Yashaswini - 35 in Hindi Fiction Stories by Dr Yogendra Kumar Pandey books and stories PDF | यशस्विनी - 35

Featured Books
  • એક સ્ત્રીની વેદના

    એક અબળા,નિરાધાર, લાચાર સ્ત્રીને સમજવાવાળું કોઈ નથી હોતું. એક...

  • Icecream by IMTB

    આ રહી આઈસ્ક્રીમનો ઇતિહાસ + ભારતની ત્રણ દિગ્ગજ બ્રાન્ડ્સ (Hav...

  • પારિવારિક સમસ્યાઓ અને સમાધાન

    પરિવાર માનવ જીવનની સૌથી નાની પણ સૌથી મહત્વપૂર્ણ એકમ છે. માણસ...

  • ભ્રમજાળ - 1

    #ભ્રમજાળ ભાગ ૧: લોહીના ડાઘ અને લાલ રંગ​અમદાવાદની ભીડભાડવાળી...

  • એકાંત - 105

    રવિએ પ્રવિણને જણાવી દીધુ હતુ કે, એ બીજે દિવસે હેતલને મનાવીને...

Categories
Share

यशस्विनी - 35


प्रज्ञा ने विवेक की बातें फोन पर सुन ली थीं।प्रज्ञा और विवेक दोनों ही आश्रम के लिए नए हैं।प्रज्ञा ने अपने फोन करने का उद्देश्य बताया।

"विवेक जी!आज तो रात बहुत हो गई है लेकिन इस आश्रम में प्रातः 5:30 बजे सामूहिक ध्यान और योग का अभ्यास होता है।क्या आप इसमें आ सकेंगे?"प्रज्ञा ने पूछा।

विवेक ने बताया,"क्यों नहीं?मैं तो स्वयं योग और ध्यान में आस्था रखता हूं। मैं इस आश्रम के लिए नया हूं और चाहूंगा कि अनेक बातें हम लोगों को यहां एक साथ सीखनी-जाननी होंगी और यहां अपने-अपने उद्देश्य को लेकर उन्हें पूरी भी करनी होगी,इसलिए हम लोगों का एक साथ वहां पहुंचना ही अच्छा रहेगा।"

प्रज्ञा ने कहा,"ओके विवेक जी!मैं भी यही चाहती हूं।गुड नाइट!"

"शुभ रात्रि प्रज्ञा जी!"विवेक ने कहा।

     यह हिमालय क्षेत्र की एक सर्द रात थी और रात्रि को लगभग 12:00 बज रहे थे।यह अक्टूबर का महीना है,लेकिन तापमान लगभग शून्य से तीन डिग्री के आसपास।

      विवेक तड़के ही 4:30 बजे उठ गया। लगभग बर्फ से जमे हुए पानी में स्नान के स्थान पर रसोईघर क्षेत्र में जल रहे तीन बड़े चूल्हों में गर्म पानी की व्यवस्था थी।विवेक ठीक 5:25 बजे योग कक्ष में पहुंच गया। उसे आश्चर्य हुआ कि ठीक इस समय स्वामी मुक्तानंद और योग प्रशिक्षक मंच पर पहुंच चुके थे।साधक भी अपनी-अपनी जगह पर विराजमान थे।यह अत्यंत अनुशासित व्यवस्था थी।

      स्वामी मुक्तानंद ने योग और ध्यान के संबंध में अनेक बातें बताईं और सभी ने सामूहिक योग तथा ध्यान का अभ्यास भी किया।

      स्वामी मुक्तानंद ने अगली भेंट में विवेक और प्रज्ञा को धार्मिक ग्रंथो के गहन अध्ययन का निर्देश दिया। विवेक और प्रज्ञा किसी बड़े मार्गदर्शन की आशा से आए थे ,लेकिन यहां तो स्वामी जी ने उन्हें पुस्तक पढ़ने के कार्य में संलग्न कर दिया, यह सोचकर वे थोड़ा आश्चर्य चकित थे।

      विवेक को रहने के लिए जो कक्ष प्रदान किया गया था, उसका बाहरी भाग एक छोटा पुस्तकालय था।सैकड़ों,धार्मिक, वैज्ञानिक और साहित्य ग्रंथ उसमें रखे हुए थे। स्वामी मुक्तानंद ने विशेष रूप से विवेक को यह कक्ष और इससे लगा हुआ पुस्तकालय इसलिए आवंटित किया था, ताकि विवेक दिन या रात जब चाहे तब इन ग्रंथो का अध्ययन कर कोई सूत्र ढूंढने की अपनी ओर से कोशिश कर सके।अब इस अध्ययन कार्य में स्वामी जी के निर्देश पर प्रज्ञा भी उसके साथ जुटने वाली थी।

