मेरा नाम आरव मल्होत्रा है, और मैं झूठ बोलने में माहिर हूँ। लेकिन जो कहानी मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ, वो सच है। हर एक शब्द। हर एक पल। क्योंकि कुछ सच इतने भयानक होते हैं कि उन्हें झुठलाया नहीं जा सकता।
मुंबई की उस बरसाती रात को जब मैंने पहली बार मायरा को देखा था, मुझे नहीं पता था कि मेरी ज़िंदगी एक ऐसे भंवर में फंसने वाली है जिससे मैं कभी बाहर नहीं निकल पाऊँगा। वो एक आर्ट गैलरी में खड़ी थी, काली साड़ी में, एक पेंटिंग के सामने इतनी तन्मयता से देख रही थी मानो वो तस्वीर उससे कुछ कह रही हो। उसके लंबे काले बाल उसकी पीठ पर लहरा रहे थे, और जब उसने मुड़कर मुझे देखा, तो मुझे लगा जैसे समय रुक गया हो।
उसकी आँखें। भगवान, उसकी वो आँखें। गहरी, रहस्यमय, और किसी अनकहे दर्द से भरी हुई।
"ये पेंटिंग आपको पसंद है?" मैंने पूछा, हालाँकि मुझे कला से कोई खास लगाव नहीं था। मैं वहाँ अपने एक मुवक्किल से मिलने आया था। मैं एक मनोचिकित्सक हूँ, मुंबई के सबसे महंगे क्लिनिक में।
उसने मुझे देखा, लेकिन कुछ नहीं बोली। बस देखती रही, जैसे मेरी आत्मा को पढ़ने की कोशिश कर रही हो।
"मायरा," उसने आखिरकार कहा, अपना हाथ बढ़ाते हुए। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी कँपकँपी थी, जैसे वो बोलने से डर रही हो।
मैंने उसका हाथ थामा। उसकी उंगलियाँ बर्फ की तरह ठंडी थीं।
उस रात के बाद, मायरा मेरे दिमाग से नहीं निकली। मैं उसके बारे में सोचता रहा, उसकी उन खामोश आँखों के बारे में, उस अधूरे वाक्य के बारे में जो उसने पेंटिंग के बारे में कहना शुरू किया था लेकिन बीच में ही रुक गई थी।
तीन दिन बाद, वो मेरे क्लिनिक में थी।
"डॉक्टर मल्होत्रा," रिसेप्शनिस्ट ने इंटरकॉम पर कहा, "एक मायरा सिन्हा आपसे मिलना चाहती हैं। उनका कोई अपॉइंटमेंट नहीं है।"
मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
जब वो मेरे कमरे में दाखिल हुई, तो मैंने देखा कि उसकी कलाई पर नीले निशान थे। किसी की उंगलियों के निशान। किसी ने उसे बहुत ज़ोर से पकड़ा था।
"मुझे मदद चाहिए," उसने धीरे से कहा, और उसकी आँखों में आँसू आ गए। "मैं... मैं अपने पति को मारना चाहती हूँ।"
मैं अपनी कुर्सी पर जम गया। इक्कीस साल के अपने करियर में मैंने हज़ारों मरीज़ देखे थे, लेकिन किसी ने भी ऐसा सीधा इकबाल नहीं किया था।
"बैठिए, मायरा," मैंने कहा, अपनी आवाज़ को स्थिर रखने की कोशिश करते हुए। "शुरू से बताइए।"
वो बैठ गई, अपने हाथ अपनी गोद में मोड़ते हुए। काफी देर तक वो कुछ नहीं बोली। बस खिड़की से बाहर देखती रही, जहाँ मुंबई की भीड़भाड़ वाली सड़कें थीं।
फिर उसने बोलना शुरू किया।
"विक्रांत... मेरे पति... वो एक सफल बिजनेसमैन हैं। सिन्हा इंडस्ट्रीज के मालिक। बाहर से देखने में हम परफेक्ट कपल लगते हैं। बड़ा घर, पैसा, शोहरत। लेकिन अंदर..." उसकी आवाज़ टूट गई।
मैंने उसे पानी दिया। उसने एक घूँट लिया और जारी रखा।
"शादी के पहले साल सब ठीक था। फिर धीरे-धीरे बदलाव आने लगा। पहले छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा, फिर चीखना-चिल्लाना, और फिर..." उसने अपनी आस्तीन ऊपर की। उसकी बाँहों पर पुराने और नए, दोनों तरह के निशान थे।
मेरे अंदर गुस्सा भर आया, लेकिन मैंने खुद को काबू में रखा। "आपने पुलिस को क्यों नहीं बताया?"
