Yashaswini - 28 in Hindi Fiction Stories by Dr Yogendra Kumar Pandey books and stories PDF | यशस्विनी - 28

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यशस्विनी - 28

........................रोहित एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं।उन्होंने संसार से पूरी तरह वैराग्य भाव धारण कर लिया था और गुरु से तप के लिए हिमालय क्षेत्र में जाने की आज्ञा मांगी थी।कोविड 19 महामारी की खतरनाक पहली लहर के बीच रोहित 2021 के अगस्त महीने में निकल तो पड़े थे ज्ञान की खोज में लेकिन यह उनके जैसे आधुनिक विचार वाले युवक के लिए एकाएक आसान कार्य नहीं था।तार्किक मन आस्था को स्वीकार नहीं करता।वह किसी भी अलौकिक कार्य को तर्क की कसौटी पर कसना चाहता है।

रोहित ने स्वामी विवेकानंद की जीवनी पढ़ी हुई है।श्री नरेंद्र भी एकाएक स्वामी विवेकानंद नहीं बन गए थे।बचपन से ही जिज्ञासु,मानवता के प्रति तड़प रखने वाले श्री नरेंद्र भी श्री रामकृष्ण परमहंस के सानिध्य में आकर ही उन प्रश्नों के उत्तर प्राप्त कर पाए थे, जिन्हें उनका तार्किक मन ढूंढा करता था। सत्य की खोज कोई हंसी खेल नहीं है। ऐसा नहीं होता कि बस मन में क्षण भर का वैराग्य आया और अगले ही क्षण घोषणा कर दी किसी ने,कि मैंने सब कुछ जान लिया है।एक दीर्घ साधना के बाद मन श्री नरेंद्र जैसा बनता है और श्री रामकृष्ण परमहंस जैसे गुरु की प्राप्ति भी ईश्वरीय कृपा से ही होती है।

    रोहित ने हिमालय पर्वत की ऊंचाई की ओर चढ़ना प्रारंभ किया। सुबह से शाम हो गई। रोहित रास्ता भटक गया। बर्फीली हवाओं का चलना प्रारंभ हो गया था। रात गहराने लगी थी और चलना मुश्किल था। दूर एक पहाड़ी पर रोशनी टिमटिमाती हुई दिखाई दी। रोहित ने उधर लड़खड़ाते हुए कदम बढ़ाए। अचानक उसे ठोकर लगी और वह बेहोश हो गया। 

उसे लगा जैसे वह गहरी नींद में जा रहा है।

वह जैसे गहरी तंद्रा में ही मानो विचित्र से स्थानों की यात्रा करते हुए हजारों वर्ष पूर्व के युग में जा पहुँचा था और उसने अपनी आंखों के सामने अनेक  घटनाओं को घटित होता हुआ देखा था........ आखिरी दृश्य जो रोहित ने एक बार फिर देखा वह था.........श्री कृष्ण और अर्जुन का संवाद ........ इसके बाद जैसे यह दृश्य धुंधला पड़ने लगा....... अर्धनिद्रा में रोहित ने देखा...........श्री कृष्ण के जैसी एक आकृति  उसके सामने उभरी.... सिर पर मोर पंख है और हाथ में बांसुरी.. श्री कृष्ण उनके सम्मुख हैं और वे...... झुककर उसके सिर पर स्नेह से हाथ फेर रहे  हैं...... इसके बाद रोहित मूर्छित हो गया....... उसे कुछ भी याद नहीं  रहा....... कि  उसके साथ क्या-क्या हो रहा है..........

              आज आश्रम के कुछ शिष्य निचली पहाड़ियों के क्षेत्र में वन औषधियों की तलाश में भ्रमण कर रहे थे। एक युवक उन्हें जमीन पर बेहोश अवस्था में पड़े हुए दिखे। ठंड से हाथ पांव बिल्कुल सुन्न और सर्द थे…..पैरों में छाले थे, श्वास बस चल रही थी।उनके गेरूए वस्त्र फटे हुए थे……. आश्रम के साधक बेहोश पड़े रोहित को उठाकर स्वामी मुक्तानंद जी के पास पहुंचे। स्वामी जी कुछ देर के लिए सोच में पड़ गए। उन्होंने कुछ क्षण अपनी आंखें बंद की और मुस्कुराते हुए आंखें खोलते हुए कहा,

