो हमारी प्रकृति को कभी कोई खतरा नहीं होगा। 
मुझे विश्वास है, तुम अपने उद्देश्य में जरूर सफल होंगे।"
प्रोफेसर नैनी उन्हें वहां की कुछ और जानकारी देते हैं।
उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि वे ये सच को जान सकते हैं।

और यहीं से शुरू होती है तृषा की यात्रा।

वे दोनों अपने-अपने होस्टल लौटते हैं। रात को तृषा अपनी डायरी में कुछ लिखती है...
शायद अब मैं अपनी मंजिल से दूर नहीं।

 कुछ दिनों बाद उनकी परीक्षा होने वाली थी।
अगली सुबह तृषा रवि से कहती है.. क्यों न हम परीक्षा समाप्त होने के बाद चले। 
इस पर रवि भी हां, कह देता है। फिर वे दोनों पुस्तकालय की ओर चले जाते हैं।***

तृषा और रवि पूरे मन से परीक्षा की तैयारी में जुट जाते हैं।

थोड़े ही दिनों में उनकी परीक्षा भी समाप्त हो जाती है।
अब समय था मौन द्वीप जाने का।

 परीक्षा समाप्त होने के बाद रात में अपने अपने होस्टल वे मौनद्वीप जाने के लिए बैग तैयार कर रहे थे।

सुबह उन्हें एक नए सफर पर जो निकलना था- एक ऐसा सफर जो सिर्फ रहस्य की ओर नहीं, बल्कि उस सच्चाई की ओर था,
जो अब तक अनदेखी थी...अगली सुबह सूरज की पहली किरणों के साथ ही तृषा और रवि तैयार खड़े थे। तृषा ने कहा,
“समुद्र के उस पार जाने से पहले… मैं अपने गांव जाना चाहती हूं… अपनी दादी से मिलना है।”

तृषा की यात्रा...

आगे...