उसने कड़वी हँसी हँसी। "पुलिस? डॉक्टर साहब, विक्रांत सिन्हा के खिलाफ कोई केस दर्ज नहीं होता। उनकी पहुँच हर जगह है। मैंने एक बार कोशिश की थी। अगले दिन वो पुलिस अधिकारी हमारे घर डिनर पर आया था।"
"तो आप क्या चाहती हैं?" मैंने पूछा, हालाँकि मुझे जवाब का अंदाज़ा था।
"मैं चाहती हूँ कि आप मुझे समझाएँ कि मैं पागल नहीं हूँ," उसने कहा, अब सीधे मेरी आँखों में देखते हुए। "क्योंकि हर कोई, मेरे माँ-बाप, मेरे दोस्त, सब कहते हैं कि विक्रांत एक अच्छा इंसान है और मुझे उनकी कद्र करनी चाहिए। मैं सोचने लगी हूँ कि शायद गलती मुझमें है। शायद मैं वाकई पागल हूँ।"
"आप पागल नहीं हैं, मायरा," मैंने धीरे से कहा। "आप एक एब्यूसिव रिलेशनशिप में फँसी हैं। और हम मिलकर इससे निकलने का रास्ता ढूँढेंगे।"
उसने पहली बार मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन वो मुस्कान उसकी आँखों तक नहीं पहुँची।
अगले तीन महीनों में, मायरा मेरी नियमित मरीज़ बन गई। हफ्ते में दो बार वो आती, और हर बार हम उसकी ज़िंदगी की एक और परत खोलते। मैं उसे थेरेपी देता, उसकी बातें सुनता, और धीरे-धीरे उसमें आत्मविश्वास जगाने की कोशिश करता।
लेकिन कुछ और भी हो रहा था। कुछ जिसे मुझे नहीं होने देना चाहिए था।
मैं उससे प्यार करने लगा था।
ये गलत था। ये अनैतिक था। ये मेरे पेशेवर आचार संहिता के खिलाफ था। लेकिन दिल किसी नियम को नहीं मानता।
एक शाम, बारिश में भीगी हुई, वो मेरे क्लिनिक आई। उसका चेहरा सूजा हुआ था, होंठ फटा हुआ था।
"उसने फिर मारा," उसने कहा, और मेरी बाँहों में गिर पड़ी।
मैंने उसे सँभाला, उसे बिठाया, उसके घावों पर मरहम लगाई। और फिर, मैंने वो किया जो मुझे नहीं करना चाहिए था।
मैंने उसे चूम लिया।
वो एक पल के लिए स्तब्ध रह गई, फिर उसने जवाब दिया। हम दोनों जानते थे कि ये गलत है, लेकिन उस पल में कुछ भी सही नहीं लग रहा था सिवाय एक-दूसरे के।
"भाग चलो मेरे साथ," मैंने उसके कान में फुसफुसाया। "हम कहीं दूर चले जाएँगे, जहाँ विक्रांत हमें नहीं ढूँढ पाएगा।"
"वो हमें ढूँढ लेगा," उसने कहा, लेकिन उसकी आवाज़ में उम्मीद की एक किरण थी। "वो हमेशा ढूँढ लेता है।"
"तो हम उससे पहले कुछ करेंगे," मैंने कहा, और तभी मुझे एहसास हुआ कि मैं क्या कह रहा हूँ।
मायरा ने मुझे देखा, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। "तुम मेरी मदद करोगे?"
मैंने सिर हिलाया। "हाँ। मैं तुम्हारी मदद करूँगा।"
और उस रात, हमने एक योजना बनाई। एक ऐसी योजना जो या तो हमें आज़ाद कर देगी, या हमेशा के लिए बर्बाद कर देगी।
लेकिन मुझे नहीं पता था कि मायरा मुझसे एक राज़ छुपा रही थी। एक ऐसा राज़ जो हर चीज़ को बदल देगा।
एक ऐसा राज़ जिसके लिए मैं कभी तैयार नहीं था।
***
दो हफ्ते बाद, विक्रांत सिन्हा की लाश उनके ही घर में मिली। गोली उनके सिर में लगी थी। और मायरा... मायरा गायब थी।
पुलिस ने मुझसे पूछताछ की। मैंने उन्हें बताया कि मायरा मेरी मरीज़ थी, लेकिन मैंने उनसे कुछ भी निजी नहीं कहा। डॉक्टर-पेशेंट कॉन्फिडेंशियलिटी।
लेकिन इंस्पेक्टर रणवीर चौहान मुझ पर शक कर रहा था। मैं उसकी आँखों में देख सकता था।
"डॉक्टर मल्होत्रा," उसने कहा, मेरे क्लिनिक में बैठते हुए, "मायरा सिन्हा आखिरी बार आपसे कब मिली थी?"
"दो दिन पहले," मैंने झूठ बोला। सच ये था कि वो उस रात मुझसे मिली थी जिस रात विक्रांत मरा था।
"और उसने कुछ अजीब बात नहीं की? कोई संकेत नहीं दिया कि वो कुछ करने वाली है?"
मैंने सिर हिलाया। "नहीं। वो डिप्रेशन में थी, लेकिन खुदकुशी या हत्या का कोई संकेत नहीं था।"
चौहान ने मुझे गौर से देखा, फिर उठ खड़ा हुआ। "अगर आपको कुछ याद आए, तो मुझे बताइएगा।"
जब वो चला गया, तो मैंने अपने फोन पर एक मैसेज देखा। एक अननोन नंबर से।
"मुझसे मिलो। वो पुरानी जगह पर। आज रात ११ बजे। अकेले आना। - M"
मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा। मायरा ज़िंदा थी।
लेकिन क्या वो सच में वो थी जो मैं सोच रहा था? या कुछ और खेल चल रहा था?