                    सुबह की पहली किरण निकलने से पूर्व ही विवेक योग और ध्यान के नियमित अभ्यास को पूर्ण कर चुका था। पाठशाला से लगे हुए भोजन कक्ष में सभी साधक प्रातः 8:00 बजे एकत्र होते हैं।वहीं विवेक की फिर प्रज्ञा से भेंट हुई। स्वामी मुक्तानंद के निर्देश पर पहले तो विवेक को थोड़ी झिझक थी कि प्रज्ञा उसके कक्ष में स्थित पुस्तकालय में आकर साथ ही अध्ययन करेगी लेकिन उसका मन सात्विक और बिना कलुषता के था।

            विवेक इस आश्रम में आने से पहले चारों वेदों और कुछ उपनिषदों का अध्ययन कर चुका था और अब आश्रम में श्रीमद् भागवत  की बारी थी।

विवेक ने सेल्फ में से श्रीमद् भागवत का पहला अध्याय निकाला और फिर टेबल पर रखकर इसका अध्ययन शुरू किया।नोट्स बनाने का काम प्रज्ञा ने शुरू किया। कभी आवश्यकता होने पर महाभारत, तो कभी श्रीमद्देवी भागवत और इसी तरह अनेक धर्म ग्रंथो तथा साहित्यिक ग्रंथों की सहायता ली गई। इस काम में महीनों लगने वाले थे और प्रज्ञा ने लिखना शुरू किया।

       श्रीमद् भागवत का अध्ययन और उससे आधुनिक जीवन की समस्याओं का समाधान ढूंढने के लिए उपयोगी जीवन सूत्र प्राप्त करने का प्रयास ……….जैसे श्री शुकदेव जी महाराज और सम्राट परीक्षित के बीच संवाद का एक नया संस्करण …आधुनिक संदर्भ में पूरे श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ जीवन सूत्र ढूंढने की एक नई कोशिश …. वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ…वे सृष्टि के उद्भव और विकास की कहानी को नए सिरे से खंगालने की कोशिश कर रहे हैं…यहां वक्ता और श्रोता परस्पर विवेक तथा प्रज्ञा दोनों ही हैं…. कभी एक बोलता है तो दूसरा सुनता है और कभी दूसरा बोले, तो पहला सुनता है….. प्रसंगों को ढूंढने का काम विवेक करता है और प्रज्ञा वॉइस टाइपिंग से अपने लैपटॉप में ही सीधे नोट्स बनाते जाती है।

प्रश्न पूछने का काम विवेक का रहता है तो उत्तर देने का काम नेहा करती है। वाचन का काम अधिकतर विवेक ही संपन्न करता है।

कभी-कभी देर रात तक पढ़ने और कुछ समझने तथा सूत्र ढूंढने का प्रयास चलते रहता है।

                आज विवेक और प्रज्ञा, च्यवन ऋषि-सुकन्या तथा इला के सुद्युम्न नमक पुरुष बन जाने की घटना का विशेष उल्लेख करते हुए अपने धर्म ग्रंथो के अध्ययन का कार्य रोकने की सूचना स्वामी मुक्तानंद को देना चाहते थे। अब उन्हें आगे मार्गदर्शन अपेक्षित था।दोनों ने स्वामी मुक्तानंद से भेंट के लिए प्रातः कालीन योग अभ्यास के सत्र में जाने का निर्णय लिया। वहां उन्हें स्वामी जी से स्वयं की चर्चा के लिए जरूर समय मिल जाता।

       विवेक और प्रज्ञा को वहां दो अन्य व्यक्ति भी आश्रम के साधक -साधिकाओं से अलग दिखाई दिए।वे मुख्य मंच पर पीछे की ओर एक कोने में बैठे थे। विवेक और प्रज्ञा उनसे थोड़ी दूरी पर बैठे थे।वे साइंटिस्ट नेहा और कंप्यूटर फील्ड के एक्सपर्ट रोहित थे,जो स्वयं भी एक विशेष उद्देश्य को लेकर पिछले कई महीनो से आश्रम में थे। यह एक संयोग था कि विवेक और प्रज्ञा पिछले 20 दिनों से आश्रम में ठहरने की अवधि में रोहित और नेहा से परिचित नहीं हो पाए थे।    

     योग का सत्र पूरा होने के बाद स्वामी मुक्तानंद ने चारों को एक दूसरे से मिलवाया और उन्हें वहीं प्रतीक्षा करने का निर्देश देकर अपने निज साधना कक्ष में लौट गए।रोहित और नेहा एक दूसरे को पहले ही जान चुके थे,लेकिन इन चारों का एक साथ इकट्ठा होना एक अद्भुत संयोग था।वे सभी एक साथ स्वामी मुक्तानंद को अपने कार्य में हुई प्रगति का विवरण देना चाहते थे।स्वामी मुक्तानंद के बुलावे में अभी देर थी।चारों को परस्पर मिलकर अत्यंत प्रसन्न हुईं और वे आपस में बातें करने लगे।विवेक ने रोहित से पूछा,"आप तो कंप्यूटर एक्सपर्ट है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में भी काफी काम कर चुके हैं लेकिन इस आश्रम में आपका आना किन परिस्थितियों में हुआ?

क्रमशः 

योगेंद्र