उसी बीच एक वरिष्ठ वैज्ञानिक शांत कदमों से उसकी ओर बढ़े। वे थे - प्रोफेसर विलियम। उनके चेहरे पर अनुभव की झुर्रियाँ थीं, पर आँखों में अब भी मिशन की चमक बची थी। वो आद्विका के पास आए और कहा, "तुम्हारा स्वागत है, आद्विका। ये मिशन अब तुम्हारे साथ पूरा होगा।
पहले तो वह सहम गई फ़िर
उस ने प्रोफेसर से पूछा- सर आपने मुझे ही क्यों चुना? मैं तो अनुभवी भी नहीं हूं? बस एक मामूली सी विद्यार्थी हूँ।
प्रोफेसर विलियम ने मुस्कुराकर जबाव दिया- हमने तुम्हें चुना तुम्हारी सोच, लग्न और मुश्किल समय में सही निर्णय को देख कर। हमें लगता है तुम इस मिशन के लिए बेहतर हो।
आद्विका प्रोफेसर का आभार व्यक्त करती है। क्योंकि उसके लिए ये सब एक सपने के जैसा था।
तभी प्रोफेसर बोले - चलो तुम्हें इस मिशन की जानकारी देते हैं... हमने इस मिशन को नाम दिया है- 'एक और जीवन
ये नाम मानव जाति को ध्यान में रख कर और एक नए जीवन की खोज के लिए एक दम सटीक है।
आद्विका आस पास रखी सभी चीज़ों को ध्यान से देख रही थी कि वे उसे तीन अन्य लोगों से मिलवाते हैं
निशांत - एक भारतीय खगोलभौतिकी विशेषज्ञ,
सैम - एक अमेरिकी बायो-इंजीनियर, पायलट,
और मॉरिश - एक यूरोपीय पायलट और तकनीकी विश्लेषक।
ये तीनों वो लोग थे जो अब आद्विका के साथ टाइटन की ओर जाने वाले थे।
आद्विका के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी। उसे यक़ीन नहीं हो रहा था कि वह उस मिशन का हिस्सा बन चुकी है जिसका सपना उसने वर्षों से देखा था।
लेकिन तभी, प्रोफेसर विलियम थोड़े गंभीर हो जाते हैं। उन्होंने आद्विका की आँखों में देखा और कहा "मैं तुम्हें कुछ ज़रूरी बात बताना चाहता हूँ, और चाहता हूँ कि तुम पूरी सच्चाई जानकर ही हाँ कहो।"
एक पल का मौन... "इस मिशन की सफलता की संभावना बहुत कम है।
हमें नहीं पता कि टाइटन की सतह कैसी है, वहाँ की हवा, वहाँ की ज़मीन, वहाँ के तत्व क्या वे इंसानी जीवन के अनुकूल हैं या नहीं। और सबसे बड़ी बात हमें नहीं पता कि तुम लोग लौटोगे या नहीं। यह सिर्फ़ एक अनुमान है... एक कोशिश।"
ये सुनकर आद्विका की साँस थम सी गई। वो चुप रही... जैसे एक आँधी अंदर उठी हो सपनों और डर के बीच खड़ी।
लेकिन तभी प्रोफेसर की आवाज़ फिर गूँजती है: "पर हमारे पास यही एक रास्ता है।
अगर हम आज नहीं गए तो कल सिर्फ़ पछतावा बचेगा, जीवन नहीं।"
आद्विका ने गहरी साँस ली। उसके अंदर कुछ टूट रहा था, पर उसी में से कुछ जुड़ भी रहा था। उसने प्रोफेसर की आँखों में देखा और धीरे से सिर हिलाया "मैं जाऊँगी।
क्योंकि अगर जीवन की एक और शुरुआत कहीं हो सकती है, तो हमें उसकी ओर पहला क़दम उठाना ही होगा।"
शाम का समय... 🌠
शाम ढल रही थी। आसमान पर हल्की गुलाबी परत थी, जैसे सूरज भी धीरे-धीरे धरती से विदा ले रहा हो। आद्विका घर लौटी - चुपचाप।
उसके चेहरे पर ना खुशी थी, ना ग़म... बस एक गहरी सोच।
आँगन में उसके पिता जॉन खेतों से लौट रहे थे, हाथों में मिट्टी थी, पर माथे पर उम्मीद। अंदर रसोई से माँ की चूड़ियों की आवाज़ आ रही थी शायद वो आज उसका पसंदीदा खाना बना रही थीं।
पर आद्विका उस सब से दूर, चुपचाप अपने कमरे में चली गई। कमरे की दीवारें वैसी ही थीं, जैसी उसने बचपन से देखी थीं किताबों की अलमारियाँ, खिड़की से झाँकती रोशनी, और वही पुराना बेड जिस पर वो सपनों की दुनिया में खो जाती थी।
कमरे की खिड़की से एक हल्की पीली सी रोशनी अंदर आ रही थी, उसकी किताबें बिखरी थीं, और एक पुरानी डायरी खुली पड़ी थी। अद्विका बेड के पास जमीन पर बैठ जाती है।
उसकी आंखे कमरे की हर चीज को देख रही थी। जैसे वो उसे कुछ कहे रही हो।
उसे पता था जिस रास्ते पर वो अब जा रही है, वो सिर्फ़ दूरी से नहीं, डर से भी भरा था।
लेकिन उसे जाना था अपने पिता के खेतों के लिए, अपनी माँ की चूड़ियों की आवाज़ के लिए, और उन सब के लिए, जिन्हें जीवन अभी और जीना था।
कमरे में सन्नाटा था...