उस रात ११ बजे, मैं उस पुरानी इमारत के पास पहुँचा जहाँ हम पहली बार मिले थे - वो आर्ट गैलरी। अब वो बंद हो चुकी थी, अँधेरे में डूबी हुई।
मैं अंदर गया। बारिश फिर से शुरू हो गई थी, और बिजली चमक रही थी।
"आरव।"
मैं मुड़ा। वो वहीं थी, उसी काली साड़ी में, उसी जगह खड़ी जहाँ मैंने उसे पहली बार देखा था।
"मायरा," मैं उसकी ओर दौड़ा, लेकिन वो पीछे हट गई।
"मत आओ पास," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में कुछ अलग था। ठंडा। दूर।
"क्या हुआ? विक्रांत... वो मर गया। अब तुम आज़ाद हो। हम साथ हो सकते हैं।"
उसने हँसना शुरू किया। एक ऐसी हँसी जो मेरी रीढ़ में सिहरन भेज गई।
"आज़ाद? आरव, तुम समझे नहीं।"
"तो समझाओ मुझे।"
उसने अपने पर्स से कुछ निकाला। एक डायरी। और उसे मेरी ओर फेंक दिया।
मैंने उसे उठाया और पहला पन्ना खोला। वहाँ लिखा था:
"आज मैंने एक नए शिकार को चुना है। उसका नाम आरव मल्होत्रा है। वो एक मनोचिकित्सक है। परफेक्ट। क्योंकि जो मैं करने वाली हूँ, उसके लिए मुझे एक ऐसे इंसान की ज़रूरत है जो मेरे मन को समझ सके... और फिर भी मुझे न समझ पाए।"
मेरे हाथों से डायरी छूट गई।
"तुमने... तुमने शुरू से योजना बनाई थी?"
"हर एक पल," मायरा ने कहा, अब मेरे करीब आते हुए। "विक्रांत की हिंसा, वो सारे घाव, वो सारी कहानियाँ... सब सच थीं, आरव। लेकिन वो पूरा सच नहीं था। क्योंकि मैंने भी उसे मारा। हर बार। और उसे इतना प्रोवोक किया कि वो मुझे मारे।"
"क्यों?" मेरी आवाज़ एक फुसफुसाहट बनकर रह गई।
"क्योंकि मैं जानना चाहती थी," उसने कहा, "कि प्यार करने वाला एक इंसान कितनी दूर तक जा सकता है। और तुम, आरव, तुम परफेक्ट साबित हुए। तुमने अपनी नैतिकता, अपना करियर, सब कुछ दाँव पर लगा दिया... मेरे लिए।"
मुझे चक्कर आने लगा। "तो विक्रांत को किसने मारा?"
मायरा मुस्कुराई। "तुमने।"
"नहीं! मैं उस रात वहाँ नहीं था!"
"तुम्हें याद है वो कॉफी जो मैंने तुम्हें दी थी उस रात?" उसने कहा। "उसमें एक दवा थी। एक ऐसी दवा जो तुम्हें सब कुछ भुला देती है। तुम वहाँ थे, आरव। तुमने गोली चलाई। तुम्हारे फिंगरप्रिंट्स उस बंदूक पर हैं जो मैंने समुद्र में फेंक दी।"
नहीं। ये सच नहीं हो सकता। ये...
लेकिन तभी मुझे याद आया। उस रात मेरे कपड़ों पर खून के धब्बे। जिन्हें मैंने शराब की वजह से लगा हुआ सोचा था।
"तुमने मुझे इस्तेमाल किया," मैंने कहा, गुस्से और दर्द के मिश्रण में।
"मैंने तुमसे प्यार किया," मायरा ने कहा, और पहली बार उसकी आँखों में आँसू थे। "मैं अब भी करती हूँ। लेकिन मैं वो हूँ जो मैं हूँ। और मैं बदल नहीं सकती।"
पुलिस की साइरन की आवाज़ सुनाई दी। वो करीब आ रही थी।
"तुमने उन्हें बुलाया?" मैंने पूछा।
"हाँ," उसने कहा। "क्योंकि ये कहानी का अंत होना चाहिए। लेकिन मैं तुम्हें एक चॉइस दे रही हूँ, आरव। तुम भाग सकते हो। अभी। मैं तुम्हें पाँच मिनट दूँगी।"
"या?"
"या तुम रुक जाओ। और मेरे साथ इस कहानी का असली अंत देखो।"
पुलिस की गाड़ियाँ अब इमारत के बाहर थीं।
मैंने मायरा को देखा, उसकी उन खूबसूरत, धोखेबाज़ आँखों को।
और मैंने अपना फैसला किया।
एक ऐसा फैसला जो मेरी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल देगा।