" ये एक विशिष्ट व्यक्ति हैं। जिस ज्ञान और सत्य की खोज में भारतीय परंपरा में अनेक दिव्य आत्माओं ने सभी तरह की भौतिक सुख सुविधाओं को तिलांजलि देकर और अपने किसी सुखद भविष्य की संभावना को पूरी तरह त्याग कर अपना घर बार छोड़ा है,उसी परंपरा में चलने का प्रयत्न करने वाला यह भी एक सच्चा साधक है।इसे आश्रम के औषधालय के विश्राम कक्ष में रखो।"साधकों ने तुरंत आज्ञा का पालन किया।

अगले कई दिनों तक भी रोहित बेहोशी की हालत में रहे और न जाने वे क्या स्वप्न देखे जाते थे और बीच-बीच में कभी अपने दोनों हाथ नमस्कार मुद्रा में जोड़ देते थे तो कभी अचानक चिल्ला उठते थे।

औषधालय पहुंचने के 15 से 20 दिनों के भीतर रोहित की चेतना धीरे-धीरे लौटने लगी थी। स्वामी मुक्तानंद नियमित रूप से औषधालय पहुंचते थे और वे रोहित का उपचार कर रहे प्रमुख वैद्य दिव्यकृति से रोहित के स्वास्थ्य की अद्यतन जानकारी लेकर उन्हें आवश्यक निर्देश दिया करते थे।

आश्रम वासियों की मेहनत रंग लाई। एक दिन रोहित ने कठिनाईपूर्वक आंखें खोलीं। सामने आश्रम के साधकों को देखकर उसके चेहरे पर एक चमक आ गई।

"पुत्र क्या नाम है तुम्हारा?"स्वामी मुक्तानंद का स्वर गूंजा।

"र….रोहित…।" रोहित ने कठिनाईपूर्वक जवाब दिया।

स्वामी जी और रोहित के मध्य सामान्य चर्चा का क्रम शुरू हुआ।

"हिमालय के इस दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में किस उद्देश्य को लेकर आए हो?"

"मुझे स्वयं भी ज्ञात नहीं है स्वामी जी, शायद मैं स्वयं को ही ढूंढने के लिए निकला हूं।"

"यह तो अद्भुत बात हुई पुत्र! स्वयं को जानने की ऐसी तीव्र कामना बिरले ही लोगों को हुआ करती है।पर तुम्हारी यह दशा कैसे हो गई?"

   रोहित कुछ बताना चाहते थे लेकिन मुख से शब्द नहीं निकल पा रहे थे और उसकी कठिनाई को देखकर स्वामी मुक्तानंद जी ने स्वयं मना कर दिया और कहा,"जब तुम पूरी तरह स्वस्थ हो जाओगे तो चर्चा करेंगे।अभी तुम्हें विश्राम की आवश्यकता है।"

  कक्ष के एक कोने में वैद्य दिव्यकीर्ति ने स्वामी जी को रोहित  की शय्या से दूर ले जाते हुए बताया,"संभवत: कई दिनों की भूख-प्यास और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र की चढ़ाई के कारण इनकी यह दशा हो गई है।पूरा शरीर ज्वर से तप रहा है। कमर की कुछ नसों को छोड़कर शरीर के अंगों को कोई विशेष चोट या क्षति नहीं पहुंची है।मैंने औषधि दे दी है और दो से तीन दिनों में ज्वर के उतरते ही ये तेजी से स्वस्थ होना शुरू हो जाएंगे।"

स्वामी मुक्तानंद ने राहत की सांस ली और वैद्य जी से विदा लेकर औषधालय से बाहर निकल गए।

  वैद्य दिव्यकीर्ति के दल ने तत्काल श्रेष्ठ उपचार प्रारंभ करते हुए रोहित को लगभग 15 दिनों में ही पूरी तरह स्वस्थ कर दिया।जब अगले दिन से ही रोहित की आयुर्वेद पंचकर्म चिकित्सा शुरू हुई तो वह थोड़ा सकुचा रहा था।पंचकर्म सहायक ने विभिन्न औषधि गुणों से युक्त पत्तों को कूटना पीसना और उसमें दिव्य जड़ीबूटियों का मिश्रण शुरू किया।जब उसने रोहित से पेट के बल लेटने के लिए कहा तो वह समझ गया था कि अब मुझे अपनी अत्यधिक तार्किक सोच को एक किनारे रखकर प्रभु की नियति मानकर इस आश्रम की व्यवस्था का पालन करना चाहिए और दिए जा रहे उपचार को पूरे मन से ग्रहण करना चाहिए। 

रोहित का सघन उपचार जारी रहा। उसे आज भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के महत्व का भी ज्ञान हो रहा था।

स्वयं वैद्य दिव्यकीर्ति रोहित के उपचार की व्यक्तिगत देखरेख कर रहे थे और पंचकर्म प्रक्रिया के दौरान रोहित ने उनसे अनेक प्रश्न भी पूछे।

"इस तरह की उपचार प्रक्रिया में समय अधिक लगता है आचार्य जी!"