थोड़ी ही देर में दरवाज़ा धीरे से खुला। जॉन भीतर आए। उन्होंने अपनी बेटी को नीचे बैठा देखा। धीरे से बोले, "क्या हुआ मेरी बच्ची...? ऐसे क्यों बैठी हो?" आद्विका ने ऊपर देखा।
उसकी आँखें भरी थीं, लेकिन शब्द सधे हुए। "कुछ नहीं पापा... बस आपको कुछ बताना चाहती हूँ।" "तो कहो ना, डरो मत।" जॉन मुस्कराए।
"पापा मुझे एक मिशन के लिए चुना गया है एक ऐसा मिशन जो धरती से बहुत दूर है।
जॉन की आँखें चमक उठीं, "ये तो बहुत अच्छी बात है! तुम्हारी मेहनत रंग लाई... तुम्हारी पढ़ाई किसी के काम आ रही है। मुझे तुम पर गर्व है!"
लेकिन आद्विका शांत रही।
एक पल रुकी... फिर धीरे से कहा "पापा, ये मिशन... धरती से बाहर का है।
मुझे... अंतरिक्ष में जाना होगा।" हम सब के लिए और अगर कोई न गया तो कुछ बचेगा भी नहीं।
जॉन की मुस्कान रुक गई। साँस जैसे थम गई हो। कमरे में अचानक एक भारी सन्नाटा छा गया।
आद्विका ने उनकी आँखों में देखा और कहा "मुझे पता है ये आसान नहीं होगा... पर यह ज़रूरी है।
धरती के जीवन को बचाने का एक ही रास्ता है वहाँ जाना, जहाँ अब तक कोई नहीं पहुँचा।
और शायद हम न लौटें... पर अगर गए नहीं, तो लौटाने लायक कुछ बचेगा भी नहीं..."
आद्विका की बात सुनकर जॉन जैसे भीतर से टूट गया। वो कुछ नहीं बोला... पर उसके चेहरे पर उग आई चिंता की लकीरें उसके दिल की बेचैनी बयाँ कर रही थीं।
एक पल को वो दीवार की ओर देखने लगा जहाँ आद्विका का बचपन का एक फ़ोटो टँगा था, जिसमें वो मिट्टी से सने हाथों में एक फूल लिए मुस्करा रही थी। जॉन ने उसकी तरफ़ देखा और धीरे से बोला "अगर तुम वापस नहीं लौटी तो...? अगर मैं... तुम्हें देखे बिना ही चला गया तो...?" ये शब्द जैसे किसी पत्थर पर हथौड़े की चोट हों।
आद्विका कुछ पल चुप रही।
फिर अपने पापा के पास जाकर धीरे से उनका हाथ थामते हुए बोली...
"पापा... मुझे कुछ नहीं होगा। मैं अकेली नहीं जा रही मेरे साथ मेरी एक टीम है।
ये मिशन कुछ ही दिनों का है, मैं जल्दी लौट आऊँगी... आपके पास, माँ के पास, हमारे खेतों के पास..." लेकिन जॉन उसकी आँखों में देख रहा था।
आज उसकी बच्ची उससे झूठ बोल रही थी उससे झूठी उम्मीद दे रही थी।
जॉन ने कहा..."मुझ से झूठ मत कहो, आद्विका। मैं जानता हूँ, तुम क्या छुपा रही हो।
तुम लौटो या ना लौटो, पर जो जा रहा है वो मेरी बेटी है... मेरा गर्व भी, मेरा डर भी।"
अद्विका का गला भर आया। फिर भी उसने खुद को सम्भाला और कहा "पापा... बस यही मान लीजिए, कि अगर मैं गई तो शायद कुछ और बेटियाँ, कुछ और ज़िंदगियाँ बच जाएँ। हम सब तो वैसे भी मर ही रहे हैं ना धीरे-धीरे, हर रोज़।
पर अगर मैं गई... तो शायद किसी और की साँसें बच जाएँ।" कमरे में एक चुप्पी थी, भारी और गीली। जॉन एकदम चुपचाप बैठा रहा।
उसकी नन्ही परी आज बहुत बड़ी हो गई है जो कभी एक कॉकरोच से डरती थी आज दुनियां बचाने के लिए अपनी जान को जोख़िम में डाल रही है।
ये सब उसके दिमाग़ में चल रहा था।
फिर बहुत देर बाद उसने कहा "ठीक है... अगर तुम जाना चाहती हो, तो मैं तुम्हें नहीं रोकूँगा।"
जॉन उठने लगा, पर रुक गया। "पर तुम्हारी माँ... क्या तुमने सोचा है उसे क्या कहोगी?"
