Yashaswini - 41 in Hindi Fiction Stories by Dr Yogendra Kumar Pandey books and stories PDF | यशस्विनी - 41

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यशस्विनी - 41

छठी इंद्री

        रोहित जैसे नींद से जाग उठे हों,आश्चर्य से सभी को देखने लगे। स्वामी मुक्तानंद वापस अपने आसन पर पहुंचे। उन्होंने धीर गंभीर वाणी में कहना शुरू किया,"नेहा बेटी! भविष्य में भले ही नितांत आवश्यकता हो जाए लेकिन वर्तमान में मुझे अलग से फोर्थ जेंडर के रूप में धरती पर एक नई प्रजाति का विकास करना उचित प्रतीत नहीं हो रहा है।इससे अनेक सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक खतरे उत्पन्न हो जाएंगे।नर और नारी का सदियों से चला आ रहा शाश्वत और पवित्र रिश्ता,आपसी समझ और दोनों द्वारा मिलकर दायित्वों का पालन अपने आप में श्रेष्ठ है।जब फोर्थ जेंडर के आने के बाद नए रिश्ते बनेंगे,तो उन रिश्तों को सामाजिक वैधानिक दायरे में परिभाषित करना अत्यंत कठिन हो जाएगा।गंभीरतापूर्वक विचार किया जाए तो विवाह संतति को लेकर भी अनेक उलझनें उत्पन्न हो सकती हैं।"

सभी उत्सुकतापूर्वक स्वामी जी की बातें सुन रहे थे। उन्होंने अपनी बातें जारी रखीं," अतः मेरा सुझाव यही है नेहा कि पृथक से फोर्थ जेंडर की प्रजाति पर अनुसंधान करने के बदले मनुष्य में ही और विशेष रूप से नारियों में तुम्हारे द्वारा बताए गए फिफ्थ जेंडर के गुणों को योग से प्राप्त ऊर्जा और ध्यान की आध्यात्मिक शक्ति से जगाना……छठी इंद्री को शिव जी के त्रिनेत्र की तरह जाग्रत करना और अन्य बाह्य सुरक्षा मानकों व आत्मरक्षा की सावधानियों का पालन करते हुए विकसित करने का प्रयास किया जाए। तुम्हारा यह फोर्थ जेंडर वर्तमान स्त्रियों और पुरुषों दोनों में भगवान देवाधिदेव शिवजी के तीसरे नेत्र और मनुष्य शरीर की छठी इंद्रिय की तरह कार्य करे,उसे खतरों से बचाए और ऐसी स्थिति में हमलावर को तत्काल मुंहतोड़ जवाब दिया जा सके।"

         नेहा ने प्रसन्नतापूर्वक सहमति में सिर हिलाया।उसे अपने अनुसंधान को एक परिवर्तित रूप में जारी करने का निर्देश प्राप्त हो गया था। अब वह अमेरिका में स्वामी जी के निर्देश को ध्यान में रखकर आगे अनुसंधान करेगी  आगे स्वामी जी ने एक महत्वपूर्ण घोषणा की,"रोहित ने पंचमहाभूतों की साधना पूर्ण कर ली है।ब्रह्मांड के सर्वशक्तिमान ईश्वर तत्व की फ्रीक्वेंसी से रोहित की फ्रीक्वेंसी सुमेलित हो गई है।अब उसमें पारलौकिक और अतिमानवीय शक्तियां जाग्रत हो गई हैं।रोहित दिन- रात अपने कान्हा जी की आराधना किया करता है।भगवान बांके बिहारी जी की जिस बांसुरी का स्पर्श कर और उसे अपने मस्तक से लगाकर रोहित ध्यान में डूब जाया करता है,वह बांसुरी अब सिद्ध हो गई है।अब रोहित अंतर्यामी बनकर लोगों की अनेक संभव मनोकामनाओं को पूर्ण करने की स्थिति में पहुंच गया है।"

स्वामी जी के मुंह से यह उद्घोषणा सुनकर सभी आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता से भर उठे।

प्रज्ञा ने साहस करते हुए स्वामी जी के सामने एक जिज्ञासा रखी,"तो क्या पलक झपकते ही रोहित जी लोगों की पीड़ा हर लेंगे,रोगियों को स्वस्थ कर देंगे और गरीबों को सुख सुविधाएं देकर उनके अभावों को दूर कर देंगे?"