वैद्य जी ने जवाब दिया,"ऐसा आवश्यक नहीं है रोहित!यह समय रोगी की स्थिति और रोग की गंभीरता को देखते हुए निर्धारित किया जाता है।"

"मुझे हजारों वर्ष पुरानी भारत की इस उपचार प्रणाली का आज प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा है आचार्य जी! यह सर्वाधिक उपयोगी और व्यावहारिक पद्धति है।"रोहित ने कहा।

आचार्य जी ने मुस्कुराते हुए कहा,

"विश्व की सभी मान्य चिकित्सा पद्धतियों की अपनी विशेषताएं हैं। किसी को अस्वीकार करना या अनुचित घोषित करना सही नहीं होगा। सभी अपनी तरह से रोगियों की पीड़ा को दूर करने की ही कोशिश करते हैं।"

"आपने सही कहा आचार्य जी और मुझे इस आयुर्वेद पद्धति से उपचार मिल रहा है,यह मेरे लिए एक अलौकिक अनुभव है। जब मैंने पहली बार आश्रम में लाए जाने के बाद अपनी आंखें खोलीं,तो मुझे ऐसा लगा, जैसे मेरा पुनर्जन्म हुआ है।यहां प्राकृतिक परिवेश है और आश्रम में तो यहां के कण-कण में,पवन के प्रत्येक झोंके में,यहां जल की हर एक बूंद में चिकित्सा है।"

रोहित ने धीरे-धीरे अपने अनुभव बताते हुए कहा।

रोहित के पूरे शरीर की मालिश हो रही थी। अभ्यंग की यह प्रक्रिया न सिर्फ शरीर के तापमान को नियंत्रित रखती है, बल्कि इससे शरीर में रक्त और अन्य आवश्यक द्रव्यों का प्रवाह भी सुगमता से होता है।

  वैद्य जी ने कहा,"प्रकृति में सभी चीज संतुलित है और शरीर में भी यही प्राकृतिक संतुलन है। गड़बड़ी भी तभी उत्पन्न होती है,जब संतुलन गड़बड़ा जाता है,चाहे प्रकृति हो,या शरीर हो। शरीर में रोगों के प्रमुख कारक तीन दोष हैं वात,कफ और पित्त। इनका संतुलन बिगड़ने से विभिन्न विकार पैदा होते हैं और इन्हें संतुलित करने के लिए पंचकर्म चिकित्सा महत्वपूर्ण है।"

वैद्य जी ने सहायकों से वस्ति क्रिया प्रारंभ करवाई। रोहित ने कहा,"आप सत्य कह रहे हैं आचार्य जी! जिस तरह एक निश्चित समय अवधि के बाद गाड़ी की सर्विसिंग आवश्यक होती है, वैसा ही हमारा शरीर है, जिसके लिए समय-समय पर देखरेख और इसे कार्यक्षम बनाए रखने के लिए योग,प्राणायाम से लेकर आवश्यकता के अनुसार औषधि उपचार सभी आवश्यक हैं।"

    रोहित का उपचार जारी है लेकिन मन में प्रश्नों की श्रृंखला भी। जिन प्रश्नों को लेकर वह महेश बाबा के आश्रम से सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय कर इस आश्रम में पहुंचा है, क्या उसे उन प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे? घायल अवस्था में आश्रम पहुंचे रोहित का उपचार तो कुछ ही दिनों में हो जाएगा लेकिन उसकी प्रिय मित्र यशस्विनी के चले जाने के बाद जो रिक्तता उसके हृदय में उत्पन्न हुई है और अपने भविष्य के विराट अभियान में जिस कमी को वह महसूस कर रहा है, उसकी पूर्ति कैसे हो पाएगी? क्या मन की पीड़ा का भी कोई समाधान है?

          

क्रमशः 

योगेंद्र