अद्विका की आँखों में एक चमक आई। वो हल्के से मुस्कराई और बोली "माँ से कहूँगी आपकी बेटी चाँद पर जा रही है…”
जॉन और अद्विका अभी बात कर ही रहे थे, कि रसोई से माँ की आवाज़ आई "चलो अब खाना ठंडा हो रहा है..." जॉन ने अद्विका की ओर देखा और मुस्कराते हुए कहा "चलो, अब थोड़ा खाना खा लो, और अपनी माँ से भी बात कर लेना।
वो सब समझ जाएँगी।"
दोनों कमरे से बाहर निकले। टेबल पर रोज की तरह माँ ने गरम गरम रोटियाँ, दाल, और अद्विका का पसंदीदा खिचड़ा परोसा था। पर आज सब कुछ वैसा होकर भी कुछ बदला-बदला था।
अद्विका चुपचाप बैठी रही उसकी उंगलियाँ थाली में पड़े चावल को हल्के से घूमाती रहीं।
माँ ने देखा तो पूछा "क्या हुआ बेटा...? ध्यान कहाँ है तुम्हारा?" अद्विका चौंकी, फिर हल्के से मुस्कराकर बोली "कुछ नहीं माँ... बस ऐसे ही..."
माँ उसकी आँखों को देख रही थी। वो जानती थी कि उसकी बेटी कभी ऐसे चुप नहीं रहती।
खाना खाने के बाद...
जॉन अपने कमरे में चला गया। माँ भी उठने लगी तभी आद्विका ने धीमे स्वर में पुकारा "माँ..."
माँ रुक गई। पीछे मुड़कर देखा "हाँ बेटा, बोलो।"
अद्विका कुछ पलों तक चुप रही, फिर धीमे से बोली कुछ नहीं।
मां मुस्कुरा कर चली जाती है।
थोड़ी देर बाद
आद्विका रसोई में माँ को देखती है और धीमे से कहती है "माँ... मुझे कहीं जाना है।" माँ हाथ में थाली थामे पलटती है, "कहाँ?"
अद्विका अपनी माँ से आँखें नहीं मिला पा रही थी। इसलिए उसने पास रखे सामन को टटोलते हुए बोला...
"एक मिशन पर... पृथ्वी से बाहर जाना होगा।
कुछ दिनों बाद हम वापस आ जाएँगे..."
उसने एक सांस में सबकुछ बोल दिया।
माँ वहीं पास की कुर्सी पर बैठ गई थाली उसके हाथ से फिसलकर नीचे जा गिरी।
मां की आँखें आद्विका के चेहरे पर टिकी गई, पर होंठों पर कोई शब्द नहीं थे।
कुछ देर की खामोशी के बाद
पीछे से जॉन की आवाज आती है "जाने दो उसे... कम से कम कुछ अच्छा करने के लिए तो जा रही है।"
मां अभी भी चुप थी।
आद्विका ने जब देखा उसके पिता की आँखें नमी से भरी थीं, लेकिन आवाज में हिम्मत थी।
माँ अब भी कुछ नहीं बोली, फिर धीरे से पूछा "जाना कब है?"
"कुछ दिनों बाद..." आद्विका ने कहा। "तैयारी पूरी करनी है।" माँ बस सिर हिलाती है। "ठीक है... तो अब सो जाओ। सुबह जल्दी उठना है।"
सब अपने-अपने कमरों में चले जाते हैं। वो रात – जब सब सो चुके थे... पर आद्विका को नींद कहाँ...? वो खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई। बाहर एक सन्नाटा पसरा था
आसमान में तारे धीरे-धीरे चमक रहे थे, जैसे कोई उससे कुछ कहना चाहता हो। उसकी आँखों में मिशन की तस्वीरें थीं, पर दिल में माँ की खामोश आँखें और पापा की थमी हुई साँसें। वो खड़ी रही... घंटों तक... बिना कुछ बोले, बिना कोई आहट किए। जब थक गई, तो चुपचाप जाकर लेट गई।
जाने का समय...🍁
- विदा लेने का वो आखिरी लम्हा सुबह आद्विका तैयार थी। उसकी माँ ने उसके लिए वही बनाया जो उसे बचपन से पसंद था हल्की मिठास वाली दलिया, घी की रोटी, और नींबू का अचार।
आद्विका तैयार होकर दरवाज़े पर आती है।
मां ने उसे माथे पर चूमा और कहा... "जल्दी लौट आना..." लेकिन जॉन ने कुछ नहीं कहा।
वो बस वहीं खड़ा रहा, आँखों में समंदर लिए, पर चेहरे पर एक ख़ामोशी ओढ़े।
आद्विका ने माँ-बाप को गले लगाया, और बिना पीछे देखे अपने मंज़िल की ओर चल पड़ी ।
जहाँ भविष्य उसका इंतज़ार कर रहा था।
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