स्वामी जी ने कहा,"एक सीमा तक,क्योंकि प्रकृति के संतुलन को ईश्वर के सिवा कोई नहीं बदल सकता है।मनुष्य के कर्मों का फल अगर क्रियमाण कर्म के फल के रूप में इसी जन्म में अपने समय से मिल जाता है,तो कुछ कर्मों के फल संचित होकर अगले जन्म के लिए स्थानांतरित हो जाते हैं और यही आगामी जन्म में उसके प्रारब्ध बनकर  विशिष्ट सुख या दुख के रूप में उसे प्राप्त होते हैं।रोहित इस प्राकृतिक न्याय व्यवस्था में हस्तक्षेप नहीं कर पाएंगे लेकिन वह एक बड़ी सीमा तक कर्मों के दुष्प्रभाव और आसन्न विपरीत फलों से उत्पन्न होने वाले अन्य नए दुष्प्रभावों को रोक पाएंगे। केवल रोहित ही क्यों, अपनी - अपनी सीमा और क्षमता के अनुसार कोई भी सामान्य मनुष्य भी ईश्वर का नाम स्मरण करते हुए और उनकी आराधना करते हुए ईश्वर की कृपा से ऐसा करने में सक्षम हो सकता है।"

     विवेक ने सहज जिज्ञासावश पूछा,"तो क्या रोहित भाई अब जनता के बीच जाकर उनके दुख और उनकी समस्याओं को दूर करने के लिए मार्गदर्शन हेतु कोई पावन दरबार लगा सकते हैं?"

स्वामी मुक्तानंद ने कहा,"हां,रोहित ऐसा कर सकते हैं, पर कोई पावन दरबार लगाना उनकी इच्छा और कार्य करने की उनकी शैली पर निर्भर रहेगा। पारलौकिक दिव्य शक्तियों को प्राप्त करने में सक्षम हो चुके साधक को अनेक सावधानियां भी बरतनी पड़ती हैं और लोभ,क्रोध,वासना,कामना, मोह,अहंकार आदि चित्त की दूषित वृत्तियों से हमेशा के लिए दूर रहना पड़ता है।"

  रोहित अपने आसन से उठकर स्वामी मुक्तानंद के पास पहुंचे और उनके चरणों में दंडवत प्रणाम किया। स्वामी मुक्तानंद ने आशीर्वाद देते हुए कहा,"उठो रोहित,अब अपना जीवन हमारे भारतवर्ष और संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए समर्पित कर दो।बस यह ध्यान रखना कि मन में कभी अहंकार न आए और इन दिव्य शक्तियों का कभी दुरुपयोग न हो,अन्यथा ये एक क्षण में समाप्त भी हो जाएंगीं।"

रोहित ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा, "जी स्वामी जी,आपकी आज्ञा शिरोधार्य है। मैं एक अकिंचन कृष्णभक्त और साधारण सेवक बनकर ही जनता की सेवा करना पसंद करूंगा।जिन अलौकिक शक्तियां की आपने चर्चा की है, उनका उपयोग मैं स्वयं नहीं करूंगा,आवश्यकता के अनुसार भगवान बांके बिहारी जी ही मुझसे वैसा करवाएंगे और वह भी जन कल्याण के लिए,स्वयं के लिए सुख-साधनों को इकट्ठा करने के लिए नहीं। मैं लोगों की पीड़ा दूर करने के लिए प्रयास करूंगा पर किसी चमत्कार या लोकप्रियता के उद्देश्य से नहीं। भविष्य में मैं क्या कर पाऊंगा,यह भगवान बांके बिहारी जी की इच्छा और आपके निर्देश पर ही निर्भर होगा स्वामी जी!"

"तथास्तु रोहित!" स्वामी जी ने कहा।

         रोहित अभी आश्रम में ही रुके हैं।देह और आत्मा को लेकर रोहित के मन का अंतर्द्वंद्व अब समाप्त हो चुका है।उनका मन प्रफुल्लित है।उन्होंने सोचा,देह से आत्मा की यात्रा के कई सोपान हो सकते हैं, यहां तक पहुंचने के लिए कई रास्ते हो सकते हैं, लेकिन सभी का अंतिम लक्ष्य यहीं आकर आत्म तत्व और महा आनंद तक पहुंचकर ही पूर्ण होता है।कोई यह नहीं कह सकता है कि यही रास्ता सही है और दूसरा गलत। सब अपने-अपने तरीकों से इस सत्य और आनंद को प्राप्त कर लेना चाहते हैं।रोहित को दिव्य शक्तियों को प्राप्त कर लेने के बाद भी अहंकार नहीं है।उन्हें अभी भी यह स्मरण है कि वे पूर्ण नहीं हैं और एक साधारण मनुष्य ही हैं। साधना के क्षेत्र में वही मनुष्य आगे बढ़ सकता है,जिसके मन में कोई अहंकार न हो, जो सिद्धियों का दुरुपयोग ना करें, बल्कि उसका उपयोग केवल जन कल्याण के लिए करे।

(क्रमशः)